यशोधरा को हथियार बनाया गया

अनिता भारती
अनिता भारती साहित्य की विविध विधाओं में जितना लिखती हैं , उतना ही या उससे अधिक सामाजिक मोर्चों पर डंटी रहती हैं  खासकर दलित और स्त्री मुद्दों पर. सम्पर्क : मोबाईल 09899700767.

अनिता भारती का यह लेख साहित्य और साहित्यिक आलोचना में वैष्णव-ब्राह्मणवादी प्रभाव को स्पष्ट करते हुए मैथिलीशरण गुप्त की रचना 'यशोधरा' को बुद्ध-विरोधी एजेंडा का काव्य बता रहा है: 

बुद्धकाल में स्त्रियों की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए 'नारी तेरे रूप अनेक' के संपादक क्षेमचंद्र सुमन पेज न. 41 पर लिखते हैं- “तथागत बुद्ध ने अनेक पीड़ित और दु:खी नारियों को अपमे संघ में दीक्षित कर लिया था। उनके भिक्षुणी संघ में जहाँ अम्बपाली, अड्डाकाशी और विमला जैसी दूषित जीवन बिताने वाली नारियों का प्रवेश था वहाँ उसमें अनेक राजकुमारियों, रानियों और श्रेष्ठिगणों की दुहिताएँ भी थी। ऐसी प्रवज्जित स्त्रियों को बुद्ध पुत्री कहा जाता था। इन भिक्षुणियों द्वारा कही गई उल्लास पूर्ण वाणियाँ '’थेरी-गाथा” नामक ग्रंथ संकलित है। गृहस्थ जीवन बिताने वाली नारियों में विशाखा, मल्लिका, सोमा, चन्द्रा, वशिष्ठी आदि के उज्ज्वल चरित्र उस काल के गौरव के प्रतीक है। इन महिलाओं के वचन संयुक्त निकाय और मज्झिम निकाय में समाविष्ट है '।

संस्कृति के चार अध्याय के पेज नं.155 पर बुद्धकाल की स्त्रियों की स्थिति के बारे में डॉ. रामधारी सिंह दिनकर का कथन है- बौद्ध धर्म का आविर्भाव ऐसे समय हुआ जब नारी पुरूष के अत्याचारों के बोझ से दबी जा रही थी, शास्त्रकारों ने जिसे कोई व्यक्तिगत स्वतन्त्रता नहीं दी थी,  इसके लिए बौद्धकाल में अमर संवेदना का संदेश मिला।

प्रोफेसर इंद्र अपनी पुस्तक 'दी स्टेट्स आफ वुमेन इन एशियन इंडिया (पेज-233) में कहते है- “बुद्ध ने अध्यात्मिकता के द्वार विधवाओं और सधवा दोनों के लिए समान रूप से खोल दिए। यहाँ तक की वेश्याओं के लिए भी संघ के द्वार समान रूप से खुले रहते थे। तथागत ने आम्रपाली का निमन्त्रण सहर्ष स्वीकार किया। कन्या का विवाह प्राय: वयस्क हो जाने पर ही होता था। प्रेम विवाह के कतिपय उदाहरण बुद्ध साहित्य में मिलते है।

उपर्युक्त वक्तव्यों और दृष्टान्तों के आलोक में यदि हम बुद्धकाल में स्त्रियों की दशा पर विचार करें तो पाते है कि उस काल में स्त्रियाँ अपने निर्णय लेने में स्वतन्त्र थी, वैदिक काल की अपेक्षा उनकी स्थिति ज्यादा मजबूत थी। बुद्ध के संघ में जितनी स्त्रियाँ है या फिर बुद्ध के सम्पर्क में जितनी स्त्रियाँ आई वे स्त्री चेतना व अपने अस्तित्व के प्रति खूब जागरूक थी।

अब हम जरा एक नज़र 'यशोधरा'  खंडकाव्य के रचयिता  मैथिलीशरण गुप्त जी के प्रेरणा स्त्रोत या फिर यशोधरा में उनकी वैचारिकता के कुछ आधार सूत्र पर भी डाल लेते है। यशोधरा में जिस वैचारिकता के चलते उन्होने यशोधरा का पूरा चरित्र गढ़ा,  वह हिन्दू वैदिक और वैष्णव संस्कृति है। इस संस्कृति में स्त्रियों की स्थिति पर वेदों से कुछ संदर्भ दृष्टव्य है-

