समकालीन हिन्दी-उर्दू कथा साहित्य में मुस्लिम स्त्रियाँ: संघर्ष और समाधान


डा. शगुफ़्ता नियाज़


समकालीन हिन्दी-उर्दू कथा साहित्य में मुस्लिम स्त्रियों के मुद्दों और उनकी छवि को लेकर शगुफ़्ता नियाज़ का एक पठनीय आलेख. हालांकि इस आलेख में व्यक्त इस्लामिक स्त्रीवाद और पश्चिमी स्त्रीवाद के बनाये गए बरक्स से स्त्रीकाल की सहमति नहीं है. 
                       
यह सच है लेखन में हिंदू-मुस्लिम जैसा कुछ नहीं होता चाहिए परंतु जब लिखित रूप से यह फर्क नज़र आने लगता है तो इसकी विवेचना करना आसान लगता है। नासिरा शर्मा के इस कथन की पुष्टि करते हुए मैं यह कहना चाहूंगी कि समकालीन कथाकारों में उषा प्रियंवदा, राजी सेठ, मृदुला गर्ग, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल, सुधा अरोड़ा, सूर्यबाला, प्रभा खेतान ने स्त्री के अधिकारों को स्वत्वबोध संबंधी अनेक समस्याओं का अंकन भारतीय स्त्री  के संदर्भ में किया है। परन्तु मुस्लिम स्त्री  की समस्याएं उठाई गई यद्यपि मुस्लिम उपन्यासकारों शानी, राही मासूम रज़ा, अब्दुल बिस्मिल्लाह, बदीउज्जमां, असगर वजाहत आदि ने भी बड़ा कार्य मुस्लिम वर्ग के लिए किया है। उनके उपन्यासों में सांप्रदायिकता, अस्पृश्यता , जातिवाद, स्त्री पुरुष संबंध आदि विषय रहे, परंतु मुस्लिम स्त्री के लिए अधिकारों के लिए कोई काम नहीं हुआ। परन्तु नासिरा शर्मा और मेहरुन्निसा परवेज ने मुस्लिम महिलाओं के महत्व और अस्तित्व के लिए अपने कथा साहित्य में मुस्लिम स्त्री के लिए बड़ा काम किया।



मुस्लिम समुदाय हमारे देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है। भारत का मुस्लिम समाज विशेष तौर पर स्त्री अपेक्षाकृत अधिक पिछड़ी हुई है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट इस बात का विवेचन अत्यंत विस्तृत तरीके से करती है। इसके अनेक कारण है जिसके निवारण की कोशिशे हिंदी और उर्दू साहित्य में हो रही है। ‘‘स्त्री वाद और इस्लामी स्त्री वाद में क्या फर्क है दोनों का सम्बन्ध महिलाओं के सशक्तिकरण से है। परन्तु इस्लाम मे स्त्री वाद ऐसे मूल्यों पर आधारित है जो सकारात्मक है, गरिमा, मान सम्मान पर आधारित है पर पश्चिमी स्त्री अनैतिकता और यौन स्वतंत्रता मानवधिकार में बदल गई।’’ (इस्लाम और स्त्री वाद, असगर अली इंजीनियर)
हज़रत मोहम्मद (सल्ल.) पहले फेमिनिस्ट थे जिन्होंने हजारों साल पहले महिलाओं को व्यवस्थित ढंग से सशक्तिरण प्रदान किया जिस दौरे जाहिलियत में लड़कियों को जिंदा दफना दिया जाता था, हुजूर साहब ने इस घृणित कृत्य के खिलाफ आवाज़ उठाई। वह अपनी बेटी का इतना आदर करते थे उसके आने पर अपनी जगह छोड़कर खडे़ हो जाते थे। इस्लाम में बेटी की शादी उसकी मर्ज़ी के बिना नहीं हो सकती। सैद्धान्तिक दृष्टि से मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति बहुत ही सुदृढ़ है, परन्तु व्यवहारिक रूप में उनकी स्थिति आज भी दयनीय है
कुरान में महिलाओं के लिए जो अधिकार है वह पितृसत्तामक व्यवस्था लागू नहीं करती जहाँ “माँ के कदमों के नीचे जन्नत है’ वहाँ स्त्री अपने अस्तित्त्व के लिए आज भी संघर्षरत है! मुस्लिम महिलाए कुरान में दिए गए अधिकारों की जानकारी नहीं रखती उनकी गरीबी और अज्ञानता के कारण स्थिति और ख़राब हुई है।
कुरान की आयते 4:3 और 4:129 में एक शादी पर ही ज़ोर दिया गया है। कई शादियाँ विधवाओं और यतीमों के ख्याल से इजाजत है और पूर्व पत्नी की रज़ामंदी से की जानी चाहिए।

भारतीय संविधान में अनुच्छेद 14, महिलाओं को और पुरूषों के राजनीतिक आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में समान अधिकार और अवसर प्रदान करता है। अनुच्छेद 15, महिलाओं को समानता का अधिकार प्रदान करता है तो अनुच्छेद 16, सभी नागरिकों को रोजगार का समान अवसर देता है चाहे महिला हो या पुरूष। अनुच्छेद 39, सुरक्षा, समान काम के लिए समान वेतन की वकालत करता है, महिलाओं के विभिन्न संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार ने महिलाओं को विशेष ध्यान में रखकर उनसे संबंधित अनेक कानून बनाए है ताकि उन्हें शोषण-उत्पीड़न से बचाकर पूरा सम्मान प्राप्त हो जैसे-न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, हिन्दू विवाह अधिनियम 1966 में संशोधित, देह व्यापार निवारण अधिनियम 1986 में संशोधित, दहेज निवारण अधिनियम 1986 संशोधित, महिलाओं के अभद्र चित्रण रोकने संबंधी कानून, घरेलू हिंसा अधिनियम, 1986 का सती प्रथा निवारण अधिनियम, प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम 1994 जो भ्रूण पहचान को अवैध घोषित करता है।
सरकार महिलाओं के वास्तविक विकास हेतु दृढ़ संकल्प है एवं विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा उन्हें सहयोग प्रदान कर रही है। अब उन्हें स्वयं भी प्रयास करना होगा कि घर-परिवार और समाज में उनके योगदान की महत्ता को समझा एवं सराहा जाए। जब महिलायें खुद के बारे में सोचने और व्यवहार करने के तरीकों में बदलाव लाएँगी, अपनी स्थिति सर्वोपरि करने में सजग होंगी तभी वे सशक्त बनेगी।

