आदिवासियों के मानवाधिकार की लड़ाकू पर रिपब्लिक टीवी का निशाना: यह सत्ता का चारण काल है


उत्तम कुमार (फेसबुक पोस्ट से) 

पीयूसीएल द्वारा 2016 का निर्भीक पत्रकारिता सम्मान लेते समय उन्होंने पुरस्कार स्वरूप प्रशस्ति पत्र और धान के कटोरा पुरस्कार में दते हुए कहा था कि ‘उत्तम जी इसकी रक्षा कर पत्रकारिता करनी है और जवाब में मैंने कहा था कि ‘इस सम्मान को मैं असंख्य पीडि़त मानवता को समर्पित करता हूं उन लोगों को भी जो प्राकृतिक संसाधनों की लड़ाई में जेलों में कैद हैं।’ पीडि़त मानवता की  सेवा में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाली सुधा भारद्वाज का दोष यह है कि वह एक मानवाधिकार अधिवक्ता होने के नाते लगातार छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में आदिवासियों की मुठभेड़ों में बंदी प्रत्यक्षीकरण के प्रकरणों में पेश हुई और निडरता के साथ लगातार मानवाधिकार रक्षकों की पैरवी करती रही हैं।



जब हाल ही में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने छत्तीसगढ़ के सुकमा के कोडासवाली गांव में एक जांच में उनका सहयोग मांगा था तब भी वह अपनी व्यवसायिक ईमानदारी और साहस के साथ पेश आई। यदि यही उनका दोष है तो वे तमाम लोग भी उतने ही दोषी हैं जो अधिनायकवाद, फासीवाद और भूमंडलीकरण की ताकतों द्वारा पैदा खतरों और चुनौतियों का सामना रचनात्मक और आलोचनात्मक तौर-तरीकों से करते आ रहे हैं।

सभी को मालूम हो कि नेशनल लॉ युनिवर्सिटी, दिल्ली की अतिथि प्रोफेसर और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की राष्ट्रीय सचिव अधिवक्ता सुधा भारद्वाज ने रिपब्लिक टीवी चैनल पर 4 जुलाई 2018 को अर्नब गोस्वामी द्वारा प्रसारित उस सुपर एक्सक्लूसिव ब्रेकिंग न्यूज पर आपत्ति जताई है जिसमें उनके खिलाफ बेबुनियाद आरोप लगाए गए हैं। रिपब्लिक टीवी पर ऐंकर गोस्वामी ने ‘शहरी माओवादी’ पर एक बुलेटिन चलाते हुए अधिवक्ता सुधा के नाम से एक पत्र का उल्लेख किया था।

सुधा ने एक सार्वजनिक बयान जारी करते हुए कहा है कि मेरे खिलाफ आरोपों की एक लंबी सूची पेश की जा रही है जो हास्यास्पद, अपमानजनक, झूठी और एकदम निराधार है। इस टीवी कार्यक्रम में गोस्वामी ने दावा किया था कि सुधा द्वारा किसी कामरेड प्रकाश को एक पत्र लिखा गया था जिसमें कश्मीर जैसी परिस्थिति निर्मित करने की बात की गई थी। गोस्वामी ने इस कथित पत्र का हवाला देते हुए माओवादियों और अलगाववादियों के बीच एक संपर्क स्थापित करने की कोशिश की है।

सुधा ने बयान में कहा है, ‘ऐसे किसी भी पत्र से किसी भी तरह का संबंध होने से मैं दृढ़ता और निस्संदेह इनकार करती हूं... अगर ऐसा कोई दस्तावेज अस्तित्व में है तो भी मैंने उसे नहीं लिखा है।’ अपने बयान में अधविक्ता सुधा ने मानवाधिकारों से जुड़े अपने कार्यों का उल्लेख करते हुए पैदा किए जा रहे झूठ, भय और आतंक का मुंहतोड़ जवाब देते हुए कहा है कि ‘मैंने अपने अधिवक्ता से अर्नब गोस्वामी और रिपब्लिक टीवी को मेरे खिलाफ झूठे, दुर्भावनापूर्ण और बदनाम करने वाले आरोपों के लिए कानूनी नोटिस भेजने का अनुरोध किया है।’

आपको जानना चाहिए कि अर्थशास्त्री रंगनाथ भारद्वाज और कृष्णा भारद्वाज की बेटी सुधा का जन्म अमरीका में 1961 में हुआ था। 1971 में सुधा अपनी मां के साथ भारत लौट आईं। जेएनयू में अर्थशास्त्र विभाग की संस्थापक कृष्णा भारद्वाज की सोच के विपरित सुधा ने अपनी अमरीकन नागरिकता छोड़ दी। सुधा 1978 की आईआईटी कानपुर की टॉपर है। आईआईटी से पढ़ाई के साथ वह दिल्ली में अपने साथियों के साथ झुग्गी और मजदूर बस्तियों में बच्चों को पढ़ाना और छात्र राजनीति में मजदूरों के बीच काम करना शुरू कर दिया था। लगभग साल 1984-85 में वे छत्तीसगढ़ में शंकर गुहा नियोगी के मजदूर आंदोलन से जुड़ गईं। उन्होंने 40 की उम्र में अपने मजदूर साथियों के संघर्षों में संवैधानिक लड़ाई के लिए वकालत की पढ़ाई पूरी कर आदिवासियों, मजदूरों के न्याय के लिए उठ खड़ी हुई। जनहित के नाम से वकीलों का एक ट्रस्ट बनाया और समाज के पीडि़त वर्ग के लिए केस लडऩा शुरू किया। उन्होंने बस्तर के फर्जी मुठभेड़ों से लेकर अवैध कोल ब्लॉक, पंचायत कानून का उल्लंघन, वनाधिकार कानून, औद्योगिकरण के मसले पर ढेरों लड़ाईयां लड़ी।

