छायावादी कविता में पितृसत्तात्मक अभिव्यक्ति


मनीष कुमार 
भक्तिकाव्य के बाद छायावादी काव्य अपनी युगीन संवेदनशीलता में अद्वितीय है| दो विश्व-युद्धों के बीच के इस युग की यह अद्वितीयता महज़ कैशोर्य भावुकता की संरक्षिका नहीं अपितु शाश्वत मानवीय संवेगों को ऊर्ध्वतर बनाने हेतु भी प्रतिबद्ध है| राजा राममोहन और ज्योतिबा फुले के सार्थक प्रयासों के उपरान्त गांधी – आंबेडकर युग में स्त्री अस्मिता को नए आयाम मिल रहे थे| वैश्विक परिदृश्य में रूसी क्रांति की सफलता के उपरान्त स्त्री को अनेक अधिकार दिए गए| अमेरिका और यूरोप में फर्स्ट-वेव फेमिनिज्म की सफलता मताधिकार के रूप में रेखांकित की जा सकती है| अतः समग्रता में दुनियावी परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं| छायावादी कविता में अपने पूर्ववर्ती साहित्य से प्राप्त तमाम नैतिकताओं से प्रशंसनीय प्रश्नाकुलता का तेवर मौजूद है| इसकी स्त्री – पक्षधरता की परिव्याप्ति इस क़दर रही कि विरोधियों ने सजनी-सखी संप्रदाय कहकर उपहास किया| बावजूद इसके इस युग के प्रबुद्ध कवि भी पितृसत्तात्मक मूल्यों से पूर्णतः मुक्त नहीं हो पाए| दरअसल पितृसत्ता के बीज मानवीय – अवचेतन में इतने गहरे पैठे हैं कि अनजाने ही क्यूँ न सही, वे अंकुरित होने लगते हैं| छायावाद के अंतर्गत पितृसत्ता को रेखांकित करने हेतु क्रमवार कवियों का अध्ययन किया जायेगा-
छायावाद के शिखर-कवि जयशंकर प्रसाद की कालजयी कृति ‘कामायनी’ का एक रूपकमय बिम्ब है-
“सिन्धु सेज पर धरा वधू अब तनिक संकुचित बैठी-सी

प्रलय निशा की हलचल स्मृति में मान किये-सी ऐंठी-सी” ...(‘आशा’ सर्ग)


धरा-रूपी बहू के साथ प्रलय-रूपी रात्रि में ऐसा हुआ कि उसकी स्मृति में ऐंठन का आविर्भाव हुआ? दरअसल परंपरागत भारतीय – दाम्पत्य जीवन के आरम्भ में अपरिचय की प्रक्रिया के दौरान देह से प्रेम (प्रायः पहले प्रेम फिर देह के स्थान पर) उपजाने की ऐसी विडंबना रही है, जिसने संबंधों को अपेक्षाकृत अधिक उंचाई तक नहीं ले जाने दिया| स्त्रियों की तुलना में ज्यादा मर्दों का स्वभाव भी प्रेमपूर्ण नहीं होता; समागम को वे भोग से ऊपर ले ही नहीं जा पाते| इन्हीं सब कारकों के चलते वोल्स्टनक्राफ्ट 1 ने तो बहुत पहले ही विवाह को कानूनी – वेश्यावृत्ति घोषित किया था , जिसे उनके समय ने सिरे से खारिज़ किया|
प्रसाद ने इसी पुस्तक में अन्यत्र लिखा है-
“पगली! हाँ सम्हाल ले कैसे छूट पड़ा तेरा अंचल?” ...(कामायनी)
यह घूंघट वास्तव में पितृसत्ता का कवच है| इसका ‘चित और पट’ दोनों ही पुरुष – मानसिकता के पक्ष में है. पुरुष घूंघट डलवाएगा भी और मन-मुताबिक़ उघाड़ेगा भी| इसके आविष्कार में ही षड्यंत्र के अलावा और क्या है? स्वयं की कामांधता का दोषारोपण स्त्री पर क्यूँ?
प्रसाद के नाटक की पात्रा मालविका गाती है-
“मधुप कब एक कली का है
 पाया जिसमें प्रेम रस, सौरभ और सुहाग
बेसुध हो उस कली से, मिलता भर अनुराग
बिहारी कुंजगली का है” ...(‘चन्द्रगुप्त’ नाटक)

