पत्थलगड़ी और कोचांग बलात्कार मामला: रांची से प्रकाशित अखबारों की विश्वसनीयता पर प्रश्न

श्रीप्रकाश 
झारखंड का खूंटी जिला इन दिनों उबल रहा है-एक ओर आदिवासी पत्थलगड़ी कर स्वायत्तता का घोष कर रहे हैं, वहीं कोचांग में 5 रंगकर्मियों का 'कथित बलात्कार,' तीन पुलिसकर्मियों का कथित अपहरण, जो बाद में चार निकले, पुलिस का दमन इन दिनों सुर्खियों में है. लेकिन रांची से प्रकाशित होने वाले अखबारों ने किस तरह सरकार के पक्ष में और आदिवासियों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है यह बता रहे हैं श्रीप्रकाश. इस आलेख  के अनुसार अखबार न सिर्फ अपनी विश्वसनीयता खो रहे हैं, बल्कि पत्रकारिता के सामान्य मापदंड पर भी खरे नहीं उतर रहे. उधर बलात्कार की पीड़िताओं को लगभग नजरबंद रखा गया है-वे न परिवार से मिल पा रही हैं और न ही सोशल एक्टिविस्ट से उन्हें मिलने दिया जा रहा है. यह  आलेख कई कारणों से पढ़े जाने की मांग करता  है, यह पत्थलगड़ी आन्दोलन और उसके दमन की न सिर्फ तस्वीर पेश करता है, बल्कि उसके विस्तृत इतिहास में ले जाता है. साथ ही दो वृत्तचित्रों के माध्यम से इस संघर्ष को बखूबी समझा जा सकता है. 




मध्य व पूर्वी भारत में अभी पत्थलगडी शब्द चर्चा का विषय बना हुआ है। पत्थलगडी मूलतः कोलारीयन समूह के मुण्डा व हो आदीवासी समुदायों की परम्पराओं मे से एक सबसे महत्वपूर्ण  हिस्सा है। मूल मर्म ये है कि जब इस समुदाय के किसी समुह ने जंगल मे अपने बसने के लिये जगह बनाई और उस गोत्र या किली के लोग वहां बस गये तो वे अपने मृतको के हड्डी जिसे 'जन्धहलंग' कहा जाता है को एक खास पत्थर के नीचे पूरे  विधि विधान से रखते हैं। ये बड़े पत्थर, ससनदिरी कहलाते है। यदि किसी मुण्डा समुदाय के व्यक्ति की मृत्यु हो जाय तो उसकी अन्तिम क्रिया तब तक पुर्ण नही मानी जाती जब तक की उसकी हड्डिया उनके किली के संसनदिरी में  न रखी जाय।

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इसी परम्परा मे अन्य कई तरह के पत्थरों को गाँव व इलाके मे रखा व गाडा जाता है, जिसमें विर्रदिरी- वंशावली निरूपित करता है और सीमानदिरी -गाव की बाउंडरी/सिमाना को दिखाता है, इसके अलावा भोदिरी, होरादिरी, गाडूदीरी आदि कई और भी तरह के पत्थरों की परम्परा है। यहाँ ये बताना महत्वपुर्ण होगा कि वतर्मान मे कई कारणों से इन परम्पराओ मे क्षरण हुआ है जिसमे आर्थिक-संस्कृतिक के अलावा धार्मिक कारण महत्वपुर्ण हैं। खासकर संगठित या सांस्थानिक धर्मो के बढते प्रभावों ने इन परम्पराओं को कमजोर किया है । कारण ये है कि जन्म मृत्यू की अवधारणा विभिन्न धर्मो मे भिन्न-भिन्न होती है।

