आपातकाल : पुलिसकर्मियों की पत्नियां, बहनें, बेटियाँ, मायें कर रही हैं आन्दोलन: गिरफ्तार हो रहे पुलिसकर्मी


 छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह एवं उनके पुत्र अभिषेक के चुनावी क्षेत्र से जुड़े जिला मुख्यालय राजनाँदगांव में पिछले कुछ दिनों से छत्तीसगढ़ में पुलिसकर्मियों के परिवार आन्दोलन पर हैं, पुलिसकर्मियों में से कुछ को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है, कुछ बर्खास्त किये गये हैं. आज 25 जून को जब देश में इमरजेंसी लागू की गयी थी, उस दिन पुलिसकर्मी व्यापक आन्दोलन कर रहे हैं, वे एक दूसरे आपातकाल से गुजर रहे हैं. क्या है आन्दोलन की पृष्ठभूमि, कैसा है उनपर दमन का तरीका बता रहे हैं विवेक कुमार, वे इस आंदोलन को 2009 की एक घटना और 20 साल पहले थाने पर हुए हमले के बाद बर्खास्त पुलिसकर्मियों के संघर्ष की पृष्ठभूमि में भी देख रहे हैं: 


पुलिसकर्मियों के आन्दोलनरत परिवारवाले 

गत 18 जून को मुख्यमंत्री रमन सिंह
एवं उनके पुत्र अभिषेक के चुनावी क्षेत्र से जुड़ा जिला मुख्यालय राजनाँदगांव में पुलिस विभाग में कार्यरत कर्मचारियों-सिपाही, हवलदार, एएसआई, एसआई की पत्नियों और परिवार के सदस्यों ने एक सांकेतिक धरना प्रदर्शन किया जिसमे पुलिसकर्मियों के परिवार के सदस्यों की ओर से विभिन्न मांगों को लेकर मुख्यमंत्री के नाम   को  ज्ञापन सौंपा गया, इससे पहले 15 जून को बिना किसी संगठन के ही 25 जून को धरना प्रदर्शन की अनुमति बाबत डीएम तथा एसडीएम को पत्र के माध्यम से सूचना दी गयी। सूचना देते ही पूरे प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। प्रदर्शन की जानकारी सम्भवतः मुख्यमंत्री को तत्काल ही दे दी गयी थी। इसीलिए मुख्यमंत्री के निर्देश से सांकेतिक धरना प्रदर्शन के समय ही प्रशासन की ओर से उनके पंडाल आदि उखाड़ फेके गये। जिस वजह से पटवारी कार्यलय के सामने एकत्रित होकर एसडीएम कार्यालय तक रैली निकाल कर ज्ञापन सौंप कर अपना कार्यक्रम समाप्त कर दिया।

आंदोलन की महत्वपूर्ण कड़ी: 
परंतु अगले ही दिन उच्च पुलिस अधिकारियों द्वारा अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को दिशा निर्देश जारी कर दिए गए जिसमे आंदोलन में शामिल न  होने की बात कही गयी। तथा परिजनों को भी दूर रखने की शख्त हिदायत दी गयी । इसके पश्चात ही शाम तक मे आंदोलन भड़काने के आरोप में कई रिटायर्ड पुलिस कर्मियों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिन्हें बाद में कोर्ट से जमानत मिल गयी। अगली सुबह से पहले ही कई पुलिस कर्मियों को कारण बताओ नोटिस मिल चुकी थी तथा कई कर्मियों को बर्खास्त करने का आदेश भी जारी हो चुका था। इसी बीच मुख्य आन्दोलनकर्ता के रूप में राकेश यादव (पूर्व पुलिस कर्मचारी, इसी मामले में बर्खास्त) की पहचान की जा चुकी थी।

आंदोलन की निर्धारित तिथि 25 जून के पहले आंदोलन क्यों भड़का ??: 
पुलिस विभाग के आला अधिकारियों द्वारा अपने ही कर्मचारियों पर की गई इस सख्ती एवम बर्बरता से पूरे प्रदेश में पुलिश विभाग के कर्मचारियों में व्यापक असंतोष फैल गया। जिससे व्हाट्सएप, फेसबुक आदि के माध्यम से आंदोलन की व्यापकता और बढ़ गयी। हद तो तब हुई जब विभाग द्वारा अपने ही कर्मचारियों के फोन कॉल, व्हाट्सएप कॉल, मैसेज, लोकेशन आदि पर नजर रखी जाने लगी। अनुशासनहीनता मानते हुए  5 दिन के भीतर ही 3000 से ज्यादा लोगों को जवाब पेश करने का नोटिस जारी किया जा चुका एवं 300 से ज्यादा लोगों को बर्खास्तगी का तुगलकी फरमान जारी कर दिया गया, तथा 2 दर्जन से गिरफ्तारी भी की जा चुकी है। विदित हो कि यह पूरा का पूरा आंदोलन केवल पुलिस कर्मियों के परिजनों ( पत्नी, माता-पिता, बहन ) ही चला रहे थे इस आंदोलन में पुलिस कर्मी शामिल नही हैं, पुलिस कर्मी पहले ही की  तरह ड्यूटी कर रहें हैं।
आन्दोलन को समर्थन देने आगे आयी कांग्रेस 


