बेटियों का सवाल राज्य, मीडिया और सिविल सोसायटी से



ज्योति प्रसाद 

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने मंत्री का अभी भी बेशर्म बचाव करते चुनाव के लिए लव-कुश (कुर्मी-कुशवाहा) समीकरण साधने में लगे हैं. कॉल डिटेल्स से इस खुलासे के बाद भी कि मंत्री मंजू वर्मा के पति का ब्रजेश ठाकुर से याराना रिश्ता था, दो साथ दिल्ली सैर-सपाटे ले लिए आते थे. राज्य की मीडिया उनसे लौलीपॉप सवाल कर अपनी वफादारी जता रही है, सिविल सोसायटी में वंशविहीन बच्चियों के लिए कोई बड़ा उबाल नहीं है. उधर उत्तरप्रदेश के देवरिया, हरदोई, हरियाणा के नूह से भी ऐसी ख़बरें आयीं हैं, पढ़ें ज्योति प्रसाद का लेख-राज्य, मीडिया, सिविल सोसायटी को कटघरे में खड़ा करता लेख:

ब्रजेश ठाकुर और मंत्री मंजू वर्मा 


मुजफ्फरपुर बालिका गृह की घटना इस देश के हर व्यक्ति के लिए एक सदमे की तरह है. किसी भी तरह की बलात्कार की घटना पर चुप रहना गैर-जिम्मेदाराना काम होता है. हम शायद गैर जिम्मेदार होते जा रहे हैं जो अभी तक मुंह सी कर बैठे हैं. हमारा कैसा खून है जो बच्चों के साथ हो रहे भयानक जुर्मों पर भी नहीं खौलता? कठुआ से चले तो मुजफ्फरपुर तक पहुंचे और मंदसौर पर रोये. न जाने देश के किन किन हिस्सों में इस तरह के मामले अंजाम तक पहुँच रहे होंगे! हम ऐसे समाज का अंग बन गए हैं जो अपने ही बच्चों को स्वस्थ, सुरक्षित माहौल और जीवन नहीं दे पा रहे. जिस कलम को बच्चों की कविता और कहानी लिखने के लिए उठना चाहिए वही कलम उनके साथ हुए भयानक घटनाओं के बारे में उठ रही है. इच्छा तो यह होती है कि कलम से स्याही की जगह आग निकले और सब भस्म कर जाए!

मुजफ्फरपुर में बच्चियों के यौन शोषण की घटना को जानने के लिए पढ़ें : बिहार में बच्चियों के यौनशोषण के मामले का सच क्या बाहर आ पायेगा?