ये पत्थर सिर्फ धार्मिक या संस्कृतिक महत्व भर नहीं  रखते परन्तु इसके अन्य महत्वपुर्ण आयाम हैं, जैसे मौखिक परम्परा वालो मुण्डा इन पत्थरो को अपने जमीन की मिल्कियत का अकाट्य प्रमाण मानते है। भूमि व पारिवारिक विवाद मे ससनदिरी ही अन्तिम निर्णय के लिये महत्वपुर्ण साक्ष्य होता है, क्योंकि एक ही खानदान के मृत्यु पाये लोगों की हड्डियां एक ही ससनदिरी मे रखी जाती हैं। दुसरे शब्दो में कहें तो ये एक तरह से कुर्सीनामा है जहाँ परिवार अपनी वंशावली को देख सकता है। ये पत्थर लिटाये हुए रहते है। विर्रदिरी इसी क्रम मे अगला है जो एक बडा पत्थर है- मृत व्यक्ति के लिये बडे पत्थर को खडा किया जाता है, जिससे उसकी वन्शावली का पता चलता है।

जब पहली बार  अंगरेजी हुकुमत ने भूमि और जंगल को निजी मिल्कियत मे लाने के लिये कानून बनाये तो आदिवासी क्षेत्रो में विद्रोहों की झड़ी लग गयी और मुण्डा इलाके मे बिरसा उलगुलान के बाद ब्रीटिश  हुकूमत को मुण्डारी खुटकट्टी परम्परा को ध्यान मे रखते हुए छोटानागपूर कास्तकारी अधिनियम बनाने पड़े जो सीएनटी ऐक्ट के नाम से प्रसिद्द है।

आदिवासी अधिकार, कॉरपरेट लूट पर अनेक वृत्तचित्रों के निर्माता 

दूसरी तरफ 2014 में वर्तमान भाजपा की सरकार विकास और रोजगार के नारे के साथ प्रचन्ड बहुमत के साथ केन्द्र और राज्य मे आई । पहली बार झारखण्ड मे गैर आदिवासी मुख्यमंत्री  बनाये गये। अब जब अगले चुनाव में एक वर्ष बाकी है, सरकार के पास जनता के सामने अपनी उपलब्धियां दिखने को ज्यादा कुछ है नहीं। सरकार लगातार कॉरपरेट घरानों से राज्य में पूंजी निवेश कराने के लिए हर साल आयेाजन व सैकड़ों एमओयू करा रही है. पर ये सारे धरातल पर उतर नहीं रहे हैं। इसका एक प्रमुख कारण भूमि की अनुपलब्धता  है और यहाँ के लोग अपनी भूमि किसी भी कीमत पर देना नहीं चाहते हैं।



                                                               पत्थलगड़ी की कहानी ( श्रीप्रकाश की एक डॉक्यूमेंट्री)



ऐसा नहीं है कि आदिवासी समुदाय विकास नहीं चाहता, पर विगत में विकास योजनाओं के तल्ख अनुभव ने इस आदिवासी अन्चल के मुल निवासियों  की एक बडे आबादी में  धारणा घर कर दी है कि विकास योजनाओ से उनका का भला तो नही बल्की उनका आर्थिक-सांस्कृतिक विनाश  ही हुआ है। दूसरी तरफ सरकार के सारे एमओयू भूमि की अनुपलब्धता के कारण ठप्प पड़े हैं,  चुनाव सर पर है राज्य का मध्यम वर्ग को लुभाने के लिये सरकार के पास ज्यादा नहीं है। पर वर्तमान सराकर के पास धर्म के रूप मे आखिरी अस्त्र ही बचता है जिससे इसेके वोटर भी फोल्ड से बाहर नही जायेंगे और समाज मे ध्रुवीकरण मजबुत होगा। साथ ही आदिवासी समाज को धर्म के नाम पर विभाजित करने से भूमि अध्रिग्रहण में भी सफलता मिलेगी।

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इस पृष्ठभूमि में हम रांची से प्रकाशित अखबारों को देखें कि वे क्या कह रहे हैं: 
18.02.2017  को एक बैनर हेडलाईन हैं, लगभग सभी अखबारों में:

'3.10 लाख करोड के निवेश के लिए 210 कंपनियो ने किया एमओयू, छह लाख लोगों को मिलेगा रोजगार
निवेशको के लिये सरकार के दरवाजे 24 घंटे खुले'

HIndust an Times 19-02-2017 
Momentum Jharkhand takes social media by storm 
(Nearly 150 million impressions and a reach of 28.2 million on Twitter recorded during GIS)
Times of india – 21.may 2018- Momentum Jharkhand: 21 projects launched
21 project will bring  Rs 700 crore  to the state. 
पर वास्तविकता में एक भी एमओयू धरातल पर नहीं उतरे.