बेशक़ मधुप कब एक कली का ही रहा है? किन्तु कली-रूपक के बहाने स्त्री अगर चयनात्मक होते हुए एकाधिक पुरुषों का वरण करना चाहे तो पौरुष घायल क्यों होने लगता है? बिहारी ही नहीं, बिहारिनी भी कुंजगली की हो सकती है| किन्तु तत्कालीन समय ने इस सोच को अवकाश ही नहीं दिया| अगर इस सन्दर्भ में ‘मैडम बावेरी’ को याद किया जाये तो तथाकथित आधुनिक यूरोपीय समाज को भी कठघरे में खड़ा किया जा सकता है| इसके प्रकाशन मात्र ने फ्रांस में भूचाल ला दिया था|
‘कंकाल’ के अंतर्गत विजय और यमुना की वार्त्ता को प्रसाद इस तरह लिखते हैं-
“मैंने और भी ऐसा कुंड देखा है, जिसमें कितने ही जल पियें वह भरा ही रहता है|”
“सचमुच! कहाँ पर विजय बाबु?”
“सुंदरी के रूप का कूप” ...(‘कंकाल’ उपन्यास)
असल में यह उस मनोवृत्ति की धारणा है जो इस तर्क का हवाला देती रहती है- एक मुर्गा, पंद्रह मुर्गियों को यौन-तृप्ति देता है किन्तु पंद्रह मर्द मिलकर भी एक स्त्री को यौन-तृप्ति नहीं दे पाते|
प्रसाद अपनी एक कविता में लिखते हैं-
“जो पथिक होता कभी इस चाह में
वह तुरत ही लुट गया इस राह में” ...(‘सौंदर्य’, प्रसाद)

स्त्री – सौंदर्य पर लुटेरे आदि के आक्षेप नए नहीं हैं| ‘माया महाठगिनी’... जबकि असल बात उलटी है| आवश्यकता पुरुष के आत्ममंथन की है| सुधीश पचौरी ने नाओमी वोल्फ़ की मशहूर किताब ‘ब्यूटी मिथ’ पर विचार करते हुए लिखा है- “ब्यूटी मिथ के बाहर जाना आसान नहीं है| क्या स्त्री की स्त्रीवादी सौंदर्य की परिभाषा हो सकती है? यह पुनर्परिभाषा दरअसल सत्ता की पुनर्परिभाषा है|”2.  वास्तव में ऐसी परिभाषा देना मुश्किल ज़रूर है किन्तु, असम्भाव नहीं| संभवतः स्त्रियों को पुरुषों की अपेक्षाओं के इतर आत्मनिष्ठ सौंदर्य को ही तवज्जो देनी होगी; उनके परिधान में पुरुषों द्वारा आरोपित दृष्टिकोण से फ़र्क नहीं पड़ना चाहिए|
प्रसाद की कविता ‘प्रियतम’ का एक अंश है-
“औरों के प्रति प्रेम तुम्हारा, इसका मुझको दुःख नहीं
 जिसके तुम हो एक सुहाग, उसको भूल न जाव कहीं|” ...(‘प्रियतम’, प्रसाद)
तत्कालीन समाज में पुरुषों का एकाधिक विवाह/सम्बन्ध रखना आम बात थी; पत्नी/प्रेमिका की एकनिष्ठता के सापेक्ष वह निम्न स्तर पर था| वैसे भी स्त्री पर एकाधिकार, पितृसत्ता का आधार रहा है|
प्रसाद की कविता ‘चित्रकूट’ की उद्धृति है-
“जनकसुता ने कहा- ‘नाथ! यह क्या कहते हैं?
 नारी के सुख सभी साथ पति के रहते हैं” ...(‘चित्रकूट’, प्रसाद)

जयशंकर प्रसाद 

पुरुष-मानसिकता ने पितृसत्ता को इस तरह जमाया है कि वे स्त्रियों के ऐच्छिक - अनुकरण के अभिलाषी है| उपर्युक्त अंश की उक्ति सीता की है| यद्यपि सीता को इसी तरह की आज्ञाकारिता से बांधकर देखा जाता रहा है| किन्तु इसकी व्याख्या भिन्न भी हो सकती है| इस इंजैक्ट की जाने वाली पितृसत्ता को लेकर जे. एस. मिल ने लिखा है- “पुरुष कोई बाध्य ग़ुलाम नहीं चाहते; बल्कि इच्छित दास चाहते हैं| इसीलिए वे स्त्रियों से दासता हेतु प्रत्येक प्रक्रम का अभ्यास कराते हैं|”3  सीता के मुख से पति का हर स्थिति में साथ देने वाली प्रेम की आधार-भूमि विश्वास है| किन्तु, अविश्वास से ‘अग्नि-परीक्षा’ लेने का कलंक राम के माथे से कैसे मिटेगा? सीता के पुनः वनवास की त्रासदी झेलने और धरती में समा जाने पर राम की मूकता कैसे क्षम्य हो सकती है?
प्रसाद की काव्योक्ति है-
“किसका यह सूखा सुहाग है,
 छिना हुआ किसका सारा रस|” ...(‘विषाद’, प्रसाद)

