नीरजा हेमेन्द्र की कविताएं ( स्त्री होना और अन्य)

नीरजा हेमेन्द्र


विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित.उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा सम्मानित. संपर्क: neerjahemendra@gmail.com 

स्त्री होना
अभिशाप नही है स्त्री होना
स्त्रियों की उड़ान होती है
दृढ़, ऊँची, सपनों-सी सतरंगी
वह उड़ सकती है बचपन में
छोटे भाई को गोद में लेकर
सपने दिखाती सुखद लोक की ओर
वह पूर्वजों की अनमोल धरोहर से
सृजित कर सकती है स्वर्णिम इतिहास
स्त्री होना अभिशाप नही है
उसके पंख उसे ले जाते हैं ग्रहों और नक्षत्रों तक
दृष्टि भेदती है धरती का अन्तःस्थल
निकाल लाती है खनिज-रत्न उसके गर्भ से
सजाती है भविष्य
अलंकृत करती है नवीन पीढियाँ
गढ़ती है इतिहास
स्त्री के बिना घर
दीवारों से घिरा भूखण्ड है
संवेदनहीन...सारहीन
स्त्री होना अभिशाप नही है
इच्छाओं के पंखों पर उड़ कर
बाँध सकती है वह
अश्वमेध का अश्व सूर्य तक
स्त्री सम्पूर्ण है

प्रतिद्वन्दी नही तुम मेरे 

मैंने कभी नही चाहा कि
तुम मेरे प्रतिद्वन्दी बनों
या करूँ मैं तुम्हारा विरोध
तुम्हारे बिना अपने अस्तित्व की कल्पना
मैंने कभी नही की
आखिर तुम्हीं ने तो भरी थी
बाल्यावस्था में
मेरे पंखों में उड़ान
दी थी इच्छाओं को हवा
मैं उड़ती रही सपनों के साथ
तुमने क्यों नही अवगत् कराया कि,
पुत्री! सपनों के साथ उड़ना
तुम्हें कर सकता है आहत
किशोरवय छोड कर
जब मैंने पाया तुम्हें
परिवर्तित हो चुका था स्वरूप तुम्हारा
मेरी कल्पनाओं में बसा था
पिता-सा स्वरूप तुम्हारा
तुम्हारी दुनिया में मैं भरूँगी
नभ से लाकर इन्द्रधनुष के सात रंग
मेरे पैरों को बेड़ियों में मत जकड़ों
मैं तुम्हारे साथ चलूँगी
धूप में भी, छाँव में भी
मेरे सह-पथगामी
पथ के अन्तिम पड़ाव पर
मुझे तुम्हारा थोड़ा-सा सम्बल चाहिए
ओ पुत्र मेरे!
मेरी वो मजबूत बाँहें अब थरथराने लगी हैं
जिन्होंने तुम्हे गोद में उठाया था
काँपने लगी हैं मेरी वो बूढ़ी उंगलियाँ
जो तुम्हे खिलाती थीं रोटियाँ
जब तुम हठ कर बैठते थे बचपन में
भोजन न करने की
मुझे वृद्धाश्रम में नही
तुम्हारे घर में, तुम्हारे हृदय में
थोडा़-सा स्थान चाहिए
अन्तिम पड़ाव समीप है मेरे पुत्र!
मैं न होती तो क्या तुम्हारा अस्तित्व होता?
तुम्ही बताओं मेरे पिता, मेरे पति, मेरे पुत्र
तुम न बनों मेरे प्रतिद्वन्दी, मेरे विरोधी
मेरी सम्पूर्णता को तुम
चुनौती नही दे सकते
मैं स्त्री हूँ
मैं अविजित थी, हूँ, और रहूँगी
तुम मेरे प्रतिद्वन्दी नही
नही करना मुझे तुम्हारा विरोध.

औरत होने का अर्थ 
अब जब कि.......
खोल लिये हैं मैंने अपने नेत्र
बाँध ली हैं मुट्ठियाँ
विस्मृत कर चुकी हूँ
अतीत के पीड़ादायक दिन
जब सपनों की उन्मुक्त उड़ान को
बन्द कर अपनी नन्हीं हथेलियों में
दौड़ती-फिरती थी तुम्हारी ही दुनिया के इर्द-गिर्द
औरत होने का दर्द
औरत होने से पूर्व
समझने की पीड़ा लिए मैंने
अनेक सर्द चाँद टाँक लिए थे
अपने आसमान पर
देख कर तुम्हारा छद्म शक्तिशाली रूप
अपनी नन्हीं मुट्ठियों में भर ली है ऊष्मा
सर्द चाँद परिवर्तित होने लगे हैं
लगने लगे हैं कुछ-कुछ सूर्य जैसे
अपनी शक्ति का आकलन किया है मैंने
और पाया है मेरे बिना तुम कुछ भी नही
अनेक रिश्तों की गाँठे खोलती
बाँध ली हैं मुट्ठियों में
अपनी पहचान, अपनी अस्मिता
अबला नही हूँ मैं
औरत होने का अर्थ है
बँधीं मुट्ठियाँ, स्वप्निल नेत्र
बहती नदी, और आग
मेरी यात्रा 
कितनी कठिन थी
बच्ची से युवा होने तक की मेरी यात्रा
मेरे जन्म लेना भी तो उतना ही कठिन था
मैंने तय की वो यात्रा
अनेक रिश्ते बिखरे थे मेरे चारों ओर
अपने थे....उनके नाम भी थे
मैं अनभिज्ञ थी इस सत्य से
कि मैं एक स्त्री हूँ
कि मेरी देह ही मेरी पहचान है
मैं खिलती रही निर्जन में खड़े अमलतास के पुष्पों-सी.....
टूट-टूट कर बिखरती रही भिम पर
कभी तुम्हारी दृष्टि.....
तो कभी तुम्हारी उंगुलियों के
घृणित स्पर्श से सिसकता
व्यतीत होता मेरा लहूलुहान बचपन
मुझे स्त्री होने का अपराधबोध कराता रहा
मेरा स्त्री होना अपराध है...?
तुम्हारा पुरूष होना तुम्हारी सार्वभौमिकता....?
तपिश से दृढ़ हो चुके अमलतास के वृक्षों ने
सूने पथ पर अंकित कर दी है अपनी उपस्थिति
तुम्हारी उगुलियों का घृणित स्पर्श अब नही सहेंगी
मेरी देह की गोलाईयाँ
मुझे जीना सिखा दिया है
धूप ने....शीत ने....आँधियों ने
तार-तार होते रिश्तों से
मैंने बना लिया है एक फौलादी पुल
जिससे हो कर गुजरेंगी आने वाली पीढ़ियाँ
बच्चियाँ देंगी तुम्हारी सत्ता को चुनौती
ललकारेंगी तुम्हारे उस पुरूषत्व को
जिसे बेटियां दिखती हैं मात्र देह की शक्ल में.

तस्वीर गूगल से साभार 

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