स्त्री परम्पराओं, सिद्धान्तों और नियमों की बेड़ी में बंधी है। विशेषकर मुस्लिम परिवारों में स्त्री  की स्थिति अत्यंत पिछड़ी एवं दयनीय है। बेटी जिसका वजूद जाहिलियत के दौर में बोझ समझा जाता था, इस्लाम में वही बेटी जन्नत हासिल करने का जरिया बन गयी । इस्लाम में माँ के पैरों के नीचे जन्नत है और उसकी नाफरमानी बहुत बड़ा गुनाह है और बहन की शक्ल में उसकी आबरू की खातिर भाई को जान कुर्बान हो सकती है और बीबी शक्ल में वह मर्द के लिए सबसे कीमती तोहफा है। परन्तु इस सब के बाद भी वह पुरूष की आश्रिता ही रह गयी। इस्लाम के अधिकांश नियम एवं कानून यद्यपि स्त्री की सुरक्षा का विचार कर बनाए गए थे यही नहीं बल्कि उनकी दयनीय स्थिति के पीछे कार्यकारी शक्तियों पर पर्याप्त रूप से विचार भी किया गया और कारणों को स्पष्ट किया गया परन्तु उसका अर्थ बदल गया। प्रश्न उठता है कि शिक्षा की कमी, बेरोजगारी, पर्दा, पिछड़ापन तथा अन्य बहुत-सी कमियाँ भारतीय मुस्लिम समाज में बंटवारे में साठ वर्ष बाद दूर हो गई हैं तो फिर मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति (दशा)  आज भी एक प्रश्नचिह्न है। हिन्दी उपन्यास साहित्य की बात करें तो 19वीं शती से बीसवीं शताब्दी तक ऐसा कोई उपन्यास नहीं जिसमें मुस्लिम स्त्री और समाज का अंकन न हो यद्यपि गोपालराय ने निःसहाय हिन्दू में ही मुस्लिम पात्रों का अंकन स्वीकार किया है प्रेमचन्द के प्रेमाश्रम में ग्रामीण मुस्लिम स्त्रियों की बात उठाई गई है देवेंन्द्र सत्यार्थी के कठपुतली यशपाल का झूठा सच, कमलेश्वर के लौटे हुए मुसाफिर, भीष्म साहनी के तमस्, शानी के काला जल, राही का आधा गाँव, मेहरुन्निसा परवेज़ की कोरजा, अकेला पलाश, नासिरा की ठीकरे की मंगनी और जिन्दा मुहावरे, अब्दुल बिस्मिल्लाह की झीनी-झीनी बीनी चदरिया, ज़हरवाद, मुखड़ा क्या देखें आदि उपन्यासों में मुस्लिम समाज व उनकी स्थितियों का चित्रण है।
उर्दू उपन्यासों में नज़ीर अहमद ने (1869) में मिरातुल उरूस अपनी बेटी के लिए था। जिसमें स्त्री का आदर्श रूप दिखाया गया है।

 राशिदुल खैरी ने भी मुस्लिम स्त्रियों के प्रेम संबंध उनकी भावनाओं का उल्लेख किया है। प्रेमचन्द की बाज़ारे हुस्न में भी वेश्या जीवन की समस्याऐं उठायी गयी है। बेवा, निर्मला आदि में स्त्री की निरीहता का वर्णन है इस्मत चुगताई ने ज़िद्दी, टेढ़ी लकीर मासूमा, सौदाई में निचले मध्यवर्ग की स्त्रियों के बचपन कुवँारेपन, जवानी और उम्र की ढलान का ध्यानकर्षक दृश्य पेश किया है राजेन्द्र सिंह बेदी उपन्यासों में ऐसे स्त्री पात्र सृजित किए जो एक साथ अनेक किरदार निभाते है। कुर्रतुल ऐन हैदर और जीलानी बानो के यहाँ विभिन्न प्रकार के मनुष्य स्त्री पात्र है केवल इस्मत चुगताई जिन्होंने लिहाफ़ समलैंगिकता पर आधारित है लिखा है स्त्री के तौर पर आज़ादाना पहचान की दावेदार है। ऐसा उर्दू साहित्य में कम है परन्तु शमूल अहमद और रेवती सरन शर्मा ने अपने उपन्यासों ‘नदी‘ और सफ़रे बे-मंज़िल में ज़रूर ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए है नदी की नायिका वैवाहिक जीवन से आज़ाद होने के बाद अपनी पहचान पाती है। सफ़रे बे मज़िल की नायिका वैवाहिक बंधन में रहकर अपने वैयक्तिक पहचान का अधिकार मांगती है।

उर्दू महिला कथाकारों में सरवत खान का अंधेरा पग में परंपरा का विद्रोह दिखाई देता है जकिया मरशदी का पारसा बीवी का बघार में चार पीढ़ियां दिखाई गई है चारों अपनी परंपरा से हटकर जीना चाहती है जिसका उन्मुक्त वर्णन लेखिका ने किया है। सादिका नवाब सहर के कथा साहित्य में भी विभिन्न समस्याओं का चित्रण किया है। ‘मन्नत’ में स्त्री  जिस सृष्टि प्रक्रिया के कारण पूजनीय मानी जाती है अर्थात् मासिक धर्म की समस्या से जुड़ी पीड़ा को उठाया गया है। जिस दिन से पहले में नायक की मां अपने पति केे आचरण से नाखुश है और बदले की भावना में कुछ ऐसा करती है जो आदर्श मां की व्याख्या का विरोध करता है। ‘व्हीलचेयर पर बैठा शख्स’ में भी जटिल स्त्री समस्याओं को सादिका जी ने उठाया है।