कथित सुहाग उजड़ जाने पर जीवन को नीरस घोषित करने वाली शक्तियों ने स्त्री को जिंदा लाश बनाए रखा| महादेवी वर्मा ने विधवा के लिए ‘मृत पति का निर्जीव स्मारक’ 4 पद का अर्थवान प्रयोग किया है| इस सूखे सुहाग और छिने हुए रस के प्रतिकूल सीमंतनी उपदेश की लेखिका की विधवाओं को सलाह थी- “तुम्हारी बेहतरी की यही तजवीज अच्छी है कि जब दिल इस इन्द्रिय के विषय को चाहे दूसरी शादी कर लो|”5 
प्रसाद ने आंसू के अंतर्गत लिखा है-
“छलना थी, तब भी मेरा
 उसमें विश्वास घना था
 उस माया की छाया मैं
 कुछ सच्छा स्वयं बना था|” ...(‘आंसू’, प्रसाद)

इन पंक्तियों में पितृसत्ता का समर्थन और विरोध दोनों एक साथ हैं| स्त्री को जहाँ ‘छलना और माया’ का संबोधन है; बावजूद इसके कवि का उसमें विश्वास होने व सच्चा बनने की स्वीकारोक्ति उस समय की परंपरा बनाम आधुनिकता की संघर्षमय लिपि जान पड़ती है|
प्रसाद की कविता ‘प्रलय की छाया’ के दो अंश हैं-
“...सुना- जिस दिन पद्मिनी का जल मरना
 सती के पवित्र आत्म गौरव की पुण्य – गाथा
 गूँज उठी भारत के कोने - कोने जिस दिन;
 उन्नत हुआ था भाल
 महिला – महत्व का| ...
 ... मैं भी थी कमला,
 रूप – रानी गुजरात की|
 सोचती थी-
 पद्मिनी जली स्वयं किन्तु मैं जलाऊंगी –
 वह दावानल ज्वाला
 जिसमें सुलतान जले|” ...(प्रलय की छाया, प्रसाद)

महादेवी वर्मा 

इस काव्यांश का सम्बन्ध अल्लाउद्दीन खिलजी के कोहराम से है, जो उसने भारत पर मचा रखा था| वाकई स्त्रियाँ पुरुषों की निगाह से युद्धों को नहीं देख सकतीं| क्या दुनिया में ऐसा कोई युद्ध हुआ है जिसका पक्ष-प्रतिपक्ष सिर्फ और सिर्फ़ स्त्रियों का ही हो? निश्चित तौर पर नहीं| ऊपर से एक जुमला अक्सर उछाला जाता है कि- सारे युद्ध दरअसल स्त्रियों के ही कारण हुए हैं| करे कोई भरे कोई... उपर्युक्त कविता में जहाँ एक ओर रानी पद्मिनी के जौहर का महिमामंडन किया गया है; वहीँ दूसरी ओर कमलावती अपनी ‘स्त्रियोचितता’ पर खेद प्रकट कर रही है| ‘आगे कुआँ पीछे खाई’ की स्थिति में स्त्री क्या करे? आत्मसम्मान को बचाए या आत्मप्राण को? आखिर किसलिए भी? पुरुषों के आपसी वर्चस्व की लड़ाई ने स्त्रियों को असह्य पीड़ाओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिया| कई बार युद्ध एक आवश्यक बुराई भी प्रतीत होते हैं; लेकिन मानव-सभ्यता को इस क्रूरता से बाहर आना ही होगा|

विषयक – वैविध्य की दृष्टि से छायावाद के सबसे बड़े कवि निराला के काव्य में पितृसत्ता की उपस्थिति को अधोलिखित उक्तियों से पुष्ट किया जा सकता है-
छंद के बंध को तोड़ने वाले कवि की कविता ‘नयनों के डोरे लाल’ में पितृसत्ता का बंध बरक़रार रहता है-
“प्रिय कर, कठिन - उरोज – परस कर कसक मसक गयी चोली
 एक – वसन रह गयी मंद हंस अधर – दशन अनबोली-
                 कली - सी कांटे की तोली|” ...(‘नयनों के डोरे लाल’, निराला)

उक्त दृश्य तब घटित होता है जब कलीरूपी नायिका कुछ अलसाई हुयी है और इस अवस्था में नायक के आने पर, उसकी सुध न लेने पर; नायक को अपना अपमान महसूस होता है| उसका अतार्किक पौरुषीय दंभ जाग उठता है| वह उसकी चोली को मसक देता है| प्रतिक्रियास्वरूप वह अपने प्रिय को ‘मंद – हंसी’ और बिन बोले स्वर की प्रेम-पूर्णता देती है| वस्तुतः इस उद्धरण में नायक की कामासक्त भावना भी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है| वह नारी को ‘पैसिव’ मानता है और खुद को ‘एक्टिव’| यदि कोई स्त्री ‘एक्टिव’ फॉर्म में देखी जाती है तो इसे एक अपराध की भांति देखा जाता है| ‘कली सी कांटे की टोली’ इसी तरह के सम्भोग का चित्र है|
‘वन-बेला’ के अंतर्गत निराला लिखते हैं-
“वर्ष का प्रथम
 पृथ्वी के उठे उरोज मंजु पर्वत निरुपम
 किस्लायों बन्धे
 पिक भ्रमर – गूंज भर मुखर प्राण रच रहे सधे” ...(वन-बेला, निराला)

