काली मॉडल रिनी कुजूर का प्रसिद्धि-पूर्व संघर्ष : रंगभेद का भारतीय प्रसंग

ज्योति प्रसाद
 शोधरत , जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. सम्पर्क: jyotijprasad@gmail.com  

छत्तीसगढ़ के एक गाँव की लड़की रातोरात इन्टरनेट पर छा गई है. इसकी वजह बहुत बड़ी और खास है. रिनी नी कुजूर नामक इस खालिस भारतीय मॉडल को देखकर लोग दंग हैं. लोग उनकी तुलना बारबेडियन अंग्रेज़ी पॉप गायिका रिहाना से कर रहे हैं. उनकी शक्ल काफी हद तक एक  दूसरे से मिलती भी है. रिनी कुजूर ने अपनी इन्स्टाग्राम प्रोफाइल पर अपना नाम रिहाना से मिलता जुलता रखा है. दोनों में नैन नक्श की समानता के अलावा एक और समानता भी है. दोनों के रंग एक जैसे हैं. अंग्रेज़ी गायिका रिहाना की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनको इन्स्टाग्राम पर 64 मिलियन लोग फॉलो करते हैं. यह संख्या हैरान कर देती है. उनका एक गीत जो ‘अम्ब्रेला’ नाम से मशहूर है, को यूट्यूब पर 40 करोड़ से भी अधिक लोग देख चुके हैं. यह आंकड़ा जादुई नहीं बल्कि हकीक़त है. ठीक इसी तरह एक अन्य गायिका बियोंस नोवेल्स को इन्स्टाग्राम पर ही 116 मिलियन लोग फॉलो करते हैं. बात माइकेल जैक्सन की हो, रिहाना की हो, बियोंस की हो या फिर बॉब मार्ले की सभी का एक ही रंग है- काला! रिनी कुजूर का भी यही रंग है. और यह भी एक अच्छी वजह है कि वे आज भारतीय मिडिया में चर्चा का विषय बन चुकी हैं.

अपने नैन नक्श के रिहाना से मिलने जुलने के कारण इन्टरनेट पर छा जाने वाली रेनी कुजूर का रंग अचानक से कई अख़बारों और ऑनलाइन मीडिया वेबसाइट पर प्रमुखता से चमक रहा है. उनका इस तरह से रातों रात चर्चा में आ जाना खास भी है. भारत जैसे देश में जहाँ बात-बात में रंग को लेकर भेदभाव होता है वहीं उसी देश में रेनी अपने इसी रंग के साथ धूम मचा रही हैं. अख़बारों में उनके ऊपर खास रिपोर्ट लिखी जा रही हैं. उनकी तरह-तरह की तस्वीरें छप रही हैं. लोग उनको गूगल पर सर्च कर रहे हैं. लोग उनके बारे में हर तरह की जानकारी जानना चाह रहे हैं. एक ओर उनकी तस्वीर है तो बगल में रिहाना की. ऊपर मोटे मोटे अक्षरों में लिखा गया है- (Meet Indian Rihanna!) मिलिए भारतीय रिहाना से!

रिनी कुजूर 


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हालाँकि अभी यह शुरुआत है. रिनी के लिए मॉडल बनने का यह सफ़र आसान नहीं रहा. यह देश इंग्लैंड नहीं है जहाँ नओमी कैम्पबेल जैसी मॉडल का अपना एक रूतबा है. जब वह रैंप वॉक करती हैं तो लोगों की तालियाँ उनका स्वागत करती हैं. पर भारत में ऐसा नहीं होता. नओमी आज 48 साल की हो चुकी हैं पर अभी भी उनका जलवा कायम है. रिनी कुजूर में नओमी का भी अक्स देखा जा सकता है. हमारे देश में जाति, धर्म, अमीरी-गरीबी का भेदभाव तो है ही साथ ही रंग से जुड़ा भेदभाव भी जड़ों तक फैला हुआ है. ऊपर से रिनी का छतीसगढ़ जैसे प्रदेश से होना जो अधिकतर मामलों में पिछड़ा हुआ प्रदेश बताया जाता है, साथ ही उनका आदिवासी होना भी. अख़बारों में उनके दिए गए इंटरव्यूज़ में उन्होंने बताया भी है कि बचपन से लेकर आज तक के संघर्ष में लोगों ने उनके काले रंग को लेकर मजाक बनाया है. अंग्रेज़ी भाषा पर बेहतर पकड़ न होने के चलते और गहरे रंग को देखकर उनको काम का मौका ही नहीं मिलता था. कई जगह काम देने से मना कर दिया जाता था. कई बार मेकअप करने वाले लोग उनके रंग को लेकर तंज कस दिया करते थे. उनके पास ऐसे ढेरों उदाहरण हैं जहाँ वह बतलाती हैं कि रंग को भारत में किस तरह से देखा जाता है.