यहाँ हमारा अभीष्ट केवल समकालीन कथा साहित्य में अभिव्यक्त मुस्लिम स्त्रियों की समस्याएँ और समाधान है। इस दृष्टि से हम अब उन समस्याओं पर विचार करेंगे जो इन उपन्यासों में बार-बार उठाए गए हैं।
निर्धनता व अशिक्षा मुस्लिम स्त्रियों की सबसे बड़ी समस्या है जब जीविकोपार्जन के लिए पैसों की तंगी है तो शिक्षा पर खर्च करना उनके लिए कैसे संभव है। हिंदी कहानी साहित्य में प्रेमचंद के ईदगाह की बेवा दादी की निर्धनता, बेबसी से स्त्री  का जो संघर्ष दिखाना प्रारम्भ हुआ कि तीन पाई से ईद किस तरह से मनाई जाए, वह मेहरून्निसा परवेज की कहानी ‘विधवा’ व ‘त्यौहार’ में भी ज्यों का त्यों बना है ये त्यौहार क्या आते है।  ‘‘हमें नंगा करके चले जाते हैं’’ आगे चलकर कन्या रूप में स्त्री  का संघर्ष नासिरा शर्मा की ‘चार बहने शीश महल’ की कहानी में दर्दनाक अंत के साथ होता है। नासिरा शर्मा की कहानी ‘बावली’ एक और दर्द भरी कहानी है ऐसी पत्नी का दर्द है जो मां न बन पाने की वजह से अपने पति की दूसरी शादी करवाती है।

अशिक्षा मुस्लिम स्त्रियों की सबसे बड़ी समस्या है हिन्दी और उर्दू कथा साहित्य में इसका पर्याप्त वर्णन और समाधान भी दिया गया है। उर्दू में जाहिदा हिना की कहानी ‘ज़मी आग की आंसमा आग का‘ में शंहशाह बानों के पढ़ाई शुरू करने के लिए लिखती है कि ‘‘सारा कुटुम्ब इकट्ठा है, खानदान की लडकियाँ कुन्बे की इस पहली लड़की को देख रही है जिसकी मकतब हो रही है!...... देखने वालो की आँखों में अचंभा है कि ये पढ़ना नहीं लिखना भी सीखेगी।’’

पति के घर पहुँच कर उसे एक ज़िन्दगी से ये शिकायत ज़रूर थी कि ‘‘मुझे पढ़ना लिखना सोचना क्यों सिखाया नाम की शंहशाही क्यों अता की.....ये शिकायत इसीलिए कि क्योंकि पति ने जब पहली बार किताब हाथ में देखी तो चार टुकड़े कर बाहर की तरफ उछाल दिए और भरे किताबों की पेटी की होली आँगन में जलाई गई! .... शंहशाह बानों ने सोचा कि मजाज़ी खुदा का हुक्म भी तो हाथ काट देता है उगलियाँ कुतर देता है, तभी तो शाहबानो के पिता आख़िर साँस तक बेटी के हाथ का लिखे हुरूफ़ को देखने की हसरत ही रही।’’ शमोएल अहमद के उपन्यास गिरदाब में भी साजी को छठी जमात तक पढ़ते दिखाया “गाँव के स्कूल में पढ़ती थी शादी हो गई। उसने पहला तजुर्बा बयान किया वह यह कि उसे बताया गया था कि ससुराल के लोग बहुत पढ़े लिखे थे यहाँ आई तो मालूम हुआ कि सभी मिडिल फेल थे। खुद उसके पति दरजात ने कहा था कि उसके पास किताबों से भरी अलमारी है पर एक अख़बार तक उसके घर में नहीं आता था। अब क्या करूंगी शौक भर गया लेकिन मेरी बेटी को पढ़ा दो। मनसूबा को वह आई.एस. बनाने का ख्वाब देखती थी। मैं तो पढ़ नहीं सकी कम से कम बेटी तो पढ़ ले.

मेहरून्निसा परवेज़ के कोरज़ा में भी फातिमा पढ़ी-लिखी नहीं है उसकी आवाज़ दबा दी जाती है परन्तु कम्मो अपने आत्म विश्वास को अकेले जीवन जीने का निर्णय लेती है। मेहरुन्निसा परवेज़ की उपन्यास कोरजा की कम्मो के शब्दों में ‘‘नहीं अमित मैं अकेले चल सकती हूँ अभी से सहारे का इतना आदी मत बनाओ की खुद अपने पैरों पर खड़ी ही न हो सकूँ।’’ (मेहरुन्निसा परवेज, कोरजा, पृ. 147)

हिन्दी साहित्य में नासिरा जी ने ठीकरे की मंगनी उपन्यास में महरुख के माध्यम से एक विशिष्ट चरित्र सामने आता है जिसमें बचपन में शादी तय हुई और फिर महरूख़ के भविष्य की रूपरेखा उसकी क्षमताओं और रुचियों के बजाय उसके भावी पति की इच्छाओं को ध्यान में रखकर की जाती है, यद्यपि महरूख को बाहर पढ़ने के लिए भेजने पर महरूख़ की माँ के विचार प्रगतिशील है कि मैं औरत हूँ खूब अच्छी तरह जानती हूँ कि इस नए दौर में और के लिए मजबूती क्या होनी चाहिए। अर्थात् आधुनिक विश्व की आवश्यकताओं में उन्नत शिक्षा का कितना महत्त्व है कहने की आवश्यकता नहीं। उर्दू साहित्य में भी शमूल अहमद की नदी की नायिका पढ़ी-लिखी है इसलिए वह भंवर से निकल जाती है।

