लहू की अपवित्रता को संवैधानिक झटका: सबरीमाला मंदिर में महिलाएं कर सकती हैं प्रवेश


स्त्रीकाल डेस्क 

सुप्रीम कोर्ट ने आज सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर ऐतिहासिक निर्णय देते हए मंदिर में 10-50 साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी। यह फैसला पांच सदस्यीय बेंच ने बहुमत से दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि महिलाएं कहीं से भी पुरषों से कमजोर नहीं हैं। मंदिर में उनके प्रवेश का रोक भेदभाव करने वाला है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय (जस्टिस आर एफ नरीमन, जस्टिस ए एम खानविलकर, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदू मल्होत्रा) संविधान पीठ ने आठ दिनों तक सुनवाई करने के बाद एक अगस्त को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे आज 28 सितंबर को सुनाया गया।

मंदिर में युवतियों के दिखने पर सरकार ने दिये थे जांच के आदेश 


प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा  ने कहा कि महिलाएं पुरुषों से कहीं भी कमजोर नहीं हैं और शरीर  के आधार पर उनके साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।-प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि 10 से 50 की उम्र वाली महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने से रोकना संवैधानिक सिद्धातों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि सभी श्रद्धालुओं को मंदिर में पूजा-अर्चना करने का अधिकार दिया जाता है। लैंगिक आधार पर मंदिर में प्रवेश से किसी को रोका नहीं जा सकता। कोर्ट ने चार जजों का सर्वसम्मत फैसला सुनाते हुए कहा कि  भगवान अयप्पा के श्रद्धालु हिंदू हैं। आप अपने रोक से एक अलग धार्मिक प्रभुत्व बनाने की कोशिश न करें। किसी भी शारीरिक एवं बॉयोलाजिकल कारण को रोक का आधार नहीं बनाया जा सकता। सबरीमाला मंदिर की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों को जरूरी धार्मिक क्रियाकलाप के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती।

महिला जस्टिस की (महिला) विरोधी राय 

सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों में से चार ने सर्वसम्मति से अपना फैसला सुनाया जबकि बहुमत के इस फैसले में एक निर्णय पीठ की एक मात्र महिला सदस्य जस्टिस इंदु मल्होत्रा का भी है, जो काफी चौकाने वाला है. इंदु मल्होत्रा ने  ने अपनी अलग राय रखते हुए कहा कि धार्मिक परंपरा को केवल समानता के अधिकार के आधार पर परीक्षण नहीं कर सकते। धार्मिक रूप से कौन सी परिपाटी जरूरी है इसका फैसला श्रद्धालु करें न कि कोर्ट। इंदु मल्होत्रा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आज का फैसला केवल सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसका व्यापक असर होगा। गहरी आस्था वाले धार्मिक भावनाओं के मुद्दों में सामान्य रूप से दखल नहीं देना चाहिए।
रेडी टू वेट कैम्पेन 


महिलाओं ने चलाया था रेडी  टू वेट कैम्पेन 
एक ओर सबरीमाला मंदिर प्रवेश को लेकर कई महिला संगठनों ने मुहीम चला रखी थी तो वहीं कुछ महिलाओं का समूह भी सामने आया था जो मंदिर में प्रवेश पर रोक के पक्ष में 'रेडी टू वेट' कैम्पेन चला रही थीं। हैश टैग कैम्पेन सोशल मीडिया में भी चला था। इस बीच कुछ संगठनों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इंडियन यंग लायर्स एसोसिएशन और अन्य द्वारा दायर की गई याचिकाओं पर आया है। बहस के दौरान मंदिर के बोर्ड त्रावणकोर देवासम ने कहा था कि मासिक धर्म की प्रक्रिया से गुजरने वाली महिलाओं का प्रवेश मंदिर में देवता की प्रकृति की वजह से वर्जित है। जबकि माहवारी की उम्र वाली महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर रोक के इस विवादास्पद मामले पर केरल सरकार का रुख बारबार बदलता रहा, उसने 18 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि वह उनके प्रवेश के पक्ष में हैं।

