मन की बात और स्वच्छता की ढोंग वाली सरकार ज़रा हम सफाई कर्मियों का दर्द भी सुन लो!


सुशील मानव 

अंबेडकर महासभा द्वारा सफाईकर्मियों की सीवर में मौत के खिलाफ़ 25 सितंबर को देशव्यापी आंदोलन के आह्वान पर ‘सफाई कर्मचारी यूनियन दिल्ली’ की ओर से जंतर-मंतर पर 25 सितंबर को 11 बजे से एक धरना प्रदर्शन आयोजित किया गया, जिसमें सीवर में मरे मजदूरो के पीड़ित परिवारजनों समेत भारी संख्या में सफाईकर्मी और समाज के अन्य तबके के लोग शामिल रहे। इस प्रदर्शन को कई महिला संगठन, कर्मचारी संगठन और राजनीतिक दलों का समर्थन मिला। कई राजनेताओं और संगठनों के मुखिया ने सफाई कर्मचारी आंदोलन के मंच से वहां मौजूद लोगो को संबोधित किया।


एक सीवर की सफाई में अपना शौहर खो चुकी पूजा ने मंच से कहा कि अपने सरकार ने नौकरी तो दिलवाई लेकिन उसकी तनख्वाह महीने के 6 हजार ही मिलते हैं। उसमें मैं अपने घर को चलाऊँ कि बच्चों को पढ़ाऊँ। मैं चहती हूँ किसी भी बहन के साथ ऐसा न हो, न ही किसी के बच्चे अनपढ़ रहें।

लुधियाने से आई ममता ने बताया कि उनके पति की सीवर में डूबने सो मौत हो गई थी। उनके बच्चे अभी बहुत छोटे-छोटे हैं। हमें 6 हजार सैलरी मिलती है, उतने से गुजारा नहीं हो पाता। आखिर कब तक हम बहने सीवरों में अपना आदमी खोते रहेंगे, कब तक अपने बच्चों को लावारिश बनाते रहेंगे। कब तक ये आंदोलन चलता रहेगा? सीवर में जाने का मतलब है अपने घर के लोगों को बेघर करो। बच्चों को अनाथ और अनपढ़ करो।

सीवर में अपना एकलौता बेटा गँवा चुकी एक महिला ने मंच से अपना दुःख, अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बताया कि मेरा एकलौता बेटा था। पांच हजार रुपए की नौकरी करता था। एक रोज उन लोगों ने हमारे बच्चे को 500 रुपए का लालच देकर सीवर में उतार दिया था, बेटा सीवर में जैसा गया वैसा का वैसा रह गया, निकल भी नहीं पाया। सरकार ने उस वक्त सहायता के वादे तो कई किए थे पर दिया कुछ भी नहीं। हम तिरपाल तानकर रहते हैं। मेरे घर में कमाने वाला कोई नहीं है। दो बच्चियाँ हैं, एक तो अभी बहुत छोटी है और बीमार है। कमाने वाला चला गया अब न तो हमेरे पास रहने का ठिकाना है न खाने का। हम क्या करें कहाँ जाएँ क्या खाएँ?’
वहीं 9 सितंबर 2018 को पश्चिमी दिल्ली के डीएलएफ कालोनी में सीवर की सफाई में मरे सरफराज के पिता ने कहा कि भले ही सरकार ने हमारे बेटे की मौत के मुआवजे में कुछ भी न दिया गया हो फिर भी हम सरकार से विनती करते हैं कि हमारे बेटे की मौत के लिए जो लोग जिम्मेदार हैं उनके खिलाफ वह कड़ी सजा सुनिश्चित करे और उनकी कंपनी को बंद किया जाए। 