पर्वतों की उपमा हेतु उरोजों की ही आवश्यकता पड़ गयी? कवियों की चेतना में स्तनीय – रूढ़छवि का आग्रह स्त्री – समाज पर नकारात्मक असर डालता है| जर्मेन ग्रीयर ने अपनी पुस्तक ‘द फीमेल यूनक’ में ग्रेगरी (अ फादर्स लिगेसी टू हिज डाटर्स) को उद्धृत किया है- “प्रकृति का गढ़ा सुन्दरतम वक्ष भी उतना सुन्दर नहीं होता जितना कल्पना का गढ़ा वक्ष होता है|” 6  जर्मेन स्त्रियों से आग्रह करती हैं- “ऐसी चोलियाँ पहनना बंद कर दें जो गुब्बारे की जैसी छातियों की कल्पना को आगे बढ़ाये चली जाती हैं, ताकि पुरुष असली चीज़ की विविधता को स्वीकार करें|”7 सौन्दर्य के रूढ़ – प्रतिमानों ने स्त्री – क्षमताओं की कितनी हानि की है, जर्मेन ने इसका वैज्ञानिक वर्णन किया है|
‘कुकुरमुत्ता’ के अंतर्गत निराला लिखते हैं-
“हाथ जिसके तू लगा,
 पैर सर रखकर व पीछे को भगा
 औरत की जानिब मैदान यह छोड़कर,
 तबेले को टट्टू जैसे तोड़कर,
 शाहों, राजों, अमीरों का रहा प्यारा
 तभी साधारणों से तू रहा न्यारा|” ...(‘कुकुरमुत्ता’, निराला)

‘औरत की जानिब’ पर विचार करिए... साध्य को ललकारने के साथ यह स्त्री को भी गाली है| हमारा दुराग्रह नारियों को अबला और कायर मानता है| जैविक रूप से संभव है कि वे पुरुषों जितनी शक्तिशालिनी न हों किन्तु इसका सामान्यीकरण उचित नहीं है| हमारा समाज संवेदनहीन उपमाओं पर प्रायः आत्ममंथन नहीं करता- ‘औरत की तरह’, ‘हिजड़े की तरह’, ‘लंगड़े की तरह’ आदि ऐसी ही उपमाएं हैं|
‘प्रेम संगीत’ कविता का एक अंश है-
“जात की कहारिन वह,
 मेरे घर की पनहारिन वह,
 आती है होते तड़का
 उसके पीछे मैं मरता हूं|
 कोयल - सी काली, अरे,
 चाल नहीं उसकी मतवाली,
 ब्याह नहीं हुआ, तभी भड़का,
 दिल मेरा, मैं आहें भरता हूँ|” ...(प्रेम संगीत, निराला)

निराला 

कविता को पढ़कर चंद्रभान यादव की पुस्तक ‘भक्तिकाव्य में स्त्री – चिंतन’ में उद्धृत प्रो. चौथीराम यादव का कथन प्रासंगिकजान पड़ता है- “जाति - पांति और ऊंच - नीच के भेदभाव पर आधारित वर्ण – व्यवस्था से नारी की अधीनता का बड़ा गहरा सम्बन्ध है|”8 जाति – व्यवस्था की कुरीति से दबी कहारिन स्त्री के पीछे निराला कामांध – से प्रतीत होते हैं| कथित ‘कहारिन’ का ब्याह न होने पर कवि का भड़कना पुरुषों की उस मनोवृत्ति का सूचक है जो स्त्रियों से यौन – शुचिता का दुराग्रह रखता है| उसके मानस में काम – संबंधी ‘कौमार्य’ की धारणा बलवती होती है| यदि वह कहारिन निराला के स्थान पर किसी और घर की हो; तो कहना मुश्किल है कि उस पर यौन – हमला नहीं हो सकता| वैसे इस प्रकरण पर निराला सिद्धांत और व्यवहार दोनों स्तर पर घिरे नज़र आते हैं| डॉ रामविलास शर्मा ने उनके वेश्यालय जाने को इस प्रकार न्यायसंगत ठहराने की कोशिश की है- “निराला साफ़ तौर पर और खुलकर कहते थे कि मैं सेक्स की ज़रूरत पूरी करने के लिए कोठे पर जाता हूँ| यह बहुत बड़ी नैतिकता है| मनुष्य की अपने प्रति और समाज के प्रति जो ईमानदारी है, वह सबसे बड़ी ईमानदारी है|”9  अगर इसे उचित मान भी लें तो क्या समानता के तर्क से आज की तरह ‘प्लेबॉय – कल्चर’ अस्तित्व में थी? वेश्यावृत्ति किसी भी समाज की सबसे बड़ी विकृतियों में से एक है| तर्क-कुतर्क से वेश्यालय पुरुष – दृष्टि से भले ही वाज़िब जान पड़े मगर स्त्री – दृष्टि से सिवाय उसके शोषण के और कुछ नहीं हो सकता| वास्तव में वेश्यालय सामंती – सोच के शिखर हैं|
कविता ‘रानी और कानी’ का यह हिस्सा ग़ौरतलब है-
“जब पड़ोस की कोई कहती है-
 ‘औरत की जात रानी
 ब्याह भला कैसे हो
 कानी जो है वह|’
 सुनकर कानी का दिल हिल गया...” ...(रानी और कानी, निराला)