उज्जवल भट्टाचार्या हस्तक्षेप ब्लाग में लिखते हैं कि सुधा की मां कृष्णा भारद्वाज जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में इकोनामिक्स डिपार्टमेंट की डीन हुआ करती थीं। सुधा की मां बेहतरीन क्लासिकल सिंगर थी और अमर्त्य सेन की समकालीन भी थीं। आज भी सुधा की मां की याद में हर साल जेएनयू में कृष्णा मेमोरियल लेक्चर होता है, जिसमें देश के नामचीन स्कॉलर शरीक होते हैं। आईआईटी से टॉपर हो कर निकलने के बाद भी सुधा को कैरियर खींच न सका। उनकी मां ने दिल्ली में एक मकान खरीद रखा था, जो आजकल उनके नाम पर है, मगर बस नाम पर ही है। मकान किराए पर चढ़ाया हुआ है, जिसका किराया मजदूर यूनियन के खाते में जमा करने का फरमान उन्होंने किरायेदार को दिया हुआ है। गुमनामी में गुमनामों की लड़ाई लड़ते अपना जीवन होम कर चुकी हैं। उन पर लगाए जा रहे आरोप साजिशाना है जो लोग पीडि़त मानवता के लिए उठ खड़े हो रहे हैं उन्हें साम, दाम, दंड और भेद के साथ निरंकुश शासन व्यवस्था उनके सामने कठिन चुनौतियां पेश कर रही है। प्रतिवाद में जनसंघर्ष तेज होंगे और नए रास्ते निकाले जाएंगे।

सुधा भारद्वाज जेएनयू में 

उन्होंने रिपब्लिक टीवी चैनल और एमडी सह ऐंकर अर्नक गोस्वामी के अटेंशन का जवाब कुछ इस तरह दिया है-

मुझे सूचित किया गया है कि रिपब्लिक टीवी दिनांक 4 जुलाई 2018 को एक कार्यक्रम प्रसारित किया है, उसमें उसके एंकर और एमडी अर्नव गोस्वामी सुपर एक्सक्लूसिव ब्रेकिंग न्यूज के रूप में पेश कर रहे हैं। इस कार्यक्रम में, जो बार-बार पेश किया जा रहा है, मेरे खिलाफ आरोपों की एक लंबी सूची पेश की जा रही है जो हास्यास्पद अपमानजनक, झूठी और एवं निराधार हैं। गोस्वामी का दावा हैं कि मैंने किसी माओवादी को कोई कामरेड प्रकाश को-एक पत्र लिखा है (इसमें मुझे ‘कामरेड अधिवक्ता सुधा भारद्वाज’ के रूप में पेश किया गया है), जिसमें मैंने कहा है कि ‘कश्मीर जैसी परिस्थितियां’ निर्मित करनी होगी। मुझ पर माओवादियों से राशी प्राप्त करने का भी इलजाम मढ़ा गया है। और यह कि मैंने इस बात की पुष्टि की है कि मैं तमाम वकीलों को जानती हूं जिनके माओवादियों से संपर्क है। इनमें से कई को में जानती हूं वे बड़े उत्कृष्ट मानवाधिकार के वकील हैं, और अन्य जिन्हें मैं नहीं जानती हूं।

ऐसे किसी भी पत्र से किसी भी तरह से संबंधित होने से में दृढ़ता और निस्संदेह इंकार करती हूं। मैंने ऐसा कोई भी पत्र नहीं लिखा है। जिसका जिक्र गोस्वामी ने किया है-अगर ऐसा कोई दस्तावेज अस्तित्व में है जो मैंने नहीं लिखा है,रिपब्लिक टीवी द्वारा प्रसारित आरोपों का मैं खंडन करती हूं जो उसमें मेरे खिलाफ मढ़े हैं, मुझे बदनाम करने के लिये लगाये गये हैं जिससे मुझे व्यवसायिक और व्यक्तिगत हानि पहुंची हैं। अपने इस कार्यक्रम में रिपब्लिक टीवी ने इस पत्र के  स्रोत का जिक्र नहीं किया है, मुझे यह बहुत ही अजीबोगरीब मामला लगता है कि वह दस्तावेज जिसमें गंभीर आरोप लिखे गए हैं वह गोस्वामी के स्टूडियो में सबसे पहले प्रगट हो। मैं पिछले 30 वर्षों से ट्रेड यूनियन आंदौलन से जुड़ी हुई हूं और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा में सक्रिय रही हूं। जिसकी स्थापना शंकरगुहा नियोगी ने की और दिल्ली राजहरा और भिलाई की मजदूर बस्तियों के सैकड़ो मजदूरों के बीच जीवन जिया हैं,जो इस सत्य के गवाह हैं। ट्रेड यूनियन कार्यवाहियों मैं सन 2000 से एक वकील बनी और तब से लेकर आज तक मजदूरों, किसानों, आदिवासियों, दलितों और गरीबों के मुकदमों में पैरवी की है, जो भूमि अधिग्रहण, वन अधिकारों और पर्यावरण अधिकारों के दायरे में आते हैं।