स्त्री  को भावना हीन समझना उनके साथ इंसानो वाला बर्ताब न करना जैसी समस्या हिन्दी उर्दू दोनों जगह समान्य रूप से उठाए गए है- शमोएल अहमद कृत ‘‘नदी’’ उपन्यास में हनीमून के स्थल जहां उत्साह होना चाहिए वहां पति-पत्नी के वार्तालाप में ज़िन्दगी का कोई रंग नहीं है- “ज़मीन पर क्यों बैठी हो, पागल हुई हो क्या? उसे लगा कि वह बात नहीं कर रहा बल्कि आहनी ज़जीर हिला रहा है। वह अलग सी चीज़ थी जिसका इस्तेमाल क्या जा रहा था वार्डरोब की तरह........ नकारची के ढोल की तरह ........ चूँकि वह पी.एच.डी कर रही थी। अन्ततः पति से मुक्त होकर ही वो अपना अस्तित्व पहचानती है।

इसी प्रकार नासिरा शर्मा ठीकरे की मंगनी ने सकारात्मक कार्य के चुनाव के साथ स्त्री की स्वतंत्रता के संदर्भ में तीसरे घर की रूपरेखा प्रस्तुत करके उसके विभिन्न पहुलओं का व्याख्यायित विश्लेषित करते हुए तथाकथित स्त्री वाद आंदोलन से पहले ही उसके आज़ादी के संदर्भ में नए परंतु व्यावहारिक मार्ग का संकेत करती है “पिता और पति के घर से अलग वह ठिकाना मायके और ससुराल के विशेषणों से युक्त हो, उसकी मेहनत और पहचान का हो।

तीन तलाक की समस्या आज केंद्र में है इस बात को हमें नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया में हम जिस रिश्ते को सबसे पहले देखते हैं वह आदम हव्वा का पति पत्नि का रिश्ता है जहाँ बीवी को एक नज़र मुहब्बत से देखने के हज़ारो सवाब है जहाँ माँ के कदमों के नीचे जन्नत है वहाँ तीन तलाक देकर एक मिनट में सारे रिश्ते तोड़ने के नियम कैसे हो सकते हैं। मुस्लिम स्त्रियों में तलाक व हलाला की समस्या गम्भीर रूप में आज भीं विद्यमान है, हिन्दी उर्दू साहित्य में इसका पर्याप्त विस्तार मिलता है। किसी भी धर्म की तरह इस्लाम में भी तलाक को वैवाहिक संबध में बिगाड़ के बाद आख़िरी विकल्प के रूप में देखा जाता है हुल्ला, मुहिल्लल, हलाला, इद्दत, खुला और तलाक के मामले मंें ये शब्द काफ़ी उलझाने वाले हैं। इसको बताने की यहाँ आवश्यकता नहीं है। निकाह, हलाला, शरीआ इस्लामिक कानून की एक प्रथा है जिसमें तलाक देने के बाद जब पति उसी स्त्री को दोबारा अपनाना चाहता है तो हलाला की प्रक्रिया को पूरा करना होता है। संक्षेप में कुरान में केवल दो कैफ़ियत हलाला की है कि- तलाक के बाद स्त्री की दूसरी जगह शादी हो और वहाँ भी निभ न पाए तब पूर्व पति से निकाह हलाला कहलाएगा जिसे तलाके मुबररा कहते हैं। दूसरे परिस्थिति वह जब दूसरे पति की मृत्यु हो जाए तब पहले पति से विवाह कर सकती है। इस सीधी सी बात को काज़ी मौलवियों की मदद से वीभत्स रूप दे दिया गया है। प्रयोजन वश जो हलाला कराया जा रहा है वह हराम है इस प्रक्रिया को हुल्ला या तहलीली कहा जाता है जिस पर कुरान में लानत भेजी गई है।



 मुस्लिम पसर्नल ला, एप्लीकेशन एक्ट 1937, डिजोल्यूशन आफ मुस्लिम मैरिज एक्ट 1939 आॅफ राइटज आन डिवोर्स ए-1986, 1937 और 1939 का एक्ट अंग्रेजो ने बनाया था।  इसे आज़ादी के पहले एंग्लो मोहम्मडन लाॅ कहते थे। आज़ादी के बाद मुस्लिम पसर्नल लाॅ बोर्ड कहते है। यह एक संवैधानिक संस्था नहीं है। विद्वान हिलाल अहमद, तारिक महमूद, फैज़ान मुस्तफा, जावेदाना, आरिफ मोहम्मद खान, असगर अली इंजीनियर और बड़े-बड़े ऐकेडमीशियन है। एक बड़ा महिला वर्ग भी मानता है कि तीनों एक्ट में पर्याप्त संशोधन की आवश्यकता है।

पसर्नल ला की एक बड़ी आथोरिटी प्रो0 ए0ए0 फैज़ी “मुकद्दस कुरान बहस व मुबाहसे से ऊँची आसमानी किताब है लेकिन इसमें कुछ चीजें ऐसी है जिन्हें बदल देने की ज़्ारूरत है जैसे बहुपत्नी विवाह परदा और तलाक।“ (मुस्लिम पर्सनल लाॅ धार्मिक सामुदायिक दृष्टिकोण, मौलाना सदरूद्दीन इसराही) जस्टिस वी0 आर कृष्ण अय्यर का उदाहरण था कि जब वह केरला हाइकोर्ट के चीफ़ जस्टिफ ये तब वह इस्लाम और हज़रत सल्ल0 अलैहेवसल्लम के बारे में अच्छी राय नहीं रखते थे। कुरान की एक स्टडी तलाक़ के केस में अपनी किताब को कोट किया जिस क़ौम के पैगम्बर ने सोचने समझने के और अक़्ल इस्तेमाल करने का मज़हबी फरीज़ा बताया उस क़ौम के लोग अक़्ल इस्तेमाल करने पर फ़िक्र करना गुनाहे अज़ीम समझ बैठे हैं आगे कहते हैं कि 1400 साल पहले उस ज़माने में ऐसे मसलों को हल कर दिया जो आज बड़े-बड़े सोशल सांइटीस्ट को परेशान किए है। (फै़जान मुस्तफा, इंटरव्यू)

