रानी बेटी

प्रीति प्रकाश 

तेजपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधरत प्रीति प्रकाश की कहीं भी प्रकाशित यह पहली कहानी है. शारीरिक और आर्थिक रुग्णता की शिकार एक लडकी की यह कहानी उम्मीद है आपको निराश नहीं करेगी- न शिल्प के स्तर पर और न कथावस्तु के स्तर पर. 

“एक ,दो ,ढाई ...|”
“चावल तो ढाई डब्बे ही है | पर रोज तो तीन डब्बे बनते है |”
 आज खाना कैसे बनेगा?
कही किसी और डब्बे में हो ?
पुष्पा ने चादर उठाकर चौकी के नीचे झाँका ?
दो तीन डब्बे भी खीचे | पर चावल किसी में नहीं था |
“अब क्या करू ?” थोड़ी देर वैसे ही बैठे रही फिर जाने क्या सोच कर उठी और चावल धोने लगी | फिर तसली में लेवा लगाकर अदहन दे दिया |



जब से माँ काम करने जाने लगी है ,खाना बनाना पुष्पा का ही काम बन गया है | पहले माँ सब काम करती थी और पुष्पा स्कूल जाती थी | स्कूल की याद आते ही पुष्पा मुस्कुराई | कितना मजा आता था न तब | वह रोज खूब तैयार होकर पढने चली जाती | पढाई क्या खाक होती थी| दिन भर दोस्तों के बीच गपास्टिंग होती और कॉपियो पर मेहंदी के डिजाईन बनाये जाते| बिना बात के हँसी आती | सर डाँटते तो सब सहेलियां हसंती और सर अगर सीधे क्लास में आकर चुपचाप बैठ जाते तो भी सबको हँसी आती | अगर हसने के लिए सजा के रूप में क्लास के बाहर  सबको खड़े कर देते तो भी एक दूसरे के पीछे छुप छुप के हसंती |

पुष्पा को सच में हँसी आ गयी | हँसते-हँसते अचानक उठकर शौचालय चली गयी | पेशाब के साथ खूब  गिरा | आज उसका बीसवा दिन है माहवारी का | शायद कोई बीमारी है | कपड़ा पूरा गीला हो गया है | डोलची में से पुष्पा ने माँ की पुरानी साड़ी निकली | फाड़ कर उसे हो मोड़ कर ले लिया | जाने कौन सी बीमारी हो गयी है | अब उसका मन बेचैन हो गया है |

किसी तरह पुष्पा ने भात डभका दिया | चन्दन ,नंदन दोनों को खिला के खुद भी खा लिया |माँ वापस आई तो पुष्पा जैसे उनके ही इन्तेजार में बैठी थी | माँ को खाना परोस के वही बैठ गयी |
“माँ , चावल ख़तम हो गया है |”
“हूँ” माँ ने कहा और दो कौर खा कर पानी उठा कर पीने लगी |
“ माँ , आज भी बहुत खून गिरा है”
माँ चुपचाप बैठे रही |
“माँ लगता है डॉक्टर के यहाँ जाना पड़ेगा”
“अरे हा,सोनी की माँ बता रही थी कि सोनी को भी ऐसे ही था तब वो अडहुल का फूल पीस के पीई थी तो ठीक हो गया”
अचानक जैसे माँ को याद आया |
“रे नंदन,जाके कहीं से उड़हुल का फूल तोड़ के ले आओ |”
पुष्पा मन मसोसकर रह गयी | जब भी वो माँ से डॉक्टर के पास जाने के लिए कहती , माँ ऐसा ही कोई देसी नुस्खा बता देती | सब समझ रही थी पुष्पा |

जाने कितनी देर बाद चन्दन पोलोथीन में चावल लेकर आया | दरवाजा बंद था | बहुत देर तक दरवाजा बजाने के बाद भी जब नहीं खुला तब खिड़की के पास जाकर झाँका |
फिर जोर से चिल्लाया|



"बीसों बार समझा चुकी है माँ –“एक तो डॉक्टर के पास जाने का मतलब हजार रुपया का सूई ,दवाई | ऊपर से किसके साथ जाये | अगर पटीदार जान गया सब कि पुष्पा के माहवारी में खराबी है तो सात गाँव ढोल पीट देगा सब | बियाह काटने के लिए तो तैयार बैठा है सब | ई त किसी से होगा नहीं कि बाप नहीं है तो उहे लोग बाप भाई जैसा बनके लड़का खोज दे |'