पर उनके अनुभवों से यह साफ़ हो जाता है कि हमारे यहाँ के लोग गोरे रंग को लेकर किस हदतक पागल हैं. हमारी नस्ल काकेसियन नहीं है. हम काले वर्ण की कतार में आते हैं. भारत एक गरम देश है. हमारे यहाँ के लोगों में यूरोपियन लोगों की तरह सफ़ेद रंग में तब्दील हो जाने की गज़ब की चाहत है. यहाँ के फ़िल्मी सितारे खुद गोरा बनाने वाली क्रीम का जोरशोर से प्रचार करते हैं. यहाँ तक कि शाहरुख़ खान खुद मर्दों वाली क्रीम बेचते हैं. उनके विज्ञापन के मुताबिक यह क्रीम लड़कों ‘मर्दों’ को इस्तेमाल करनी चाहिए क्योंकि यह लड़कियों पर इम्प्रेसन डालने के लिए अच्छा उत्पाद है. लेकिन उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि जब वे अपनी रा-वन फिल्म बना रहे थे तब ‘छमक-छल्लो’ गीत एक काले विदेशी गीतकार एकॉन से क्यों गवाया? ये फ़िल्मी सितारे तो ज्यादा नहीं सोच पाते. यह लोगों को सोचना चाहिए कि वे क्यों अन्धे होकर इन्हें फॉलो करते हैं. हाल-फिलहाल में आलिया भट्ट, यमी गौतम, हृतिक रोशन, शाहरुख़ खान, दीपिका पादुकोण, जॉन अब्राहम आदि फ़िल्मी कलाकार गोरापन बेच रहे हैं. इस हद तक रंग से जुदा भेदभाव खुलेआम दिखता है. भारत में गोरा बनाने वाली क्रीम का कारोबार करोड़ों में है. टीवी पर हर दूसरा तीसरा विज्ञापन इन्हीं कंपनियों का है.

टीवी पर हर दस मिनट में फेयर एंड लवली क्रीम का प्रचार करने वाली अभिनेत्री यमी गौतम बार-बार भारतीय दर्शकों और आम लोगों को रंग साफ़ करने का लगभग आदेश देती हैं, पर खुद अपने सोशल साईट इन्स्टाग्राम पर बियोंस नोवेल्स, जेनिफ़र लोपेज़ और प्रियंका चोपड़ा जैसी शख्सियतों को फॉलो करती हैं. यह उनके व्यक्तित्व का दोहरापन है. एक तरफ उनको भारतीय काले रंग के लोगों मरीज लगते हैं दूसरी तरफ वे बियोंस जैसी गायिका को फॉलो करती हैं. युवा होती लड़कियों को यमी गौतम की बजाय रिनी कुजूर को फॉलो करना चाहिए जिसने अपने इस रंग और तमाम रुकावटों के बाद भी अपना हौंसला नहीं छोड़ा. आज दुनिया उन पर चर्चा कर रही है. उनकी खूबसूरती पर कसीदे कहे जा रहे हैं.