दैनिक भास्कर  में 05.03.2018  को पहले पेज पर पांच कालम का हेडलाईन है :
बोले मुख्यमंत्री रघुवर दास राजनीतिक अस्थिरता की वजह से गांवों मे कई काम पूरे नही हुए
पत्थरगडी की आड़ में अअफीम का अवैध धंधा, राष्ट्रविरोधी ताकतो का इन्हे संरक्षण
हिन्दुस्तान के 05.03.2018 के मुख्य पृष्ठ पर हेडलाईन हैं: 
मुख्यमत्री की चेतावनी ऐसा करनेवालों  को बर्दाश्त नहीं करेंगे
अफीम के लिये हो रही है पत्थलगड़ी

वहीं इसी समाचार को विस्तार से लिखते हुए मुख्यमंत्री के हवाले से अखबार लिखता है कि उन्हे पता है कि 100 एकड़ में अफीम की खेती हो रही है और इसमें उग्रवादी संगठन साथ दे रहे हैं।
वहीं अखबार में खूंटी संवाददाता के डेटलाईन से अलग हेडलाईन लगाई है - अलगावादी नारो के साथ पत्थलगडी, विरोध मे बैठक
 दैनिक भाष्कर ने 6मार्च 2018 को बैनर हेडलाईन लगायी है: 
अफीम के कारण पत्थलगडी की पुष्टि नहीं, लेकिन जहां पत्थलगडी वहीं अफीम का गढ
सिर्फ खुंटी के 1500एकड मे अफीम की खेती
डर या कमाई... पुलिस यहां कभी जाती ही नही
दोनों अखबार अफीम की खेती से जुड़े आंकड़े अलग-अलग बताते हैं पर भाष्कर ने एक बॉक्स मे 9 अन्य जिलों में होने वाले अफीम की खेती का आंकडा दिया है, जिसमें लातेहार मे 300 चतरा मे 525 व पलामू में 170एकड में अफिम की खेती की बात कही गयी है।

13.08.2017 को प्रभात खबर के फ्र्रन्टपेज का हेड लाईन है:
भूअर्जन मे सोशल इंपैक्ट स्टडी नही होगी, विधेयक पारित
धर्म स्वतंत्र बिल सदन से पास, जबरन धर्मातरण कराने पर चार साल की सजा
वहीं हेड लाईन के बगल में दो कालम की खबर है कि एमओयू 3.51 लाख करोड का, काम 3.8 प्रतिशत जमीन पर ही 
इसी खबर में एक फोटो है, जिसका कैप्शन है धर्मातरण बिल पास होन के बाद रांची के अल्बर्ट एक्का चौक पर जश्न मनाते लोग और ठीक नीचे बॉक्स में हेडिंग है भूमि अर्जन पुनर्वसन एव पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकार और पारदर्शिता का अधिकार झारखण्ड संशोधन विधेयक 2017 वहीं  4.4.2018 के प्रभात खबर के मुख्य पृष्ठ पर चार कालम के न्यूज में हेड लाईन है - पत्थलगडी केा लेकर राज्यपाल ने की बैठक कहा:
बहकाने वालों के बच्चे कर रहे विदेश में  पढ़ाई: 



पर अगर आप समाचार को पढ़ें तो पता चलता है कि यह एक भ्रामक व गुमराह करने वाली खबर है जिसे गलत तरीके से हेडलाईन बनाया गया है। आगे समाचार खुद ही ये बताता है कि राज्यपाल ने कहा है कि बहकाने वाले लागो के परीवार को भी देखें उनके बच्चे निश्चित रूप से विदेश या अच्छे शिक्षण संस्थानो मे पढ रहे होंगे।


टेलीग्राफ रांची ने 18 फरवरी 2018 को 
'Rock protests anti-national'
CM in Khunti, speaks out against Pathalgadi
के शीर्षक से खबर प्रकाशित की है और मुख्यमंत्री के हवाले से कहा गया कि राज्य में  देशविरोधी ताकतों को सर उठाने नहीं दिया जायेगा।
टेलीग्राफ के 3 जूलाई 2018 के अंक में 
Bid to quell Khunti stir
के शीर्षक से खबर लगाई है कि खूंटी प्रशासन ने नक्सल प्रभावित जिले के दारीगुटू में संगठनों के आउटफिट आदिवासी महासभा जैसों के प्रभाव वाले गाव में आमसभा की, जहां महासभा ने बाहरी लोगो के आने पर प्रतिबन्ध लगा रखा है।

