सुप्रीम कोर्ट का दहेज़ संबंधी निर्णय यथार्थ की जमीन पर


                                             
अरविंद जैन

पिछले दिनों अपने ही एक निर्णय को पलटते हुए सुप्रीमकोर्ट ने दहेज़ के मामलों में जो नयी व्यवस्था दी है, वह स्वागत योग्य जरूर है, लेकिन न्याय का डगर इतना आसान नहीं है. अरविंद जैन का आलेख: 

“आमतौर पर सिर्फ कानून बनाने से ऐसी सामाजिक समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता, जिन की जड़ें बहुत गहरी हैं. कानून बनाना जरूरी और अनिवार्य है, हालांकि इन्हें हर संभव दृष्टि से देखना चाहिए. देखना चाहिए ताकि कानून के साथ-साथ सामाजिक चेतना का प्रसार हो सके और समय को नया रूप-स्वरुप दिया जा सके.” (दहेज़ निषेध अधिनियम, 1961 पर संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की टिप्पणी)


भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दो सप्ताह में अपने ही दो फैसलों को बदला। पहला भारतीय दंड संहिता,1860 की धारा 377 (समलैंगिकता) और दूसरा सोशल एक्शन फ़ॉर मानव अधिकार बनाम भारत सरकार मामले में भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498ए (दहेज उत्पीड़न)। यथार्थवादी न्यायशास्त्र से लेकर आदर्श मॉडल स्कूल तक फैली विभिन्न शाखाओं पर लंबी बहस करने से क्या लाभ! सो, यहाँ मैं ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सिर्फ दहेज संबंधी मामले पर संसद और न्यायपालिका की पक्षपाती भूमिका और न्यायिक विवेक और दृष्टिकोण के बारे में ही बात करूँगा।

उल्लेखनीय है कि अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न के अपराधियों की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए अपना निर्णय सुनाया था। इस पर भी विस्तार में चर्चा करेंगे।
27 जुलाई 2017 को राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य केस में सुप्रीम कोर्ट की एक और पीठ ने दहेज उत्पीड़न मामलों को कानून का दुरुपयोग बताते हुए, हर शहर में जाँच समिति बनाने के आदेश के साथ अन्य दिशा-निर्देश भी दिए थे। इससे बहू को दहेज के लिए उत्पीड़ित करने वाले पति एवम परिवार को असीमित छूट मिली और बहुओं को विकल्पहीन अंधेरे में धकेल दिया गया। इस निर्णय का राष्ट्रीय स्तर पर विरोध और आलोचना हुई।

एक साल बाद ही सितम्बर 2018 में सोशल एक्शन फ़ॉर मानव अधिकार बनाम भारत सरकार केस में पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के बाद, सुप्रीम कोर्ट को  अपना (राजेश शर्मा वाला) फैसला बदलना पड़ा और जाँच समितियों के गठन को गैर कानूनी बताया गया है। 498ए पर इस निर्णय से भी, दहेज उत्पीड़न की शिकार बहूओं को कोई विशेष राहत मिलने की कोई संभावना नज़र नहीं आ रही। हाँ! इतना जरूर कह सकते हैं कि पुराने निर्णय के पैबन्दों को, नए रेशमी लबादे से ढक दिया गया है। क्या सिर्फ 'कॉस्मेटिक सर्जरी' से हालात बदल जाएंगे!

पढ़ें: न्याय व्यवस्था में दहेज़ का नासूर

बुनियादी सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका सिर्फ कानून व्याख्यायित कर सकती है या फैसलों की आड़ में कानून बना भी सकती है? न्यायपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र की सीमा रेखा कहाँ से शुरू होती है और कहाँ समाप्त? क्या विधायिका और न्यायपालिका मिल कर अपने बेटे-बेटियों की ही वैधानिक सुरक्षा में नहीं लगे हैं? बहूओं की चिंता कौन करेगा! न्यायधीशों की नियुक्ति के मामले में संसद द्वारा बनाए कानून को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक ठहराया और परिणाम स्वरूप 400 से अधिक पद खाली पड़े हैं। अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार निरोधक कानून, 1989 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर देशव्यापी आंदोलन और उसके बाद संसद द्वारा किए संशोधन पर सवर्णों द्वारा भारत बंद की हिंसक घटनाएँ हमारे सामने हैं। तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद, तीन तलाक़ विधेयक लोकसभा में पारित होने के बावजूद, राज्यसभा में अटका-लटका दिया गया। देश अच्छी तरह जानता-समझता है कि इस टकराव में कितना कुछ टूटा-फूटा और बिखरा है। खैर...!