अंतिम वाक्य चुभता है हमेशा,पुष्पा को | बाप है उसका | तो क्या अगर चार साल से घर नहीं आया | जिन्दा तो है अभी | पापा कहती थी उन्हें वह |  हमेशा से लगता है कि कभी अचानक ही आ जायेगे  | और सुबह जब पुष्पा सोकर उठेगी तो अंगनाई में बैठे दातुन करते मिलेंगे |
जब पुष्पा पाचवी में पढ़ती थी तो देखा था उन्हें  | वह सोके उठी तो वही अंगनाई में बैठे दातुन कर रहे थे |
“उठ गयी मेरी बेटी| बोल क्या खाना खाएगी आज |”
“पापा,आप कब आये |”
तब आया जब तुम सोयी थी नींद से |”
पापा ने उसका सर सहलाते हुए कहा और पुष्पा एकदम सीने से लग गयी |
आज भी बार बार वो वह सीना ढूढती है ,जिससे लगकर अचानक से वो राजकुमारी बन जाती थी |
पापा अपने साथ ढेर सारा सामान लेकर आये थे | चन्दन ,नंदन के लिए गाड़ी,पिस्तौल और उसके लिए सैंडल |
“पापा ये सैंडल तो बहुत बड़ा है”
उसने ठुनकते हुए कहा था |
“अच्छा मेरी रानी बेटी इस बार दूसरा सैंडल यही से खरीद देता हूँ | यह वाला जब तुम थोड़ी बड़ी हो जाना तब पहनना |”

दोनों बातें कभी नहीं हुई | ना पापा ने दूसरा सैंडल खरीदा और ना बड़ी होने के बाद उसने कभी उस सैंडल को हाथ लगाया | उस दिन कितनी खुश थी न वो |पापा आये थे,घर में मीट बना था | उसका नया सैंडल आने वाला था | ख़ुशी-ख़ुशी वह स्कूल गयी पर जब लौटी तो सब बदल गया था | पापा गली में शराब पीकर धुत्त चिल्ला रहे थे ,माँ दरवाजे की ओट में खड़ी रो रही थी और पूरा मोहल्ला तमाशा देख रहा था |
“साली, मैं रात दिन मेहनत करता हूँ,साहेब लोग की गलियां खाता हूँ और तू यहाँ दूसरे मर्द को घर में बुलाती है |”
“बेहया,लाज नहीं आती ,पति के पैसे किसी और पर उड़ाते |”
“टुकी,टुकी काट दूंगा तुझे |
“कुतिया कही की | रे कुत्ता भी तुझ से ठीक है |”
“पापा,” सहमते हुए पुष्पा ने कहा | पर पापा ने नहीं सुना | वो तो अपनी ही रौ में बोलते गए |
“जा , मर गयी तू मेरे लिए,मर गया मेरा परिवार, जा रहा हूँ मैं| नहीं आऊंगा कभी |”

और पापा चले गए | इस बार जो गए तो कभी नहीं लौटे | माँ कई दिन तक रोती रही | कोसती रही उसको जिसने पापा के कान भरे थे | फिर पापा को भी, जिन्होंने जाने किसकी बात पर भरोसा किया | कभी-कभी खुद को भी कोसती कि वह क्यों बूत बनी खडी रह गयी उस दिन |जाकर हाथ पकड़ कर रोक लेती | पापा को कई बार खोजने की भी कोशिश की | पर शायद पापा ने फ़ोन नंबर के साथ साथ पता भी बदल दिया | तब तो दर्जनों चिट्ठियाँ भेजने के बाद एक बार भी जवाब नहीं आया |
अचानक माँ उठने लगी तो पुष्पा को ध्यान आया |
“माँ ,तुमने आधा क्यों खाया ?”
“अरे , पेट भर गया | इतना ज्यादा तुमने परोसा था | मैं क्या भैस हूँ |”
माँ ने हसंते हुए कहा | माँ हसंते हुए भी कैसे दिखती है न| लगता है रो रही है |
“नहीं माँ,ज्यादा नहीं है|”
“बैठो”
“ हम सब ने खा लिया है | बस तुम्ही बाकी थी |”
पुष्पा ने मानो हुकुम देते हुए कहा | फिर हाथ पकड़कर जबरन बिठा दिया |
“अच्छा,ठीक है | तू मानेगी नहीं |”
“जा, जरा जाके आचार ले आ |”
“नहीं ,नहीं, तू नहीं ला |
“चन्दन , जरा तू डब्बे से अचार निकाल के तो दे|”
चन्दन आचार निकाल के देने लगा तो पुष्पा उठी | एक बार मुड कर माँ को देखा | माँ अभी भी सर झुकाए बैठी थी | वह जब माँ को देखती है तो सोचती है कि क्या ऐसा ही भावहीन चेहरा शुरू से माँ का था ?

पहले उसे माँ पर गुस्सा आता | पापा तो अच्छे भले थे , जब वो उन्हें छोड़कर स्कूल गयी थी , पता नहीं माँ ने क्या कहा कि पापा यूं रूठकर चले गए | पर अब उसे माँ पर जरा भी गुस्सा नहीं आता | पापा तो चले गए ,पर माँ ,वो तो कही नहीं गयी | चाहे लाख मुसीबत आये वो बच्चो के साथ ही रही | पापा ने गुस्से से जाने के बाद घर में एक रुपया भी नहीं भेजा | माँ ने घर चलाने के लिए घर घर बर्तन मांजने का काम पकड़ लिया | चन्दन नंदन प्राइवेट स्कूल से सरकारी में आ गए और वह सरकारी स्कूल से सीधे घर आ गयी | माँ दूसरो के घर काम करती और वह अपने घर | खेल , तमाशे,स्कूल ,सहेलियां,और बिना वजह की बातें, सब जाने कहाँ छूट गयी | अब तो उसे बातें करना बिलकुल अच्छा नहीं लगता |
चन्दन,नंदन तो दिन भर बाहर गिल्ली ,डंडा खेलते है,माँ से कुछ कहो तो हाँ,हूँ में जवाब देती है| मोहल्ले में किसी के घर जाओ तो पहला सवाल करते है –
“बेटी ,पापाजी के बारे में कुछ मालूम चला?” और फिर इतना अफ़सोस जताते है जैसे सारी मुसीबत उन्ही के घर आयी है |
“ओह”