प्रथम तो ब्याह की अवश्यम्भाविता का प्रश्न? द्वितीय, लड़की कानी हो तो उससे जुड़ा विमर्श? स्त्री चिंतकों ने यूँ ही परिवार को शोषण का आधार बताते हुए विवाह संस्था पर सवाल खड़े नहीं किये थे| स्त्री की उन्मुक्त – पहचान स्थापित होने में परिवार ने काफी बाधा पहुंचाई है| यह भी सही है की इसका निदान ‘परिवार’ संस्था को ख़त्म करना नहीं है| एकाधिक विवाहों को ललचाये रहे वृद्धों     ने भी इनकी तरफ कभी नहीं देखा| ‘अपंग’ लड़कियों को अपशकुनी मानने की रूढ़ – मनःस्थिति की व्याप्ति खूब रही है|
‘खजोहरा’ नामक हास्य – कविता का प्रसंग है-
“सावन में भतीजा होने को हुआ
 पहले से बुला लायी गयीं बुआ|”...
“नैहर में घूँघट के उठने से
 बुआ जी की जान बची छुटने से|” ...(खजोहरा, निराला)

भतीजा होने पर प्रायः बुआ का ही आगमन होता है, फूफा कम ही आते हैं| खैर... जिस नैहर में बुआ कभी फुदकती रही होगीं, अब उसके लिए वे पराई – सी हो चुकी हैं| वास्तव में जिस ससुराल को भी स्त्री को ‘असली घर’ बताया जाता है, उसमें उसको कितना अपनापा मिलता है यह बताने की ज़रूरत नहीं है, अन्यथा ‘स्त्री विमर्श’ अस्तित्व में ही क्यूँ आता? ससुराल छोड़ दीजिये, अब मायके में भी ‘घूंघट के उठने से’ उनकी जान को खतरा है| इसी कविता की एक और पंक्ति है जिसमें गाँव का एक युवक बुआजी से मज़ाक करता है- “अकेली – अकेली कहाँ चलीं बुआ?” भारत के कुछ हिस्सों में भाभी - साली के अलावा मामी – बुआ आदि रिश्तों में भी ‘परिहास का रिवाज़’ है| इस परिहास को लोक – संस्कृति का जामा पहनाकर स्वीकार्यता दिलाई जाती है| क्या यह मज़ाक सदैव शुद्ध – परिहास ही रहता है? प्रथमतः मज़ाक अपनी प्रकृति में ही विशुद्ध रूप से मज़ाक – मात्र नहीं होता| द्वितीयतः स्वस्थ परिहास के पैमाने प्रायः पुरुष – मानसिकता ने ही तय कर रखे हैं| मज़ाक की इस असमानतापूर्ण – अनगढ़ता पर विचार होना चाहिये|

प्रकृति के साथ मिथकों का सर्जनात्मक वर्णन करने वाले कवि सुमित्रानंदन ‘पन्त’ जी के विषय में प्रसिद्ध है कि आप स्त्रैण थे| प्रकृतिगत दृष्टि से यह स्वीकार्य होना चाहिए लेकिन हमारी सामाजिक मान्यताएं इसकी इजाज़त नहीं देतीं| बहरहाल पन्त के काव्य में पितृसत्ता का रेखांकन निम्न पद्यांशों के आधार पर किया जा सकता है-
‘ग्राम्या’ के अंतर्गत पन्त की कथात्मक काव्योक्ति है-
“घर में विधवा रही पतोहू,
 लछमी थी, यद्यपि पति घातिन,
 पकड़ मंगाया कोतवाल ने,
 डूब कुँए में मरी एक दिन!
 खैर, पैर की जूती, जोरू
 न सही एक, दूसरी आती,
 पर जवान लड़के की सुध कर
 साँप लोटते, फटती छाती!” ...(‘वे आँखें’, पन्त)