इस इलाके मे माओवादी संगठन के अलावा पीएलफआई नामक उग्रवादी संगठन के बीच वर्चस्व की लडाई है। कई जानकार ये कहते हैं कि पीएलफआई को माओवादियों के खिलाफ प्रशासन का परेाक्ष सर्मथन प्राप्त है।
अगर हम गौर से देखें तो यह इलाका व पत्थलगडी प्रकरण राजनीतिक नाटक का एक परफेक्ट प्लाट है और एक राजनीतिक प्रयोगशाला भी है। सरकार अपनी विकास योजनाओं का क्रियान्वयन नही करा पा रही है और उसका टाईम टेस्टेड रिलीजन का कार्ड एक हद तक आदिवासी समाज को विभाजित करता दिख रहा है, वहीं अखबारों की भूमिका सरकार के पक्ष को रखने वाला ही दिख रहा है.  जानकार तो यहाँ तक कह रहे हैं कि अंग्रेजी के एक-आध अखबारों को छोड दिया जाय तो बाकी अखबार सरकार के प्रवक्ता के रूप मे कार्य करते दिखते हैं। क्योकि दुसरे पक्ष की बातें लगभग गौण हैं और अगरहैं तो वह सरकारी वर्जन से ही मिलता जूलता है। वही वे अपनी विश्वसनीयता बनाये रखने के लिए निश्चित अन्तराल में एक-आध बार सरकार को प्रश्न करते दिखते हैं। कायदे से मीडिया में सारे स्टेक होल्डरो के पक्ष आने चाहिए थे और सारे पक्षों से सटीक सवाल पुछे जाने थे, पर उनका नितांतअभाव दिखता है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि प्रिन्ट मीडिया की विश्वसनियता पर सवाल खडे हो रहे हैं।
इसे भी पढ़ें : रंगकर्मियों से बलात्कार : क्या बलात्कारी पीड़िता को खुद सही-सलामत वापस छोड़ते हैं? आदिवासी अधिकार की प्रवक्ता दयामनी बारला ने उठाये ऐसे कई सवाल

पत्थलगडी प्रक्ररण मे उबाल तब आया जब अख़बारों में खबर छपी कि एक एनजीओ के नुक्कड नाटक से मानव तस्करी के खिलाफ जागृति  फैलाने वाली मंडली की महिला सदस्यों का पत्थलगडी के इलाके में एक इसाई मिशन स्कूल  से अपहरण कर उनके साथ बलात्कार किया गया । बाद के धटनाक्रम में तीन पुलिसकर्मियों का ,जो खूंटी के लोकसभा सदस्य के घर मे तैनात थे, हथियार समेत अपहरण कर लिया गया और बाद में वे तीनो पुलिस कर्मी सकुशल वापस आ गये पर आश्चर्य यह है कि तीन के बदले चार पुलिसवाले आये, यानी पुलिस को ये भी पता नहीं था कि उनके कितने सिपाहियों का अपहरण हुआ था।
इस धटना की रिपोर्टिंग में लगभग पुलिस का वर्जन ही अखबारों  के हेडलाईन बने। जैसे:
24.05.2018 
पेज-1  प्रभात खबर  ‘फादर समेत तीन गिरफ्तार, पत्थरगडी समर्थक जॉन तिडू मास्टरमाईड, पिएलफआई भी शामिल
यह रिर्पोट कोचांग नामक गाँव,जो पत्थलगडी के इलाके में है, में एक कथित एनजीओ के पांच महिला सदस्यों का, जो उस इलाके मे जागरूकता फैलाने के उदेश्य से नुक्कड नाटक करने गयी थीं, अपहरण और बलत्कार की घटना के बाद की है।
दैनिक भास्कर  के पेज 3 पर ,26.05.2018 को चार कालम के बॉक्स का हेड लाईन है:
अब चेत जाईये संविधान के नाम पर ही बरगला रहे हैं पत्थरगडी के नेता
खूंटी  मे सुनाई दे रहे है कश्मीर जैसे नारे
ग्राम सभा में उठ रही है आजादी की आवाज
एक व्यक्ति की पीठ की तरफ से ली गयी तस्वीर ,है जिसमे एक बच्चा उसके कन्धे पर सर रख कर सो रहा है’ 
कैपसन है: ‘देखिये... कैसे बचपन के कानो मे धुल रहा है अलगाववाद का जहर’
27.06. 2018 दैनिक भास्कर  के  पेज 1 का बैनर
‘ खूंटी  गैंग रेप ! पहली बार पुलिस ने आरोपियों को  पकड़ने  के  लिए पत्थलगडी क्षेत्र में चलाया सर्च आपरेशन
गैग रेप के आरोपियो पर कार्रवाई के जबाव मे सांसद कडि.या मुण्डा के घर पर हमला, 3 गार्ड्स का अपहरण’
22. 06. 2018 के पेज 1 पर दो कालम का शीर्षक है :
‘पत्थलगडी के नाम पर हर कृत्य का समर्थन करने वाले क्या इस कुकृत्य की जिम्मेवारी लेगे?’
पेज 8 पर दो कालम के न्यूज का शीर्षक है:
स्कूल में  स्वागत बैड बन्द होते ही आ धमके वे अपराधी... जैसे हर किसी से परिचित हों
जिस स्कूल में धटना, उसके आस-पास के सारे गांवों में हुई है पत्थलगडी’



