सखी का सखी को प्रेम पत्र: खुल गई बेडियां!


यशस्विनी पाण्डेय

प्यारी सखी ,
 वैसे तो आमतौर पर मै पत्र लिखते हुए कोई संबोधन नहीं देती, क्योंकि ये मेरा पत्र लिखने का अपना आइकॉन है. तुम जानती हो, बल्कि जिन-जिनको पत्र लिखे हैं मैंने वो सब जानते हैं. पर आज तुम्हे संबोधन देकर लिख रही क्योंकि आज ये पत्र सभी पढने वाले हैं तो मै चाहती हूँ कि पढने वाले जाने कि ये पत्र कौन किसके लिए लिख रहा. आज तुम होती मेरी ज़िन्दगी में तो भी हम कर तो कुछ नहीं पाते. पर हाँ, खुश होते उन आगे की पीढ़ियों के लिए जो हमारी तरह जात-मजहब उम्र लिंग से ऊपर उठकर इश्क करते. हम खुश होते उन लोगों के लिए जो हमारी तरह एक दोगली जिंदगी जीने को विवश नहीं. जीना तो हमे भी नहीं चाहिए था ये दोहरा जीवन, पर हममें न हिम्मत थी, न आत्मविश्वास, न कोई आधार.  किस बेस पर क्या करते कहाँ रहते? क्या मै तुम्हे वो सुरक्षा दे पाती तुम्हे जो एक पुरुष देता है ? नहीं ! न मै खुद को ही सुरक्षित रख पाती इस पुरुष सत्तात्मक समाज में जहाँ कानून भी हमारे पक्ष में नहीं था. हमारे जैसे लोगों को तो पुलिस भी ढूंढ-ढूंढ कर परेशां करती है. हमारा कभी पाला तो नहीं पड़ा ऐसी परिस्थितियों से पर हाँ ऐसा होता तो है ही.