प्रथमतः पति – घातिन कहते हुए विधवा स्त्री को ताना दिया जा रहा है| कोतवाल के दुस्साहस पर मौन रहते हुए स्त्री के कुँए में डूब मरने पर अफ़सोस का प्रकटीकरण ही ग़ायब नहीं है, स्त्री को महत्वहीन भी बताया जा रहा है| उसको पैर की जूती के रूप में देखने वाली पुरुष – वृत्ति को जवान लड़के की मौत पर तो छाती पीटने की फुर्सत है; किन्तु स्त्रीत्व के हनन से उसे कोई सहानुभूति नहीं|
‘पूर्वस्मृति’ के अंतर्गत सीता के विषय में पन्त लिखते हैं-
“जनरव भय से राघव ने पत्नी को
 छोड़ा था क्या? कथा पुरातन रे यह,
 आई थी वह अग्नि – परीक्षा देने,
 जन – भू का दुःख भार झेलने दुःसह!” ...(पूर्वस्मृति, पन्त)

जन के ‘आरोपों’ के कारण सीता को वन – गमन हेतु भेजना और अंत में परीक्षा एने हेतु बाध्य करना, राम के चरित्र का स्याह – पक्ष है| अपनों के विश्वास से अधिक चिंता दूसरों के अप्रामाणिक आक्षेप की क्यूँ? मिथकीय नायक अपने विविध आयामों में इक क़दर गूँथा जाता है कि आदर्शमयता पर खतरा ना आये; किन्तु आवश्यकता उनका सापेक्षिक अध्ययन करने की है| तभी प्रक्षिप्त पितृसत्ता का दिग्दर्शन संभव है|
‘पूर्वस्मृति’ की ही एक अन्य पंक्ति है-
“गला शिला उर, हुई अहल्या उर्वर|”

अहल्या – प्रसंग’ गंभीर रूप से पितृसत्तात्मक है| अहल्या के साथ छल करने वाले ‘देवों के राजा’ इन्द्र, शुचितावाद के प्रकोप से पीड़ित करने वाले गौतम ऋषि और उद्धार करने वाले राम, तीनों ही पुरुष हैं| अहल्या निर्दोष है फिर भी पत्थर बनाये जाने हेतु अभिशप्त है| इंद्र और गौतम को सज़ा तो छोड़िये, इनके सम्मान में कोई कमी भी नहीं दिखाई देती| यानी हमारा समाज पुरुष के व्यभिचार और अन्याय पर मूक रहते हुए स्त्री के आत्म – सम्मान को कुचलता रहा है|
‘अशोक वन’ की एक अवलि है-
“साक्षी राम बिना क्या सीता
 नहीं दिव्य जग जननी, पुनीता?” ...(अशोक वन, पन्त)
कवि ने ‘प्रश्नवाचक – चिह्न’ का प्रयोग क्यों किया है? यह सीता के समर्थन में है या विरोध में? यदि ‘जय श्री राम’ या ‘राम – राम’ के रूप में राम का स्वतंत्र अस्तित्व है तो सीता का ऐसा अस्तित्व क्यूँ नहीं हो सकता? उपर्युक्त पद्यांश वास्तव में पुरुष में ही स्त्री की पहचान के विलय के उपक्रम की स्पष्ट अभिव्यक्ति है|
‘सत्यकाम’ की कथा में पितृसत्ता और मातृसत्ता का तनाव देखा जा सकता है| पन्त ने लिखा है-
“ ‘ब्रह्मज्ञान की दीक्षा? क्या है गोत्र तुम्हारा?’
  ‘गोत्र? गोत्र?’ रुक कर बोला जाबाल हतप्रभ,
  ‘गोत्र नहीं अब मुझे ज्ञात! माँ से पूछूँगा!’ ” ...(सत्यकाम, पन्त)
सत्यकाम, गौतम ऋषि के पास ब्रह्मज्ञान की दीक्षा लेने के लिए जाता है तो गौतम के शिष्य उससे उसका गोत्र पूछते हैं| पितृसत्तात्मक समाज में गोत्र का निर्धारण पिता – पक्ष के आधार पर होता आया है| जब वह माँ से गोत्र पूछने की बात गौतम के शिष्यों से कहता है तो इस पर उनकी प्रतिक्रिया निन्द्य है-
“ हा, हा, हा, हा – लहर हँसी की दौड़ी उच्छल
  शिष्य – वर्ग में! कहा दूसरे ने – ‘क्या यह भी
  ज्ञात नहीं तुमको कि ब्रह्मविद्या पाने का
  अधिकारी केवल ब्राह्मण होता है! ... जाओ,
  भगो यहाँ से! ब्रह्मज्ञान की दीक्षा लेने
  किस मुंह से आये हो? जब तुम गोत्रहीन हो!’
... ‘अरे, वर्णसंकर होगा यह कोई निश्चय!’
  कहा तीसरे ने, अपमानित कर किशोर को!
  ‘गुरु दुत्कार बताएँगे इस तुच्छ श्वान को!’

