झारखण्ड के 20 सामाजिक कार्यकर्त्ताओं पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज, आलोका कुजूर का खुला ख़त



प्रस्तुति और रिपोर्ट : राजीव सुमन 

26 जुलाई  को करीब साढ़े ग्यारह बजे झारखण्ड के खूँटी जिले के खूँटी थाना में 20 लोगो पर देशद्रोह के साथ ही अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है. एफ.आई.आर. संख्या 124/2018 में 124A,121A,121 भा.द. वि. के अंतर्गत और 66A,66F,आई.टी. एक्ट के तहत धाराएं दर्ज हैं. इन पर मुख्य आरोप सोशल मीडिया में खूंटी के पत्थलगड़ी आन्दोलन में आदिवासियों की ओर से लिखना है. 20 लोगों में से एक आलोका कुजूर ने जनता के नाम एक खुला ख़त लिखा है. रिपोर्ट और प्रस्तुति: राजीव सुमन

सामाजिक कार्यकर्ताओं के पक्ष में आया विपक्ष: किया प्रेस कांफ्रेंस 


झारखण्ड में खूँटी और आसपास के क्षेत्रों में पिछले कई महीनो से पत्थलगड़ी आन्दोलन चल रहा है. सरकार लगातार इस आन्दोलन को ख़त्म करने के प्रयास कर रही है लेकिन झारखण्ड के आदिवासी अपनी संथाल परम्परा के अंतर्गत स्वयं का प्रशासन चाहते हैं. आदिवासियों के जल-जंगल और जमीन की इस लड़ाई में कई बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं संगठन अपने-अपने स्तर पर इसपर अपनी राय रखते आ रहे हैं-टीवी, समाचार पत्रों, सोशल मीडिया और अन्य के माध्यमों से. इसी आन्दोलन से सम्बद्ध नेताओं पर हाल ही में झारखण्ड की पांच लड़कियों के साथ गैंगरेप का आरोप भी लगा था. इससे पहले झारखण्ड के सांसद करिया मुंडा के आवास पर तैनात पुलिस कर्मियों को पत्थलगड़ी आन्दोलन समर्थकों द्वारा अगवा करने और बाद में छुडा लिए जाने की घटना भी सामने आई.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन 

इसी कड़ी में अब सरकार ने 20 लोगों के ऊपर उक्त धाराओं के तहत सोशल मीडिया पर लोगों को सरकार के खिलाफ भड़काने और उकसाने आदि का आरोप लगाते हुए देशद्रोह का मामला दर्ज किया है. आरोपों में पुलिस का कहना है ' खूँटी एवं आस-पास के क्षेत्रों में कुछ लोग यहाँ के भोले-भले एवं अधिवासी ग्रामीणों को आदिवासी महासभा एवं ए. सी. भारत सरकार कुटुंब परिवार के नाम पर बहला-फुसलाकर, धोखे में रखकर, संविधान की गलत व्याख्या कर एवं सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्र विरोधी, संविधान के विरुद्ध राष्ट्र की एकता  एवं अखण्डता को तोड़नेवाले क्रियाकलाप कर समाज में साम्प्रदायिक एवं जातिय माहौल को बिगाड़कर विधि-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न कर रहे हैं.'

उक्त एफआईआर. में जो नाम पुलिस ने 1.बोलेसा बबीता कच्छप 2.सुकुमार सोरेन 3.बिरास नाज़ 4.थॉमस मुण्डा, 5.वाल्टर कन्दुलना 6.घनश्याम बिरुली, 7.धरम किशोर कुल्लू, 8.सामू टुडू  9.गुलशन टुडू, 10.मुक्ति तिर्की, 11.स्टेन स्वामी, 12.जे. विकास कोड़ा, 13.विनोद केरकेट्टा 14.आलोका कुजूर 15.विनोद कुमार, 16. थियोडोर किडो, 17.राकेश रोशन किरो, 18.अजय कंडूलाना, 19. अनुपम सुमित केरकेट्टा, 20.अन्जुग्या बिस्वा के खिलाफ इन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है. 