 मुझे याद है छोटी सी स्कर्ट पहने तुम स्कूल आती थी और मै कुरता-जीन्स. ऐसा नहीं है कि मै खुद को लड़का मानती थी, मुझे अपने स्त्रीत्व से ही प्रेम है. तुम्हारे घर में भी प्यार मोहब्बत तो दूर दोस्ती को लेकर भी काफी रुल रेगुलेशन थे और मेरे घर में भी घोर जातिवाद. सिर्फ निम्न जाति का होने की कीमत नही चुकाई जाती, बल्कि उच्च जाति, कुल खानदान की भी उतनी ही बड़ी कीमत चुकवाई जाती है, वो भी केवल बहु-बेटियों से. घर पर जब भी कोई आता था तो दादी का यही सवाल होता था उस लड़की से कि जात क्या है? अगर उच्च कुल की नही हुई वो तो पूरा ध्यान दादी का इसी मे रहता था की किस बर्तन में मैंने चाय दी? कहाँ बिठाया क्या खिलाया? और फिर उसके जाने के बाद मुझसे बर्तन को विशेष तौर पर साफ़ करने को कहा जाता था और चादर को बदल देने को. मेरी उम्र कोई कम नहीं थी पर तब भी ये समझ में नहीं आता था कि इसका क्या मतलब? इसका दोस्ती से और किसी के आने जाने से क्या सह-संबंध ? तुम्हारे आने के साथ भी इस तरह की घटनाएँ होने लगी थीं पर तब बहुत ज्यादा मुझे बुरा लगता था. तुम्हारे आने की फ्रीक्वेंसी ज्यादा थी जाहिर है हम सिर्फ अच्छी सखियाँ नहीं थीं हम बहुत-बहुत अच्छी सखियाँ थीं. दीन-दुनिया, परिवार, समाज, आयु-लिंग से कहीं ऊपर. ये सब न दादी के लिए मैटर करता था न मेरे माँ-बाप के लिए. पर मेरे लिए मैटर करता था, वह था, दादी जो अप्रत्यक्षतः अपमान करती थीं तुम्हारा, उनके अंदर जो खुन्दस थी तुम्हारे निम्न-जाति को लेकर. उनकी ये निगेटिविटी कब मेरे अंदर भी घर कर गयी पता नहीं चला. तुम्हारे जाने के बाद पिताजी से वो चुगली करती थीं कि मैंने तुम्हारे लिए बाज़ार से मिठाई मंगवाई फिर चाय के साथ समोसे मंगवाए और तुम्हे भगवान माफिक इज्जत दे रही हूँ मै. वैसे तो ये उनकी व्यंग्यात्मक शिकायत रहती थी कि ‘भगवान जइसन इज्जत दियाता’ पर प्रेम अगर परमात्मा और खुदा है तो हाँ तुम ही तो थी ‘मेरा प्यार’‘मेरी खुदा’. ईश्वर ने तो साथ नहीं ही दिया मेरा. कब कैसे साथ नहीं दिया इसकी तो लम्बी कहानी है. जीवन में जो पहली सरसराहट आई थी वो तुम्हारी ही वजह से तो आई थी. मन-मानस, देह-दिमाग पर जो गुदगुदाहट थी, एक इंटेंसिटी और नशा-सा जो तारी रहता था वो तुम से ही रहता था. क्या-क्या तारी रहता था? तुम्हे भी पता है उसे सिर्फ तुम समझ सकती हो और हमारे जैसे लोग समझ सकते हैं. बहरहाल, दादी हमारे प्रेम कहानी की खलनायक/खलनायिका का रोल अदा कर रही थीं. उनकी नकारात्मकता माँ-पिताजी के सर चढ़कर भी बोलने लगा. मुझे याद है ज़िन्दगी में अगर निगेटिविटी के असर में आकर अगर कोई गलत रिएक्शन मैंने किया है तो वो दादी के साथ किया. उनकी कॉटन की साडी में ब्लेड लगा के और उनकी आलमारी की चाभी छुपा के. अपनी साड़ी को लेकर पजेसिव रहती थीं वो. आयरन की हाई स्टार्च वाली साड़ी पहन के घर के मुख्य द्वार पर बैठा उनका दमकता चेहरा आज भी मुझे याद आता है तो हंसी आती है कि हमारे उनके बीच एक चूहे-बिल्ली का खेल चलता था. उनकी नकारात्मकता के प्रभाव स्वरूप माँ पिताजी ने फतवा जारी कर दिया कि जब दादी को नहीं पसंद तो तुम अपनी दोस्ती-यारी स्कूल कॉलेज तक ही सीमित रखो. पाबन्दी की हद ये भी थी कि मै तुम्हारे घर भी नहीं जा सकती थी. क्योंकि, दो वजह थे एक तो मेरे घर से भी कहीं आने-जाने की इजाजत नहीं के बराबर थी, दूसरा, तुम्हारे घर में भी मित्रता को लेकर नकारात्मक दृष्टिकोण ही था. बेसिकली ये सब इसीलिए था कि हम अपनी जिंदगी न जीने लगे, अपने सुख-दुःख न पहचानने लगे, हमे क्या अच्छा लगता है? क्या करना चाहिए? ये सब सोच न आने लगे. पर, मै तो पैदा ही गर्भ से विद्रोह कर के हुई होउंगी. माँ कहती भी है कि मै तीसरी संतान थी घर में वो भी बेटी. तो उन्होंने नहीं चाहा कि मै आऊं बिना ये इंश्योर हुए कि मेरा लिंग क्या है? अब सिर्फ सोच से कहाँ काम चलता है? तकनीक भी तो चाहिए, एफर्ट भी तो मैटर करता है और वैसे भी बच्चे तो ईश्वर का तोहफा होते हैं पाप -पुण्य का ये सब मामला हो जाता है. ये अलग बात है कि उस बच्चे को लाकर बेसिक जरूरत शिक्षा-अच्छा भोजन जैसी सुविधाओं से उसे ताउम्र वंचित किया जाए. ये पाप की श्रेणी में नहीं आता? कितना हास्यास्पद है न अपने हिसाब से पाप-पुन्य का खांचा खींच लो. छोड़ो मामला दूसरी तरफ जा रहा, आओ हम अपनी बातें करते हैं. दादी से लिया गया नादानी से भरा प्रतिशोध मुझे शांत तो नहीं कर पाया. पर, एक अपराधबोध-सा जरुर पैदा कर गया जब परेशान हो-हो कर वो अपनी चाभी ढूंढ रही थीं और अपनीकटी-फटी साड़ी देख हाय-तौबा मचा रही थीं. शुरुआत के कुछ क्षण तो बड़ा आनंद आया पर जल्दी ही अपनी औकात पर आ गयी मै कि ये मै नहीं कि अपने फ्रस्टेशन में किसी को तंग करके मुझे सुकून मिले.