वर्तमान भारतीय समाज का राजनीतिक नारा है 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' और सामाजिक-सांस्कृतिक आकांक्षा है 'आदर्श बहू'। वैसे भारतीय शहरी मध्यम वर्ग को 'बेटी नहीं चाहिए', मगर बेटियाँ हैं तो वो किसी भी तरह की बाहरी (यौन) हिंसा से एकदम 'सुरक्षित' रहनी चाहिए।हालाँकि रिश्तों की किसी भी छत के नीचे, स्त्रियाँ पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं हैं। यौन हिंसा, हत्या, आत्महत्या, दहेज प्रताड़ना और तेज़ाबी हमले लगातार बढ़ते जा रहे हैं।

2013 के कानूनी संशोधन करते समय संसद ने (बेटियों को सुरक्षित रखने के  लिए) सहमति से  यौन संबंध बनाने की उम्र सोलह साल से बढ़ा कर अठारह साल की, मगर पन्द्रह साल से बड़ी उम्र की बहूओं के साथ बेटों द्वारा बलात्कार तक करने की खुली छूट को बरकरार रखा। संशोधन से पहले पति को सहवास की छूट थी मगर संशोधन के बाद अन्य यौन क्रियाओं (अप्राकृतिक) का भी कानूनी अधिकार मिल गया।  यह दूसरी बात है कि बाद में (2017) सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पन्द्रह से अठारह साल के बीच की उम्र की पत्नी से यौन संबंध अपराध माना जाएगा। अठारह साल से बड़ी उम्र की पत्नी अभी भी पति के लिए घरेलू 'यौन दासी' बनी हुई है। इस पर ना जाने कब विचार विमर्श शुरू होगा!

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दहेज उत्पीड़न विरोधी कानून की मूल विडंबना यह है कि आज तक इसका लाभ, वास्तविक पीड़िताओं को कम ही मिल पाया है. ईमानदारी से कहूँ तो साफ़ तौर पर कारण यह है कि कानून की भाषा में दहेज़ माँगना, लेना या देना किसी भी तरह ‘अपराध’ नहीं है, दहेज़ हत्या ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ मामला नहीं, दहेज़ उत्पीड़न ‘मृत्यु से ठीक पहले’ होना सिद्ध करो और अब दहेज़ अपराधियों की गिरफ्तारी पर भी रोक या अंकुश. नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर घंटे एक महिला दहेज हत्या का शिकार हो रही है लेकिन दहेज प्रताड़ना के अधिकाँश मामले तो दर्ज ही नहीं होते. कानूनी जाल-जंजाल या समाज में बदनामी के भय से, उत्पीड़ित महिलाएं सामने नहीं आतीं और घुट-घुटकर जीती-मरती रहती हैं. इस सब के बावजूद देश की सब से बड़ी अदालत का कहना है कि महिलाएं कानून का ‘नाजायज इस्तेमाल’ ढाल की बजाय, हथियार के तरह कर रही हैं. सच यह है कि इस देश में बहुत से कानून हैं, मगर महिलाओं के लिए कोई कानून नहीं है और जो हैं वो अंततः स्त्री विरोधी हैं.