23 .06.2018 को भाष्कर में भाजपा के राज्यसभा के सदस्य समीर उराव का वक्तव्य है, जिसमें वे कह रहे हैं कि
‘धर्म बदलने वाले को क्यों  मिले आरक्षण, हम संसद में विधेयक लाएंगे।
वहीं टाईम्स ऑफ  इंडिया के 23 जून 2018 के अंक में   Kochang villagers vow to fight ‘biased probe शीर्षक से छपे न्यूज में ग्रामीणों का पक्ष छपा है, जो कि बाकि अखबारों मे कम ही देखने को मिला है
और 1 जुलाई के भाष्कर मे छपे न्यूज मे कहा गया है कि पत्थरगडी के मास्टर माईड, गैगरेप के अपराधी और पुलिसकर्मियों के अपहरणकर्ता 12 दिनो के बाद भी पकड़  से बाहर हैं।

                                                            एक और उलगुलान: ( श्रीप्रकाश की एक डॉक्यूमेंट्री)


                                                     

   

अगर पूरे  प्रक्ररण व अखबारो मे छपी खबरों  का विश्लेषण करें तो लगता है कि सरकार व प्रशासन अपने वर्जन को अखबारों में प्रमुखता  से छपवाने में सफल है। पर इसका खामियाजा अखबारों की विश्वसनीयता पर है क्योंकि इस पूरे  पत्थलगड़ी प्रकरण में  सोशल मीडिया ने बढ-चढ कर विभिन्न आयामों को लोगो के सामने लाया और एक तरह से सोशल मीडिया ने जो जगह अखबारो ने छोडी थी उसको भरने की कोशिश की है जिसके कारण  नुक्कड नाटक मे धृणित बलात्कार व पुलिसकर्मी अपहरण काण्ड पर एक धारणा बन गयी है कि ये प्लान्टेड थे। जैसे हथियारों का मिलना,  तीन की जगह चार पुलीसकर्मी की वापसी होना, पीड़ित नुक्कडनाटक कर्मी महिलाओं को छिपा कर रखना, दो एफआईआर एक ही समय पर दो अलग-अलग थानो मे दर्ज होना इत्यादि सोशल मीडिया में अच्छी-खासी जगह पा रहे हैं. ग्रामीणों व पत्थलगडी समर्थको के विडीयो, इंटरव्यू व उनका पक्ष सेाशल मीडिया पर उपलब्ध है ।



