अटल निर्णयों में अटल नहीं रहे, किये वंचित समाज विरोधी फैसले भी


पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को एक ओर भावभीनी श्रद्धांजलि दी जा रही है तो दूसरी ओर उनकी निर्मम आलोचना भी हो रही है. आलोचनाओं से आहत उनके प्रशंसक जहाँ आलोचकों पर हमलावर हैं इस ढाल के साथ कि मृत्यु के तुरत बाद आक्रामक आलोचना भारतीय परम्परा नहीं है, वहीं आलोचक इन प्रशसंकों को चिह्नित करते हुए बता रहे हैं कि वंचित समाज के हित में काम करने वाले नेताओं के न रहने पर वे किस तरह उनका अपमानजनक खिल्ली उड़ाते हैं -ऐसे आहत प्रशंसकों में हाल में निर्वाण प्राप्त करुणानिधि पर सक्रिय अपमानजनक टिप्पणियाँ की थीं, तो कुछ इन टिप्पणियों के मौन समर्थक थे. पढ़ें: स्त्रीकाल में अटल बिहारी वाजपेयी का मूल्यांकन करती दो टिप्पणियाँ. 



अरुणा सिन्हा (राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, एनएफआईडवल्यू) 
'हार नहीं मानूंगा' कहने वाले अटलजी आखिर जिंदगी की जंग हार गये ।एक ओजस्वी वकता,कवि , ह्रदय,मंजे हुए राजनेता,माननीय स़ांसद,उदार और कटटरता का मिश्रण  व्यकित्व के धनी अटलजी एक लोकप्रिय नेता रहे। 13 दिन और 13महीनों की सरकार के मुखिया रहने के बाद 1999 से 2004 तक पहली गठबंधन सरकार मे प्रधानमंत्री के रूप में अपना कार्य काल पूरा किया। 'शाइनिंग इंडिया' के नारे के साथ  लडे गये अगले आम चुनाव मे उन्हें हार का मुंह देखना पडा। अपने कार्य काल मे उन्होंने पोखरण मे दूसरी बार गुप्त रूप से परमाणु परीक्षण कराये। पाकिस्तान से संबंध सुधारने के प्रयास में दो बार वार्ता की। आगरा मे हुई वार्ता को छोड़ मुशर्रफ बीच मे ही अपने देश लौट गए। दिल्ली से लाहौर तक बस चलायी और उसके पहले यात्री के रूप मे अटलजी ने सफर किया। संयुक्त राष्ट्रसंघ मे पहली बार हिन्दी मे भाषण देने को उनकी उपलब्धियों मे गिना जाता है।साम्यवाद से अपना राजनीतिक जीवन प्रारम्भ करनेवाले अटल जी आरएसएस के प्रचारक और कायवाहक बन गये।जीवन भर अविवाहित रहे। विरोधियों को भी साथ लेकर चलने वाले अटलजी के शिष्य रहे बीजेपी के दो वरिष्ठ नेताओं ने भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता के जहर बोये. लाल कृष्ण आडवाणी ने अयोध्या मे राममंदिर बनाने के लिए देश भर मे रथयात्रा की, इसने  सामप्रदायिक तनाव भडकाया, जो बाबरी मस्जिद के टूटने के साथ वह चरम पर पहुंच गया,तब अटलजी की चुप्पी खलने वाली थी. उसके बाद 2002 मे हुए गुजरात दंगे मे उनके दूसरे शिष्य की नरेन्द्र मोदी की भूमिका उन्माद बढ़ाने वाली रही. गुजरात के तत्कालीन मुखयमंत्री नरेंद्र मोदी को राजधर्म का पाठ तो याद दिलाना लेकिन उन्हें  पद से हटाने की हिम्मत न जुटा पाना उनके वयक्तित्व के विरोधाभास को दर्शाता है। जो भी हो एक अच्छे पत्रकार, चुटीले अंदाज वाले और सबको साथ लेकर चलने वाले इस लोकप्रिय नेता,विरोधियों की आवाज को भी सुनने वाले, उनहे भी साथ लेकर चलने वाले सर्वमान्य नेता के रूप में देश ने उन्हें आदर दिया।



प्रेमकुमार मणि का यह स्मृतिलेख भी पढ़ें: अटल इकहरे चरित्र के नहीं, जटिल चरित्र के थे