दहेज कानून का ‘दुरुपयोग’: गिरफ़्तारी पर अंकुश
2 जुलाई 2014 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति चंद्रमौली कुमार प्रसाद और पिनाकी चन्द्र घोष की खंड पीठ ने, अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य के मामले में दहेज कानून का ‘दुरुपयोग’ रोकने के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था दी थी. सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा था कि जिन मामलों में 7 साल तक की सजा हो सकती है, उनमें गिरफ्तारी सिर्फ इस आधार पर नहीं की जा सकती कि आरोपी ने वह अपराध किया ही होगा. गिरफ्तारी तभी की जाए, जब पर्याप्त सबूत हों, आरोपी की गिरफ्तारी ना करने से जांच प्रभावित हो, और अपराध करने या फरार होने की आशंका हो. अदालत के निर्देश यह भी हैं कि दहेज मामले में गिरफ्तारी से  पहले केस डायरी में कारण दर्ज करना अनिवार्य होगा, जिस पर मजिस्ट्रेट जरूरी समझे तो गिरफ्तारी का आदेश दे सकता है. इस आदेश की अनदेखी करने पर अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए. सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश जारी किया है कि दहेज उत्पीड़न के मामलों में भी आरोपी को बहुत जरूरी होने पर ही  गिरफ्तार किया जाना चाहिए. सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498 ए या दहेज़ प्रतिषेध अधिनियम की धारा 4 तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे सभी मामलों के लिए है जिनमे अपराध की सजा सात वर्ष से कम हो या अधिकतम सात साल तक हो. उल्लेखनीय है कि इस निर्णय द्वारा पति के सम्बन्धियों को भी ‘रक्त-विवाह और गोद संबंधों’ तक ही सीमित कर दिया गया है. शेष किसी सम्बन्धी के खिलाफ मामला नहीं चल सकता. 

सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर से महिलाओं द्वारा दहेज़ कानून के ‘दुरूपयोग’  पर ‘गहरी चिंता’ जताते हुए कहा कि यह कानून बनाया तो इसलिए गया था कि महिलाओं को दहेज़ प्रताड़ना से बचाया जा सके, परन्तु कुछ औरतों ने इसका ‘नाजायज इस्तेमाल’ किया और दहेज उत्पीड़न की झूठी शिकायतें दर्ज कराईं हैं. उल्लेखनीय है कि यह सर्वोच्च न्यायालय का ऐसा पहला या आखिरी निर्णय नहीं है, जिसे किसी न्यायमूर्ति विशेष का पूर्वग्रह या दुराग्रह मान-समझ कर नज़र अंदाज़ किया जा सके. हिंसा, यौन-हिंसा, घरेलू हिंसा से लेकर सहजीवन में सहमति के संबंधों तक पर, उच्च न्यायालयों समेत और भी न्यायालय विवादस्पद सवाल उठा चुके हैं. दहेज़ कानूनों से परेशान ‘पति बचाओ’ या ‘परिवार बचाओ’ आन्दोलन भी सक्रिय है.

पढ़ें: महिला अधिकारः वैधानिक प्रावधान

कानून अधिकार या हथियार?

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के ‘दुरुपयोग’ पर दिशा-निर्देश महिला संघठनों को बेहद चौंकाने वाले हैं. विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में ही स्त्रियों द्वारा दहेज़ कानूनों का ‘दुरूपयोग’ किया जा रहा है या अभियोग पक्ष की कमजोरियों के कारण सजा नहीं हो पाती ? मुद्दा यह नही है कि क्या अपराधियों को गिरफ्तारी में असीमित छूट से पुलिस की निरंकुशता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं मिलेगा?
हम क्यों और कैसे भूल जाते हैं कि दहेज अपराध में सजा की दर इसलिए भी बेहद कम है कि अपराध घर की चारदीवारी के भीतर होते हैं, जिनके पर्याप्त सबूत नहीं होते या हो नहीं सकते. कौन देगा ‘बहू’ के पक्ष में गवाही? ऊपर से कानून में इतने गहरे गढ्ढे हैं, कानून के रखवाले भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं, साधन-संपन्न वर्ग में दहेज का चलन  पहले से अधिक बढ़ा है, कानून ऊपरी तौर पर बेहद प्रगतिशील दिखते हैं, पर दरअसल बेजान और नख-दन्त विहीन हैं. कहा यह जा रहा है कि महिलाएं कानून का ‘नाजायज इस्तेमाल’ हथियार की तरह कर रही हैं, ना कि ढाल के रूप में. कानून अगर हथियार ही है तो क्या सिर्फ महिलाएं ही इसका ‘नाजायज इस्तेमाल’ कर रही हैं? बाकी कानूनों के ‘दुरूपयोग’ और बढ़ते अपराधों के बारे में, आपका क्या विचार है?