दूसरी तरफ देश के प्रमुख महिला संगठनो की सदस्य, जो दो दिनों तक खूंटी मे डेरा डाले रहीं, खूंटी के वरिष्ठ अधिकारियों से मिल पाने में सफल नहीं हो सकीं, और न ही पीड़ित महिला नाटककर्मियों से ही मुलाकात हो पाई है । एक तरफ प्रशासन की भूमिका के बारे में कोई सवाल नही खड़े  कर रहा है वहीं ग्रामसभा के नेतृत्व को ये भी सवाल नहीं पूछा  है कि अगर  स्वशासन व स्वायतता की बाते करते हैं तो पहले अपने इलाके पर तो नियत्रण रखेंगे? आप के इलाके से महिलाओं का अपहरण होता है उनके साथ बलात्कार होता है, इस पर आप की व्यवस्था कुछ नही कहती और न ही कोई ऐक्शन लेती है। जब पत्थलगडी इलाके में बाहरी लोगो का अगमन मना था तो ये नाटक  मंडली कैसे पहुँच गयी?

पुनश्च:

मैंने काफी पहले उन ब्रीटिश  पुलिस अधिकारियों की रिपोर्टें पढी थी जो पुलिस के साथ संथाल हुल और बिरसा मुण्डा आदि की मुटभेड पर थी। रिपोर्ट में बिरसा उलगुलान, जो खूंटी के इलाके में हुआ था, आदिवासीयो के साथ पुलिस के युद्धों का विवरण विस्तार से लिखा था। अधिकारी ने जो लिखा था वह आर्श्चय और विस्मय से भरा था कि 'मैंने अनेक मुटभेड व युद्ध में हिस्सा लिया है पर यह युद्य एक तरफा था। आदिवासी लडाके नगाडा बजने के साथ ओट से निकल तीरों की बौछार करते। पर उनके तीर हम तक नही पहुँच पा रहे थे जबकि वे हमारे बन्दुक की गोलियों की सीमा पर थे। वे लोग लगातार हमारे गोलियों, के शिकार हो रहे थे पर उन्होंने लडना नहींछोडा। जैसे ही नगाडा बजना शुरू होता बचे हुए आदिवासी फिर बाहर निकल तीर चलाते -ये क्रम तब तक चला जब तक कि सारे गोलियों का शिकार न हो गये।'

इसी तरह की एक और घटना हैं: खूंटी  के तोरपा इलाके में फरवरी 2001 मे 'कोयलकारो' जन सगठन के कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने गोली चलाई जिसमें 8 लोगों की जान गयी थी। इसका कारण बना था कि जनसंगठन ने डेराग से लोहाजिमी जाने वाली सडक, जो मुडारी खुटकट्टी जमीन पर बनी थी, एक अस्थाई चेक नाका/बेरीकेटीग लगाया था कि कोई भी बाहरी व्यक्ति अगर आये तो यहाँ अपनी गति धीमी करे, जिससे स्थानीय लोगों  को पता चले कि कौन आया है। पुलिस उस नाका को तोड कर हटा रही थी जिसका उस समय उपस्थित एक स्थानीय भुतपुर्व सैनिक ने विरोध किया जिसे पुलिस ने बन्दुक के कुदें से मार कर घायल कर दिया था जिसके विरोध में जनसंगठन तपकारा पुलिस पोस्ट के सामने धरना दे रहा था।

एक और घटना जो 25 अगस्त 2017 मे कांकी, खूंटी में हुई थी जिसमें 200 की संख्या में पुलिस बल और एसपी, मजिस्ट्रेट, खूंटी व मुरहु थाना के थानेदार समेत कई प्रशासनिक अधिकारियों को ग्रामीणों ने 13 घंटे तक गाँव में रोक के रखा था. जो डीसी और जिले के बड़े पुलिस पदाधिकारियों के साथ बातचीत के बाद ही ये अवरोध टुटा था, ये मामला तत्कालीन डीसी मनीस रंजन की सूझ-बूझ से शान्त हो पाया था.