”कन्या जब पति गृह में वधु बनकर प्रवेश करती थी, तब उसका कार्य सास-ससुर की सेवा एवं गृहकार्यों का निरीक्षण था। (अर्थवेद 14/2/27) वैदिक साहित्य में नारी के व्यक्तित्व का चरम विकास उसके मातृत्व में माना गया है। दम्पति की यही कामना थी कि वह पुत्र-पुत्रियों से युक्त होकर जीवन पर्यन्त गृहस्थ सुख का उपभोग करे।  (ऋग्वेद 8/21/8, 1/124/4, अर्थवेद 14/2/31) एक अन्य जगह वीर पुत्रों को उत्पन्न करना पत्नी का प्रमुख कर्तव्य था। उसके लिए दस पुत्रों तक की प्रार्थना की गई है- इमां त्वमित्र मीढ्व: सुपुत्रा सुमगां कृग।दशास्या पुत्राणा चेहि पति मेकादश कृति (ऋग्वेद 10/85/45)

इन सब संदर्भों से बुद्धकाल की स्त्री और वैदिक काल की स्त्री की सामाजिक व वैयक्तिक स्थिति एकदम स्पष्ट हो जाती है। कविवर मैथिलीशरण गुप्त वेदों, पुराणों, भाष्यों, रामायण, महाभारत आदि के साथ-साथ गांधीवादी चिन्तन से भी बहुत प्रभावित रहे हैं। इस चिन्तन के फलीभूत करने उसे लोक जीवन व्यावहारिकता के साथ आदर्श रूप में लोगों के सामने रखने के लिए उन्होंने यशोधरा को अपने खण्ड काव्य का आधार बनाया। यशोधरा 1932 में आई थी, इससे पहले 'साकेत' 1931 में आ चुकी थी। लगभग इसी समय कवि मैथिलीशरण गुप्त गाँधी जी के सम्पर्क मे आए थे। यह एक रोचक तथ्य है कि 'यशोधरा' खंडकाव्य के आने के बाद ही महात्मा गाँधी ने ही उनको राष्ट्र कवि की पदनाम से सुशोभित किया था।

अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इतिहास में अनेक पात्र ऐसे हैं या हो सकते थे जिन पर लिखा जा सकता था,  जो वेद पुराण, व अन्य भाष्यो में हिन्दू स्त्री के चरित्र के तौर पर आदर्श है। परन्तु ध्यान देने वाली बात है कि मैथिलीशरण गुप्त इतिहास के पन्नों से उन आदर्श चरित्रों को न चुनकर बुद्धवादी स्त्री यशोधरा को ही क्यों चुनते है?  इसका जवाब हलांकि कई विद्वान आलोचकों ने अध्ययनानुसार दिया है परन्तु मैं यहाँ दो आलोचको के कथन इस संदर्भ में प्रस्तुत करूँगी।



राम रतन भटनागर एम. ए अपनी पुस्तक 'मैथिलीशरण गुप्त एक अध्ययन' में लिखते है -  'हिन्दू धर्म और हिन्दू पौराणिक गाथाओं की नयी व्याख्या करके उन्होंने हिन्दुत्व की महत्ता स्थापित की और देश के सामने प्राचीन गौरव का आदर्श रखा। परन्तु गुप्त जी मूलत: प्रचारक नही हैं, वे कवि ह- और कवि से अधिक युगदृष्टा। उन्होंने हिन्दू मात्र में प्राचीन गौरव को पुनर्जीवित किया। युग की सबसे बड़ी माँग यही थी इसने राष्ट्रीयता को भी बल दिया। हिन्दू भावना और राष्ट्र भावना में कोई ऐसा विरोध नही है कि दोनों को एक साथ नही साधा जा सके। गुप्त जी ने दोनों की साधना की है और वे इस साधना में सफल रहे है।'

यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि जिस हिन्दू प्राचीन गौरव और जिस हिन्दू बनाम राष्ट्रीयता और हिन्दुत्व बनाम हिन्दू की बात राम रतन भटनागर जी ने गुप्त जी की वैचारिकता के संदर्भ में की है और आज जिस हम उग्र हिन्दुत्व व उग्र राष्ट्रीयता का उदय देख रहे हैं उसके बीजारोपण  इस काल के कवियों की कविताओँ में दिखाई पड़ते है।

डॉ. उमाकान्त गोयकृत अपनी पुस्तक 'मैथिलीशरणगुप्त' के पेज न. 36 पर लिखते हैं -  'य़शोधरा का उद्देश्य यशोधरा के चरित्र सर्जना के साथ-साथ बौद्ध सिद्धान्तों का खण्डन करके वैष्णव विश्वासों का संस्थापन अथवा मंडन निश्चित कवि का उद्देश्य रहा जैसे कि 'साकेत' के निर्माण में 'उर्मिला' की परिकल्पना के साथ-साथ रामकाव्य का प्रणयन भी उनका ध्येय रहा। यशोधरा के माध्यम से कवि ने बुद्ध वैचारिकी पर हिन्दू वैचारिकी की विजय, बुद्ध की जगह राम की महत्ता, वैदिक व वैष्णवी संस्कृति की स्थापना, स्त्री के हिन्दू स्त्री आदर्श रूप की कल्पना की है। स्वयं कवि ने 'यशोधरा' में स्वीकार किया है- अथवा तुम्हारे शब्दों में ही मेरी वैष्णव भावना ने तुलसी दल लेकर या नैवेध बुद्धदेव के सम्मुख रखा है। कविराजों के राजभोग व्यंजन में मैं वहाँ जगह पाऊँगा ? अकिंचन की यह खिचड़ी स्वीकार करते है या नही?

उमाकांत गोयकृत आगे कहते है कि - 'जिस खिचड़ी की बात मैथिलीशरण गुप्त जी कर रहे हैं दरअसल वह खिचड़ी भी नही है। यदि यशोधरा काव्य मे कुछ बुद्ध वैचारिकती और कुछ हिन्दू वैचारिकी को मिलाजुला कर लिखते तो शायद यह खिचड़ी कहलाने लायक होती। परन्तु यशोधरा तो पूर्ण रुप से बुद्धवाद पर हिन्दूवाद की विजयगाथा है। जहाँ बुद्ध ईश्वर का विरोध करते हैं,  वही मैथिलीशरण गुप्त बुद्ध की पत्नी यशोधरा के माध्यम से ईश्वरवाद का समर्थन करते है। वह बुद्ध को विष्णु का अवतार मानने को इच्छुक हैं। वह सनातनी मूल्यों  के पोषक बन यशोधरा से उनका पालन करवाते हैं, सबसे बड़ी बात तो यह कि वह यह सब काम अर्थात बुद्ध का वैचारिक व आध्यात्मिक विरोध खुद उनकी पत्नी यशोधरा को माध्यम बनाकर करते है। वह बुद्ध से राम का आदर करवाते हैं । उनको बुद्ध और राम में कोई मतभेद नज़र नही आता। बुद्ध का मार्ग मध्यम मार्गीय है, जनकल्याण वाला है, बुद्ध अपने चरित्र में ऐसे अकेले व्यक्तित्व हैं जो सिर्फ वर्षावास में ही एक जगह ठहरते हैं । वर्षावास यानि सिर्फ वर्षा के समय तीन महीने एक जगह ठहरते हैं। बाकी समय गतिमान रहते हैं।