दहेज़ माँगना, लेना या देना ‘अपराध’ नहीं
निसंदेह दहेज़ विरोधी कानून तो 1961 में ही बन गया, लेकिन इस पर लगाम लगने की बजाय, समस्या निरंतर जटिल और भयंकर होती गई. इसलिए 1983 में संशोधन करके भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498ए जोड़ा गया, साक्ष्य अधिनियम में बदलाव किये. कारण कानून की भाषा में दहेज़ माँगना, लेना या देना किसी भी तरह ‘अपराध’ नहीं माना-समझा गया. परिणाम स्वरुप दहेज़ उत्पीड़न और दहेज़ हत्याओं के आंकड़े, साल-दर-साल बढ़ते ही चले गए और आज तक दहेज़ हत्या के किसी भी मामले में फाँसी की सज़ा नहीं हुई. जिन मामलों में हुई भी तो वो उच्च अदालतों ने, आजीवन कारावास में बदल दी. सर्वोच्च न्यायालय से उम्रकैद की सजा पाए हत्यारे, फाइलें गायब करवा के तब तक बाहर घुमते रहे जब तक इस लेखक- वकील ने अखबारों में 'भंडाफौड़' नहीं किया. सुधा गोयल (दिल्ली राज्य बनाम लक्ष्मण कुमार,1986) और शशिबाला केस में 'चौथी दुनिया' और 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' में सनसनीखेज रिपोर्ट-सम्पादकीय छपने के बाद ही, हत्यारों को जेल भेजा जा सका. इस बारे में मैंने विस्तार से ‘वधुओं को जलाने की संस्कृति’ (‘औरत होने की सज़ा’) में लिखा है.





दहेज़ हत्या : फाँसी नहीं उम्रकै
आश्चर्यजनक तो यह भी है कि जब दहेज़-हत्या के मामलों में फाँसी की सजा के मामले सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचने लगे, तो भारतीय संसद को 1986 में कानून बदलना पड़ा. सैंकड़ों मामले हैं, किस-किस के नाम गिनवाएं. भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 304B में, दहेज़ हत्याओं के लिए चालाकी पूर्ण ढंग से विशेष प्रावधान पारित किया. इस कानून में यह कहा गया कि शादी के 7 साल बाद तक अगर वधु की मृत्यु अस्वाभाविक स्थितियों में हुई है और ‘मृत्यु से ठीक पहले’ (‘soon before death’) दहेज़ के लिए प्रताड़ित किया गया है, तो अपराध सिद्ध होने पर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है. इससे पहले दहेज़ हत्या के केस भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 302 के तहत दर्ज़ होते थे और अधिकतम सजा फाँसी हो सकती थी. मगर संशोधन द्वारा पितृसत्ता ने यह पुख्ता इंतजाम कर दिया गया कि दहेज़ हत्या के जघन्य, बर्बर और अमानवीय अपराधों में भी, फाँसी का फंदा ‘पिता-पुत्र-पति’ के गले तक ना पहुँच सके और अगर सजा हो भी तो, सात साल से लेकर अधिकतम सजा ‘उम्रकैद’ ही हो.
मीडिया में प्रचारित-प्रसारित यह किया गया कि महिलाओं की रक्षा-सुरक्षा के लिया सख्त कानून बनाए गए हैं. ऐसे अनेक मामले हैं, जिनमे सर्वोच्च न्यायालय सहित विभिन्न अदालतों ने अपराधियों को, इसी आधार पर बाइज्ज़त रिहा किया कि पीडिता को ‘मृत्यु से ठीक पहले’ (‘soon before death’) दहेज़ के लिए प्रताड़ित नहीं किया गया था. विधि आयोग की 202 वी रिपोर्ट इस संदर्भ में पढने लायक है. विधि आयोग ने भी कोई विशेष संशोधन की सिफारिश नहीं की.