तलाक में हज़रत स0 अलैहे वसल्लम हज़रत अबु बकर हजरत उमर के दो साल तक तीन तलाक 1 ही मानी जाती थी। पर हजरत उमर ने इसका विरोध किया विवाद यही से शुरू होता है। यद्यपि उनके बाद भी पुरानी परम्परा ही मानी गयी। चंूकि हुजूर साहब को हम सबसे ऊपर मानते हैं अतः हमें उन्हीं के बताए रास्ते पर चलना है। तलाके़ बिदअत- एक बार में तीन तलाक़़़ जो गलत है, इसी पर मोखाल जो  हलाला है और सभी इसी को अपना रहे हैं। यह तरीका सही नहीं है। तलाके एहसन-में एक तलाक देकर तीन महीने दस दिन बाद अलग हो सकते है। तलाक़े हसन- यह बिलकुल सही तरीका है। कुरआन में इसी का जिक्र है- कुरान की सुरह 222 से 240 सूरह अल बक़रा, सूरह तलाक आयत न0 65 सुरह निसा आयत नं0 35 में इसका विशद वर्णन हैं अत्तलाक़ो मरराताने, फइमसको बेमारूफिन अव तसरीह्म    बेएहसान.......ज्वालेमून। (अलबकरा, आयत नं0 222, पारा नं0 2 पृ0 123, त़फहीमुल कुरान जिल्द- 7, मौलाना सय्यद अब्दुल आला मौदूदी।)

आज मुस्लिम महिलाएं 1400 साल पहले वर्णित कुरान का नियम मानने को तैयार है। मगर यूनीफार्म सिविल कोड लागू न हो। वर्तमान समय में त्वरित तीन तलाक़ तुरन्त समाप्त हो और कुरान या संविधान में से एक नियम लागू हो। कुछ लोग इसके पक्ष में है कुछ विपक्ष में परन्तु यह अच्छी चीज़ नहीं है। बड़े-बड़े एकेमेडिशयन....... ये मानते है कि तीन तलाक़ इस्लाम के मूलभूत ढाँचे में नही है। कुरान में तलाक़ की एक लम्बी प्रक्रिया है जिससे बहुत से स्टेप्स है जिसमें बातचीत समझाना, गुस्सा होना, फिर गवाह के माध्यम से सुलाह समझौता फिर केवल एक तलाक देना और कोशिश करना कि इस बीच सम्बन्ध सुधर जांए 3 महीने 10 दिन बाद तलाक आटोमेटिक हो जाती है यदि गलती का एहसास हो जाए तो दोबारा निकाह औरत के इंटरेस्ट पर होगा नया मेहर व नई कन्डीशन के साथ जब दो बार निकाह काॅस्पेट होगा तो हलाला की विकृति स्वंय ही समाप्त हो जाएगी पर मुस्लिम पुरूष इसे नहीं अपनाते इस प्रक्रिया में घर टूटने की सम्भावना बहुत कम है। वर्तमान समय में एक माडल निकाहनामे को बनाने की स्कीम है पर मस्जिद के इमाम और निकाह पढ़ाने वाले का इसमें राज़ी होना आवश्यकता है।

वर्तमान परिपे्रक्ष्य में मोदी व योगी जी तीन तलाक को लेकर गम्भीर है अपने भाषणों में द्रौपदी के चीरहरण से तीन तलाक की समस्या को जोड़ते हुए इसका विरोध किया है। लोग उनके पुण्य कृत्य को राजनीतिक छदम समझे पर मैं इस बात का सम्मान करती हूँ कि तीन तलाक से पीड़ित महिलाओं के लिए आश्रम खोलने का निर्णय और उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के अलावा स्वरोजगार भी उपलब्ध कराने की बात कही है। इसका हम सब को सम्मान व स्वागत करना चाहिए। कुरान में भी सबसे आला दर्जे का सदक़ा तलाक शुदा पर खर्च करना है। आज कुरान को तर्जुमें से अर्थ के साथ सही व्याख्या की आवश्यकता है पुरूष और स्त्री दोनों को इसका ज्ञान होना आवश्यक है। कुरान को अर्थ से पढ़ने की जरूरत है। तभी तलाक़े हसन की जानकारी होगी और समाज से इस कुरीति का नाश होगा वरना कोर्ट में केस या फ़ैसला पहुँचा तो 5 करोड़ तलाक के केस जहाँ पहले से हैं वहाँ समस्या बढ़ेगीं ही।

हिंदी साहित्य में इस समस्या को लेकर उपन्यास लिखे गए है। अब्दुल बिस्मिल्लाह ने ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया‘ में श्रमिक मुसलमान परिवारो का चित्रण खींचा है, वहाँ स्त्री  की जो वास्तविक दशा है तथा पुरूष इस्लाम के नियमों का सहारा लेते हुए स्त्री  प्रति जो मानसिकता रखता है, उसे अभिव्यक्ति प्रदान की है, ‘औरत जात की आखि़र हैसियत ही क्या है? औरत का इस्तेमाल ही क्या है? कतान फेरे, चूल्हा-हाड़ी करे, साथ में सोये, बच्चे जने और पाँव दबाये। इनमें से किसी काम में कोई हीला-हवाली करे तो कानून इस्लाम का पालन करो और बोल दो तुम्हें तलाक देता हूँ। तलाक़, तलाक़, तलाक़।'