बुद्ध पूरा जीवन घूमकर जन कल्याण में लगाते हैं। बुद्ध की लोक प्रचलित कहानी जिसमें बुद्ध ने एक बीमार, एक मृतक , एक संसार त्यागी मनुष्य देखा और वह संसार से विरक्त हो गए। इसी कारण वे अपनी सोती हुई पत्नी यशोधरा और नवजात पुत्र राहुल को छोड़ कर चले गए। यह कहानी लोकप्रचलित ही सही, परंतु सही नहीं  है। बुद्ध के घर छोड़ने की यह कहानी भ्रमात्मक है और बुद्ध के कारण घर छोड़ने का यह कारण कदापि नहीं हो सकता। डॉ. अम्बेडकर ने 'बुद्धा एंड हिज धम्म' में ब्राह्मणवादियों द्वारा प्रचलित इस कहानी को तथ्यहीन बताते हुए अपनी पुस्तक में बताया है - शाक्य और कोलिय राज्य में रोहिणी नहीं के जल बंटवारे को लेकर विवाद था। यह विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों राज्यों के लोगों द्वारा आपस में खून -खराबे और युद्ध की नौबत तक आ पहुँची। उन्होंने जल बंटवारे को लेकर अपने ही मत्रिमंडल से  सुलह की अपील की जिसके परिणाम स्वरूप राज्य से विद्रोह अथवा गद्दारी के आरोप में उनके सामने तीन शर्ते रखी गई, जिसमें पहली शर्त बुद्ध को मृत्युदण्ड दूसरी शर्त बुद्ध के घर की सम्पति जब्त करना तथा तीसरी शर्त देश निकाला थी । बुद्ध ने अपनी पत्नी यशोधरा से, जो कि उस समय प्रसूता थी और अपने माता-पिता से विमर्श करने के बाद ही अपने राज्य को छोड़कर जाने का निर्णय लिया। पहले दो निर्णय न लेने का कारण था, यदि वे मृत्युदण्ड स्वीकार करते तो उनके माता-पिता, पत्नी व बच्चे के लिए बहुत दुखद होता। दूसरा निर्णय जिसमें उनके घर की कुर्की हो जाने देने पर परिवार को बहुत कष्ट और तंगहाली में जीना पड़ता। इस वजह से वह दो राज्यों के बीच पानी की लड़ाई से उत्पन्न युद्ध की स्थिति को टालने के लिए उन्होंने अपने परिवार सम्मत तीसरे निर्णय को चुनकर गृहत्याग का रास्ता अपनाया । पूरे बुद्ध साहित्य में ऐसा कहीं ऐसा वर्णन नहीं मिलता जहाँ कि वह यशोधरा को अर्धरात्रि में गहरी निद्रा में सोते हुए चोरी छुपे, रात के अंधेरे में चोरों की तरह घर छोड़कर चले गए हो।

कवि मैथिलीशरण गुप्त  की पूरी काव्य रचना यशोधरा इसी तथ्य पर आधारित है कि यशोधरा  सिद्धार्थ से कहती है कि वह उससे बिना बताऐँ कैसे मुक्ति के लिए चले गए। मुक्ति तो पाना ठीक है, जनकल्याण भी ठीक है, समाज को उनकी मुक्ति प्राप्ति से बहुत लाभ होगा परंतु फिर वह कहकर जरुर जाते। इन्हीं  सब भावों को व्यक्त करते हुए कवि बार-बार यशोधरा से कहलवाते हैं  कि -   'सखि वे मुझसे कहकर जाते।'

कवि मैथिलीशरण गुप्त ने यशोधरा के माध्यम से दलित श्रमण बुद्ध संस्कृति के मुकाबले  वैदिक वैष्णवी संस्कृति को ऊपर रखा वे यशोधरा को आदर्श हिन्दू नारी बनाने के चक्कर में एक ऐसी नारी की रचना कर बैठे जो बुद्ध संस्कृति के खिलाफ है। यशोधरा  में मैथिलीशरण गुप्त  ने अपनी कल्पना के अनुसार  तथ्य रख यशोधरा का जो चरित्र गढ़ा है, वह आज के संदर्भ में अविश्वासनीय लगता है। गुप्त जी की यशोधरा पुनर्जन्म,  व्रत, पूजा-पाठ में विश्वास रखती है, जबकि बुद्ध संस्कृति किसी भी तरह के ईश्वरवाद, पूजा-पाठ और अंधविश्वास के खिलाफ है। बुद्ध के प्रस्थान से पूर्व उसका दायां अंग फड़कता है, जो कि हिन्दू धर्म के अनुसार किसी अनिष्ठ या अमंगल की अशंका व्यक्त करता है।