मुजफ्फरपुर बालिका गृह की घटना और अहम सवाल 
सवाल यह है कि बच्चियों का यौन शोषण लम्बे समय से हो रहा था, फिर भी इन घटनाओं की भनक किसी को नहीं लगी, ऐसा क्यों? क्या यह घटना सिस्टम के सड़ने की वजह से है? सिस्टम के पायदानों पर बैठे लोगों के ही हाथ खून से सने हैं यह बात तय है. 31 जुलाई 2018 को नवभारत टाइम्स में आखिर के पन्ने में एक खबर छपी है. काफी हदतक वह खबर महत्वपूर्ण है. खबर के मुताबिक जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में बाल गृहों में बच्चों की सुरक्षा के लिए पांच स्तरों के इंतजाम किये गए हैं-
1. पहला स्तर बाल कल्याण समिति का होता है. इस समिति की जिम्मेदारी यह है कि महीने में दो बार बाल गृहों में जाकर जाँच की जाए. लेकिन हैरत की बात यह है कि इस समिति के सदस्य ही खुद आरोपों के दायरे में हैं.
2. दूसरा स्तर जिला मजिस्ट्रेट के स्तर पर आता है. बाल कल्याण समिति के कार्यों की निगरानी जिला मजिस्ट्रेट करेगा. लेकिन यहाँ पर भी बच्चों को सुरक्षा नहीं मिली.
3. तीसरे स्तर पर जाँच समिति का प्रावधान है. इस जाँच समिति में जिला और राज्य स्तर समिति में सरकारी अधिकारी और सिविल सोसायटी के लोगों का होना जरुरी है. लेकिन इस मामले में यह व्यवस्था भी कहीं दिखाई नहीं दी.
4. चौथे स्तर पर देखे तो हमें फिर से निराशा हाथ लगेगी. हर राज्य में न्यायालय में जेजे कमेटी होती है. इस कमेटी का काम सिटिंग जज देखते हैं. जेजे एक्ट को सही से लागू करवाने की जिम्मेदारी इन्हीं पर होती है. लेकिन यहाँ यह मशीनरी भी नहीं दिखाई देती.
5. पांचवे स्तर पर राज्य में स्टेट कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स होता है.
ऊपर के ये पांच बिंदु नहीं बल्कि पांच व्यवस्था की जिम्मेदारी थी कि बच्चों के साथ कुछ गलत न हो. उनको समुचित सुरक्षा मिले. लेकिन इस हमाम में सभी नंगे निकले. क्या नेता, क्या अफसर और क्या सामाजिक कार्यकर्ता, सभी ने जम कर रुपयों से पेट भरा और बच्चियों का यौन शोषण किया. उन्हें हर तरह से प्रताड़ित किया.

सरकार और वहां की मीडिया की नाक के नीचे इतनी बड़ी घटनाएं हो रही थीं फिर भी यह सब की सब व्यवस्था अफीम लेकर सोती रहीं और इसकी भनक भी नहीं लगी. यह कैसे हो सकता है? क्या सरकार में जिम्मेदाराना पद पर बैठे लोगों को इसका जवाब और जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए? क्या यह मामला कईयों के इस्तीफे की वजह नहीं बनना चाहिए? क्या यह मामला अंतरात्मा को झकझोड़ कर नहीं रखता? क्या छोटी छोटी बच्चियों के साथ हुए इस हैवानियत को हल्के में, जाँच का विषय कहकर छोड़ा जाना चाहिए? कई नेताओं ने शर्मसार होने की बात कही है. खुद सूबे के मुखिया भी यही कहते हुए सुनाई दिए. बहुत अजीब लगता है जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधि जिनके पास शक्ति है, वे लोग लापरवाह बयान देते हैं. इस तरह के बड़े खौफनाक हादसे में खानापूर्ति वाले बयानों से काम नहीं चलना चाहिए बल्कि जमीनी स्तर पर गंभीरता दिखनी चाहिये.

घटना के बाद मंजू वर्मा के साथ राज्य के मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री 

पत्रकार बिरादरी  
हैरत है कि टीवी वाले खबरिये चैनलों में इस घटना का कहीं भी बहुत बड़ा ज़िक्र एकदम से नहीं दिखा. न ही बहस लायक इस मुद्दे को माना गया. हिंदी पट्टी के टीवी खबरिये चैनल अंधविश्वासों की खबर चलाते रहते हैं. सोमवार को फलां रंग का कपड़ा पहनो और वीरवार को गुड़ चना चबाने का चमत्कारिक उपाय बताने वाले बाबाओं को बिठाकर अन्धविश्वास की नसीहत देने का समय इन चैनलों के पास भरपूर है पर समाज के नजरिये से महत्वपूर्ण ख़बरों को दिखाने के लिए इनके पास समय नहीं है. इन चैनलों वालों की नींद अभी भी पूरी तरह नहीं खुली है. रोज़ सुबह चमकीले कपड़े पहने बाबाओं द्वारा दर्शकों का गुडलक निकालते रहते हैं, पर इस खबर को अपने प्राइम टाइम का हिस्सा नहीं बनाया. गिरफ्तार आरोपी खुद ही तीन भाषाओं में अख़बार निकालता था. कहा जा रहा है कि उसका खुद काफी रसूख भी था. ऐसे में स्थानीय मीडिया घूँघट ओढ़कर बैठा हो तो हैरानी क्या! इस बिरादरी को अपने गिरेबां में बार बार झांककर देखना चाहिए. यह नसीहत से बढ़कर है. खाली जूते चाटने से भी थकावट हो जाती होगी. कम से कम एक पल ऐसा जरुर बचाकर रखना चाहिए जिससे पता चले कि हाँ, अभी इंसानियत बाकी है. उस समय अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए. जो न निभा पाए तो अपने सीने पर एक लिखित बोर्ड लगाएं कि हम बिके हुए लोग हैं और हम से कोई उम्मीद न की जाए.

