नये पेशवाओ की नई थ्योरी ‘अर्बन माओइस्ट’

सीमा आज़ाद 


 सीमा आज़ाद  सामाजिक कार्यकर्ता एवं साहित्यकार हैं. संपर्क :seemaaazad@gmail.com

6 जून 2018 को सुबह ही यह खबर देश भर में फैल गयी कि देश के दो राज्यों से कुल पांच लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। इन गिरफ्तार लोगों में एक वकील, एक प्रोफेसर, एक सम्पादक व संस्कृतिकर्मी, एक जेएनयू स्कॉलर राजनीतिक कार्यकर्ता, और एक ज्प्ैै स्कॉलर विस्थापन विरोधी मोर्चे से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता हैं। इन पांचों की गिरफ्तारी के लिए कारण बताया गया कि ये लोग 1 जनवरी को पुणे के भीमा कोरेगांव की जुटान के आयोजक थे। हर किसी को यह बात आश्चर्य भरी लगी, लेकिन इस ‘कारण’ ने भीमा कोरेगांव के आयोजकों द्वारा सरकार को दिया गया नाम ‘नवी पेशवायी’ यानि नया ब्राह्मणवाद को सही साबित कर दिया। बदले में इस नयी  पेशवाई ने दलित स्वाभिमान के लिए सक्रिय इन पांचों को नाम दिया- ‘अर्बन माओइस्ट’ यानि शहरी माओवादी। यह नाम देकर उसने फिर से जाहिर कर दिया कि यह नयी पेशवा सरकार इस बार वर्णव्यवस्था और अर्थव्यवस्था के पायदान पर नीचे ढकेले गये लोगों पर वर्चस्व बनाये रखने के लिए इसी नामकरण के सिद्धांत पर चलेगी-‘अर्बन माओवादी’ या ‘रूरल माओवादी, ‘कस्बाई माओवादी’ और ‘भूमिगत माओवादी।’

पृष्ठभूमि 
लेकिन सबसे पहले चर्चा इस पर कि आखिर जनवरी में हुए भीमा कोरेगांव के आयोजन से सरकार इतना क्यों डर गयी, कि उसने पहले ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां कीं, फिर ‘अर्बन माओइस्ट’ का शब्दजाल फेंका और फिर उनसे प्रधानमंत्री की हत्या की योजना भी बनवा डाली? इसके लिए हमें इसकी पृष्ठभूमि में जाना होगा।
31 दिसम्बर और 1 जनवरी जब नये साल का आगमन हर साल की तरह ही होना था, उसी समय महाराष्ट्र के पुणे जिले से 40 किमी दूर कोरेगांव में एक इतिहास को याद करने के लिए एक और इतिहास दोहराया जा रहा था। जिस इतिहास को याद किया जा रहा था, वह था 200 साल पहले भीमा कोरेगांव में हुआ वह युद्ध, जिसमें मुख्यतः महार सैनिकों की सेना ने  पेशवाओं की सेना को जबर्दस्त हार का मजा चखाया था। उस पेशवा राज की  सेना को, जिसमें महारों को मनुवादी वर्णव्यवस्था के नियमानुसार ‘अछूत’ माना जाता था। पेशवाओं के लिए ये इतने अछूत थे कि इन्हें सवर्णों द्वारा सिर्फ छूना ही मना नहीं था, बल्कि सड़क पर चलते समय इन्हें अपने पीछे एक झाड़ू और गले में एक हांडी लटकानी पड़ती थी, ताकि जिस रास्ते से ये चलें, पीछे बंधी झाड़ू उस स्थान को ‘स्वच्छ’ बनाती जाये, और चलते समय यदि महारों के मुंह में लार या थूक आ जाय, तो उसे ये सड़क पर न थूक, हांडी में थूकें ताकि रास्ता ‘पवित्र’ बना रहे। यह सब उस समय के पेशवाओं का ‘स्वच्छ भारत अभियान’ था, (जो आज के पेशवाओं द्वारा दलितों को बस्तियों से भगाने में बदल गया है)। पेशवाओं के खिलाफ या उनके द्वारा वर्जित किये गये शब्दों या वाक्यों को बोलने वाले महारों का सिर कलम कर उसे पेशवा फुटबाल की तरह खेलते थे, ताकि बाकी महारों में ऐसा करने का खौफ भरा जा सके। और यह सब मात्र सामाजिक धर्म का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह बाकायदा राजकीय धर्म और कानून था (उस समय की पेशवाई और नयी पेशवाई की सत्ता में बस इतना ही फर्क है)

गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए एक पोस्टर 


पेशवाओं का क्रूर समय का प्रतीक विजय 
स क्रूर समय को समझे बगैर भीमा कोरेगांव के इस युद्ध और इसमें महारों की उपलब्धि को नहीं समझा जा सकता। दरअसल महारों ने यह युद्ध अंग्रेजों के नेतृत्व में लड़ा था, इसलिए पेशवा मानसिकता के लोग इस तथ्य की आड़ में इसके महत्व को कम करने का प्रयास करते हैं। वास्तव में इस युद्ध का यह महत्व है कि इसने वर्णव्यवस्था के समर्थकों और संरक्षकों के इस दंभ को तोड़ दिया था कि युद्ध लड़ना और उसमें विजय हासिल करना सिर्फ क्षत्रियों का कर्म है, पेशवाओं का राज करना और शूद्रों का कर्म सिर्फ सेवा करना है। इस युद्ध के परिणाम ने मनुवादी वर्णव्यवस्था के पोषक पेशवा राज का दंभ तोड़ दिया था साथ ही शूद्रों को आत्म सम्मान से भर दिया था। इस युद्ध में शहीद हुए महार और अन्य सैनिकों (जिसमें मुसलमान भी थे) की याद में अंग्रेजों ने एक ‘विजय स्तंभ’ का निर्माण कराया और उस पर उनका नाम भी खुदवाया, जिसे आज भी पढ़ा जा सकता है । बाद में इस स्तंभ को डा भीमराव अंबेडकर ने ‘शूद्रों का प्रेरणा स्तंभ’ कहा, उन्हें उनकी शक्ति का एहसास कराने वाला ‘शौर्य स्तंभ’। जो लोग भी इसे अंग्रेजों के पक्ष में किया गया युद्ध कहकर इसकी आलोचना करते हैं, उनके लिए यहां बस एक बात- अंबेडकर लगातार कहते और लिखते रहे कि यदि भारत से मनुवादी वर्णव्यवस्था का खात्मा नही हुआ, तो अंग्रेजों के जाने से भी शूद्रों की गुलामी की अवस्था पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। और हम यह देख रहे है कि अंग्रेज चले गये, लेकिन शूद्र जातियों की स्थिति में मामूली बदलाव ही हुये हैं, क्योंकि मनुवादी वर्णव्यवस्था अंग्रेजों के जाने के बाद भी बनी हुई है। सवर्णों के लिए आजादी की लड़ाई का आयाम इकहरा था, लेकिन अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए इस लड़ाई का आयाम दोहरा था। इस सन्दर्भ में भीमा कोरेगांव का 200 साल पुराना यह युद्ध वास्तव में मनुवादी वर्णव्यवस्था को टक्कर देने वाली एक छोटी सी लेकिन महत्वपूर्ण घटना थी।

अंबेडकर द्वारा इस स्थान का महत्व याद दिलाये जाने के बाद यहां हर वर्ष इन तारीखों पर सैकड़ों का जमावड़ा होता है, जो इसे ‘शौर्य दिन’ के रूप में याद करते और मनाते हैं। इस साल क्योंकि इसके 200 साल पूरे हो रहे थे, इसलिए एक बड़े जमावड़े की योजना बनी। योजनाकर्ता संगठनों की तादाद भी 200 के आसपास ही थी, जिसमें अधिकतर दलित संगठनों के अलावा पिछड़ी जातियों के संगठन, सांस्कृतिक संगठन, महिला संगठन, आदिवासी संगठन और विभिन्न मुद्दों पर काम करने वाले कई जनवादी संगठन शामिल थे। ये सभी ‘एल्गार परिषद’ के नाम से एकजुट हुए। इसके कई प्रमुख आयोजकों में एक थे सुधीर ढावले, (जिन्हें 6 जून को गिरफ्तार किया गया) और हर्षाली पोतदार (जिसके घर पर 17 अप्रैल को तलाशी अभियान किया गया)। आयोजन के वक्ताओं में कई प्रतिष्ठित लोगों के साथ शोमा सेन भी थी।(जिनका नाम 17 अप्रैल की एफआईआर में नहीं होने पर भी 6 जून को घर पर घण्टों तलाशी ली गयी और फिर गिरफ्तार कर लिया गया)।