वहीं उसी घटना में मरे दूसरे मजदूर विशाल के बड़े भाई अंगद ने मंच से बताया कि उसका भाई पंप ऑपरेटर था उसपर दबाव बनाकर जबर्दस्ती वहाँ भेजा गया। तीन टैंको की सफाई के लिए 6 लोग थे। हर टैंक में दो-दो लोग उतरे। 20-25 फुट गहरा सीवर। जबकि दूसरा जना सीढ़ी पकड़ने के लिए था। सीवर में मेरा भाई घुस गया थोड़ी देर में जब ऑक्सीजन मिलना बंद हो गया तो मेरे भाई की साँस फूलने लगी। जो जना पानी लेने गया था वो लौटकर आया तो उसने विशाल को आवाज दी। वह जवाब नहीं दे सका। चार लोगों ने मिलकर उसे बाहर निकाला तो उस वक्त मेरा भाई विशाल जिंदा था, वो चलकर एंबुलेंस में गया। एंबुलेंस में ऑक्सीजन जैसी कोई सुविधा नहीं थी। उसे मोतीनगर के किसी अस्पताल में ले जाया गया, वहाँ वह लगभग पौना घंटा जिंदा था। वहाँ उसने नर्स को खून दिया है, तीन-चार उलटिंया की हैं, उसके बाद उसे आरएमएल रेफर कर दिया गया, वहाँ जाने तक मेरा भाई जिंदा था। वहाँ उसके साथ उस कंपनी या बिल्डिंग का भी व्यक्ति साथ नहीं गया था। एंबुलेंस उसे आरएमएल के स्ट्रेचर पर छोड़कर चली गई थी। हम लोग साथ में जाते हैं तब तो कोई सुनवाई सरकारी अस्पताल में होती नहीं है। वो तो फिर भी अकेला था। उसकी हर्टबीट बहुत धीमे धीमे आ रही थी। थोडी देर बाद उसकी मृत्यु हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसके पेट से डेढ़ सौ एमएल कीचड़ मिला है। मैं सरकार से यही कहना चाहूँगा कि इसकी निष्पक्ष जांच कराई जाए और जो दोषी हो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। 

सफाई कर्मचारी आंदोलन की कोर मेंबर विमल थोराट ने मंच से कहा कि ‘आज सफाई कर्मचारियों की इतनी बड़ी संख्या में मौत इसलिए हो रही है क्योंकि जो ढाँचा है उसे बदलने के लिए सरकार तनिक भी तैयार नहीं है। मनुस्मृति में जिस तरह लिखा गया है उसकी उसी तरह पालन किया जा रहा है। पिछले दस सालों में जो पौने दो हजार मौते हुई हैं उसकी जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ सरकार है। हम किसी से उम्मीद नहीं रखते हैं लेकिन हम उम्मीद रखते हैं हमारी सिविल सोसायटी, जो नागरिक समुदाय है, उसकी आज क्या जिम्मेदारी बनती है,वह अपनी जिम्मेदारी निभाए।

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वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ ने मंच से संबोधित करते हुए कहा कि 'सफाई कर्मचारी आंदोलन का सबसे पहला उद्देश्य उस सिस्टम से लड़ना है जो उसके खिलाफ खड़ा है। सम्मान और मानवाधिकार के लिए दुनिया का सबसे बड़ा संघर्ष है ये। और आज मैं इसकी सॉलीडारिटी पर यहाँ इसके साथ खड़ा हूँ। जब हम ये मांग करते हैं कि सीवर की सफाई के लिए विदेशों से मशीने मँगवाइए और इसको खत्म करिए तो सत्ता कहती है कि पैसा नहीं है। नीरव मोदी विजय माल्या और राफेल डील को तीन गुना करने के लिए पैसा है पर इसके लिए पैसा नहीं है। ये आंदोलन जबसे शुरू हुआ तब से मैं इसके साथ हूँ आज भी मैं यहाँ इसके सॉलिडैरिटी के लिए खड़ा हूँ। '

स्वराज पार्टी के नेता योगेंद्र यादव ने कहा कि ‘आज की सभा में मैं सत्या को ढूँढ़ता हूँ। आज से आठ साल पहले सफाइ कर्मचारी आंदोलन ने देश के पाँच शहरों से एक यात्रा की थी, नवंबर 2010 में मावलंकर हॉल दिल्ली में सामाजिक परिवर्तन यात्रा समाप्त हुई थी। उस हॉल के मंच पर एक चार साल की बच्ची भी थी उसका नाम था सत्या। वह मंच पर इसलिए थी क्योंकि उसकी माँ ने संकल्प लिया था कि वो टोकरी उठाना छोड़ देगी।तमिलनाड़ू के आज तक टोकरी और मैला उठाने की व्यवस्था खत्म नहीं हुई। सत्या आज बारह साल की हो गई होगी। मैं सोचता हूँ कि आज क्या करती होगी सत्या? वो स्कूल जाती होगी, मेरे बच्चों कि तरह कंप्यूटर सीखती होगी या कि उसका नंबर भी वहीं लगा होगा, जहाँ उसकी माँ का लगता था। ये सवाल आज देश के सामने है। क्योंकि सीवर में जिसका दम घुटता है वो सिर्फ आपके भाई और पिता, पति दोस्त भर नहीं हैं। ये इस देश का संविधान है जिसका दम घुट रहा है सीवर के अंदर। ये हिंदुस्तान की आत्मा है जिसका दम घुट रहा है सीवर के अंदर। और इसका ईलाज सरकार नहीं अब हम सबको ही मिलकर करना होगा। हमें माँगना नहीं अब मुट्ठी बंद करके आवाज उठानी होगी।’