सुमित्रानंदन पन्त 

जैसा कि पहले संकेत किया है कि – भारत में पितृसत्ता को स्थायित्व प्रदान करने में वर्ण – जाति ने भी बड़ी भूमिका निभाई है| सत्यकाम की माँ जबाला का परिचारिका के रूप में कार्य करने के क्रम में किसी ऐसे पुरुष से सत्यकाम का जन्म हुआ था, जिसने जबाला को अपेक्षित सम्मान ही नहीं दिया| जबाला जब सत्यकाम को उसके पिता का गोत्र बताने में अक्षम रही तो उसने अपने ही नाम के आधार पर सत्यकाम का नया नाम ‘सत्यकाम जाबाल’ रखा| एक तरह से यह माँ के गोत्र की प्रतिष्ठा थी| अन्यथा वह शिक्षा से वंचित रह जाता|

करुणा - स्त्रोतनी महादेवी वर्मा की कविताओं में भी पितृसत्ता की उपस्थिति है| असल में पितृसत्ता की पैठ इतनी गहरी है कि स्त्रियों को भी बाक़ायदा इससे संपृक्त किया गया है| बकौल सिमोन, ‘वह पैदा नहीं होती, बनाई जाती है’| इनकी कविताओं में पितृसत्ता के उदाहरण विरले हैं| वह भी सघनता नहीं, सांकेतिकता के साथ-
‘कोयल’ कविता में महादेवी लिखती हैं-
“डाल हिला कर आम बुलाता
 तब कोयल आती है|
 आम लगेंगे इसीलिए यह
 गाती मंगल गाना...” ...(कोयल, महादेवी)
प्रसंग है- एक बालिका के छोटे भाई का जन्म नजदीक है तो ‘सोहर’ गाने हेतु स्त्रियाँ पहुंची हुई हैं| उपमा हेतु बालिका यह सोच रही है कि जब आम लगने की आहट के क्रम में जिस तरह कोयलें कूजन करती हैं, उसी तरह ये स्त्रियाँ भी मंगल गान (सोहर) करेंगीं| ‘सोहर’ पितृसत्तात्मक गान है| हमारे शब्दकोष में ‘सोहरी’ नामक कोई शब्द नहीं है| लड़का पैदा होने की ‘ख़ुशी’ में उत्सव (स्त्रियों द्वारा ही) होता है; जबकि लड़कियों के पैदा होने पर अक्सर ग़म पसर जाता है|
‘नीरजा’ के अंतर्गत महादेवी का एक गीत संकलित है-
“बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ!
 दूर तुमसे हूँ, अखंड सुहागिनी भी हूँ|”