इस घटना का कारण एक बेरीकेटिंग, जो ग्रामसभा ने गावमें जाने वाली सडक में लगाया था, उसे पुलिस तोड़-तोड़ देती है। और यह वही इलाका है जो आज मघ्य और पूर्वी भारत के आदिवासी अंचलों में पत्थलगड़ी नामक आयोजनों के कारण पुरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। भारत के अन्य कथित सभ्य समुदायों से अलग आदिवासी समुदाय ने बिना किसी मुकूटधारी राजा, बिना किसी स्टैंडिंग आर्मी के उन सभी राज्यसत्ता को हिला कर रख दिया, जिस किसी ने भी इनकी स्वयत्ता को चुनौती देने की कोशिश की। उन्नत सैन्य क्षमता के आगे आदिवासी युद्धों में पराजित भी हुए पर इन्होने गुलामी को स्वीकार नही किया और वे घने जंगलों मे घुसते चले गये।

ससनदीरी, पत्थलगडी जो खुटकट्टी मुण्डा परम्परा का आधारभूत हिस्सा है, जिसमें पत्थरो की अहम भुमिका है-ससनदीरी पत्थरों को मुण्डा समुदाय के लोग भूमि के स्वमित्व में पट्टे के रूप मे इस्तेमाल करते रहे हैं- और एक उदाहण भी है.  कलकते के ब्रीटिश कोर्ट में ससनदीरी पत्थरों को अपनी जमीन के पट्टे के रूप में पेश किया गया था। इन परम्पराओं को विभिन्न सरकारों ने अधिकांशतः आदिवासी बलिदानों के बाद सम्मान करते हुए कानुनी जामा पहनाया, जो झारखण्ड में ब्रीटिशकाल में बने छोटानागपुरटेनेंसी ऐक्ट, संथाल परगना ऐक्ट, आजादी के बाद पेसा और फोरेस्ट राईट एक्ट के रूप में हमलोगों के सामने है। यहाँ यह बताना महत्वपुर्ण होगा कि फ़ॉरेस्ट राईट एैक्ट 2006 की प्रस्तावना में यह लिखित रूप से स्वीकार किया गया है कि विभिन्न सरकारों द्वारा इन समुदायों पर ऐतिहासिक अन्याय हुआ है।

आजादी के बाद भूरिया कमिटी की सिफारिशों के बाद जो पेसा कानून  1996 बना, उसके प्रचार-प्रसार में भारत सरकार के वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट स्व. बीडी शर्मा ने पद त्यागकर एक संगठन भारत जनआदोलन गठित किया और गाँव-गाँव में बड़े पत्थरों पर संविधान की धाराओं को लिख र पत्थलगडी का कार्यक्रम चलाया था।

लोकतंत्र का अंतिम उद्देश्य शासन में जनता की अधिकतम भागीदरी है, विकास के निर्णयों पर आख़िरी व्यक्ति की सहमति से लोकतन्त्र अपने शिखर पर पहुँच सकता है। पुरी दुनिया में देखा गया है कि आदिवासी स्वशासन व परम्परागत शासन व्यवस्था अपने आप में अनुठे लोकतांत्रिक मूल्यों का वाहक है। युरोपियनो के अमेरिका में आगमन के साथ ही वहां के आदिवासियों के साथ चले अन्तहीन युद्ध का सम्मानजनक हल अमेरिकी कानूनों के अंतर्गत आदिवासी स्वायत्त प्रदेशों की स्थापना के साथ हुई। लेखक ने स्वयम अमेरिका  के सबसे बडे आदिवासी समुदाय नवाहो इन्डियन लोगों के स्वायत शासीप्रदेश नवाहोनेशन में उनके कार्य और अधिकारो को नजदीक से देखा है। नवाहोनेशन का अपना राष्ट्रपति, अपनी पुलिस और अपने प्रशासनिक-व्यवस्था व अधिकार क्षेत्र हैं। इन इलाकों में स्टेट की पुलिस नही आ सकती है।

(Navajo Nation) is the biggest autonomous territory within USA lies in fore state- Arizona, Colorado,new Mexico and Utah. similarly all other indigenous  communities have their own sovern nation with in the USA constiutution. 

श्रीप्रकाश स्वतंत्र वृत्तचित्र निर्माता हैं. कॉरपरेट लूट और आदिवासी अधिकार, मानवाधिकार को संबोधित अनेक फ़िल्में बनायी हैं. सम्पर्क: prakash.shri@gmail.com

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