मंदिर ले बोर्ड का पक्ष रखते हुए अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि दुनिया भर में अयप्पा जी के कई मंदिर मौजूद हैं और वहां महिलाएं बिना किसी रोक टोक के जा सकती हैं लेकिन सबरीमाला में ब्रह्मचारी देव की मौजूदगी की वजह से एक निश्चित उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर बैन लगाया गया है। इस जवाब पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था कि यह कैसे तय होगा कि 10 से 50 साल तक की उम्र की महिलाएं ही मासिक धर्म की प्रक्रिया से गुजरती हैं। 9 साल या 51 साल की महिला को भी मासिक धर्म हो सकते हैं। इसके जवाब में कहा गया कि यह उम्र सीमा परंपरा के आधार पर तय की गई है। सुप्रीम कोर्ट में कोर्ट सलाहकार राजू रामचंद्रन ने मंदिर में महिलाओं पर लगे प्रतिबंध को छुआछूत से जोड़ा। उन्होंने कहा छुआछूत के खिलाफ अधिकारों में अपवित्रता भी शामिल है। यह दलितों के साथ छुआछूत की भावना की तरह है।

उछाले जाते रहे भ्रम फैलाने वाले तथ्य 

इस दौरान मीडिया में तरह-तरह के भ्रम भी फैलाए जाते रहे। न्यूज 18 ने अपनी एक रिपोर्ट 'पीरियड्स नहीं बल्कि ये थीं सबरीमाला मंदिर में महिलाओं पर रोक की वजह' में वैसे कारण गिनाये हैं, जो कोर्ट की बहस के मुख्य बिंदु नहीं थे, बल्कि मंदिर का रुख माहवारी वाले कारण के पक्ष में ही था. इस खबर में बताया गया कि 'वेबसाइट 'फर्स्टपोस्ट' के लिए लिखे एक लेख में एमए देवैया इस आख्यान के बारे में बताते हैं. वे लिखते हैं कि मैं पिछले 25 सालों से सबरीमाला मंदिर जा रहा हूं. और लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध किसने लगाया है. मैं छोटा सा जवाब देता हूं, "खुद अयप्पा (मंदिर में स्थापित देवता) ने. आख्यानों (पुरानी कथाओं) के अनुसार, अयप्पा अविवाहित हैं. और वे अपने भक्तों की प्रार्थनाओं पर पूरा ध्यान देना चाहते हैं. साथ ही उन्होंने तब तक अविवाहित रहने का फैसला किया है जब तक उनके पास कन्नी स्वामी (यानी वे भक्त जो पहली बार सबरीमाला आते हैं) आना बंद नहीं कर देते."
माना जाता है कि अयप्पा किसी कहानी का हिस्सा न होकर एक ऐतिहासिक किरदार हैं. वे पंथालम के राजकुमार थे. यह केरल के पथानामथिट्टा जिले में स्थित एक छोटा सा राज्य था. वह महल जहां अयप्पा बड़े हुए वह आज भी है और वहां भी लोग जा सकते हैं. अयप्पा के सबसे वफादार लोगों में से एक थे वावर (मलयालम में बाबर को कहते हैं). यह एक अरब कमांडर थे. जिन्हें अयप्पा ने युद्ध में हराया था.
वावर की मान्यता आज भी है. माना जाता है कि इरूमेली मस्जिद में आज भी उसकी रूह बसती है. वह 40 किमी के कठिन रास्ते को पार करके सबरीमाला आने वाले तीर्थयात्रियों की रक्षा करती है. सबरीमाला जाने वाला रास्ता बहुत कठिन है. जिसे जंगल पार करके जाना पड़ता है. साथ ही पहाड़ों की चढ़ाई भी है क्योंकि यह मंदिर पहाड़ी के ऊपर बना है. मुस्लिम भी इरूमेली की मस्जिद और वावर की मजार पर आते हैं. यह मंदिर के सामने ही पहाड़ी पर स्थित है.
देवैया लिखते हैं कि ऐतिहासिक अयप्पा के अलावा भी एक पुराणों में वर्णित पुरुष को भी उनके साथ जोड़ा जाता है. जो कहता है कि अयप्पा विष्णु और शिव के पुत्र हैं. यह किस्सा उनके अंदर की शक्तियों के मिलन को दिखाता है न कि दोनों के शारीरिक मिलन को. इसके अनुसार देवता अयप्पा में दोनों ही देवताओं का अंश है. जिसकी वजह से भक्तों के बीच उनका महत्व और बढ़ जाता है. और इसका पीरियड्स से कुछ भी लेना-देना नहीं है.

हैप्पी टू ब्लीड कैम्पेनर निकिता आज़ाद ने भी दायर की थी याचिका
हप्पी टू ब्लीड हैश टैग कैम्पेन चलाने वाली निकिता आज़ाद ने भी इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. उनकी वकील इंदिरा जयसिंह ने भी पीरियड्स और छुआछूत को केन्द्रित अपना पक्ष रखा था.

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