पढ़ी-लिखी चुड़ैल: 'स्त्री'!


साक्षी सिंह 

अमर कौशिक द्वारा निर्देशित और श्रद्धा कपूर, राजकुमार राव स्टारर हिंदी फिल्म 'स्त्री' देख कर आई. जाने की कोई ख़ास इच्छा नहीं थी क्योंकि फिल्म को 'हॉरर-कॉमेडी' की श्रेणी में रखा गया है. डरावनी फ़िल्में देख कर मुझे डर लगता है और आज कल कॉमेडी का मतलब सिर्फ़ 'उपहास' या कि कुछ 'डबल मीनिंग जोक्स' हो चुका है. इस सो कॉल्ड कॉमेडी के दोनों ही रूपों में मुख्य रूप से स्त्रियों को टार्गेट किया जाता है, जिससे कि मुझे शदीद परेशानी है. मगर अच्छे रिव्यूज़ और दोस्तों का साथ मिला सो चली गई. जाना अच्छा भी रहा और सबसे अच्छा तो इसी लिहाज़ में कि यहाँ कॉमेडी के नाम पर स्त्रियों की देह, चरित्र और मन को टार्गेट कर सिर्फ़ कुंठाओं को पोषित करनें का काम नहीं किया गया है.



फ़िल्म 31 अगस्त 2018 को ही रिलीज़ हो चुकी है सो अब तक उसकी कहानी, फिल्मांकन, अभिनय, आरम्भ, अंत आदि की खूबियों और ख़ामियों पर काफी बात-चीत हो चुकी है. इसलिए मैं यहाँ उन विषयों पर बात नहीं करूंगी. मगर एक 'स्त्री' होने के नाते इस फिल्म में मुझे क्या ख़ास लगा वो ज़रूर साझा करूंगी.
शुरू करते हैं फ़िल्म के नाम से, जहाँ अब-तक हिंदी भाषी क्षेत्रों में किसी मृत स्त्री की आत्मा को भूतनी, पिशाचिनी, चुड़ैल आदि-आदि कहनें का चलन रहा है, उसके उलट इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि इस कहानी में लोग उस आत्मा को 'स्त्री' ही सम्बोधित करते हैं. लोगों को पता है कि वह पढ़-लिख सकती है, इसलिए वो अपने घरों के बाहर "ओ स्त्री कल आना" लिखते हैं. अगर इसके सांकेतिक अर्थ को देखें तो समझ आयेगा कि आज के वक़्त में जब कि लडकियाँ पढ़-लिख गई हैं, वे शब्दों के भाव और अर्थ समझनें लगी हैं. उन्हें अपनी क्षमताओं का पता है, तब आप भीतरी तौर पर भले ही उनसे नफरत क्यों ना करें उन्हें भला-बुरा कहें या उनके लिए भला-बुरा सोचें मगर ज़ाहिरी तौर पर तो आपको वे अपने साथ बदसुलूकी करनें की छूट कतई नहीं देंगी.
'ओ स्त्री कल आना' पढ़ कर स्त्री लौट जाती है, इसमें भी दो बातें नजर आती हैं. पहली कि, स्त्री को आप भले ही बुरी आत्मा मान रहे हैं मगर अपने साथ हुई नाइंसाफ़ी के बावजूद वह पुरुषों की भांति बलात् किसी के घर में नहीं घुसती बल्कि सामने वाले की इच्छा का सम्मान करते हुए वापस चली जाती है. दूसरी बात कि, जो 'स्त्री' बार-बार आ रही है, जिससे लोग डर और उसे कल आना पर टाल कर बेवकूफ़ बना रहे, वे 'मत आना' भी लिख सकते थे मगर नहीं लिखते क्योंकि वे जानते हैं कि वह स्त्री अपने साथ हुई नाइंसाफी का जवाब माँगने आती है, अपनें अधिकार के लिए आती है. अगर वे 'मत आना' लिखेंगे तो 'स्त्री' के विद्रोही हो जाने का भी डर रहेगा. हमारा आज का समाज भी कुछ ऐसा ही है वह ना तो स्त्रियों को उनके हक देता और ना ही देने से साफ़-साफ़ मना करता है. असल में स्त्री को लेकर लोगों के मन में बैठा डर किसी भूतनी या चुड़ैल का डर नही है बल्कि यह डर 'हक़ माँगनें वाली पढ़ी-लिखी स्त्रियों का डर है'.

फ़िल्म में चंदेरी के ग़ायब हुए लोगों के उद्धारक के रूप में उस लड़के को दिखाया है 'जिसकी आँखों में प्यार हो' ना कि भुजाओं में बल. राजकुमार राव नें एक छोटे से कस्बे  के 'लेडीज़ टेलर' विक्की की भूमिका निभाई है. विक्की अच्छा दर्ज़ी है और एक दर्ज़ी की हैसियत से आस-पास उसका अच्छा नाम है. वो अपने काम को ही बेहतर तरीके से कर के खुश है. उसका 'लेडीज़ टेलर' होना कहीं भी उपहास की वजह नहीं बनता और ना ही अपना काम छोड़ वह  कुछ हिरोइक करने की फिराक में रहता है. एक सामान्य इंसान की तरह वह दोस्तों के साथ घूमता है, गालियाँ बकता है, प्रेम करता है और डरता भी है. कहीं भी हीरो बनने के चक्कर में बड़े-बड़े पौरुष भरे डायलॉग दर्शक के सर पर नहीं पटक देता. शुरू से अंत तक राव नें उसी सादगी से अपने किरदार को निभाया है.