वाजपेयी जी के कार्यकाल मे कई ऐसी घटनाएं हैं, जो उनके शासन की कमजोरी की ओर इशारा करती हैं- 24 दिसंबर 1999 को 5 पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा काठमांडू से दिल्ली आ रही इंडियन एयरलाइंस के जहाज का अपहरण कर लिया गया था, जिसमें 178 यात्री और 15 कर्मचारी थे। उनकी रिहाई की एवज मे उन्होंने भारत की जेल मे बंद कई आतंकवादियों को छोडने की मांग रखी। भारत सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करने मे नाकामयाब रही और आतंकवादियों के आगे घुटने टेकने को मजबूर होना पडा और उनकी मांग माननी पडी। इन्हीं रिहा हुए आतंकवादियों मे से एक मौलाना मसूद अजहर ने 2009 मे भारत की संसद पर आतंकवादी हमले की साजिश रची। कारगिल पर पाकिस्तानी हमला भी अटलजी के कार्यकाल में ,1999 में,ही हुआ। हालांकि उसमें पाकिस्तानी घुसपैठियों को मुंह की खानी पडी। इन घटनाओं को छोड़ दिया जाय तो अटल बिहारी वाजपेयी कांग्रेस से बाहरके ऐसे प्रधानमंत्री थे जो सर्वमान्य नेता थे, जिन्होंने हमेशा पाकिस्तान से संबंध सुधारने की दिशा मे काम किया। पोखरण परमाणु विसफोट के बाद अमेरिका द्वारा भारत पर लगाये गये आर्थिक एवं तकनीकी प्रतिबंधों के बाद पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति भारत आये। अटलजी ने चीन का भी दौरा किया। कहा जाता है कि उनहीं के काल मे सडकों का निर्माण सबसे तेजी से हुआ। अटलजी10 बार लोकसभा के लिए चुने गये यही तथ्य उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है।     

1942 मे भारत छोडो आनदोलन से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करनेवाले और 23 दिन की जेल की सजा खाकर, कभी अंग्रेजों के खिलाफ न लडने का शपथपत्र देने वाले अटलजी का आजादी के बाद का राजनीतिक सफर फिर भी सफल ही कहलायेगा, जो उनके समावेशी,मधुर सवभाव और ओजस्वी भाषणों की,जो जुमलेबाजी से दूर अपने विरोधियों पर सीधे कटाक्ष से भरे होने के साथ लोगों की भीड इकटठा करने का दम रखते थे, तथा अच्छा संगठनकर्ता होने की देन है। भारतरत्न से सममानित अटलजी  भारत की राजनीति में हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे।

जयंत जिज्ञासु (शोधार्थी जेएनयू)
मेरे लिए अटल जी उतने ही खतरनाक और फ़िरकापरस्त रहे, जितने आडवाणी, मुरली मनोहर, कल्याण सिंह, अशोक सिंघल, प्रवीण तोगड़िया और मोदी। बस स्टाइल का फ़र्क है। वाजपेयी अलहदा शैली के वक्ता थे और उनका समृद्ध शब्कोश उन्हें कई बार बचा ले जाता था। वो चकमा देने में कामयाब हो जाते थे। बाक़ी, उन्हें लोकव्यवहार बरतना आता था। मगर, बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने उपेक्षित वर्गों के हितों के हनन में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। युनाइटेड फ्रंट सरकार के फ़ैसले को पलटते हुए अपनी 13 महीने वाली सरकार में तिकड़म कर दिया और 2oo1 में जाति जनगणना नहीं होने दी। इस मामले में अटल जी को प्रणव दादा व चिदम्बरम चाचा के समकक्ष रखा जा सकता है। भारत सरकार के कई उपक्रमों को निजी हाथों में दे दिया, आरक्षण को चुपचाप रहकर शातिराना ढंग से तहसनहस किया, अलग से विनिवेश मंत्रालय बनाया। पेन्शन ख़त्म किया। पोखरण मामले में अदूरदर्शिता का परिचय दिया। बहुतेरे जनविरोधी फ़ैसले लिए। बाबरी ढाने के लिए उन्होंने कारसेवकों को उकसाया। उनमें और नरसिम्हा राव में कई लिहाज़ से गज़ब की पटती थी। एक उकसाने वाले, दूसरे घोड़े बेच कर सोने वाले। और गज़ब तो ये कि विध्वंस के बाद संसद में आहत होके अभिनय कौशल भी दिखा दिया।



बस ये है कि उनकी एक्टिंग का मेयार मौजूदा प्रधानमंत्री से बहुत-बहुत ऊँचा था जिसे ये कभी छू भी न पायेंगे।
आज कुछ बातें कहने का मन नहीं। फिर कभी तफ़्सील से। अलविदा कह गए अटल जी! और कुछ नहीं तो शब्द-शक्तियों के शानदार प्रयोग के लिए तो उन्हें याद किया ही जा सकता है।

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