पहला फ़तवा जारी होने के बाद हम घर से बाहर बागीचे में और दालान में मिलने लगे. तुम जब आती थी तो मेरे घर किसी से खबर भिजवाती थी कि तुम बाहर हो और फिर मै तुमसे बाहर मिलने लगी. तुम्हारा जब घर जाने का समय होता था तो मै तुम्हे तुम्हारे घर तक छोड़ने जाती थी. फिर तुम्हारे घरवाले जब आश्वस्त हो जाते थे कि खानदान की इज्जत आसपास है तो फिर तुम मुझे मेरे घर छोड़ने आती थी. कितना मजेदार था न ये सिलसिला ! जी चाहता था कभी थमे ही न. पर, थमता तो सब कुछ हैं ! ये सी-ऑफ करने का नायाब और शानदार तरीका भी थ्रिल्ल था जिंदगी का. अगर हम किसी और को बताएं कि हमारा घर महज 500 मीटर की दूरी पर था और हम मिलने देखने को तरसते रहते थे. मेरी छत से तुम्हारा छत थोडा धुंधला, पर दीखता था और हम दोनों के घरवालों में एक तरह से दुश्मनी ही थी तो सबको फ़िल्मी मामला ही लगेगा. पर, फ़िल्में भी तो समाज का ही आइना होती हैं न. दुनिया में कुछ असम्भव भी है क्या ?
2 सालों के हमारे सम्बन्ध में इतनी असंख्य घटनाएँ हुईं कि अब तो याद करने से भी बातें याद नहीं आएँगी पर जिन घटनाओं ने दिमाग पर ज्यादा होंट किया था उसमे एक ये भी रहा कि मेरे घर से पहले फतवे के बाद जब हम बाहर मिलने लगे उसी दौरान एक दिन तुम जब मुझसे मिलने आई और मै अपने घरवालों के साथ शहर गयी थी तब फोन भी नही होता था कि मै तुम्हे बता सकूं. पत्रवाहक की उपलब्धता की अपनी सीमाएं हैं. मेरे घर के एक नौकर ने हमारे संबंधो का फायदा उठाकर तुम्हारे साथ यौन शोषण करने की कोशिश की. खैर, तुम बच निकली. नहीं, भी बचती तो क्या ही लुट जाने वाला था ! बस ये है कि दिमाग में बुरी स्मृतियाँ जगह ना ही लें तो बेहतर होता है. उसके बाद कितना मुश्किल रहा होगा तुम्हारे लिए मुझसे मिलने आना और बाहर उस नौकर के रहते हुए मेरा इंतजार करना. और ये सब हम क्यों झेल रहे थे? जातिवाद, सामंतवाद, लिंगवाद? कितनी दुखद विडंबना थी कि हम इस मामले में भी न किसी से कुछ कह सके न कर सके.
 स्कूल में हम तय करते थे कि आज शाम को कितने बजे छत पर चढ़ना है. पर सिर्फ हमारे तय करने से चीजें मन-मुताबिक कहाँ होती हैं? बाकि सारे टर्म्स और कंडीशन भी तो होते हैं. मेरे साथ मेरी बहने होती थी. तुम्हारे साथ तुम्हारे भाई-बहन. सो, हम एकटक वो धुंधली छवि निहार भी नहीं पाते थे. दिल को सुकून-सा जरुर मिलता था तुम्हारी छत पर तुम्हारी आकृति देख. बहनें अक्सर शाम होने पर छत से वापिस चलने को कहती थी पर मै यही कहती थी कि थोड़ी देर बाद आती हूँ. जब तक शाम की हलकी रौशनी भी तुम्हारी आकृति को स्पष्ट करती मै खड़ी होकर नजरों में भरते रहती थी. हालाँकि प्रेम में कहाँ कुछ भरता है ? जितना भरता है कहीं उससे ज्यादा खाली होता है. जितनी प्यास बुझती नही उतनी और बढ़ जाती है.
धीरे-धीरे हमारे बीच में प्यार, इश्क, गहराई, समर्पण, भूख, लालच, इंटेंसिटी, दीवानगी, तड़प, साथ जीने-मरने की चाह, केयर, पजेसनेस आदि तत्व कब कैसे शामिल होने लगे कुछ पता ही नहीं चला. कब हम लम्बे-लम्बे पत्र लिखने लगे-- एक स्कूल, एक क्लास में पढने के बावजूद, कुछ पता नहीं चला. मुझे तो याद भी नहीं कि हम लिखते क्या थे ? या बातें क्या करते थे? बातें करने को कुछ था नहीं ज्यादा हमारे बीच या फिर हम दुनियावी बातों में कभी पड़े नहीं. बहरहाल, हमारे बीच कोई गॉसिप नहीं होता था. केवल देखा-देखी आहें भरना, दिल धडकना और ये ऐसे आवेग जिन्हें समझने में हम भी सक्षम नहीं थे.

