देशवासियों के नाम पूर्वोत्तर की बहन का एक खत


तेजी ईशा


प्रिय देशवासियों, 
यह खत  इस उम्मीद के साथ कि आप इसे पढ़ पाएंगे.
मुझे नहीं पता कि मेरे साथ यह सब क्यों हो रहा हैं? मैंने जिस धरती पर अपना सबकुछ, इसी धरती पर प्रेम करते हुए निकाल दिया, वही धरती अब मुझे बेदखल करने के लिए राजनीतिक स्तर पर तैयार है. मुझे नहीं पता यह सब किसलिए और क्यों हो रहा है. मेरे बेटे का कुछ माह पहले ही गोवाहटी के एक कॉलेज में दाखिला हुआ है. और कुछ छिट-पुट काम भी यही इसी शहर में कर रहा है. हम इस शहर, इस मुल्क, इस जमीन से निकाल दिए जायेंगे तो कौन-सी जगह पर रहेंगे. कौन-सा देश, कहाँ के शरणार्थी और कहाँ की नई अकल्पनीय भौगोलिक स्थिति और पराई भाषा! कैसे जाएंगे हम अपना जीवन समेट कर और कहाँ जाएँगे?




मेरी दुर्गा माता की मूर्ति क्या मेरे साथ जा पायेगी? कुछ दिन बाद ही दुर्गा माँ आने वाली हैं, क्या मैं उसे छोड़ के चली जाउंगी? बिहू के गीत “ऊई.. जान.. ऊई.. जान.. जानमोनी होपुनोटे आहिबा..” जैसे कई गीत कान में सुनते-सुनते याद होंगे. मुझे वास्तव में नहीं पता कि कांग्रेस और भाजपा क्या है? मुझे यह, केवल इतना पता है कि मैं गोवाहटी की सुपारी खाती हूँ और मेरे गाल के कोने में पान समेटा रहता है. यही रहते हुए मैंने अपने बाबा-अब्बू से जाना कि दूर-दराज के रिश्ते और अदब-व्यवहार कैसे निभाए जाते हैं. देश-प्रदेश-राज्य क्या है! क्या होता है ! नहीं पता है. बस यह पता है कि हम जहाँ हंसी-ख़ुशी पुश्तों से रह रहे हैं वही मेरा देश है. मेरे फेफड़े में जहाँ की हवा पिछले पचपन सालों से भड़ती हुई साँस से जीवन सेंक रही है वही मेरा देश है.

पड़ोस की नसरीन ने मुझे अगले ईद में हाथ से बनी मेजपोश की मांग की है. नारंगी, हरे और उजले मोटे धागें ले आई हूँ. क्रोशिय पर धागे से कई घर बीन चुकीं हूँ. क्या इस धागे के घर को भी ठीक इसी घर की तरह छोड़ के जाना है. नसरीन के हाथों की जादुई मालिश हर दर्द की दवा है. क्या उसकी इस दवा को मैं ले जा पाऊँगी? नसरीन यूँ ही हमेशा की तरह पड़ोस के अग्रवाल जी, पाएंग़जी और जैन की बीबियों को उसके हाथ-पैर दर्द करने पर प्यार से मालिश करेगी. पर मैं अपने ऐसे दर्द के साथ कहीं किसी अनिश्चित जगहों पर रहूंगी बिना नसरीन की, उसकी मालिश की, उसके बक-बक की.

बारिश आने से पहले ही बरांडा के लिए कुछ फूल-पात्र लिए थे. जोरहाट से कुछ रेशमी फूल के उद्भिद (पौधा) मंगवाए थे. उसकी दो-चार पत्तियां इस नए जगह को अपना घर मान कर आ गईं हैं. यह गमला इस नए पौधें का नया घर है जिसमें यह अपना सर्वस्व जमा चूका है. क्या मैं इसे अपने पूर्णता के साथ ले जा पाऊँगी. मुझे तो यह भी उम्मीद नहीं है कि मैं इस बैगनी फूलों को देख पाऊँगी. अमित ने इसे अपने ननिहाल से ला कर दिया था. यह गमला यहाँ रह जायेगा तो इसे रोज पानी कौन देगा? कौन इसे रोज सिर्फ दस मिनट धूप में रखेगा? पता नहीं शायद इसकी मिट्टी में मरने से पहले वाली झुर्री होगी और यह भी पौधे सहित मेरी तरह अलविदा ना कह दे.