रिपोर्ट के मुताबिक़ इन 20 लोगों में 19 लोग सामाजिक कार्यकर्ता हैं और इन उन्नीस में एकमात्र महिला आलोका कुजुर भी शामिल हैं जो स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर की कई पत्र पत्रिकाओं में लेखन कर चुकी हैं. आलोका आदिवासी हैं और पेशे से लेखक, पत्रकार और कवयित्री रही हैं. इसके अतिरिक्त जिस महिला का नाम है वह स्थानीय है और सूत्रों के अनुसार आन्दोलन से सम्बद्ध रही है.

आरोपों में पुलिस का कहना है ' खूँटी एवं आस-पास के क्षेत्रों में कुछ लोग यहाँ के भोले-भले एवं अधिवासी ग्रामीणों को आदिवासी महासभा एवं ए. सी. भारत सरकार, कुटुंब परिवार के नाम पर बहला-फुसलाकर, धोखे में रखकर, संविधान की गलत व्याख्या कर एवं सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्र विरोधी, संविधान के विरुद्ध राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को तोड़नेवाले क्रियाकलाप कर समाज में साम्प्रदायिक एवं जातीय माहौल को बिगाड़कर विधि-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न कर रहे हैं.'  इस बीच पूरा विपक्ष इस मामले में इन नामजद लोगों के पक्ष में खड़ा हुआ है. विपक्ष ने आज प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि ' ये सामाजिक कार्यकर्ता देशद्रोही हैं, तो हम भी इनके साथ हैं और इस तरह हम भी देशद्रोही हुए.
आलोका कुजूर दायें से दूसरी 



नामजद आलोका ने पत्थलगड़ी आन्दोलन और आदिवासियों की जल-जंगल और जमीन की इस लड़ाई में सरकारी नजरिये, दमन से उपजे सवालों को जनता के नाम खुला पत्र लिखा है:

देशद्रोही क्यों ? 
दिनांक  
                                         
दिनांक – 3 अगस्त 2018

मेरी कलम से देश की जनता को खुला पत्र

जोहार साथियों

मैं आलोका कुजूर हूँ. जुलाई 28 और 29 तारीख के दैनिक अखबार से पता चला कि 26 जूलाई को खूंटी थाना में 20 लोगों समेत मेरे ऊपर भी देशद्रोह का मुकदमा दर्ज हुआ है. जानकारी के अनुसार "फेसबुक के माध्यम से मैने खूंटी में पत्थलगड़ी करने वाले लोगों को उकसाया है. संविधान की गलत व्याख्या की है. फेसबुक के माध्यम से जनता को भडकाया है, वो भी गांव की वैसी जनता जो अशिक्षित है." ये आरोप सरासर गलत है.

मैं 2008 से फेसबुक में लिखने का काम कर रही हूं, जिसमें मैं समाजिक और राजनीतिक हर व्यक्ति के काम-काज पर मूल्यांकन करती रही हूं. मैं जमीन के आंदोलनों से भी लम्बे समय से जूडी रही हूं. राज्य के कई छोटे-बडे आंदोलनों के साथ-साथ ही, भारत में महिला-आंदोलनों के साथ भी मेरा संबध रहा है.

