समाज का नजरिया बदलने वाली फोटोग्राफर संगीता महाजन


पुष्पेन्द्र फाल्गुन 

बोलती तस्वीरों की फोटोग्राफर संगीता महाजन की फोटोग्राफी और उनके इस सफ़र की कहानी कह रहे हैं संवेदनशील साहित्यकार और पत्रकार पुष्पेन्द्र फाल्गुन. आइये समझते हैं संगीता महाजन की फोटोग्राफी यात्रा को कुछ शब्दों कुछ तस्वीरों के जरिये:  

लंबी-चौड़ी सड़कें, चकाचक सड़कें, लकदक सड़कें, विकास के नाम पर सबसे ज्यादा यही चित्र आम तौर पर आँखों के सामने रखा जाता है, लेकिन इन्हीं चित्रों के सहारे मशहूर फोटोग्राफर संगीता महाजन ने वर्तमान सरकार द्वारा किए जा रहे विकास एवं उसकी चपेट में आयी स्थानीय अर्थव्यवस्था और सामाजिकता की बदहाली को न सिर्फ सबके समक्ष रखा है, बल्कि अपने छायाचित्रों के माध्यम से आमजन के मन-मस्तिष्क में यह सवाल उत्पन्न करने में कामयाबी हासिल की है कि यह तथाकथित विकास सर्वसमावेशी विकास नहीं है.
                             

 यह विकास कुछ धन्नासेठों और सफेदपोशों का ही विकास है, समाज के शेष वर्ग इस विकास से सिर्फ और सिर्फ बुरी तरह प्रभावित होंगे. संगीता महाजन की यह तस्वीरें आमजन को यह सन्देश दे रही हैं कि यदि इस तथाकथित विकास का विरोध नहीं हुआ तो इस देश का आम नागरिक न सिर्फ बदहाल होगा बल्कि बचे रहने की लाचारी में खुद अपने ही लोगों के खिलाफ खड़े होने पर मजबूर हो जाएगा.




संगीता महाजन, इसी तरह के छायाचित्रों के लिए पूरे देश में ख्यात हैं. जन-सरोकार उनके फोटोग्राफी का केन्द्रीय विषय है. सरोकारीय फोटोग्राफी कैसे आमजन को व्यवस्था के प्रति संदेह, सवाल और प्रतिरोध के लिए प्रेरित कर सकती है, संगीता महाजन के छायाचित्र इसकी मिसाल हैं.



अपने समय के बरक्स जो सवाल खड़े होते हैं, एक फोटोग्राफर होने के नाते संगीता जी उनसे जूझती हैं और उन्हें अपने छायाचित्रों का विषय बनाती हैं. उनकी वर्तमान हॉकर सीरीज उसी सिलसिले को आगे बढ़ा रही है. इन छायाचित्रों में आम और खास का भेद इतना स्पष्ट रेखांकित है कि समाज के आम इंसान को यह तय करने में देर नहीं लगती कि उसे किस तरफ खड़ा होना चाहिए और क्यों?



फोटोग्राफी विथ विज़न
संगीता महाजन ने फोटोग्राफी को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम इसलिए बनाया कि उन्हें लगता है कि यह एकमात्र ऐसी विधा है जो विसंगतियों के सारे आयाम देखने वाले के समक्ष खोलकर रख देती है. छायाचित्रों को देखने वाला किसी भी छायाचित्र से तात्कालिक और दीर्घकालिक, दोनों ही अवस्थाओं में जुड़ता है, यह उसके मानवीय स्वभाव के अनुकूल है. शायद इसीलिए कला-माध्यमों में सबसे नया होने के बावजूद पूरी दुनिया में फोटोग्राफी ने अपने लिए दीगर कला माध्यमों के बनिस्बत पुख्ता जगह बना ली है. फोटोग्राफी की इसी विशेषता को संगीता महाजन फोटोग्राफरों के लिए चुनौती मानती हैं. वह कहती हैं, ‘कैमरे से खींची जाने वाली हर तस्वीर पहली ही बार खींची जाती है, चाहे फोटोग्राफर ने कितने ही फोटो खींचे हो, लेकिन हर बार जब वह फोटो खींचता है तो दरअसल पहली बार ही वह फोटो खींच रहा होता है, फोटो पहले दिमाग में क्लिक होती हैं, बाद में कैमरे में, इसलिए फोटोग्राफर की दृष्टि और उसका नजरिया साफ़ होना चाहिए, नहीं तो वह इस कला-माध्यम के साथ न्याय नहीं कर पाएगा.’

संगीता महाजन 


महिलाएं ही उम्दा फोटोग्राफर

संगीता महाजन मानती हैं कि फोटोग्राफी विधा के साथ महिलाएं ज्यादा न्याय कर पाती हैं, क्योंकि इस विधा में कला, संवेदना, संयम, कौशल, पारदर्शिता और ईमानदारी की एक ही समय पर जरुरत होती है, महिलाएं कुदरती तौर पर इन गुणों की सम्यक संवाहक हैं, इसलिए जब उनकी आँख कैमरे की आँख बन जाती है तो वह वो सब कुछ दिखा पाती हैं, जो आम तौर पर हमारे आग्रहों की वजह से हमसे देखने से छूट जाता है. संगीता महाजन का मानना है कि महिलाओं के हाथ में फोटोग्राफी का भविष्य उज्ज्वल है.