सीपीआई सासंद डी राजा कहा कि ‘मैं एक सांसद के तौर पर पूरी पार्लियामेंट के सामने ये सवाल उठाता हूँ कि मैनुअल स्कैवेंजिंग का काम अभी तक क्यों जारी है जबकि मैनुअल स्कैवेंजिंग राष्ट्र का शर्म है। सरकार इस काम के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल क्यों नहीं करती? मैं प्रधानमंत्री मोदी से पूछता हूँ कि क्या सबका साथ आपके लिए सिर्फ एक स्लोगन है और यदि स्लोगन नहीं हो तो आपके राज्य में ये शर्मनाक कार्य करने के लिए दलित क्यों बाध्य हैं? आपको सबके साथ होने की जरूरत नहीं सिर्फ इनके साथ होने की ज़रूरत है। मैं प्रधानमंत्री मोदी से पूछता हूँ कि क्या वे मैनुअल स्कैवेंजर के साथ हैं। कानून में ये मना है लेकिन कानून ही लागू नहीं है। ऐसे कामों को जाति विशेष के लोगों पर दबाव बनाकर उनसे करवाया जाता है। ये मानवाधिकार और जनवाद का सवाल है। इससे मुक्ति का युद्ध जारी रहेगा।’ 



वहीं ऐपवा की महासचिव कविता कृष्णन ने संबोंधित करते हुए कहा कि ‘मोदी जब भी बनारस के घाटों पर झाड़ू लेकर दिखें उनके पार्टी के समर्थकों को उनसे पूछना चाहिए कि आप झाड़ू लगाने वाले सफाईकर्मियों की मौत पर एक भी शब्द क्यों नहीं बोलते? मैन स्केवेंजिंग को आप आध्यात्मिक अनुभव बताते हैं। जब तक आप इस शर्मनाक काम को खत्म नहीं करते, मैला ढोने की प्रथा खत्म नहीं करते तब तक तो कम से कम स्वच्छता की बात तो मत कीजिए।’

सफाई कर्मचारी आंदोलन के संस्थापक बेजवाड़ा विल्सन ने मंच से ललकारते हुए कहा, ‘मैं देश के सभी नागरिकों की ओर से पूछता हूँ कि पिछले दस साल में 1790 लोग जो मरे हैं उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा! गटर में मरे हजारों लोगों का पीड़ित परिवार आज अपनी पीड़ा लेकर यहाँ आया है। देश के प्रधानमंत्री आप चुपचाप बैठ सकते हो पर इस देश का नागरिक चुप नहीं बैठेगा। वो सवाल पूछेगा कि मेरे भाई को किसने मारा? मेरे पिता को किसने मारा? मेरे बेटे को किसने मारा? मेरे पति को किसने मारा?  इतने लोगों की मौत पर कहाँ है आपने मन की बात? आगे आओ और बताओ इस जनता को कहाँ है तुम्हारे मन की बात इन मौतों पर। इस आजाद देश में कोई गुलाम नहीं है हम सब नागरिक हैं। जीने का हक़ हम सबका है आप हमें कैसे मैत दे सकते हो। बंद करो ये सब बंद करो। प्रधानमंत्री ये सब बंद करो। चार साल में हुई तमाम सफाइकर्मियों की मौत पर आपने एक बार बी बयान नहीं दिया। आप की चुप्पी कहती है कि आपमें प्रधानमंत्री की सीट पर बैठने की योग्यता नहीं है। स्वच्छ भारत के लिए 36000 करोड़ रुपया गाँव में और 60,000 करोड़ रुपया शहरों में आप ट्वायलेट बनाने के लिए खर्च करते हैं। हमारे  लिए आपके बजट में सिर्फ पांच करोड़ रुपया होता है। ये क्या नीति है, हम यहाँ यही पूछने के लिए हैं। यू कैन नॉट किल अस लाइक दिस। हम यहाँ पैसे की बात करने के लिए नहीं गरिमा की बात करने, सम्मान की बात करने, बराबरी की बात करने, संविधान की बात करने के लिए आये हैं। पांच हजार साल से हम लोगों ने देश का मैला साफ किया। सबके लिए संविधान एक है। हम अपना जीने का अधिकार लेने यहां आए हैं और ये हक लड़कर लेकर जाएगें।’

सभा को स्वामी अग्निवेश, अरुंधती राय, प्रो तनिका सरकार, प्रो मनोज झा, सीपीआईएमएल के जनरल सचिव दीपांकर भट्टाचार्य, उषा रामानाथन, वृंदा ग्रोवर, न्यूजक्लिक के प्रवीण आदि ने भी संबोंधित किया और सेप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों को खत्म करने की माँग की।

सुशील मानव फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं. संपर्क: 6393491351

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