स्त्री इस्लाम में दिए गए अपने अधिकारों से अनभिज्ञ है। जहाँ पुरुष की यातनाओं को सहना भी गुनाह माना गया है। परिवार की इज्ज़त, माँ-बाप की इज़्ज़त, नैतिकता एवं अदर्शो का भरी भरकम बोझ ढोने वाली स्त्री  अपनी आँखे खोलना ही नहीं चाहती और पुरूष प्रधान समाज, गरिमा, प्रतिष्ठा, मर्यादा के लबादे डालकर पुरूष स्वार्थ सिद्ध करने वाले पक्षों का सहारा लेकर उसके पर कतरता रहता है। तलाक़ के अधिकार का दुरूपयोग पिछड़े मुसलमानों में बड़ी संख्या में देखने को मिलता है। तलाक़ के अधिकार का प्रयोग करने वाला पुरुष अल्लाह की कही इस बात को क्यों नज़रअदांज करता है, जहाँ लिखा है कि “अल्लाह के नजदीक हलाल कार्यों में सबसे अप्रिय कार्य तलाक़ है,।'' तलाक़ के साथ जुड़ी शर्ते यद्यपि अत्यंत कठिन हैं, पर उन शर्ताे पर कम पढ़ा-लिखा वर्ग ध्यान नहीं देता और औरत अपने अधिकारों से अनभिज्ञ है। सैयद मौलाना मौदूदी ने ‘इस्लाम में पति-पत्नी के अधिकार‘ में लिखा है। पुरूष को दंड देने के लिए इस्लाम में विधान है कि तलाक़ के बाद औरत दुबारा शौहर के निकाह में नहीं आ सकती है। जब तक किस किसी मर्द से उसका निकाह होकर जुदाई न हो जाए। साथ ही दूसरा मर्द उससे शारीरिक सम्बन्ध बनाकर राजी खुशी से उसे तलाक़ न दे दे। यह दंड पुरुष के लिए उसके अहम् पर प्रहार करने के लिए है। इसका उल्लेख भी ‘झीनी-झीनी बीनी चदरिया‘ उपन्यास में मिलता है। ‘कमरून को जब से छोड़ा है परेशान रहता है। अब तो यही उपाय है कि कमरून का निकाह किसी और से हो जाऐ और वह एक रात को अपने साथ रखकर उसे तलाक़ दे दे तब जाकर लतीफ के साथ निकाह हो सकेगा।‘ परन्तु परोक्ष रूप से देखा जाए तो इसके मध्य पिसती स्त्री  दिखाई पड़ती है जो एक तरफ पति द्वारा दिए गए तलाक़ का अपमान झेतली है, दूसरी तरफ दूसरे पुरूष के साथ सहवास का दंड। भारतीय समाज में जी रही संवेदनशील स्त्री  अपने पुरूष के प्रति एकनिष्ठ आस्था रखती है। यातनाँए झेलकर भी उसका प्रेम कम नहीं होता, ऐसे में अपने तलाक़ देने वाले पति के प्रति यदि उसका प्रेम है और वह वापस उस तक जाना चाहती है तो उसे पर पुरूष को भोगना होगा। ‘सात नदियाँ एक समन्दर‘ उपन्यास में खालिद कहते है कि ‘इन औरतों की बातें समझ में नहीं आती। जुल्म सहेंगी मगर जालिम को जालिम नहीं कहेंगी। जो मूर्ति इनमें मन में किसी की बन जाती है वह ज़िन्दगी भर बनी रहेगी।‘ वर्तमान समय के कथा साहित्य में बदलाव आया है। नासिरा शर्मा की ‘दूसरी हुकूमत’, भगवानदास मोरवाल के हलाला उपन्यास में इस समस्या के समाधान को भी उजागर किया गया है। हिन्दी साहित्य में भगवानदास मोरवाल जी का हलाला भी एक निचले अनपढ़ तबके की ही नुमाइन्दगी करता है पर नज़राना का चरित्र यहाँ स्त्री अस्मिता का गम्माज़ बन के आया है। ‘काला पहाड़‘ में भी मुस्लिम समाज और सांझी विरासत और हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात की गयी है।

नज़राना को एक झूठ के बिना पर पति नियाज़ ने तलाक दे दी। “टटलू सेठ के बिचले लड़के नियाज़ ने ऐसे ही नेक और भली औरत को एक झटके से किसी पुराने दरख़्त की तरफ इसकी जड़ो से उखाड़ फेंका उस औरत के जिसके लिए शौहर को राज़ी और खुश करना सबसे बड़ी इबादत है। मोरवाल जी ने जो शीर्षक दिया है वह हलाला है परन्तु जो समस्या है वह तहलील या हुल्ला की कुरान में ये दोनों मान्यताएँ नहीं है।फिर उसे पाने की तमन्ना प्रायोजित हलाला तक ले आती है जो नितान्त गलत है इस्लाम में मना है। ल अन्जाअलैहे मुहल्लि वलमुहिल्लाह अर्थात् तहलील करने वाले और करवाने वाले दोनों पर लानत फ़रमाई। (तफ़हीमुल कुरान, जिल्द-एक) हलाला में यद्यपि मुस्लिम स्त्री की समस्या उठाई गई परन्तु प्रो आशिक़ बालौत के शब्दों में पूरे उपन्यास पर इस्लामी रंग से ज्यादा भारतीय परम्परा का प्रभाव है। मेवों का प्रभाव सर्वत्र दिखाया देता आचार भाषा, व्यवहार सभी में परन्तु उसका सकारात्मक पक्ष यह है कि हलाला प्रक्रिया के लिए नज़राना का विवाह जब कलसंडा से होता है तब नज़राना कलसंडा के साथ ही रहना चाहती है से नज़राना तलाक़ नहीं चाहती 3 बच्चों का मोह भी उसे नहीं रोक पाता बल्कि तर्क में कलसंडा जो समाज का तिरस्कृत पात्र है उसी के ये शब्द दोहराती है।
“हे खुदा की बन्दी मैंने तो निकाह की या मारे हामी भरो कि तेरी उजड़ी़ हुई दुनिया बस जाए।“ ऐसे खरे आदमी से जब अपने पति की तुलना करती है कि एक झूठ पर उसके पति ने उसका साथ छोड़ दिया तब उसे कलसंडा के साथ ही पूरा जीवन गुज़ारना बेहतर मालूम होता है।ये क्रांतिकारी परिवर्तन दिखाना ही लेखक का अभीष्ट है वर्तमान परिपेक्ष्य में मुस्लिम स्त्री  को सशक्त करता है।