कवि मैथिलीशरण गुप्त यशोधरा में यशोधरा का न केवल आदर्श हिन्दू पत्तिव्रता स्त्री के रूप में स्थापित करते हैं, जो कि न केवल पति के त्यागने के बाद रात-दिन उसके ध्यान में मगन रहती है, अपितु गौतम बुद्ध को स्त्री जाति विरोधी भी मानती है। कवि मैथिलीशरण गु्प्त बहुत ही गुप्त तरीके से बुद्ध की लोक प्रसिद्ध कारुणिक बुद्ध, समतावादी बुद्ध, दार्शनिक बुद्ध, मानवतावादी बुद्द वाली छवि को यशोधरा के माध्यम से धूमिल कर देते हैं। सोचने वाली बात है कि जब बुद्ध के संघ में हजारों स्त्रियों प्रवज्जित हुई, फिर वह स्त्री विरोधी कैसे हुए?

यशोधरा का रचना काल 1933 है। देखने वाली बात यह है कि यह वह काल है जब अम्बेडकर और गांधी के रास्ते दलित समाज के हितों के लिए आपस में टकरा रहे थे। पहला गोलमेज सम्मेलन 1930 में हुआ था जिसमें डॉ. अम्बेडकर ने भारत के अछूतों का प्रतिनिधित्व किया है। डॉ. अम्बेडकर अछूतों की मुखर आवाज़ और नेता के रूप में उभर रहे थे। दूसरे शब्दों में कहे तो सम्पूर्ण दलित समाज डॉ. अम्बेडकर का नेतृत्व स्वीकार कर चुका था और उनको अपने दिल में बैठा चुका था।  जबकि गांधी अपने आप को अछूतों का नेता कहते थे। उस समय का सरकारी तंत्र और उसके लंबरदार व मीडिया भी यही सिद्ध करने में लगा हुआ था। चूंकि कवि मैथिलीशरण गुप्त गांधी जी से और उनके वैष्णववाद से बहुत अधिक प्रभावित थे। इसलिए यही वैष्णववादी मूल्य 'यशोधरा' के माध्यम से उन्होंने सबके सामने रखे।



1927 में महाड़ आन्दोलन के समय 25 दिसम्बर को बाबा साहेब ने विशाल दलित समाज के साथ हिन्दू स्त्रियों की गुलामी की पुस्तक 'मनुस्मृति दहन' की थी। भारतीय इतिहास का यह एक अनोखा ऐतिहासिक अवसर था। इससे पहले समाज सुधारकों ने भारतीय स्त्री की दुर्दशा के कारणों जिनमें मुख्य रूप से सतीप्रथा, बहुविवाह प्रथा, अनमेल विवाह, कन्या भ्रूण हत्या, बालविवाह, सतीप्रथा आदि के खिलाफ अलख जगाई थी। ज्योतिबा फुले सावित्रीबाई फूले स्त्री की शिक्षा के परम हिमायती था। राजाराम मोहन राय ने सतीप्रथा के खिलाफ अलख जगाई । पंडिता रमाबाई ने नवजात बच्चियों की हत्या पर गम्भीरता से काम करते हुए कटट्टर हिन्दूवादी समाज को चेताया। ताराबाई शिंदे ने अपनी पुस्तक 'स्त्री -पुरूष तुलना' के माध्यम से धर्म, पितृसत्ता आदि की खूब अच्छी तरह खबर ली थी । कहने का तात्पर्य यह कि बाबा साहेब से लेकर ज्योतिबाफुले व सावित्रीबाई फुले आदि समाज बदलाव का सपना देखने वाले तमाम समाज सुधारक स्त्रियों की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक दशा सुधारने और उसमें आमूल चूल परिवर्तन लाने के लिए क्रान्तिकारी का कार्य कर रहे थे और उनके इन सब कार्यों से भारतीय स्त्री की दशा में परिवर्तन आया भी।