वहीं स्त्री की उद्धारक स्वयं एक स्त्री यानि की श्रद्धा कपूर को बनाया है ना कि किसी पुरुष को, वह भी प्यार और मदद के रास्ते ही ना कि डर और दहशत के रास्ते. 'स्त्री' को जहाँ के लोगों नें बेईज्ज़त किया, उसे और उसके पति को मार दिया वहाँ वह इन्साफ के लिए सालों भटकती रही, पुरुषों को बंदी बना उनसे बदला लेती रही मगर उसे इंसाफ़ नहीं मिला बल्कि लोगों की धारणाएँ उसके लिए ग़लत ही बन गईं कि स्त्री पुरुषों को नंगा कर के सुहागरात मनाने के लिए ले जाती है. मगर श्रद्धा कपूर डर और दहशत की जगह राजकुमार राव को प्यार के माध्यम से ये समझाने में सफल हो जाती है कि 'स्त्री को शरीर नहीं सिर्फ़ इज्ज़त और प्यार चाहिये' जो कि बरसों पहले उससे छीन लिया गया था. फिल्मकार ने यहाँ परोक्ष रूप से ही सही मगर स्पष्ट कर दिया है कि 'स्त्रियों' को भी उनका हक और सम्मान, पुरुषों द्वारा बनाए हिंसा, भय और दहशत के रास्ते पर चल कर नहीं मिल सकता. स्त्री सशक्तिकरण के मायने 'पुरुषों' जैसा बन जाना कतई नहीं है और ना ही पितृसत्ता के समानांतर एक वैसी ही बर्बर सत्ता खड़ी करना है.

पितृसत्ता का वह भयानक जाल, जिसका शिकार हमेशा स्त्रियाँ रही हैं, उसे इस फ़िल्म में फिल्मकार नें पुरुषों पर डाल कर दिखाया है कि उसमें फंस कर पुरुष कैसे ख़ुद को बचाने के लिए घरों में बंद हो जाते हैं, टोटके करते हैं, परदा करते हैं, झुण्ड में बाहर निकलते हैं. किस प्रकार स्त्री का भय बढ़ने से धर्म की दुकानदारी बढ़ती है यह भी फिल्म में बीच-बीच में एक बोर्ड के माध्यम से साफ़ होता जाता है, बोर्ड एक पण्डे का होता है जिस पर 'स्त्री' से बचाने के नुस्खों का प्रचार और उसका दाम लिखा होता है और यह दाम देवी पूजन के उन चार दिनों में, जिनमें कि 'स्त्री' चंदेरी में अपना आतंक फैलाती, हर रोज़ बढ़ता दिखाई देता है.

इन मुद्दों के अतिरिक्त फिल्म में बीच-बीच में छोटे-छोटे डायलॉग्स के द्वारा कई कन्टेम्परेरी राजनीतिक मुद्दों को भी उठाया गया है. जैसे कि 'भाई भक्त बनना अंधभक्त मत बनना' ये आज कल बहुत ही प्रचलित राजनीतिक सटायर है जो कि समकालीन सत्ताधारी पार्टी के समर्थकों पर उनकी तर्कहीनता को चोटिल करनें के लिए किया जाता है. आधार कार्ड भी एक कंट्रोवर्सी बन चुका है जिसकी वजह से लोगों को अपनी प्राइवेसी और सुरक्षा दोनों पर ही ख़तरा मंडराता नजर आ रहा है, इस ओर भी इशारा करते हुए फिल्मकार नें पंकज त्रिपाठी से कहलवाया है कि स्त्री को सबके बारे में पता है क्योंकि 'उसके पास सबका आधार लिंक है'. विजय राज ने एक अर्ध विक्षिप्त बूढ़े का किरदार निभाया है जो कि हर वक़्त 'एमरजेंसी लगी है' कि रट लगाए रहता है. यह भी एक एक खासा राजनीतिक तंज़ है. आज के भारत की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए देश भर के बुद्धिजीवी आए दिन इस और इशारा करते रहते हैं कि 'यह दौर अघोषित एमरजेंसी का दौर है.



इस फ़िल्म की सबसे बड़ी खासियत जो मुझे लगी वह ये कि ऊपर लिखी बातों में बतौर दर्शक मैं जिन भी निष्कर्षों तक पहुँची हूँ, फ़िल्म में कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि उसका कोई सीन या कोई संवाद दर्शक को वो बातें समझाने के लिए रखा गया है, बल्कि बहुत ही सहजता से हंसी-मज़ाक के लहज़े ये सभी बातें स्वाभाविक रूप से आई हुई जान पड़ती हैं. फ़िल्म कहीं भी बोझिल नहीं होती जिसके कारण हर तबके का दर्शक आसानी से शुरू से अंत तक जुड़ा रह सकता है और फ़िल्मकार बड़ी ही चतुरता से 'हॉरर-कॉमेडी' के ज़रिये अपनें सामाजिक सरोकार दर्शकों तक पहुँचा देता है.

साक्षी सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं. सम्पर्क: sakshipuspraj@gmail.com 

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