पढ़ें : मंत्री के पति का उछला नाम तो हाई कोर्ट में सरेंडर बिहार सरकार: सीबीआई जांच का किया आदेश

मीडिया  ने इस मामले को जितने ठन्डे और बेरुखीपन से लिया है यह इस बात का सबूत है कि कैसे मुख्यधारा की मीडिया  अपने काम के मुद्दों का चुनाव कर रही है. शायद उनके लिए इस घटना में सनसनी जैसा कुछ नहीं लगा होगा. इस घटना की शिकार वे सभी लड़कियां गरीब हैं और उनका कोई रसूख वाला रिश्तेदार नहीं है. यह भी कारण है कि गरीब और जुल्म के शिकार मीडिया  के किसी के काम के नहीं. मीडिया  व्यवसाय का वह अड्डा बन गया है जहाँ ड्रामा होता है और उसी ड्रामे से रेटिंग का गेम चलता है. मोटा मुनाफा कमाने के लिए यह चैनल कुछ भी करने के लिए तैयार हैं. मीडिया  के मूल्य उन दबावों में मर रहे हैं जो कभी पत्रकारिता की आत्मा हुआ करते थे. एक छोटा पत्रकार जिसमें अभी आत्मा बाकी है, पिसकर रह जाता है क्योंकि उसकी हैसियत एक नौकरीशुदा व्यक्ति की है. वह कमाएगा नहीं तो खायेगा क्या? जो वह पत्रकारिता को धर्म मान ले तो कहीं किसी कारतूस पर उसका नाम लिख दिया जाएगा.

सास बहू जैसे शो को स्थगित करके भी यह खबर चलाई जा सकती थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. देश में गुस्से का माहौल बनाया जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यह कहा जा सकता था  कि हमारी बच्चियों के साथ ऐसा हो रहा है और हम इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे. पर क्या हम ऐसा कह पा रहे हैं? मुझे नहीं लगता. इक्का दुक्का आवाजें ही निकल रही हैं. बाकी आवाजों को तो शायद लकवा मार गया है. कशिश नामक चैनल ने इस घटना को प्रमुखता से रिपोर्ट करना शुरू किया और लोगों को इसका सच दिखाया. ऐसे में इस चैनल की महत्ता भी पता चलती है जहाँ ख़बरों के प्रति लालच नहीं बल्कि उसका सामाजिक नजरिये से महत्त्व/चिंता का होना है.

दिल्ली थोड़ा और तेज़ चिल्लाओ!
दिल्ली शहर की भी बात न की जाये तो बात पूरी न हो. अभी तक वह तबका नजर नहीं आ रहा जो खास मौकों और जुबान में स्लोगन बोलते हुए विरोध करता है. ये गुट उन लोगों का है जो स्लोगनीय बात करते हैं. उनका विरोध इतना कस्बाई बनकर क्यों रह जाता है? क्या उनके विरोध सरवाईवर की हैसियत देखकर फूटते हैं? क्या उनके विरोध नए तकनीकी मोबाईल में फोटो खींचने के लिए है?  यह उन लोगों को सोचना चाहिए.  यहाँ जो दिल्ली शहर में देशभक्ति के नाम पर खून खौला लेते हैं उन लोगों का खून न जाने क्यों नहीं खौल रहा? अब तो शक है कि खून है या सिर्फ पानी. दिल्ली के उस समाज को बाहर आना चाहिए और यह बतलाना चाहिए कि जो भी घटनाएं हो रही हैं उसकी खिलाफ़त में यह शहर और यहाँ का जर्रा जर्रा एक साथ खड़ा है. हमें इस तरह की घटना पर गुस्सा आता है. और बहुत गुस्सा आता है.