साल 2007 से मैं छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर में बतौर वकील कार्यरत हूं और उच्च न्यायालय ने मुझे छत्तीसगढ़ राज्य स्तरीय सेवा प्राधिकरण के सदस्य के रूप में भी नियुक्त किया पिछले एक वर्ष से मैं नेशनल ला यूनिवर्सिटी दिल्ली में एक अतिथि प्रोफेसर के रूप में शिक्षा दे रही हूं ,जहां आदिवासी अधिकारों और भूमि अधिग्रहण पर मैंने एक संगोष्ठी आयोजित किया और पाठ्यक्रम भी तैयार किया। इसके अलावा गरीबी पर एक नियमित पाठ्यक्रम भी पेश किया हैं। दिल्ली की जूडिशल अकादमी  के कार्यक्रम से मैं अभिन्न अंग के रूप में जुड़ी हूं। श्री लंका के श्रम न्यायालयों के अध्यक्षों को भी संबोधित किया है इस तरह मेरे जनपक्षीय और मानवाधिकार अधिवक्ता के रूप में काम जगजाहिर हैं। मैं पूरी जागरूकता से जानती हूं कि मेरा यह काम अर्नव गोस्वामी और रिपब्लिक टीवी द्वारा जोर-शोर से अकसर व्यक्त किये गए विचारों से प्रत्यक्ष रूप से विरोध में पाये जाते हैं।

मेरे विचार से फिलहाल दुर्भावनापूर्वक प्रेरित और मनगढंत हमला मेरे ऊपर इसलिये किया जा रहा है कि अभी हाल ही में 6 जून को दिल्ली में एक प्रेसवार्ता में अधिवक्ता सुरेंद्र गडलिंग की गिरफ्तारी की मैंने निंदा की। इंडिया एसोसिएशन ऑफ पीपल्स लॉयर्स जो वकीलों का एक संगठन है, उसने भी अन्य वकीलों के मुद्दों को जोर-शोर से उठाया है, जिसने भीम आर्मी के अधिवक्ता चन्द्रशेखर और स्टर्लिंग पुलिस गोली कांड के बिना पर गिरफ्तार किये गये अधिवक्ता सुचिनाथन का मामला भी है। यह स्पष्ट है कि ऐसे वकीलों को निशाना बना कर उन सभी को डराने की कोशिश है जो नागरिकों के जनतांत्रिक अधिकारों के लिये वकालत कर रहे हैं। रणनीति यह हैं कि एक भय का माहौल पैदा किया जाए, और उन सब को चुप कराने की कोशिश हैं। जिससें कि आम जन न्याय से वंचित हो जाये। इसके सातंग ही गौरतलब हैं कि अभी हाल ही में आईएपीएल कश्मीर में वकीलों द्वारा कठिनाइयों का सामना किया जा रहा है उनकी सच्चाई जानने के लिये एक टीम गठित की गई थी।

एक मानवाधिकार अधिवक्ता होने के नाते मैं छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में आदिवासियों की की मुठभेड़ों में बंदी प्रत्यक्षीकरण के प्रकरणों में भी पेश हुई थी और इसके अलावा मैं मानवाधिकार रक्षकों की पैरवी करती रही हूं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एचआरसी)के समक्ष भी पेश हुई हूं। अभी हाल ही में एचआरसी ने छत्तीसगढ़ के सुकमा के कोडासवाली गांव में एक जांच में मेरा सहयोग मांगा था इस प्रकरण में मैं उसी व्यवसायिक ईमानदारी और साहस के साथ पेश आई जो एक मानवाधिकार अधिवक्ता के रूप में मेरी उपलब्धि है। ऐसा लगा कि यही मेरी अपराध हैं। मैं अर्नव गोस्वामी के सुपर एक्सक्लूसिव अटेंशन की शिकार हूं। मैंने अपने अधिवक्ता से अर्बन गोस्वामी और रिपब्लिक टीवी को मेरे खिलाफ झूठे, दुर्भावनापूर्ण और निराधार बदनाम करने के आरोपों के लिये कानूनी नोटिस भेजने का अनुरोध किया है।

(लेखक दक्षिण कोसल में सम्पादक है )


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