बोरा की बेटी हुई है. बिलकुल अपने माँ पर गई है. गुझिया बना कर मैंने सबका मुंह मीठा किया. बोरा के ससुरालवालों ने कहा है कि इन्हें अगले दफे सिक्किम ले जाने के लिए गुझिया चाहिए. वो लोग अपनी होली अपने पोती के ननिहाल में ही मनाएंगे. आनेवाली होली के रंगों में मेरे हाथों के छाप किसी पाचिल (दिवाल), वस्त्र (कपड़े) और परदे होंगे कि नहीं – पता नहीं. गलियों में “ऐखने असो” (इधर आओ) की मेरी आवाज किसी को नहीं सुनाई देगी. “छेड़े येबेना ना.. ” (छोड़ना नहीं किसी को) की हंसीली आवाज भी मेरी कानों में नहीं आएगी.

कल ही अरुणाचल के गाँव मायोंग से कासिफ और उसकी बेगम आस्फा आईं थी. उसने बताया कि सरकार ने लुकानो नाम (बचा नाम) को फिर से माँगा है. ईद पर मैंने उन्हें सेवैयाँ और मेजपोस्त भिजवाकर हामिद के जन्मदिन पर आने को कहा था. पर सरकार के इस गणना वाले फरमान के बाद दूर-दराज से कोई नहीं आया.
यह दूरियां अब बढ़ती ही जाएगी. और छुटती जाएगी सभी बातें-हंसी-दुलार. मेरे बरांडे पर दिन भर मस्ती करती ये नई-नह्न्कू चूजों को देख कर ऐसा लगता है कि किसी दिन ठीक उसी कुत्ते की तरह, दीवार फांद कर कोई हमें झपट्टा न मार दे.

मुझे कई दिनों से यह लग रहा है कि दीवार पर टंगे वो प्लास्टिक के फूलों की तरह हमारा वजूद है जो कुछ सालों तक तो धोकर अपने साथ टांग कर रखा जाता है और फिर उसे अपने से हटा दिया जाता है जिसका पता किसी को नहीं होता है.

बारिश लगातार हो रही है. ज्योति ने परसों ही कहा था कि आंटी गोभी आने में देर है, प्याज के पकोड़े ही खिला दो. इस बारिश उसकी फरमाइश पूरा करते हुए सोच रही हूँ कि अगली बारिश में कहाँ आलू के चिप्स सुखाउंगी! बना भी पाऊँगी कि नहीं! यदि बना भी लिया तो चित्रा, हामिद, नजीब, जोसेफ तो नहीं होंगे न छत पर चिड़ियों को भगाने के लिए. उस डर में भी नहीं रह पाऊँगी कि कहीं इन शरारती बच्चों के पैर से चिप्स न टूट जाए. इन गर्मियों में तो दो छोटे-बड़े मर्तबान अचार के इनसे टूट गये थे. क्या मैं अगली गर्मी किसी पर ये प्यार वाला गुस्सा निकाल पाऊँगी? हो सकता है मेरा मर्तबान शायद आचार से न भरे, मर्तबान भी हो कि नहीं  पता नहीं.
घर के पीछे अदरक और धनिए को बोया है. इसे कैसे बड़े होता देखूंगी? इसके नन्हें कोमल नये पत्तों पर से क्या फिर मक्खी उड़ा पाऊँगी?