रिहाना 

भारतीय जनता पार्टी के एक नेता हैं तरुण विजय. पिछले साल अफ़्रीकी मूल के लोगों पर लगातार भारत में होते हमले पर उन्हें अल जजीरा चैनल ने चर्चा के लिए बुलाया था. तभी वे एक ऐसी बात बोल गए जिससे बखेड़ा खड़ा हो गया था. उन्हों ने कहा- “अगर हम नस्लीय होते तो दक्षिण भारत के लोगों के साथ क्यों रहते? आप जानते हैं न उनके बारे में...तमिल, केरल, कर्णाटक और आन्ध्र प्रदेश. हम उनके साथ क्यों रहते फिर. हमारे यहाँ चारों तरफ काले लोग हैं.” (बीबीसी की रिपोर्ट) इस बयान के बाद लोगों ने सोशल मिडिया पर जमकर आलोचना की और यहाँ तक कहा गया कि उन्हें दक्षिण भारत में घुसने न दिया जाये. यह बयान एक राजनितिक सत्तारूढ़ दल के प्रतिनिधि की तरफ से आया. लेकिन कहीं न कहीं इसमें व्यक्तिगत सड़ी हुई मानसिकता की बू भी आती है. इसलिए जब रिनी कुजूर जैसे संघर्ष करने वाले लोग इस माहौल और मानसिकता में अपनी एक जगह बनाते हैं तब उनकी उपलब्धियों  को कम कर के नहीं आंका जा सकता. 

स्कूल की शिक्षा में बताया गया कि आर्य का एक मतलब गोरा रंग होता है. फिल्मों की नायिका को काला होने का हक नहीं. वह तो गुंडे अथवा खल पात्रों की संपत्ति है. काले रंग को कुछ इस तरह से साहित्य से लेकर घर तक के माहौल में परिभाषित कर दिया गया है कि हम इसके आदि बन चुके हैं. इस रंग के इर्द गिर्द सलीके से एक घटिया सोच विकसित कर दी गई है. जब 2016 में नवम्बर महीने में नोटबंदी हुई तब एक शब्दावली ‘काला धन या ब्लैक मनी’ का खूब इस्तेमाल किया गया. गौर से शब्दों की बिसात जो भाषा में बिछी है, उसे समझें तो एक पल को अपनी भाषा के ऊपर सोचने का मन हो आएगा. कैसी भाषा है!

जिसे हम काली कमाई पुकारकर गला खराब कर रहे थे वास्तव में वह कमाई तो है पर काली नहीं बल्कि अवैध या गैर कानूनी आय है। कई दफा एक शब्दावली सुनी होगी- 'आय से अधिक संपत्ति.' वास्तव में यही सही शब्दावली है. लेकिन हमने काले शब्द को जबरन इस्तेमाल करना शुरू कर दिया क्योंकि हमारे देश के पॉपुलर मंत्री इस शब्द का बिना सोचे समझे इस्तेमाल करते हैं. असल में इस गलत ढंग से कमाई गई आय को अवैधानिक आय कहकर पुकारा जाना चाहिए.