दूर होकर भी सुहाग की अखंडता? प्रेम के दर्शन की महानता के आधार पर इस उक्ति को जायज़ ठहराया जा सकता है; किन्तु वह ‘प्रेम’ हो तब न! स्त्री – विरह (लौकिक या अलौकिक किसी भी सत्ता के प्रति हो) पर काव्याधिक्य और पुरुष – विरह की अत्यल्प मौजूदगी इस अर्थ में पितृसत्तात्मक है कि प्रायः प्रेम में स्त्रियाँ अधिक प्रतिबद्ध होती हैं| यही सीमातिरेक प्रतिबद्धता स्त्री को उसी के विरोध में खड़ा कर देती है| इसका नोटिस लिया जाना आवश्यक है| कुछ इसी तरह की अभिव्यक्ति उनके एक गीत की इस अवलि में पुनः देखिये-
“शलभ मैं शापमय वर हूँ! किसी का दीप निष्ठुर हूँ|”
वास्तव में परतंत्रता की अतिरंजना में ग़ुलाम को अपनी बेड़ियाँ तक प्यारी लगने लगती हैं| स्वयं को ‘शापमय वर’ कहने के माध्यम से महादेवी आखिर और क्या संकेत करती हैं?
छायावादी काव्यान्दोलन के सामानांतर राष्ट्रवादी काव्यधारा की सशक्त कवियित्री सुभद्राकुमारी चौहान के काव्य में पितृसत्ता की उपस्थिति का रूप इस प्रकार है-
अपनी सर्वाधिक प्रसिद्ध कविता ‘झांसी की रानी’ के अंतर्गत सुभद्राजी लिखती हैं-
“बुंदेले हरबोलों के मुँह
 हमने सुनी कहानी थी
 ख़ूब लड़ी ‘मर्दानी’ वह तो
 झाँसी वाली रानी थी|” ...(झाँसी की रानी, सुभद्राकुमारी)
एक स्त्री को एक स्त्री के ही विषय में इतना आत्मविश्वास क्यूँ नहीं कि वह ‘जनाना’ तरीक़े से लड़ सकेगी? जबकि रानी लक्ष्मीबाई के साथ अन्य साथियों के रूप में भी स्त्रियाँ (झलकारी, काना व मंदरा इत्यादि) थीं| असल में सुभद्राजी हेतु परंपरा पुष्ट हीन – ग्रंथि से पीछा छुडाना संभव न हो सका|
‘मुन्ना का प्यार’ कविता का अंश है-
“माँ मुन्ना को तुम हम सबसे
 क्यूँ ज्यादा करती हो प्यार? ...(मुन्ना का प्यार, सुभद्रा)
एक बच्ची द्वारा अपनी माँ से किया गया यह प्रश्न पारिवारिक संस्था के भेदभाव को सरल भाषा में इंगित करता है| बावजूद इसके आश्चर्य नहीं कि कल को जब यह बच्ची औरत बने तो भोगने के यथार्थ से गुजरने के बावजूद इस चक्र को न बदल पाए| यह स्थिति पितृसत्ता को जीवंत बनाये रखने में बड़ा रोल अदा करती है|
‘प्रियतम से’ में सुभद्रा जी का संबोधन है-
“मैं भूलों की भरी पिटारी,
 और दया के तुम आगार
 सदा दिखाई दो तुम हँसते
 चाहे मुझसे करो न प्यार|”
‘प्रियतम दया के आगार हैं’, संभव है| मगर, खुद को भूलों की पिटारी कहकर प्रेम न मिलने की भी स्थिति में सर्वोपरि का-सा स्थान दिए जाने की क्या व्याख्या की जाये? कहने की क्या ज़रूरत कि ये ‘मेल – डोमिनैंस’ का असर है|
राखी – विषयक अभिव्यक्ति ध्यान खींचती है-
“देखो भैया! भेज रही हूँ
 तुमको, तुमको राखी आज|
 साखी राजस्थान बनाकर
 रख लेना राखी की लाज” ...(राखी, सुभद्राजी)

राखी महान – पर्व है, इससे इनकार नहीं; किन्तु क्या उपर्युक्त बयाँ दाता और प्राप्तकर्ता के भाव की स्थापना नहीं करता? राखी का मनोवैज्ञानिक पहलू आरम्भ से ही लड़कियों की एक भिन्न मनःस्थिति का निर्माण करने लगता है| इसके निहितार्थ को नए अर्थ देने चाहिए|
अतः स्पष्ट तौर पर तद्युगीन परंपरा और आधुनिकता के तनाव को उपर्युक्त अभिव्यक्तियों से समझा जा सकता है| इस तनाव का अवलंब लेकर ‘मल्टी-लेयर्ड पैट्रिआर्की’ को समझा जा सकता है| तदुपरांत आज के समय के सापेक्ष सभ्य समाज को ध्यान में रखते हुए, इसके उपचार के प्रयास भी किये जा सकते हैं| कोई प्रशनांकित कर सकता है कि इतने गहरे विमर्श की क्या आवश्यकता है किन्तु, ध्यातव्य है कि ये बारीकियां भी पितृसत्ता को दृढ़ बनाये रखने में अपनी भूमिका निभाती हैं|

मनीष कुमार हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधार्थी हैं. संपर्क:9560883358 / 8187900928

  सन्दर्भ: 
1. वोल्स्टनक्राफ्ट, मैरी- स्त्री अधिकारों का औचित्य साधन (अनु.- मीनाक्षी), राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2014, पृ.- 20
2.पचौरी, सुधीश- पितृसत्ता के नए रूप (संपा.- राजेंद्र यादव, प्रभा खेतान, अभय कुमार दूबे), राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2010, पृ.- 40

3. Mill, J. S.- On Liberty & other Essays (Ed. by- John Gray), OUP, London, 1998, p.- 486
4. वर्मा, महादेवी- श्रृंखला की कड़ियाँ, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2015, पृ.- 20
5. एक अज्ञात हिन्दू औरत- सीमंतनी उपदेश (संपा.- डॉ. धर्मवीर), वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2008, पृ.- 6
6. ग्रीयर, जर्मेन- बधिया स्त्री (अनु.- मधु बी. जोशी), राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2005, पृ.- 36
7. वही
8. यादव, चौथीराम- भक्तिकाव्य में स्त्री चिंतन (ले.- चंद्रभान यादव), ओमेगा पब्लिकेशन, दिल्ली, पृ.- 151
9. शर्मा, रामविलास- स्त्री मुक्ति के प्रश्न (संपा.- अलोक सिंह), विकास पब्लिकेशन, दिल्ली, 2013, पृ.- 69

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