अचानक पुष्पा को फिर से पेशाब जैसा महसूस हुआ और खून कपडे को तर करता हुआ सलवार तक पहुँच गया |
किसी तरह पुष्पा उठी | फिर से दूसरा कपड़ा लिया | हाथ पैर पोछे | माँ जा चुकी थी |सुबह शाम दोनों वक़्त लोगो के घर काम करती है माँ | पुष्पा के लिए लड़का भी देखा है | उसकी शादी के लिए ही इतना काम करती है |
रात होने तक पुष्पा को कई बार कपडे बदलने पड़े | नंदन का लाया अड हूल पीस कर पी लिया|पर  कोई फायदा नहीं हुआ | रात को पुष्पा माँ के पास सोयी तो रोने लगी |
माँ भी रोने लगी |रोते हुए कहा –
 “क्या जाने भगवान् कौन परीक्षा ले रहे है ? आज मेधा का छेका था | उसी का पूड़ी सब्जी भेजी है | क्या जाने हमारे घर में शुभ काम कैसे होगा ?”
फिर पुष्पा को और सीने से लगा लिया |
“ऐ बेटी, तुम मत रोना | तुम्हारे लिए ही तो हम जिन्दा है | खूब सुन्दर लड़का से हम शादी करेंगे तुम्हारा |”
पुष्पा को और रोना आया | रोते-रोते वह सो गयी | सुबह उठी तो माँ जा चुकी थी |
बिछावन पर दाग लग गया था | पुष्पा ने अपने कपडे बदले | फिर अपने कपडे धोये | फिर चादर धोया | अभी नहा के बैठी ही थी कि मेधा की मम्मी आ गयी छेका का पकवान लेकर |
“ तब न तुम्हारी माँ साफ बेचैन रहती है | ताड जैसा देह भाग गयी  है | “
पुष्पा को देखते ही मेधा की माँ शुरू हो गयी |
“कलप रही थी बेचारी,कह रही थी कि खाली पुष्पा का दिन रात चिंता लगा रहता है |”
“के जाने कौन जनम का पाप है कि बेचारी इस जनम में भी भोग रही है |”
“मानता है सब लड़का वाला?, पचास हजार रुपया और एगो हीरो हौंडा दिए है तब जाके शादी के लिए तैयार हुआ है सब | छेका और बियाह का खर्चा अलग से |”
मेधा की माँ चली गयी | पुष्पा सोचने लगी माँ कहा से लाएगी उतना रुपया | डॉक्टर के पास जाने भर तो रुपया नहीं है |
पीरियड्स के दौरान एकाकी जीवन को बाध्य महिलायें 


सारा कपड़ा फिर भर गया पुष्पा का | जाकर डोलची में देखा तो अब एक भी पुरानी साड़ी नहीं बची थी | साफ़ घिना गया था पुष्पा का मन इस बीमारी से | माँ का बक्सा खोला पुष्पा ने | ऊपर ही एकदम नयी साड़ी रखी थी | पापा लाये थे यह साड़ी माँ के लिए | माँ ने एक बार भी नहीं पहनी है | कहती है कि जब उसकी शादी होगी तो उसी को दे देगी |
“हूँ”
“शादी तो तब होगी न जब माँ के पास पैसे होंगे”
जाने क्या हो गया पुष्पा को , खुद से ही बतियाने लगी |
“पैसा जोड़ते जोड़ते माँ ही मर जायेगी |”
“हूँ”
बक्सा में ऊपर से नीचे तक देखा | एक भी कपड़ा ऐसा नहीं जो फाड़कर वो माहवारी में ले ले |
“हूँ”
“मर तो मैं रही हूँ इस बीमारी से”

जाने कितनी देर बाद चन्दन पोलोथीन में चावल लेकर आया | दरवाजा बंद था | बहुत देर तक दरवाजा बजाने के बाद भी जब नहीं खुला तब खिड़की के पास जाकर झाँका |
फिर जोर से चिल्लाया|
सब मोहल्ले वाले दौड़े | कुछ मजबूत शरीर वालो ने दरवाजा धक्का देकर तोड़ दिया |
अन्दर पंखे से पुष्पा झूल रही थी | सलवार पखाना,पेशाब और खून से भरा था |गले में एकदम नयी साड़ी का फंदा पड़ा था |

प्रीति प्रकाश की यह कहीं भी प्रकाशित पहली कहानी है. वे फिलहाल तेजपुर विश्वविद्यालय में शोधरत हैं. 



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