अंग्रेजी पढ़ने लिखने या फिर शिक्षित होकर अपने अधिकार, अपनी अस्मिता और अपने खोए आत्मविश्वास की पुन: प्राप्ति के लिए सचेत स्त्री या दूसरे शब्दों में कहे तो एक स्वतंत्र स्त्री की कल्पना से भयभीत हमारा भारतीय पुरूष और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के शिकंजे में स्त्री को जकड़ने वाला,  समाज स्त्री को ऐसे ही आदर्श भारतीय स्त्री में तब्दील नही करना चाहता। आदर्श स्त्री घड़ने में उसके अपने निहितार्थ है। स्वतंत्र स्त्री से सत्ता कांपती है। ब्राह्मणवादी मूल्य ध्वस्त होते है। इसीलिए पितृसत्ता और धर्म की दुशाला ओढ़े पुरुष कल्पना करके य़थार्थ में अच्छी स्त्री , बुरी स्त्री की छवि घढ़ने लगता है। अ्च्छी स्त्री कौन ? जो समाज के तयशुदा पैमाने पर चले। बुरी स्त्री कौन ? जो समाज के तयशुदा पैमाने को जड़ से ठोकर मारकर उड़ा देने की ताकत रखे। अच्छी और बुरी स्त्री के चक्रव्यूह में फँसाकर पुरुष स्त्री को अच्छी स्त्री के ढ़ांचे में फिट कर पूरे स्त्री समाज को सबक सिखाता है।

कवि मैथिलीशरण गुप्त की यशोधरा सिद्धार्थ की यशोधरा से एकदम भिन्न है। वियतनाम के बुद्ध  विचारक व दार्शनिक भंते तिक न्यात हन्ह की एक पुस्तक है 'जहाँ जहाँ चरन गौतम के' हिन्दी अनुवादित पुस्तक में यशोधरा के एक अलग ही रूप के दर्शन होते है। यशोधरा सिद्धार्थ की दोस्त है । दोनों मिलकर समाज कार्य करते है।  समाज कार्य में लोगों से मिलना- जुलना, बीमार लोगों को दवाईयाँ बांटना, दु:खी परेशान,  गरीब,  मजबूर,  किसान लोगों से मिलकर उनके दुख-सुख जानना आदि। ऐसे में यशोधरा-सिद्धार्थ की दाम्पत्य जोड़ी ठीक ज्योतिबा और सावित्री बाई फुले की है। सिद्धार्थ और यशोधरा का यही रूप विश्वसनीय लगता है न कि यशोधरा का रोने धोने वाला रुप।

कवि मैथिलीशरण गुप्त यशोधरा के रूप में पति के लिए सजने-संवरने वाली, सामाजिक कार्य से दूर नितांत अनभिज्ञ की स्थिति में रहने वाली,  आहत,  परेशान, पीड़ित, प्रताड़ित, दुखी, विचलित स्त्री है। वह बुद्ध से बार-बार अपने त्याग की कीमत पर सिद्धी (जिसे बुद्धिज्म में बुद्धत्व) प्राप्त करने की बात करती है। मैथलीशरण गुप्त ने जाने - अनजाने यशोधरा खंड काव्य में, बार बार प्रयुक्त की गई पंक्ति 'सखि वे मुझसे कहकर जाते’ के माध्यम से बुद्ध का कायर,  पलायनवादी,  स्वार्थी और डरपोक व्यक्तित्व उभार कर प्रस्तुत किया है।
कवि मैथिलीशरण गुप्त से मेरी असहमति दो बातों में बनती है पहली तो यह कि बुद्ध को समझने के लिए अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर ही बुद्ध को समझा जा सकता है। यदि हम अपने पूर्वाग्रह से मुक्त होंगे तभी बुद्ध और उनके चरित्र को कि आज भी बुद्ध कितने बड़े दार्शनिक , मानवतावादी , समतावादी,  न्यायप्रिय , वर्णव्यवस्था के खिलाफ और सामाजिक क्रान्तिकारी व्यक्तित्व से पूर्ण है। दूसरे बुद्ध साहित्य में यशोधरा एक स्वतंत्र स्त्री चिंतक,  बुद्ध के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाली मजबूत महिला है जो बुद्ध द्वारा स्थापित मार्ग की सहयोगी है  ना कि अनुगमिनी।

अंत में बस यही कि किसी संस्कृति का इतिहास मिटाना हो,  बदलना हो,  अपने संस्कारों के अनुसार बदलना हो तो उसके पात्रों को बदलकर अपने पात्र रख दो या उनके पात्र के मुहँ में अपनी जुबान रख दो। यही 'यशोधरा' के माध्यम से कविवर गुप्त जी ने अपना मंतव्य साधा है।

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