छत के कोने में बने ईटों के कुर्सी को कहाँ-कैसे लेकर जाउंगी जिसपर अकेलेपन में बैठने पर हिम्मत मिलती है. जहाँ हम फेंके जाने वाले हैं वहां क्या छत होगा? वो चौड़ी ईंट की भूरी खुरदरी कुर्सी होगी? जिससे उठने पर हम हमेशा अपने दुप्पटे को छुड़ा कर सारे गुस्से को निकालते थे. क्या वो अकेलापन होगा जो कई सालों से इस घर के मिट्टी में रचने बसने के बाद बना है. इस अकेलेपन और उस होने वाले अकेलेपन में वो पिया (तोता) पीछे से टांय बोलकर टोकेगा कि नहीं?

चार गली आगे जो मोदीखाना (किराने की दुकान) के बगल में बैठा ब्योसको भिक्खु (बुड्डा-भिखाड़ी) को रोज कौन रोटी देगा? अच्छा है यह यही रहे. कम-से-कम इसी जगह. उसकी मुस्कराहट, यहाँ तक की गालियाँ भी सुनते सुनते अपना-सी लग गईं होंगी. नई जगह पर शायद सब नया सा लगे. मुस्कराहट तो मिलते मिलते रह जाएगी. शायद  बची साँस भी उस मुस्कुराहट की उम्मीद से चली जाए. दो दिनों से जब भी इसे देख रही हूँ तो एक डर जैसा लगता है कि मुझे भी कोई रोटी देने वाला बचेगा क्या ?
         
इस एक नये शब्द ने एन.आर.सी. ने मेरे जीवन को पूरी तरह से बदल दिया है. यह मेरे जीवन का एक नया ककहरा बन गया है, जिसमें क, ख, ग की जगह एन, आर, सी को पढ़ने और सीखने की कोशिश कर रही हूँ. इसे पढ़ते और सीखते हुए मैं कभी-कभी अपने भविष्य की तरफ भी यूँ ही ऑंखें ऊँची करके देखने लगती हूँ. वहां पहुंचकर थोड़ा ठिठक कर मेरे कानों में मुझे यह सुनाई देता है – जन गण मन अधिनायक जय हे! क्या मैं इससे बाहर हो गई हूँ? मैंने इस धरती का सूरज देखा है, मैं यहाँ की बारिश में नहाई हूँ, मुझे यहाँ की धूप से बहुत अलग किस्म का लगाव है. मेरी सारी मुस्कुराहटें, मेरा सारा प्रेम, मैंने इसी जगह पर सीखा है, मेरी कभी कभी की तकलीफें, कभी कभी का थोड़ा दुःख, थोड़ा रोना, थोड़ा अकेलापन मैंने इसी धरती पर महसूस किया है. लेकिन अब जो अकेलापन मिलने वाला है, क्या वो सच में अकेलापन है या इस भरे-पूरे जीवन को जीने के बाद किसी भयावह बीहड़ जंगल में फेंक दिए जाने के दुस्वप्न को लगातार जीना मेरी इन सांसों में समा गया है. मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है. खुद अपने से भी नहीं. जीवन में यह पहली बार महसूस होता है कि शिकायत का कोई अर्थ नहीं. मेरा खुद का होना ही अपने में एक शिकायत है. इसे ना मैं देख पा रही हूँ. और ना ही कोई दूसरा. इस पूरे ब्रह्माण्ड में मेरे होने की शिकायत को इस उपग्रह को कोई वितान देख पा रहा है नहीं कोई पत्रकारिता की सनसनी भरी खबर.

मैं जहाँ भी जाउंगी, अपने इस मुल्क को अपने साथ ही जीऊँगी. मेरा यह सब लिखना मेरी गूंगी आवाज को शब्द देने का प्रयास ही है, पता नहीं आप इस आवाज को सुन पाएंगे कि नहीं.
आपकी
इसी मुल्क की अभी तक की एक नागरिक

तेजी ईशा पूर्वोत्तर पर शोध कर रही है

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