इन दिनों मुख्यमंत्री की खिलखिलाहट रुक नहीं रही है. प्रेस कांफ्रेंस में भी लगाये ठहाके  

सरवाईवर बच्चियां, उनका जीवन और राज्य की जिम्मेवारी  
भारत में बलात्कार के मामले भयानक हिंसा के साथ घटित हो रहे हैं. एक ऐसी हिंसा की रूह तक काँप जाए. इसके साथ ही शोर का भी एक पक्ष दिखाई देता है. हमें इसी शोर में से विरोध को अलग करना है. यह समझना होगा कि मीडिया  कहीं हद तक इन दर्दनाक घटनाओं को शोर में तब्दील कर देता है. इतना ही नहीं वह कई नियमों को भी ताक पर रख देता है. इसका उदाहरण कठुआ बलात्कार मामले में बच्ची का चेहरा और नाम उजागर कर दिए जाने से समझा जा सकता है. पर हद तो तब हो गई जब कुछ प्रिंट मीडिया  ने पहले पन्ने पर बेशर्मी से खबर छापी कि बच्ची के साथ बलात्कार ही नहीं हुआ है. आरोपियों का बचाव भी किया गया है. यह एक तरह का घटिया और निचले दर्ज़े का शोर है. हाँ, विरोध एक जरिया है जो सकारात्मक शोर पैदा करता है और बहरी हुई सरकारों और पुलिस-प्रशासन के कानों में गूंजता है.

इन सब शब्द, शोर और बहस के बीच सरवाईवर छुट जाते हैं. कईयों को मौत के घाट उतार दिया जा रहा है. कई जो बच जाते हैं उनके आगे एक लम्बी जीने की लड़ाई चलती है. अमरीका बेस्ड एक संस्था है- रेज़िलिएंस- एम्पावरिंग सरवाईवर्स एंडिंग सेक्सुअल वायलेंस (Resilience- Empowering Survivors, Ending Sexual Violence). इनकी वेबसाइट को एक बार जरुर पढ़ना चाहिए. इन्होने एक जगह सेक्सुअल वायलेंस के प्रभावों के बारे में लिखा है. संक्षिप्त में ही सही पर पढ़कर अंदाज़ा हो जाता है. वेबसाइट के मुताबिक कुछ सरवाईवर अपने साथ घटने वाली घटना को तुरंत बयां कर देते हैं पर कुछ इसे ताउम्र अपने अन्दर छुपा कर रखते हैं. प्रत्येक सरवाईवर इन घटनाओं पर अलग अलग प्रतिक्रिया देता है. यह सांस्कृतिक, व्यावहारिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि से भी जुड़ा होता है. इसके प्रभाव भी इन्हीं के अंतर्गत समझे जा सकते हैं.
भावनात्मक रूप से सरवाईवर एक तरह के गिल्ट में जीने लगती है. खुद को दोषी ठहराते हुए वह शर्म महसूस करती है. उसके अन्दर डर भर जाता है और लोगों या खुद पर विश्वास की कमी आ जाती है. कई बार तो भरोसा भी नहीं करती. उदासी में जीती है. अकेलापन अपनाती है. खुद पर काबू नहीं रह पाता. बार बार गुस्सा आता है. अपने को वल्नरेबल समझती है. कंफ्यूजन में रहती है. व्यवहार में डिनायल का मोड होता है साथ ही साथ झटके भी महसूस करती है.