इस बात पर भी गौर करना जरूरी है कि हम कितनी अपनी भाषा बोलते हैं और कितनी दूसरों की नक़ल करते हैं. जो जुबान हमें दी गई है हम उसी में सोचते और बोलते हैं. हमारी खुद की कोई तर्कशील भाषा नहीं दिखती. उधार के शब्द लेकर हम अपनी रोज़मर्रा ढोते हैं. बच्चों की भाषा को गौर से सुने तो पाएंगे की स्कूल जाने के बाद वह अधिक भेदभाव वाली बन जाती है. यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो दिखती नहीं पर असर साफ़ समझ आता है.
भाषा आज के दौर में परोसी जाती है. घर में दरवाजे के नीचे से सुबह सुबह 16 से 17 पन्नों वाला अखबार हो या फिर टीवी में चलते कार्यक्रम, दफ्तर की धूल खाती फाइले हों या फिर सब्जी तरकारी खरीदने तक की प्रक्रिया में एक ज़ुबान चुपके से बैठी होती है. कहीं फुर्सत नहीं है दिमाग को खुद की भाषा के वाक्य रचने की. जो ज़्यादा देखा-सुना वही बार बार जीभ से संचालित होने लगता है. बनाई जा रही व्यस्त दिनचर्या सोचने की प्रक्रिया को रोक रही है और हम दिन पर दिन नक़ली होते जा रहे हैं. हम कभी बैठ कर यह नहीं सोचते कि  त्वचा का रंग आखिर क्यों इतना मायने रखता है? रंग के ऐसा होने की क्या वजहें हैं? गोरे होने की जरुरत क्यों है? काले रंग को इतने बड़े पैमाने पर क्यों ख़राब बताया जा रहा है? ऐसे सवालों के बारे में हम कभी सोचते ही नहीं.
सभी रंग को सोखने के बाद ही काला रंग पनपता है.  काला रंग विपरीत या किसी रंग का विलोम नहीं है. यह सफ़ेद रंग का दुश्मन नहीं है. वास्तव में यह रंग बाकी रंगों की तरह ही एक रंग है। बाज़ार और महान संस्कृति के पोषकों ने इसे एक हद तक नकारात्मक चोला पहनाया हुआ है. इसे अंधेरे से जोड़ा जाता है. अपशगुन का तमगा पहनाया जाता है. सामाजिक धब्बा कहा जाता है. इतना ही नहीं काली शक्ति जैसे शब्द से उन नकारात्मक रूहानी ताक़तों से जोड़ा जाता है जो हमारी दुनिया से परे हैं. अमावस की रात का ज़िक्र भी लगभग कुछ ऐसा ही है. रहस्य का रंग भी यही है. कई लोगों को देखा जा सकता है कि वे पैरों में काला धागा बांधकर रखते हैं या फिर गले में काली माला पहनते हैं कि किसी की नज़र नहीं लगे. नज़र क्या है-काली और बचाव भी काले रंग के धागे से किया जा रहा है. मौजूदा दौर में हम अपनी पीढ़ी को भी ऐसे अन्धविश्वास विरासत के रूप में दे रहे हैं जबकि कोशिश यह होनी चाहिए कि उन्हें समानता और वैज्ञानिक नजर दी जाती. 

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बहुत हद तक इस रंग के आसपास घूमती यह बिल्कुल नयी विचारधारा नहीं है. लंबे समय से इसकी बुनाई होती रही है। यही वजह कि अब हमारे दिमाग में काले रंग से जुड़ी छवियाँ अलग थलग हैं. अमूमन हम इन छवियों को काले रंग में रंग देते हैं या फिर हिकारत की नज़र से देखते हैं. धर्म से लिपे-पुते इस देश में हर रंग का अपना मजहब है. हिन्दू या मुस्लिम, सभी के अपने खास रंग हैं और उनका महत्व है. लेकिन ऊपरी नज़र डालने पर काला रंग फिर से बिना कुर्सी के रह जाता है. अब कुछ परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं. इस रंग का अपना एक मुकाम विकसित हो चुका है. अपने पहनावे में लोग इस रंग को जगह तो ही रहे हैं साथ ही साथ इस रंग से जुड़े झूठी कहानियों से बाहर आ रहे हैं. 

रिनी कुजूर 


 नोटबंदी की घटना ने इस रंग के आगे एक गतिरोधक बना दिया था. हर ज़ुबान पर काला धन या काली कमाई जैसा शब्द फेविकोल से चिपका दिया गया था. इसने अंबुजा सीमेंट सी मजबूती दिखाई दे रही थी. वास्तव में यह रंग उतना अनलकी नहीं जितना सोचा जाता है. कम से कम रिनी कुजूर को देखकर जिस खूबसूरती की समझ बनती है उसे अपनी सोच में शामिल करने की हर किसी को जरुरत है. रिनी जैसे लोगों को कल्पनीय आदर्शों से जो कलेंडर में धुप बत्ती का धुआं सूंघते हैं कि जगह रिप्लेस करने का सोचा जा सकता है.

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