उर्दू कथा साहित्य में ज़ाहिदा हिना जी का कहानी संग्रह ‘राहे अजल में’ की कहानी ‘ज़मी आग की आसमां आग का’ में भी शहंशाह बानो के जीवन में तलाक के मार्मिक चित्र ज़ाहिदा जी ने खींचे हैं जो दिल चीर के रख देते हैं। एक उद्वरण प्रस्तुत हैं- ‘‘इस ख़त में ये इत्तला दी गई थी कि शाह बानो को तीन तलाक़ दे दी गई है। बासठ की उम्र में तलाक़ नामा मिलने पर  एक स्त्री  का हक़ भी उसे नहीं मिलता अदालत कार्यवाईयों से ये हक मिलता भी है और नहीं भी मुस्तफ़ा अली खाँ ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ अपील की गयी कि इद्दत की मुद्दत (तीन महीने दस दिन) गुज़र जाने के बाद शरई ऐतबार से उसे ये हक नहीं मिलना चाहिए। भारतीय कानून ये है कि जब तक औरत दूसरी शादी न करे तब तक  उसकी हक़दार ठहरती है। उनको फ़तवे लगाए गए अख़बार जिसे वह बूढ़ी आँखों से पढ़ती थी वह बताते हैं कि वो बेदीन हो गई है 70 साल की एक बेकस व बेबस के सबब इस्लाम ख़तरे में था। उन पर केस वापिस लेने का दबाव डाला जा रहा था लाखो लोग जुलूस निकाल रहे थे लेकिन शंहशांह बानो ने हिम्मत नहीं हारी वह लड़ रही थी तमाम मुसलमान औरतो और मुसलमान लड़कियों के लिए। मगर अपने ही घर के बेटे और पोतियों पर ज़िन्दगी की बढ़ती मुश्किलें देखी तो उन कागजों पर काली स्याही से अंगूठा लगा दिया। पढ़े-लिखे होने के बाद भी ये अम्ल शंहशाह बानो की अत्यन्त करूण स्थिति को दर्शाते हैं शंहशाह बानो का दर्द प्रत्येक उस स्त्री का दर्द है जो अशिक्षित है। जिसमें पति बार-बार बहिश्ती जे़वर दिखाना कि पत्नी के पति के लिए क्या कर्तव्य है बताता है। जबकि वह स्वयं विलासिता पूर्व जीवन बिताता है और दूसरा विवाह भी कर लेता है। पत्नी को घर से बाहर तलाक़ देकर निकाल देता है और गुज़ारा भत्ता देना भी उसे स्वीकार्य नहीं है।’’


जहाँ शंहशांह बानो के और झीनी-झीनी बीनी चदरिया की नायिका तलाक की समस्या से पीड़ित हैं वहीं उसी से जुड़ा हलाला भी एक बड़ी समस्या है उर्दू में शमोएल अहमद का ‘चुनुवा का हलाला’ है और हिंदी में भगवानदास मोरवाल का ‘हलाला‘ है। चुनुवा का ‘हलाला’ में जहाँ फलो का ठेला लगाने वाले ऐसे पति-पत्नी की कथा है जो अपनी मड़ई में प्रसन्नतापूर्वक रहते थे। परन्तु सामने रह रहे पड़ोसी मौलवी तासीर की दृष्टि उसकी पत्नी के प्रति नेक नहीं थी। चन्नू और उसकी पत्नि का केवल ये पाप था कि वह एक बच्चे की ख्वाहिश रखते थे जिसके लिए वह जहाँ मज़ार और पीर कर रहे थे वहीं देवी माँ के मन्दिर से कोई खाली हाथ नहीं जाता। ये सोचकर खप्पर पूजा के अवसर पर यात्रा में दोनों पति पत्नि शिरकत करते है। शमूल अहमद ने यहाँ गंगा जमुनी तहज़ीब का नमूना पेश किया है कि कुछ मुसलमान भी मन्दिर और देवी यात्रा से जुडे थे। जो हमारी साझी विरासत है गिरदाब में भी पटना के बेहतरीन साझी संस्कृति छठ पूजा के नमूने बिखरे पड़े हैं परन्तु यहाँ हमारा विषय हलाला है जिसमें चुनवा और उसकी पत्नी शिरकत कर लेते हैं उसके बाद उनके साथ जो व्यवहार समाज करता है वो घोर निंनदनीय है तू खप्पर  यात्रा में शामिल था तूने देवी के नारे लगाए चुनुवा ने कहा कि ईश्वर एक है तो उस देवी से माँग लिया और अल्लाह से भी मांग लिया ये ख़बर फैली कि चुनुवा हिन्दू हो गया और उस पर फतवा जारी कर दिया कि चुनुवा खारिजे इस्लाम हो गया और उसकी बीवी निकाह से खारिज हुई। फिर तमामतर अस्तग़फार और कलमा पढ़ाकर वह दोबारा मुसलमान हुआ और अपने ही घर में पत्नि से परदा करने पर मजबूर क्योंकि अब निकाह दोबारा होना चाहिए और उसके लिए हलाला होना जरूरी है जो मौलवी तासीर से होने की बात होती है। लेखक के लफ़्ज है चुनुवा की मड़ई में फिर रोशनी नहीं हुई उसका दम घुट गया मड़ई कब्र में तब्दील हो गई। (चुनवा का हलाला, शमोएल अहमद)