आखिर क्या थी मांगे और माँगों का आधार ? कितनी जायज थी मांगे :

1. बुलेटप्रूफ जैकेट्स की मांग : अन्य राज्यों की अपेक्षा छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक जिले नक्सल प्रभावित हैं , ऐसे में आए दिन नक्सल वारदातें होती रहती हैं , पुलिस के जवानों को नक्सल मोर्चे पर जाना होता है ऐसे में जान का जोखिम सर्वाधिक है, कम संसाधनों की वजह से पुलिस मृत्यु दर छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा है और यही मोर्चे में असफल होने का कारण भी। सबसे ज्यादा जरूरी है ये मांग। 

2.  8 घंटे की ड्यूटी : पुलिस के जवानों का आने का तो समय तय है किंतु जाने का कोई समय नहीं, ज्यादातर थानों एवं चौकियों में स्टाफ की कमी की वजह से 12 से 18 घंटे काम लिया जा रहा जिससे वे न तो परिवार को समय दे पा रहे हैं और न ही अपने स्वास्थ्य को संभाल पा रहे हैं । सारे सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों को छोड़ कर 18 घंटे की कठिन ड्यूटी आखिर कोई कब तक करेगा।
3. उचित वेतन और भत्ते : छत्तीसगढ़ में पुलिस कर्मचारियों को अन्य राज्यों की अपेक्षा एक तिहाई ही वेतन मिलता है। जान की बाजी लगा कर ड्यूटी करने वाले पुलिसकर्मियों को यहीं के चपरासी भृत्य , चौकीदारों या अन्य चतुर्थ वर्ग कर्मचारी से भी कम वेतन मिलता है, जिसकी शुरुआत 15 हजार के तनख्वाह से होती है। इन्हें आज के जमाने मे साइकिल भत्ते के नाम पर 25 रुपये मासिक, वर्दी के नाम पर 60 रुपये, खानपान एवं पौष्टिक आहार के लिए 150 रुपये  मासिक मिलते हैं जो एक बेहूदा मजाक की तरह है ।
4. ड्यूटी पर मृत्यु में शहीद का दर्जा, उचित मुआवजा, एक सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति आदि जायज एवं प्रमुख मांगे हैं। 
छत्तीसगढ़ में इन्हीं बातों से आहत हो कर कई कर्मियों ने आत्महत्या जैसा कदम भी उठाया है ।

आंदोलन की पृष्ठभूमि: 
आंदोलन की वजहों को पहचानने के बाद इसकी पृष्ठभूमि पर जाते हैं; वर्ष 2009 में नक्सल प्रभावित राजनांदगांव जिले के सुदूर अंचल  मानपुर में  पुलिस नक्सली मुठभेड़ में एसपी सहित 3 दर्जन से अधिक पुलिस कर्मी मारे गए थे जिसकी मुख्य वजह बुलेटप्रूफ जैकेट्स जैसे संसाधनों की कमी थी। जिसके बाद एसपी को तो शहीद का दर्जा दिया गया उनके बेटे को डीएसपी की नौकरी भी तत्काल दे दी गयी। एसपी ऑफिस के सामने ससम्मान मूर्ति भी लगाई गई, किंतु अन्य शहीद नौजवानों को भुला दिया गया मृत्यु उपरांत भी उन्हें किसी वीरता पुरस्कार आदि से नवाजा नही गया, न ही उन्हें उचित सम्मान दिया गया। शहीद का दर्जा भी नही दिया गया। और न ही परिजनों की सुध ली गयी। न ही उचित एवं सम्मानजनक मुआवजा आदि दिया गया। इस मसले को जाति के कोण से भी देखा जा रहा था। माना जाता है कि मारा गया एसपी ब्राह्मण जाति से था। शायद इसलिए उसे सम्मान दिया गया। इस भेदभाव ने विभाग के कर्मचारियों में असंतोष पैदा किया। नक्सल मोर्चे पर रोज ही पुलिस कर्मियों की जानें जा रही हैं किंतु विभाग के रवैये में कोई सुधार आने का नाम ही नही ले रहा था। ऐसे में अनुशासन में बंधे जवान अपने दर्द को किससे बयान करें?

