तीस घटा पाँच बराबर आज़ाद और मुकद्दस औरत (पतनशील पत्नियों के नोट्स से)

नीलिमा चौहान
पेशे से प्राध्यापक नीलिमा समाकालीन बहुचर्चित लेखिकाओं में से एक हैं. प्रकाशित पुस्तकें: पतनशील पत्नियों के नोट्स, 'बेदाद ए इश्क' (संपादित) संपर्क : neelimasayshi@gmail.com. 

आज़ाद मिजाज़ हूँ इसलिए बर्दाश्त नहीं कि माहवारी के जुर्म में आप मुझपर तमाम तरह की बंदिशें लगाएँ। आप कहते हैं कि नए जमाने के खुले ख़यालात वाले हैं इसलिए आपने पुरानी तरह की वाहियात सोचों से किनारा कर लिया है और महीने से होने वाली जनानियों से अब आपको ज़्यादा परेशानी नहीं हुआ करती। वो बात दीगर है कि चूँकि आप अमनपसंदों को खून खराबे से और नतीजतन बहने वाले खौफनाक लाल रंग से हमेशा से ही नफरत रही है इसलिए आप माहवारी के खून से सनी औरत को अपने से दूर ही रखना चाहते हैं।लहू का लाल रंग आपको हिंसा की याद दिलाता है। चुनाँचे आप माहवारी की मारी औरतों के पाक लिबास पर इसका एक धब्बा तक देखना गवारा नहीं कर पाते। वही तो मैंने कहा कि आपके पिछ्ड़े और तंग किस्म के खयालात अब बदल चुके हैं और अब आपको माहवारी वाली औरत से बू ,हिकारत और बदमज़गी कहाँ होती है आप तो उसको घरों, दफ्तरों, सड़कों - सब जगहों पर बर्दाश्त कर लिया करते हैं। बस वो क्या है कि देवालयों के देवताओं से आप सीधे सुच्चे लोग कोई पंगा-वंगा लेना नहीं चाहा करते इसलिए आप बस केवल वहाँ माहवारी वाली औरत के दाखिले का कोई समर्थन नहीं किया करते। जिस लहू से बुतों तक को बदपरहेजी है उसको लेकर कोई सवाल,कोई एतराज आप क्योंकर करने-सुनने लगें भला ? आपके इस नेक खयाल की बलिहारी जाउँ कि जब हमारे उन दो चार दिन मंदिर में न जाने से इतनी पुरानी रवायतें, तहजीबें बचती हैं तो क्या हर्ज है इन पाबंदियों को मान लेने से?

आपकी फिक्रमंदी वाजिब है जनाब कि बुतों को क्या पता कि कौन औरत माहवारी से है और कौन नहीं ? कौन शातिर भक्तिन अपनी नापाक हालात को राज़ रखकर बुतों के नज़दीक चले जाने की ख्वाहिश रखती है। सो इस उज्र से निजात पाने के लिए आपने एकाध जगह चोर- उचक्कों की शिनाख़्त करने जैसी कोई मशीन -वशीन लगाकर औरतों के अंदरूनी सच की जाँच कर ही ली तो क्या ख़ता तो हो गई ? बिल्कुल बिल्कुल !  बराबरी और इज़्ज़त दिलों में होने की शै हुआ करती हैं। इस तरह की मामूली किस्म की बंदिशों को पाबंदियाँ मान लेना कहाँ की समझदारी है। देखिए कुदरत ने औरतों के साथ जो किया सो किया पर हम जैसी तरक्की पसंद जिंसों का फर्ज ही है इस तरह की कुदरती नाइंसाफियों की भरपाई करना । सो औरतों को कमरों में कैद कर देना या छुआछूत करना जैसी जाहिलाना हरकतें गैर इंसानियत का नमूना है। बस औरतें खुद उन पाँच दिनों की सब्र मिजाजी का नमूना पेश करती चलें तो तय्यिबा कहलाती चलें और सोचें कि बाकी दिनों तो बराबरी की मौज ही है न ।

