ग्यारहवीं 'ए' के लड़के देश का भविष्य हैं, असली खतरा ग्यारहवीं 'बी' की लड़कियां हैं


जया निगम 

सनी लियोनी  और सपना चौधरी हमारे समय के पुरुषों के लिये सपनीली परियां हैं, क्लास और कल्चर की ऊंची-ऊंची दीवारों को लांघते हुए इन दोनों ही औरतों ने अपनी लोकप्रियता की बड़ी शानदार मीनारें खड़ी की हैं. इसी तरह भाभी जी घर पर हैं की शिल्पा शिंदे की सेक्स अपील के चर्चे हर घर में हैं. सदियों से गणिकाओं और नगरवधुओं के नाम पर पुरुषों की यौन फंतासियों को पूरा करने वाली औरतें का जो अस्तित्व बाज़ार में रहा है, उन्ही लालसाओं के ऑन स्क्रीन अवतार के रूप में ये महिलायें दिख रही हैं. सविता भाभी की शोहरत के किस्से अभी पुराने नहीं हुए हैं. 



भारत में इन महिलाओं की विराट सफलता के बरक्स कोई पुरुष अपनी सेक्स अपील के चलते बाजार में छाने में इतना कामयाब रहा हो ऐसा याद नहीं आता हालांकि इसके अपवाद स्वरूप केवल फवाद खान का नाम ही याद आता है जिनकी सेक्स अपील के फंदे में महिलायें मास लेवेल पर फंसीं लेकिन क्लास और कल्चर की सीमाओं को लांघना उनके लिये भी बहुत दूर की कौड़ी थी.

क्या इन दीवानावार आदमियों को अपने घर की महिलाओं के 'टेस्ट' के बारे में कुछ पता है? माना कि ज्यादातर ने ये जानने की जरूरत कभी महसूस ही नहीं की होगी लेकिन जिन्हे 'जरूरतों का ख्याल' आता है जो ये मानने के दावे करते हैं कि औरतें भी आदमियों की तरह इंसान होती हैं. उनकी भी इच्छायें-वासनायें, हार-जीत, संघर्ष-पराक्रम और अहम-कुंठायें होती हैं. उनके लिये भी सेक्स का चैप्टर खुलते ही केवल पुरुषों के फलसफे ही वास्तविक रह जाते हैं.

हिंदी के युवा लेखक गौरव सोलंकी की एक कहानी है, 11वीं A के लड़के. यूं तो ये कहानी बेहद विवादास्पद है और नयेपन की संभावनाओं से भरपूर भी, लेकिन मेरे लिये इस कहानी की खास बात है - एक ही क्लास में पढ़ने वाले भाई और बहन की सेक्सुअल फैंटेसीज़ का समानांतर चलना और उनका आपस में एक-दूसरे से ये सब साझा करना. कहानी में शायना, नायक की हमउम्र बहन है जिसका प्यार अमरजीत से है जो उसी की क्लास में पढ़ने वाला पढाकू किस्म का, चॉकलेटी संभावनाओं से भरपूर लड़का है जिसकी शक्ल के पीछे पूरे क्लास की लड़कियां एक साल फेल होने को तैयार हैं जबकि इस हल की दुकान चलाने वाले लड़के को केवल किताबों से मुहब्बत है. शायना और उसका भाई सर्विस क्लास मां-बाप की नौकरों के दम पर पलने वाली संतानें हैं. शायना का भाई अमरजीत की भाभी के साथ सविता भाभी की कल्पनाओं के सच होने से शुरुआत करते हुए उसकी सलवार तक धोने लगता है जबकि शायना अमरजीत की किताबों के पैसे चुकाते-चुकाते उसकी दाढ़ी बनाने लगती है.
इस किताब पर भारतीय ज्ञानपीठ की आपत्ति थी कि भाई-बहन के रिश्ते को इस तरह से कहानी में दिखाया जाना अश्लील है और हिंदी समाज भी इस तरह की कहानियों के लिये तैयार नहीं है, ये उद्गार उन्होने लेखक गौरव सोलंकी को लिखे गये अपने पत्र में व्यक्त किये जिसके लिये वो तायार नहीं हुए, उन्हे ये भी गवारा नहीं था कि वो अपनी कहानी में सगे भाई-बहन के रूप में दिखाये गये अपने पात्रों का रिश्ता बदल कर कुछ ममेरा या चचेरा कर दें. इस संग्रह का नाम पहले था - सूरज कितना कम जो बाद में एक अन्य प्रकाशन से ग्यारहवीं ए के लड़के के नाम से छप कर आया.


दरअसल ये पूरा किस्सा साल 2012 का है और हमारे समाज में यौन फंतासियों और सुखों पर लगे लैंगिक पहरों के अलग-अलग किस्सों की केवल एक नज़ीर भर है. देश के आकाओं को रानी जैसी गरीब घर की बहू-बेटियों का सविता भाभी में बदल जाना तो पुश्तैनी प्रहसन लगता है लेकिन दिक्कत उन्हे होती है शायना जैसी लड़कियों के अपने भाईयों के बरक्स अपनी प्रेम और वासनाओं के सिलसिले चलाने से, यौन सुखों और फंतासियों को अपनी तरह से जीने के उनके वादों और दावों से.

जो भाई अपनी बहनों को घर, परिवार, पड़ोस, देश और धर्म की चौहद्दी में बांध कर खुद अपने शिकारी अभियानों में व्यस्त रहते हैं, उनके हाथों इस देश का धर्म, संस्कृति और अर्थव्यवस्था बिल्कुल सुरक्षित रहती है लेकिन जो लड़के अपने साथ अपनी बहनों के इंसानी हकों को पहचान कर उन्हे नहीं दबाना नहीं सीखते, धमकाना और जरूरत पड़ने पर मारना नहीं सीखते वो 'गुड़गांव' जैसे शहरों के लिये किसी मतलब के नहीं बनते. क्या इत्तफाक है कि गौरव ने ये कहानी जिस शहर से भाग कर लिखी, उसी शहर के बनने की कहानी शंकर रमन ने लिखी.
देश में चलते सेक्सी बवंडर की एक से बढ़ कर एक डरावनी कहानियां सामने आ रही हैं - मगर देश को खतरा इन सच्ची कहानियों के वास्तविक अपराधियों से ज्यादा ऐसी काल्पनिक कहानियों के सच्चे किरदारों से हैं जो किस्सा, गुड़गांव, तितली, सिटीलाइट्स, अनफ्रीडम, एंग्री इंडियन गॉडसेज, एस दुर्गा और ग्यारहवीं ए के लड़के जैसी कहानियां कह रहे हैं.

इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि 'गुनाहों का देवता' पढ़ कर मंत्रमुग्ध हो जाने वाली पीढ़ी उसी देवता की निजी जिंदगी पर आधारित 'रेत की मछली' को सुनने के लिये बिल्कुल तैयार नहीं है.
हमारी सोसायटी जिस किस्म के सेक्सी चक्रवात से गुजर रही है उसके बीचोबीच एक किस्म का 'निर्वात' है. निर्वात टूटेगा तो चक्रवात बिखर जायेगा. इस निर्वात को तोड़ने के औजार 'रानी' के पास नहीं हैं पर शायना के पास हैं, इसलिये उसका चुप रहना जरूरी है.



 आईआईएमसी की पूर्व छात्रा जया निगम फिलहाल फ्रीलांस करती  हैं. 

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