इससे पहले मानपुर में ही छत्तीसगढ़ निर्माण के पूर्व भी एक घटना हुई थी जिसे जनता ने तो भले ही भुला दिया हो पर शायद ही कोई पुलिस कर्मी भूला हो,  वह घटना है आज़ादी के बाद पहली बार पुलिस थाना लूटने की घटना! हाँ ये अपने तरह की पहली घटना थी जिसमें जान की हानि तो नही हुई थी किन्तु पूरा थाने का मालघर यथा सभी हथियार आदि नक्सलियों ने योजनाबद्ध तरीके से लूट लिया था, जिसकी भी मुख्य वजह संसाधनों व स्टाफ की कमी ही थी, किन्तु इसका भी दोष सरकार ने उन जवानों पर डाल कर पूरे थाने को बर्खास्त कर दिया था। इस घटना को भले ही आज 20 वर्ष हो गए हों किन्तु मुकदमे की लड़ाई बर्खास्त पुलिस कर्मियों ने पूरे 20 वर्ष तक लड़ी और अंततः फैसला पुलिस कर्मियों के पक्ष में ही आया। परंतु जबतक पुनः बहाली का आदेश आया तब तक ज्यादातर लोगों की उम्र रिटायरमेंट से पार हो चली थी। ऐसे में ये निर्णय कितना कष्टदायी रहा होगा उनके लिए जिन्होंने ये लंबी लड़ाई लड़ी होगी, नौकरी जाने के बाद घरबार बेच कर कानूनी खर्चों का निपटारा किया होगा और वर्षो एक मजदूर का जीवन यापन किया होगा। इन्ही दो घटनायों को जेहन में लेकर ही पुलिस कर्मियों के परिजन अपने मांगों को लेकर अंदिलंकारी बने।

अब जब ऐसे ही मामलों के बाद छुट्टी एवम उचित वेतन भत्ते को लेकर एक ज्ञापन मात्र को अनुशासनहीनता मानते हुए वर्षों पहले किसी पुलिसकर्मी  को बर्खास्त कर देना और अब उसी बर्खास्त कर्मी को मुख्य आंदोलनकर्ता मानते हुए गिरफ्तार कर लेना क्या पुलिस की दमनकारी नीति को साबित नही करता है? छत्तीसगढ़ पुलिस अपने दमनकारी नीति के लिए जग चर्चित थी ही अब अपने ही कर्मचारियों पर ये नीति अपना कर शासन ने तो अघोषित आपातकाल की स्थिति पर ला खड़ा किया है।गौरतलब है इस एक हफ्ते में गिरफ्तार सभी लोगों को कोर्ट ने जमानत पर रिहा तो कर दिया है परंतु इनकी गिरफ्तारी ने असंतोष को और ज्यादा बढ़ा दिया है।



देशद्रोह का मुकदमा 
आज की खबर अनुसार पूर्व में बर्खास्त (कथित अनुशासनहीनता के लिए) 3 कर्मियों को देशद्रोही, मानते हुए बड़े ही हाईटेक तरीके से गिरफ्तार कर लिया है। छत्तीसगढ़ के 30 से अधिक अन्य कर्मचारी संगठनों ने समर्थन की घोषणा की है। आंदोलन की तिथि 25 जून निर्धारित है , परन्तु इसके पहले ही इसे दबाने के लिए शासन ने एडी चोटी का जोर लगा दिया है, मीडिया को भी मौखिक हिदायत दे दिया गया है , राजा के आदेश की तरह पुलिस कर्मियों को अपने परिजनों को आंदोलन करने से रोकने एवं खत्म करने के लिए कहने कहा गया है , आंदोलन से दूर रहने कहा गया है,  समस्त जानकर लोगों को बर्खास्त कर लिया गया है। व्हाट्सएप करने को देशद्रोह की श्रेणी में रखा गया है। बात चीत द्वारा आंदोलन की चर्चा को भी अनुशासनहीनता माना गया है । परिजनों को धमकाने का काम जारी है। कई लोगों का आनन फानन में नक्सली क्षेत्र में स्थान्तरण का आदेश भी दे  दिया गया है। महिलाओं की तलाशी ली जा रही है, पुलिस परिजन होने पर थाने में ही पेशी ली जा रही है। फोन पर धमकाने की सीमा पार हो चुकी है। कई कर्मियों को मानसिक प्रताड़ना कर पागल बनाया जा रहा है ..पुलिसिया दमनकारी नीति पुलिस व उनके परिजनों पर ही अपना ली गयी है। आज आपातकाल की सी स्थिति निर्मित हो चुकी है।  पुलिसकर्मियों के परिजनों को आन्दोलन के लिए आने से रोका जा रहा है। गाँव-देहात, कस्बों से आने वाली हर गाडी रोक दी जा रही है, चेक की जा रही है।

आगे लिखने पर एनकाउंटर का पूरा खतरा उठाना होगा जिसकी स्थिति में अब बस्तरिया और नक्सल एवं आदिवासी क्षेत्र का पत्रकार नही है। माफी चाहता हूं पर आगे लिखने में मुझे भी डर लग रहा है जो सरकार अपने ही सैनिक पर संविधान खिलाफत की धारा लगाए वो सरकार हम अदलों का क्या करेगी जिंदा रहने पर आगे की खबर आगे जरूर भेजी जाएगी।

विवेक कुमार सामाजिक कार्यकर्ता हैं. 

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