दहेज़ उत्पीड़न, ‘मृत्यु से ठीक पहले’ अनिवार्य
5 अगस्त 2010 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आर. एम. लोढ़ा (2014 में बने मुख्य न्यायाधीश) और पटनायक की खंड पीठ  ने अमर सिंह बनाम राजस्थान केस के फैसले में कहा कि दहेज़ हत्या के मामले में आरोप ठोस और पक्के होने चाहिए, महज अनुमान और अंदाजों के आधार पर ये आरोप नहीं ठहराए जा सकते . पति के परिजनों पर ये आरोप महज अनुमान के आधार पर सिर्फ इसलिए नहीं गढ़े-मढ़े जा सकते कि वे एक ही परिवार के है, सो उन्होंने ज़रूर  पत्नी को प्रताड़ित किया होगा. जस्टिस आर. एम. लोढ़ा (2014 में बने मुख्य न्यायाधीश) और पटनायक की  खंडपीठ ने यह कहते हुए पति की माँ और छोटे भाई के खिलाफ लगाये गए दहेज़ प्रताड़ना और दहेज़ हत्या के आरोपों को रद्द कर दिया. आरोपियों को बरी करते हुए खंडपीठ ने कहा "दहेज़ माँगना अपराध नहीं है और दहेज़ के लिए उत्पीड़न मृत्यु से ठीक पहले होना चाहिए, वरना सजा नहीं हो सकती. वधुपक्ष के लोग पति समेत उसके सभी परिजनों को अभियुक्त बना देते हैं, चाहे उनका दूर-दूर तक इससे कोई वास्ता ना हो .ऐसे में अनावश्यक रूप से परिजनों को अभियुक्त बनाने से असली अभियुक्त के छूट  जाने का खतरा बना रहता है.

दहेज़ हत्या- ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ या नहीं?
दूसरी ओर 2010 में सुप्रीम कोर्ट जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा ने एक मामले में कहा कि दहेज हत्या के मामले में फांसी की सजा होनी चाहिए। ये केस ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ की श्रेणी में आते हैं। स्वस्थ समाज की पहचान है कि वह महिलाओं को कितना सम्मान देता है, लेकिन भारतीय समाज ‘बीमार समाज’ हो गया है। समय आ गया है कि वधु हत्या की कुरीति पर जोरदार वार कर इसे खत्म कर दिया जाए, इस तरह कि कोई ऐसा अपराध करने की सोच न पाए.
सर्वोच्च न्यायालय की खंड पीठ  ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले और आदेश से असहमत होने का कोई कारण नहीं है. वास्तव में  में यह धारा 302 (नृशंस और बर्बरतापूर्ण हत्या) का केस है, जिसमें मौत की सजा होनी चाहिए. लेकिन आरोप  धारा 302 के तहत नहीं लगाया गया, सो हम ऐसा नहीं कर सकते। वरना मामला तो यह दुर्लभतम में दुर्लभ की श्रेणी में आता है और अपराधियों को मौत की सजा होनी चाहिए. होनी चाहिए मगर.......!
पढ़ें: दहेज विरोधी कानून में सुधार की शुरुआत


हकीक़त यह भी है कि विधायिका ने जानबूझ कर ‘आधे-अधूरे’ कानून बनाए और कभी समीक्षा करने की चिंता ही नहीं की. जिनके लिए कानून बनाया गये, उनसे न्याय व्यवस्था का कोई सरोकार बन ही नहीं पाया. दहेज कानून के मौजूदा रूप-स्वरूप पर पुनर्विचार कब-कौन करेगा? लाखों पीड़ित-उत्पीड़ित स्त्रियां ना जाने कब से, सम्मानपूर्वक जीने-मरने का अधिकार पाने के लिए रोज़ कचहरी के चक्कर काटती घूम रही हैं.

अरविंद जैन स्त्रीवादी अधिवक्ता हैं. सम्पर्क: 9810201120

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