मैं डब्लू.एस.एस. की सदस्या भी हूं. सदस्या होने के नाते  कुछ समाजिक महिलाएं और मैं  खूंटी गैंग रेप मामले की फैक्ट फाइडिंग करने गए थे. हम सभी महिलाएं महिलाओं के अधिकार के लिए लगातार संघर्षरत् रहती है. जहां भी महिलाओं के साथ इस तरह की घटनाएं हुई, हम सब लगातार प्रखरता के साथ महिलाओं के हित की मांग करते रहे हैं. इसमें गलत कहां है. दैनिक अखबार में खबर पढने के बाद पता चला कि प्रशासन के पास इतना समय होता है कि वह फेसबुक देखती है. तब, सवाल बनता है कि वो थाना में रह कर क्या काम करते हैं? अखबार के माध्यम से जानकारी मिली कि आदिवासी महासभा और ए.सी. भारत कुटूम्ब परिवार के लोगों द्वारा ग्रामीणों को संविधान की गलत व्याख्या कर बरगलाया गया है जो मेरे हिसाब से गलत है. मै जानकारी देना चाहती हूं कि महिलाओं, सर्वजन, लेखन और जमीन के लिए चले संघर्ष में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मेरी उपस्थिति रही है तथा 15 से 20 सालों की पत्रकारिता में कहीं भी आदिवासी महासभा और ए.सी. भारत कुटूम्ब परिवार के साथ न तो सामाजिक तौर पर और न उनके संगठन से कोई संबध रहा है. मेरे ऊपर लगाया यह आरोप बेबुनियादी है. मेरा संबध इन संगठनों से कैसे है प्रशासन सार्वजनिक करे. इस बात पर गहराई से ध्यान देना जरूरी है कि एफआईआर में बार बार इस बात का जिक्र किया गया है की खूंटी की ग्रामीण जनता अशिक्षित है. तब यह सवाल करना जरुरी हो जाता है की क्या अशिक्षित ग्रामीण जनता फेसबूक इस्तेमाल करती है. फिर यह सवाल भी मन में आता है की सरकार तथा प्रशासन के जानने के बावजूद कि खूंटी में शिक्षा का स्तर रसातल में चला गया है फिर भी सरकार द्वारा शिक्षा के स्तर को ठीक करने के लिए आजतक कोई कदम क्यों नहीं उठाए गए. एक सवाल यह भी है की खूंटी की जनता अशिक्षित है तो फिर संविधान की व्याखाया कैसे हुई.

जब यह सारे सवाल मन में आते हैं तो यह समझ में आता है कि प्रशासन हम पर झूठे आरोप के आधार पर सरकार को गुमराह करते हुए वाहवाही बटोरना चाहता है.दैनिक अखबार में छपे खबर के अनुसार हम सब सोशल मीडिया और फेसबुक में पत्थलगडी एवं संविधान के प्रावधानों की गलत व्याख्या कर लोगो में राष्ट्र विद्रोह की भावना का प्रचार-प्रसार कर रहे है. यह एफ.आई.आर की कॉपी में बार बार लिखा गया है. मुझे अच्छा लगा कि थाना भी मानता है कि कहीं व्याख्या गलत हुई है. तो, यही मौका है कि इसपर संविधान की व्याख्या सही क्या हो सकती है, पर बहस हो. एफ.आई.आर में झारखण्ड के खूंटी जिला के आदिवासी ग्रामीणों की अशिक्षित होने की बात कही है. कहीं-ना-कहीं थानेदार भी बात समझ रहे हैं कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था में शिक्षा विभाग की पहुंच खूंटी में नहीं हो पाई है.
खूंटी में पत्थलगड़ी


झारखण्ड संविधान की पांचवी अनुसूची के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्र है. यहां ग्रामसभा के अधिकारों को सुनिश्चित किये बैगर आदिवासियों की जमीन पर सरकार कोई फैसला ले नहीं पा रही है. पूरा झारखण्ड जंगल-जमीन के सवाल के साथ आंदोलन कर रहा है. लोग हर दिन सड़क पर अपनी मांग के साथ संघर्ष कर रहे है. ऐसी स्थिति में जन आंदोलन के सवालों के साथ खड़ा होना कहां से देशद्रोह है. 

मेरे कुछ सवाल हैं:

1. मैं देशद्रोही क्यों और कैसे हूँ?
2. प्रशासन यह बताए कि देशद्रोह को मापने का उसका पैमाना क्या है और संविधान का पैमाना क्या है?
3. खूंटी में मानव तस्करी एक बड़ी समस्या है, क्या इस सवाल को उठाना देशद्रोह है ?
4. डायन हत्या के नाम पर लाखों महिलाओं की हत्या हो गई है, क्या इस सवाल को उठाना देशद्रोह है ?
5. वन अधिकार कानून के अंर्तगत महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित नहीं की गई है, क्या इस सवाल को उठाना देशद्रोह है ?
6.जमीन के सवाल की समस्या का समाधान क्यों नहीं निकाले जा रहे हैं, क्या इस सवाल को उठाना देशद्रोह है ?