खुमारी इतनी शांति से देर तक नहीं चलती रहती. हमारी खुमारी को भी जबरदस्त धक्का लगा था जब तुम्हारी माँ ने मेरे पत्र को पढ़ लिया था और उनकी तरफ से दूसरा फतवा जारी हुआ कि अब दोस्ती खत्म. वो तुम्हे बहका रही है. उसका खानदान ही ऐसा है. वगैरह-वगैरह. तुम बेहद डरी हुई परेशान और तनाव में थी. मैंने तुम्हारी मम्मी से जाकर डायरेक्ट बात करने की हिम्मत की और समझाया कि जैसे आपकी नजर में ये नासमझी है हम दोनों की, तो इसी नासमझी में हम कोई गलत कदम भी उठा लेंगे. सो, मिलने-जुलने से ना रोकिये. कुछ शर्त-नियमों के साथ उन्होंने मेरी बात मान ली. वो टर्म्स-कंडीशन कुछ ऐसे थे कि हम अब केवल उनके घर पर उनकी नजरों के सामने, उनके कमरे में मिलेंगे और बातें करेंगे. तुम्हारा मेरे घर आना उन्होंने बंद कर दिया. खैर, चोर तो हमेशा ताक में ही रहता है, हमने उसमे भी गुंजाईश ढूंढ ली. वो गाना है न "दीवाने हैं दीवानों को न घर चाहिए... मोहब्बत भरी एक नजर चाहिए". आप जब मर रहे हों प्यास से तो जो भी बूंद जहाँ से मिले बस गले को तर करना होता है प्यास बुझाना गौण हो जाता है. तुम्हारी माँ ने मेरा पत्र सुरक्षित रख लिया था कि अगर नियम तोड़ा गया तो वो उसे मेरी माँ से दिखा देंगी. मैंने तुम्हे इस काम के लिए लगाया कि जैसे भी कर के वो खत ढूंढो. इसमें हमारा भविष्य छिपा है. तुम्हे नहीं मिला और हम इसी डर में सालों जीते रहे.

तुम्हारी माँ ने कहा कि ये विकृति है इस पर नियन्त्रण बहुत जरुरी है. कल को तुमलोगों को अपनी इस भूल पर पछतावा होगा और मेरी बातें याद आएँगी और मुझे सही ठहराओगे तुमलोग. आज मै बुरी हूँ, दोषी हूँ, दुश्मन हूँ. खैर, इस तरह की असंख्य घटनाओं से भरा था हमारा सम्बन्ध, हमारा प्यार, हमारी इंटेंसिटी …. तुम्हारी माँ तुम सबको लेकर कहीं और शिफ्ट हो गयीं और मेरी झोली में तुम्हारी अंतहीन यादें, गांव, बागीचा, दादी, स्कूल, बाथरूम, होली, खत के राख़, तुम्हारे दिए गिफ्ट कार्ड, कपड़े और भी बहुत कुछ रह गया और है..
आज तुम एक जिन्दा लाश हो अपने घर पर बात नहीं करती तुम. तुम्हे लगता है तुमसे बिना पूछे तुम्हारी गलत शादी कर के तुम्हारी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी गयी है. तुम्हारे अंदर का मनुष्य मर चुका है. प्यार ,मोहब्बत तो जैसे कभी किया ही नहीं था तुमने. तुमसे जब-जब बात करने की कोशिश की और ज्यादा दुखी हुई. तुम कमजोर पड़ गयी, तुमने खत्म कर दिया खुद को. तुम मुझसे प्यार न करती, किसी से तो करती, जिसके साथ रहती हो उसी से करती. पर अब सब तुम्हारे लिए अस्तित्वहीन है. तुम्हारी माँ से कहना चाहती हूँ कि मै उन्हें कोई भी धन्यवाद नहीं देना चाहती न फील करती हूँ ना हम विकृत थे ना हमारा सम्बन्ध.
काश कि एक इन्सान का दूसरे इन्सान से प्यार  की तरह हमारे प्यार को समझा होता, बजाय इसके कि इसे समलैंगिकता, अप्राकृतिक, अवैध, गैरकानूनी जैसे विभागों की श्रेणी में रखा गया. आज उनकी बेटी जिंदा होती और हमारे सम्बन्ध और प्यार के क़ानूनी सहमति पर हम जश्न मना रहे होते, अपने-अपने घर में अपनी-अपनी जिंदगी जीते हुए ही सही ……..पाना और साथ रहना ही तो प्यार नहीं, एक एहसास कि कोई मीलों दूर आपके इंतजार में है आपसे बात करने के, आपसे मिलने के आपके साथ छुट्टियाँ बिताने के आपसे अपने सुख-दुःख संघर्ष शेयर करने के इंतजार में कोई जी रहा है. मुझे तुम्हारी माँ जैसी उन असंख्य औरतों से शिकायत है जो अपनी बेटी-बेटे की सेक्सुअलिटी को ढंक छुपा कर उन्हें दोहरा जीवन जीने को विवश करते हैं. अपनी गरिमा इज्जत और बड़े बनने की चाह में. आप तो तभी गिर जाते हैं जब आप प्रेम का असम्मान करते हैं. धन्यवाद माननीय न्यायधीश का कि उनके इस फैसले से शायद ऐसी असंख्य आयरनी और दुर्घटनाएं और कुछ मौत थम सके !!

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