कामख्या मंदिर में योनि और माहवारी  पूजा 


जनाब आदमी खुले में पेशाब कर किया करें कोई बात नहीं। अपने जरूरी अंगों की खलिश को मनमाफिक अंदाज़ और में खुजाकर मिटाया करें तो कोई मसला नहीं। औरतों पर बनी तमाम गालियों से अपने मुँह का और दूसरों के कान का ज़ायका बढ़ाया करें तो कोई मुद्दा नहीं। किसी भी राह चलती औरत के बदन को अपनी आंखों से स्कैन करते हुए या रातों  के अँधेरों में मुश्तजनी से बर्खास्त चिपचिपाहट से सने हुए बुतख़ानों में सर नवाने पहुँच जाया करें कोई ख़ता नहीं । मर्दों के ऐसे राज़ न तो किसी एक्स्रे मशीन पे जाहिर हुआ करते हैं न ही बेचारे बुतों की इतनी औकात ही हुआ करती है कि वो ऐसी नापाक बंदगी को नाकुबूल कर पाते हों ।  पर औरतों की माहवारी पर आपकी नज़रबीनी ज़रा कमज़ोर पड़  जाए तो आपको लगता है कि मंदिरों - मस्जिदों  पर कयामत टूट पड़ेगी। रवायत , कौम , मुल्क , सभ्यता सबके सब दोज़ख में तब्दील हो जाएँगे। अजी निहायत ही नेक ख़याल वाले जन हैं आप तो। सवाल यह है कि खुदा के मिजाज़ और पाकीज़गी के सौ कैरेट खरे रखवालों के करम का एहसान खुदा उतारेगा कैसे ?

आपने सही फरमाया जनाब कि अपनी ज़िंदगी के आठ -नौ साल लहू बहाने में ज़ाया करने वाली औरत जात कभी मर्दों की ताकत, हुनर और हिम्मत का मुकाबला नहीं कर सकती । इसलिए आपने इंतज़ामे खानादारी और पाप -पुण्य से जुड़ी तमाम तहज़ीबों की सारी नाज़ुक ज़िम्मेदारी हमारे ही कांधों पर डाल दी है। बैठे-बैठे इतना तो कर ही सकती हैं न दीन और दुनिया के लिये के नहीं ? हमारे अपनी जगह से एक इंच भी हिल जाने से या एक दम तक भर लेने से इस तहज़ीब का भवन जमींदोज़ हो सकता है। चुनाँचे हमारी देह की एक छोटी से छोटी हलचल पर, हरकत पर आपकी पैनी निगाहबीनी रहा करती है । माहवारी जैसी सूरतें तो बाकायदा पुण्य को पाप में ,पाक को नापाक में , धर्म को अधर्म में उलट देने वाली हुआ करती है। अगरचे औरतें इतना शोरशराबा करके हायतौबा करके किसी फरेब से ख़ुदा के दरबार में घुस भी जाएँगीं तो अपनी ही आने वाली पुश्तों का सत्यानाश करेंगी । क्योंकि आखिर औरत का किया धरा ऊपरवाले तक जल्द पहुँचता है। इतनी दमबाज़ी भरने की बजाय ज़रा- सी परहेज़दारी बरत लें तो उनका अहम छलनी तो नहीं न हो जाएगा । भई ललनाओं के हक और बराबरी की बात एक तरफ और मज़हब की ,तहज़ीब की मुल्क की तरक्क्की एक तरफ ।



...अजी आप और आपके मुकद्दस ख़यालात! ऐसा है कि अब आपकी यह वज़नी ख़यालबंदी सुनकर मैं पस्तहिम्मत औरत आपसे मुआफी की दरख़्वास्त करती हूँ और आपके इबादतख़ाने और बुत सलामत रहें यही दुआ करती हूँ। आप अपना धर्म बचा लो भाई जी औरतें और उनकी हस्ती तो बची बचाई हैं। आपके खुदा के बगैर भी और आपके खुदा के बावजूद भी ।

वैसे डर यह भी लगता है कभी - कभी कि कहीं मेरे खुले ख़यालात और तकक्कीपसंदगी  का इम्तिहान लेने की ग़रज से कोई मुझे अपनी माहवारी के लहू को अँगुली पर लेकर जीभ पर लगाने को कहे तो मेरा सारा ढकोसला, सारी तालीम और सारी हिमाकत हवा हो न जाए।

तीस घटा पाँच बराबर आज़ाद और मुकद्दस औरत ।

दाग़ अच्छे हैं !

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित 'पतनशील पत्नियों के नोट्स' का एक अंश 

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