 पढ़ें : 30 जुलाई को देशव्यापी प्रतिरोध की पूरी रपट: मुजफ्फरपुर में बच्चियों से बलात्कार के खिलाफ 
विरोधमनोवैज्ञानिक रूप से बुरे सपने देखना, फ्लैशबैक में बार-बार जाना या सोचना, तनाव रहना, चिंता करना, ध्यान लगाने में तकलीफ आना, खुद की नज़रों में गिरावट आना, कई तरह के फोबिया विकसित होना, कई डिसऑर्डर्स का आ जाना आदि समस्याएँ आने लगती हैं. शारीरिक स्तर पर गहरी चोट लगना, दर्द रहना, खानपान सम्बन्धी परेशानियाँ होना, मोबिलिटी कम होना, गर्भधारण करने का भय सताना या फिर एचआईवी जैसे रोगों के हो जाने के डर में रहना आदि शामिल है.

उपर्युक्त परेशानियों और दर्द में एक सरवाईवर जीती है. अगर वह बच्ची है तो आसानी से ट्रॉमा का असर समझा जा सकता है. आज के दौर में बलात्कार को लोग और सरकार बहुत ही हलके में लेती है. मुजफ्फरपुर मामले में अफसरों की असंवेदनशीलता साफ़ नजर आई जब बच्चियों को एक शेल्टर होम से दुसरे शेल्टर होम में अलग अलग शिफ्ट किया गया. टीवी फुटेज्स में उस पुलिस वाली का बच्ची का सर ढक कर खींचते हुए ले जाना एक ऐसा दृश्य था जिसमें साफ़ लग रहा था कि हमारे यहाँ सरवाईवर को छूने या उसके साथ व्यवहार करने की ट्रेनिंग नहीं दी जाती. यह बहुत बारीक तस्वीर है जिसे टीवी का मायाजाल टॉप या हेडलाइंस की ख़बरों में छिपा देता है. सरकार छुपा देती है. अफसर छुपा देते हैं. यह साफ है कि हम दर्द के स्तर पर भी सरवाईवर को नहीं समझ पाते. हमें नहीं पता कि वह किस तरह के मानसिक दबाव और तनाव में रहती है. सवाल हमारे सामने भी उभरता है कि हम अपनी संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए क्या करते हैं?
       
सुप्रीम कोर्ट ने अपने स्वतः संज्ञान में यह साफ़ तौर पर कहा है कि बच्चियों की पहचान न उजागर की जाए और न ही उनका किसी तरह का साक्षात्कार किया जाए. इसके अलावा यह भी है कि उनकी कोई मॉर्फेड तस्वीरें न दिखाई जाए. उनके भावी जीवन के लिए यह शायद यह एक अच्छा कदम है. लेकिन इन सब आदेशों में भी वे सभी सरवाईवर बच्चियां गायब नहीं हो जातीं. जेजे एक्ट होने के बाद भी ऊपर से नीचे तक के लोगों में वे शोषण का शिकार लगातार होती रहीं. क्या हमारी व्यवस्था में हमनें इसी तरह के लोग भरे हैं जो इस हद तक भ्रष्ट और अपराधी प्रवृत्ति के शिकार हैं जो बच्चियों को शोषण करने का पैसा पा रहे हैं. लगातर करोड़ों रुपये का अनुदान दिया जा रहा था. जनता के पैसो से जनता की बच्चियों का शोषण एक गंभीर बात है. इसमें उन सभी लोगों को नापा जाए जो इसमें शामिल हैं. किसी भी तरह से उनपर रहम न किया जाए. उनके सभी छोटे बड़े दोषियों को जेल में ताउम्र रखा जाए ताकि वे बाहर आकर दुसरी बच्चियों की ज़िन्दगी तबाह न करें.