आजीविका का साधन

स्नातक होने के बाद संगीता महाजन ने फोटोग्राफी को ही अपनी आजीविका का साधन बनाया. पुणे में एक वर्कशॉप के दौरान उनका परिचय एक महिला फोटोग्राफर से हुआ तभी उनके मन में इस माध्यम को आजीविका बनाने का ख्याल आया. वह कहती हैं,’ साम्यवादी विचारों से जुड़ी होने के नाते मुझे ऐसे ही किसी माध्यम की तलाश थी, जिससे आजीविका भी चले और सरोकारों को जीने में भी आसानी हो. फोटोग्राफी ने मुझे दोनों मौके मुहैया कराए.’ अपना पहला कैमरा उधार लेकर उन्होंने नागपुर के एक सांध्य दैनिक के लिए काम शुरु किया. काम इस आधार पर मिला था कि तस्वीर छपेगी तो पारिश्रमिक मिलेगा.




13 अप्रैल 1993 को उनका पहला चित्र उस सांध्य दैनिक में छपा, फिर इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ के नहीं देखा. 1994 में नागपुर में अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन कर रहे आदिवासी-गोवारी समाज के जन-समुदाय पर पुलिस ने बेंत प्रहार किया, इससे भगदड़ मच गयी और 113 निर्दोष गोवारी स्त्री-पुरुष, बुजुर्ग-बच्चे मारे गए. मारे गए लोगों में महिलाएं और बच्चे ही ज्यादा थे. संगीता महाजन उस प्रदर्शन को कवर करने गयी थीं, सारा मंजर उनकी सामने ही घटा था, उन्होंने उन दर्दनाक दृश्यों को अपने कैमरे में कैद किया. कुछ चित्र इतने मार्मिक थे कि जिन्हें देखकर कठोर से कठोर दिल मनुष्य का हृदय पिघल जाए. गोवारी हत्याकांड के उनके चित्र लन्दन से प्रकाशित होने वाले दैनिकों लन्दन टाइम्स और लन्दन इंडिपेंडेंट में प्रकाशित हुए.



नागपुर की एक छायाचित्रकार के छायाचित्र लन्दन के अख़बारों में छपे तो पूरे देश का ध्यान उनकी फोटोग्राफी की तरफ गया. 1995 में नागपुर से एक अंग्रेजी दैनिक का प्रकाशन शुरु हुआ. संगीता महाजन को उसमें पक्की नौकरी मिल गयी. हालाँकि नौकरी देने के पहले संपादक ने वही रटे-रटाए सवाल पूछे थे कि क्या एक महिला होने के नाते देर रात तक काम कर पाएंगी? काम ईमानदारी और निष्ठा से करेंगी? आदि. 2001 में उक्त अख़बार ने नागपुर से अपना प्रकाशन स्थगित किया तो संगीता महाजन का पुणे स्थानान्तरण हुआ, लेकिन उन्होंने पुणे जाने की बजाय नागपुर को ही अपनी कर्मभूमि बनाए रखने का फैसला किया.



व्यावसायिक फोटोग्राफी

नौकरी छूटने के बाद संगीता महाजन ने व्यावसायिक फोटोग्राफी का रुख किया. व्यावसायिक फोटोग्राफी पुरुषों के वर्चस्व का क्षेत्र है. प्रेस फोटोग्राफर के तौर पर भी चुनौतियाँ थी लेकिन व्यावसायिक फोटोग्राफर के तौर पर अब सबसे बड़ी चुनौती पुरुष के आग्रही मानसिकता की थी, लेकिन संगीता महाजन ने अपनी सूझबूझ और समझ से जल्दी ही इस क्षेत्र में भी अपनी पहचान स्थापित कर ली. विजन और मानवीय गरिमा को महत्व देने से उनकी व्यावसायिक फोटोग्राफी ने जल्दी ही सभी का ध्यान आकृष्ट किया. बहुत कम समय में वह नागपुर एवं मध्य भारत के एक मुख्य व्यावसायिक फोटोग्राफर के तौर पर पहचानी जानी लगीं.




महिलाओं को इस विधा से जोड़ने के उपक्रम

संगीता महाजन कहती हैं, ‘मानवीयता छायाचित्रों का एक प्रमुख तत्व है और महिलाएं ही इस तत्व को बखूबी इस माध्यम में निखार सकती हैं. क्योंकि समाज के विसंगतियों का सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं ही होती हैं इसलिए मानवीय दृष्टिकोण उनमें पुरुषों के मुकाबले ज्यादा होता है, अतः फोटोग्राफी के जरिए यदि महिलाएं खुद को अभिव्यक्त करती हैं तो विसंगति, शोषण एवं अत्याचार मुक्त समाज बनाने की गति तेज हो सकती है.’


महिलाओं को इस विधा से जोड़ने के लिए संगीता महाजन फोटोग्राफी की कार्यशालाएं आयोजित करती रहती हैं. इस समय समूर्ण महाराष्ट्र भर में उनकी कार्यशालाएं आयोजित हो रही हैं. अत्यल्प शुल्क में महिलाओं के साथ नयी पीढ़ी के युवाओं को वह फोटोग्राफी सिखा रही है, ताकि नयी पीढ़ी संवेदना के इस कला-माध्यम में खुद को अभिव्यक्त करते हुए समाज की बेहतरी की दिशा में सक्रिय हो सके.




अनेक पुरस्कार और प्रदर्शनियां

संगीता महाजन को उत्कृष्ट फोटोग्राफी के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. इसमें प्रतिष्ठित के.के. मूस फाउंडेशन पुरस्कार, स्वरवेध पुरस्कार, फूजी वर्ल्डकप क्रिकेट अवार्ड शामिल हैं. संगीता महाजन के छायाचित्रों की अनेक एकल एवं सामूहिक प्रदर्शनियां भी आयोजित हो चुकी हैं और सभी प्रदर्शनी चर्चित हुई हैं.

साहित्य और पत्रकारिता में समान रूप से गतिमान रहे पुष्पेन्द्र फाल्गुन नागपुर रहकर फ्रीलांस करते हैं. संपर्क: pushpendrafalgoun@gmail.com


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