शालिनी मोहन की कवितायेँ : 'परिभाषित' व अन्य

शालिनी मोहन
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। 'अहसास की दहलीज़ पर' साझा काव्य संग्रह प्रकाशित . सम्पर्क:  shalini.mohan9@gmail.com

1.
परिभाषित


विधवा शब्द का अर्थ क्या है

माँग में सिंदूर और माथे
पर एक लाल बिंदिया
 श्रृंगार को पूर्ण रूप से दर्शाती है
इनका होना ही
एक स्री होने का परिचायक है
यहाँ देह और आत्मा दोनों
एक जैसे दिखते हैं
वह देह जिसे उसने जिया
और आत्मा जिसे उसे पूजना है

एक विधवा नहीं समझना चाहती
कविता को
ऐसा करना तोड़ देगा
उसका भ्रम
यह एक छोटी सी स्वतंत्रता होगी
 जिसे वह पूरी तरह
जी नहीं पायेगी

जब अंधेरी गुफा में
उसकी उबड़-खाबड़ दीवार पर
लड़खड़ाने लगते हैं क, ख, ग
और घ भी ऊँघता नज़र आता है
तो अचानक चमगादड़ और उल्लु
घूरने लगते हैं तीव्रता से उनको
तब वे स्वतः टूट टूट कर
गिरने लगते हैं
अब कोई पैशाचिक शक्ति
जागृत करती है उन्हें
अचानक एक झोंके में लेके
जा बैठती है बूढ़े बरगद पर
वहीं उनका एकांत निवास है

नीचे ठूंठ पर बैठता है
एक ओझा,  बनाता
एक कालजयी रचना





2.
साड़ी में लिपटी नारी 

क्या सादगी
चेहरे पर उसके छाई है
जैसे पूस के महीने में
धूप मन को भायी है
सीमाओं में बँधी
असीमितताओं को समेटे
लो साड़ी में आ गई
नारी एक लिपटी

आई तो सबको बाँध लिया
बेटी को इसने नाम दिया
जा कर भी सबको बाँध दिया
बहू से घर को आबाद किया
बँध गई जिसने भी बाँध दिया
सूनी कलाई को है नाम दिया
अपने घने केसू से
सारे घर में है छाँव किया

स से सबल, प्र से प्रबल
म से ममता को निस्सार किया
अपने नयन के बूँदों से
प्यार से है सबको थाम लिया
कर्म को ही धर्म समझा
लोभ से हमेंशा रही दूर
मेहनत की पराकाष्ठा कर दी
कभी न इसका हुआ ग़ुरुर

बारिश की निरंतर बूँदें भी
इस चट्टान को ना पिघला सकी
बनी, मिटी, मिट के बनी
तब जा कर यह नारी
देखो एक साड़ी में है लिपटी

3.
एक आदिवासी लड़की

बस्ती, जंगल, नदी, उड़ते पंछी
बहुत याद करती है मुनिया
पिछली बार जब लौटी थी
अपनी बस्ती
उसकी माँ ने कहा था
एक-दो साल में ब्याह दी जायेगी
धीरे-धीरे मुनिया समझने लगी है
नारी सशक्तीकरण, शहरीकरण और स्पर्धा

मुनिया अपने थोड़े से बदले चेहरे को
हर दिन आईने में निहारती है
उसका काला रंग
अब थोड़ा फीका हो गया है
लाल, पीले रंग फबकर
अपनी चमक छोड़ने लगे हैं
रूखे, बेज़ान बाल
मुलायम और चमकदार हो गये हैं
उसकी फटी एड़ी
चप्पल में सुन्दर दिखने लगी है
तन पर अच्छे, आधुनिक कपड़े हैं

बालकनी में आती बारिश के
हल्के छींटों में कैसे भीगना है
सीख लिया है उसने
अपने मन के तालाब में खिले कमल को
कैसे संभालना है
जानती है अब मुनिया

अपनी मालकिन की दुलारी
अक्सर यही सोचती है
कि एक दिन राजकुमार आयेगा
गोरा, सुदंर और शहरी
मालकिन ढूँढ लायेगी
जैसे अपनी बेटी के लिये लायी थी

लौटना फिर उसी मिट्टी पर
भय और उदासी देता है
अपने सपने में उसी बस्ती के
अंतिम छोर पर
एक शहर बसा चुकी है मुनिया
मुनिया जब हँसती है
उसकी सारी सादगी
झलकती है, सफ़ेद दाँतों से


4.
वेश्या 

वेश्या शब्द का विलोम क्या होगा
वेश्या शब्द को लोगों ने
बहुत नंगा किया है, घोर घृणा दी है
इसके उच्चारण मात्र से लोगों ने
अपनी जिह्वा काटी है हर बार
इस शब्द ने इतनी घृणा झेली है
कि लज्जित हुआ, शर्मिंदा हुआ खुद से बार-बार
कहाँ जाये, क्या करे

हमारे दिमाग़ में इसने
सिर्फ़ एक देह और दृश्य पैदा किये हैं
बची हुई देह, दृश्य और परिस्थितियों के बारे में
ना तो हम सोचते ना समझते हैं
सोचने और समझने से पूरी तरह इन्क़ार कर देते हैं
एक ऐसा दिन रहा होगा
जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते
जब जीवन काटने के लिए
बेचने को उस स्त्री के पास कुछ भी नहीं बचा होगा
अंत में उसने अपना शरीर बेच दिया
सत्य, असत्य, सही, ग़लत को पोटली में बाँध
बन गई वह वेश्या

वेश्या सिर्फ़ एक देह नहीं
उसके पास एक आत्मा भी है


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