सीता हरण एक अंतर्राष्ट्रीय फलक का उपन्यास है जिसमें भारत के फैजाबाद, अयोध्या और पाकिस्तान के मुल्तान, सिंध, कराची, लाहौर के साथ-साथ पेरिस, अमेरिका, न्यूयॉर्क आदि देश भी सम्मिलित है। सीता हरण में कुर्रतुल ऐन हैदर ने सीता मीर चंदानी जैसा चरित्र गढ़ा है जिसमें सीता जमील की पत्नी है जहां सीता पति की संस्कृति को पूरी तरह अपनाती है वही जमील तुलसी की भाषा अवधी को अपनी मातृभाषा  कहकर गर्व अनुभव करता है। सीता के जीवन में त्रासदी वहां से शुरू होती है जब जमील सीता को तलाक दिए बिना अमेरिका में दूसरी शादी रचा लेता है। सीता अपने पुत्र राहिल की प्राप्ति के लिए पूरे उपन्यास में बेचैन दिखाई देती है। जमील सजा के तौर पर सीता को उस समय तलाक देता है जब सीता एकदम अकेली रह जाती है। सादिका नवाब सहर की कहानी ‘दीवारगीर पेंटिग’ में तलाक की समस्या और निदान की नवीन व्याख्या प्रस्तुत करती है। शराबी पति के एक बार तलाक कह देने से नायिका पति के बहुत समझाने पर भी वापिस नहीं आती। पति उसे हलाला की इजाजत नहीं देता क्योंकि उसके अहम् को चोट पहुँचती है अन्ततः नायिका एक नये घर का सपना लेकर अपनी मां के घर चली जाती है।

तलाक जायज समस्याआंे से निदान के लिए है। शीन मुजफ्फरपुरी के अफसाने तलाक तलाक तलाक में शहनाज और आरिफ को लेकर तलाक का मसला आया है जिसमें लडकी का बद किरदार होना तलाक की वजह है तलाक हक बात पर अलग होने का एक जायज रास्ता है परंतु 99 प्रतिशत लोग इसका गलत इस्तेमाल ही करते हैं। परिवर्तन संसार का नियम है। लिंग, वर्ग, हैसियत, समाज देश और काल का अंतर किए बिना देखा जाए तो किसी का जीवन पेचोखम से खाली नहीं है लेकिन जीवन की सार्थकता इसी में निहित है तमाम विरोधाभासों का सामना किया जाए। कोरजा की कम्मो, अकेला पलाश की तहमीना, सूखा बरगद की रसीदा, महरूख, साजी, शंहशाहबानो नज़राना आदि का जीवन प्रेरणा रूप में स्त्री  जीवन में सार्थकता व सकारात्मकता लाने का कार्य कर रहा है।

महादेवी वर्मा जी के शब्दों में हमें न किसी पर जय चाहिए न किसी से पराजय चाहिए, न किसी पर प्रभुत्व चाहिए न किसी पर  प्रभुता। केवल अपना वह स्थान व स्वत्व चाहिए। जिसका पुरुषों के निकट कोई उपयोग नहीं है परंतु जिसके बिना हम समाज का उपयोगी अंग बन नहीं सकेंगी। (श्रृंखला की कड़िया, महादेवी वर्मा, पृ. 23)

कृष्ण चंदर, राजेंद्र सिंह बेदी, आशिक हंसराज रहबर, गोपीचंद नारंग, सादिका नवाब सहर, सरवत खान, जकिया मरशदी ने उर्दू में रचना करके तथा राही मासूम रज़ा, शानी, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, मंजूर एहतेशाम, मेहरुन्निसा परवेज, नासिरा शर्मा हिंदी में आदि रचनाकारों ने हिंदी और उर्दू मैं बांटने का काम किया है नामवर सिंह के लेख की आती है उर्दू जबां आते आते एक पंक्ति है हिंदी और उर्दू के लेखक दोस्त ही नहीं बल्कि हमराही हैं क्योंकि दोनों ही भाषाओं के सरोकार एक से हैं और अपने कार्य व्यवहार द्वारा स्त्री चेतना को परिभाषित करते हुए हिन्दी, उर्दू साहित्य दोनों ही अपनी भूमिका बखूबी निभा रहे हैं।

 शगुफ्ता नियाज,वीमेंस कालेज, ए.एम.यू. अलीगढ़  के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.

                                 
स्त्रीकाल का प्रिंट और ऑनलाइन प्रकाशन एक नॉन प्रॉफिट प्रक्रम है. यह 'द मार्जिनलाइज्ड' नामक सामाजिक संस्था (सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत रजिस्टर्ड) द्वारा संचालित है. 'द मार्जिनलाइज्ड' मूलतः समाज के हाशिये के लिए समर्पित शोध और ट्रेनिंग का कार्य करती है.
आपका आर्थिक सहयोग स्त्रीकाल (प्रिंट, ऑनलाइन और यू ट्यूब) के सुचारू रूप से संचालन में मददगार होगा.
लिंक  पर  जाकर सहयोग करें :  डोनेशन/ सदस्यता 

'द मार्जिनलाइज्ड' के प्रकशन विभाग  द्वारा  प्रकाशित  किताबें  ऑनलाइन  खरीदें :  फ्लिपकार्ट पर भी सारी किताबें उपलब्ध हैं. ई बुक : दलित स्त्रीवाद 


संपर्क: राजीव सुमन: 9650164016,themarginalisedpublication@gmail.com


Blogger द्वारा संचालित.