28 तारीख को अखबार के माध्यम से पता चला कि  20 लोगों पर देशद्रोह संबधित मामला दर्ज हुआ है. वह भी खूंटी थाना क्षेत्र के अन्तर्गत, जहां 2017 से पत्थलगड़ी आन्दोलन चल रहा है. पत्थलगड़ी मुण्डा समाज की परम्परा में शामिल रहा है. सारंडा का यह इलाका ऐशिया का सबसे बड़ा वनक्षेत्र का इलाका है. यहाँ मुण्डा समाज अपनी परम्परागत व्यवस्था को कायम कर रहे हैं. उन्ही इलाकों में लगातार देशद्रोही बनाते मुण्डा समाज संविधान और जमीन के सवाल के साथ तैनात है. घने वन क्षेत्र जहां रोटी कपडा और मकान जैसी सुविधा खूद से सवाल पूछती है वहीं श्रम अधारित व्यवस्था तमाम चुनौतियों के साथ अपनी पहचान की लड़ाई लडने के लिए क्रमबंद्ध तरीके से खड़ी है. इस इलाके में कोयलकारों का आंदोलन और जमीन बचाने के आंदोलन ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया है. यहाँ के किसान मजदूर की आजीविका और जीवन का मूल आधार जमीन ही रहा है. कागज के टूकडे में जमीन का हिस्सा और जमीन में मानव का हिस्सा, विकास में खेती का हिस्सा और विकास के लिए जमीन का हिस्सा, के इस बार-बार की हिस्सेदारी के बीच किसानों के पास भूख की समस्या आ खडी होती जा रही है, वहीं पूंजी आधारित व्यवस्था उन्हें किसान से मजदूर और मजदूर से मौत के सफर की तरफ ले जा रहे हैं. बदलते दौर में सरकार की योजनाओं में कोई बदलाव नहीं आया. इंदिरा आवास आज भी एक ही लाख में बनाने की योजना है. किसानों के खेत में पानी नहीं है. ऐसे कई  सवाल है जो झारखंड की हर जनता सरकार से पूछना चाहती है.
आदिवासी चिंतक मुक्ति तिर्की 


मैं- पत्रकार, लेखिका, शोधकर्ता, महिला चिंतक और कवयित्री हूं. आदिवासी और महिला-मुद्दो से जुड़े जल-जंगल-जमीन और जन आंदोलनों पर लम्बे समय से शोधपरक लेख लिखती रही हूं. मेरे लेख भारत के लगभग हर राज्य के समाचार पत्र में ही नहीं बल्कि विश्व के कई मैगजीन में छप चुके हैं. भारत की महिला आंदोलन से जूडी हूई हूँ. राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर महिलाओं के लेखनी पर सम्मान प्राप्त है मुझे. खूद के मेहनत और महिला हित के लिए शोध किया है जो पांडूलिपि के रूप मे है.

पत्थर खदान में औरत, महिला बीडी वर्कर, पंचायती राज, डायन हत्या आदि पर शोधपरक  लेखन कर चुकी हूं. प्रथम सामुहिक किताब झारखंड इन्सायक्लोपिडीया, शोधपरक किताब झारखंड की श्रमिक महिला, कविताओं की सामुहिक प्रथम किताब- 'कलम को तीर होने दो' आदि में मैं उपस्थित हूँ, देश के प्रतिष्ठित पत्रिकाओं मे लगातार मेरी कविताओं का प्रकाशन आदि होता रहता है. मुझे लेखनी के लिए अनेक, अवार्ड, सम्मान और फेलोशिप प्राप्त हुए है.ऐसे में देशद्रोही मै नहीं यह व्यस्व्था है जो हमारी अभिव्यक्ति को, हमारी आवाज को रोकना चाहती है.



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