इस मुद्दे के खिलाफ एकजुट विपक्ष 

ये वो बच्चियां हैं जो पारिवारिक स्तर पर पहले से टूटन की शिकार हैं. जरा देर उस छोटी बच्ची के दिल दिमाग से सोचिये कि माँ पापा नहीं हैं. कोई बहन भाई नहीं है. उसे शेल्टर में लाया गया. यहाँ उसे रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और सुरक्षा मिलनी चाहिए थी. पर मिला क्या मार-पिटाई, गाली, डर या खौफ का माहौल, बलात्कार, नशीली दवाई का जबरन अत्याचार. यह एक तरह का उस बच्ची के दिमाग के लिए ट्रॉमा है. यहाँ तो सरकारी कागजों में 34 बच्चियों के साथ बलात्कार की पुष्टि हो चुकी है और नेताओं के बयान में संख्या 40 बताई जा रही है. सोचिये कि बच्चियों की पहली जरुरत उन्हें इस ट्रॉमा से बाहर निकलने की है.


सरकार से मांग
राज्य सरकार उनकी अव्वल दर्ज़े की पढ़ाई की समुचित व्यवस्था करे साथ ही उनके हर तरह का खर्च उठाये. उनका दाखिला देश के सबसे महंगे स्कूल में हो. यह निश्चित किया जाए कि उनके साथ वहां सामान्य व्यवहार हो. उनकी वहां सुरक्षा रहे. यह भी तय किया जाए कि स्कूल में उनके साथ सम्मानजनक बर्ताव किया जाए. उनके लिए विदेशों में आगे की पढ़ाई का बेहतरीन इंतजाम हो. उन्हें इस काबिल बनाया जाए जिससे वह मजबूत बनकर समाज में उभरे और बेहतर जीवन बिताये. उनकी नौकरी की व्यवस्था भी सरकार करे. सरकार को हर वह कदम उठाना चाहिए जिसमें उनकी बेहतरी हो.

एक राज्य और समाज के स्तर पर हम यह तय करें कि हमारे यहाँ इस तरह की घटनाएं एक रोज़मर्रा की घटना में तब्दील न हो जाएं. अक्सर यही देखने में आता है कि बड़ी घटना हो जाने के बाद आनन फानन में सरकार उलटे और अटपटे कदम उठाती है. घटिया बयानों का एक दौर चल पड़ता है. कुछ लोग और पार्टी के कार्यकर्त्ता तो दोषियों के बचाव में रैली भी निकाल देते हैं वह भी तिरंगे के साथ. यह किस तरह की मानसिकता विकसित कर चुके हैं हम! एक मानव समाज की तरह बर्ताव भी नहीं कर पा रहे. हालात बहुत बिगड़ चुके हैं. इसलिए व्यक्ति, परिवार, समाज और प्रशासन के स्तर पर हमें संभलने की नितांत जरुरत है. वरना यह वह आग है जिसमें हम सब के घर जलेंगे. हाँ, हम अभी नहीं संभले तो सब जलेंगे.

एक गुजारिश है, अगर जो भी चैनल आपको आपके काम की खबर नहीं दिखाता उस चैनल को अपनी सूची से हटा दीजिये. उस चैनल का बहिष्कार कर दीजिए जो बाबाओं को स्टूडियो में बिठाकर बकवास बहस करवाता है. उस चैनल को बिल्कुल नजरंदाज़ कर दीजिये जो हिन्दू और मुसलमान की बहस के बीच भाईचारे का क़त्ल कर रहा है. आप यह सोचिये कि वाट्स-एप की फोटो में तिरंगा लगाने से कुछ नहीं होगा. हो सकता है आपके देश से प्यार के बारे में आपके कांटेक्ट के लोगों को पता चल जायेगा पर उस इंसानियत का क्या जो इन बच्चियों के लिए आपके अन्दर से बाहर नहीं आती? उस गुस्से को बाहर निकालिए और अपने चुने हुए सेवकों को तलब कीजिये.

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