जैसाकि पहले कहा गया है इस बार के भीमा कोरेगांव जुटान का नारा था ‘नयी पेशवाई को ध्वस्त करो’। इस आयोजन और जुटान दोनों में गड़बड़ी पैदा करने के लिए सरकार ने और उसकी पेशवा राज के संगठनों ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। पहले तो लोगों को यहां इकट्ठा होने से रोकना शुरू किया लोगों की बसों को भीमाकोरेगांव के स्तंभ तक पहुंचने के कई किलोमीटर पहले ही उनकी बसों को रोक दिया गया। फिर भी भीड़ की संख्या लाख तक जा पहुंची। इसके बाद सरकार के समकक्षी साम्प्रदायिक मनुवादी संगठनों ने आने वालों को रोकने के लिए बलवाई गतिविधियों का सहारा लेना शुरू कर दिया। लोगों को मारना, उन पर हमले करना, बसों या उनकी सवारियों में आग लगाना, जिससे अफरा-तफरी का माहौल का माहौल बन गया। यह बलवा कराने में हिन्दूवादी संगठनों के दो नेता मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिंडे की अहम भूमिका है, इन्होंने अपने भाषणों में खुलेआम मनुवादी सवर्णों से शूद्रों के खिलाफ हिंसात्मक कार्यवाही की अपील की, उनके भाषण के वीडियों अभी भी यूट्यूब पर सुने जा सकते हैं। बलवा कराने के लिए इन दोनों पर एफआईआर भी दर्ज करायी गयी, लेकिन इनमें केवल मिलिंद एकबोटे की गिरफ्तारी ही हुई वो भी काफी धरना-प्रदर्शनों के बाद, लेकिन जल्द ही वो जमानत पर रिहा भी हो गया। भिंडे पर तो आंच भी नहीं आयी क्योंकि वो प्रधानमंत्री नरेन्द्रभाई मोदी का प्रेरणास्रोत है, इसका ऐलान मोदी जी ने खुद खुलेआम किया है।(इसके बाद भी किसी को इस सत्ता के ‘नयी पेशवाई’ होने में शक नहीं होना चाहिए)। आयोजन में आने से रोकने के लिए हिन्दूवादी संगठनों ने हिंसा का सहारा लिया, दूसरी ओर भीमा कोरेगांव में आयोजन सफलता पूर्वक सम्पन्न हो गया, फिर भी सरकार ने आयोजन के जुटान में हुए बलवे का ठीकरा ‘एल्गार परिषद’ पर ही फोड़ना चाहा।  लेकिन भिंडे और एकबोटे की ‘हेट स्पीच’ वायरल होने और पुणे के बलवे का स्रोत सभी के सामने आ जाने और इन दोनों के साथ अन्य कई दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो जाने के कारण नये पेशवाओं को मामला हाथ से निकलता दिखने लगा। मार्च तक एकभोटे की जमानत होने और उसके जेल से निकलने तक उनकी ओर से चुप्पी रही, और उसके बाद फिर सभी चीजें नयी पेशवाई के पक्ष में पलटनी शुरू हो गयीं।

अप्रैल की एक घटना, जिसके बाद पुलिस दूसरी दिशा में सक्रिय हुई 
अप्रैल में अचानक खबर आयी कि हिन्दूवादी संगठनों द्वारा बलवा करने वालों की हरकतों की मुख्य चश्मदीद गवाह 19 वर्षीय किशोरी जो कि बलवे के बाद से पुणे के पुनर्वास केन्द्र में रह रही थी, पास के कुएं में मरी हुई पायी गयी। घर वालों द्वारा इसे हत्या का मामला बताने के बाद भी पुलिस इसे आत्महत्या का मामला बताती रही। 17 अप्रैल को भोर में ही सुधीर ढावले के मुम्बई स्थित ऑफिस/घर पर, हर्षाली पोतदार के घर पर, भीमा कोरेगांव के आयोजक संगठनों में एक कबीर कला मंच के जिम्मेदार लोगों के घर पर, नागपुर में वकील सुरेन्द्र गाडलिंग के घर पर और दिल्ली में रोना विल्सन के घर पर घण्टों तलाशी अभियान चलाया गया (वास्तव में पुलिसिया तलाशी अभियान को ‘डाका अभियान’ कहना अधिक उचित है, क्योंकि पुलिस हमेशा ऐसे अभियानों में घर में रखे कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल फोन, इलेक्ट्रानिक संचार माध्यम, महत्वपूर्ण किताबें, आवश्यक दस्तावेज और सारे रूपये-पैसे लेकर चली जाती है, अब के सभी तलाशी अभियानों में उसने यही किया है)। इस ‘डाका अभियान’ के बाद भिंडे और एकबोटे और उसके साथियों पर बलवा करने के लिए मुकदमा चलाने की बजाय सरकार ने इन सभी पर भीमाकोरेगांव के ‘आयोजन के लिए’ एफआईआर दर्ज कर लिया। इसके बाद डेढ़ महीने खामोश रहने के बाद उसने 6 जून को एक नये खुलासे के साथ इन सभी को, साथ ही एफआईआर के बाहर के दो अन्य लोगों शोमा सेन और महेश राउत को गिरफ्तार कर लिया। पहले कहा गया कि भीमाकोरेगांव के आयोजन के  ये दोषी हैं। इस बात से जब देश के दलित और पिछड़ी जातियों के संगठन में रोष फैलने लगा, तो कहा गया कि ये लोग ‘अर्बन माओवादी हैं, जिन्हें कोरेगांव के आयोजन के लिए माओवादियों ने पैसा सप्लाई किया, जब यह बात भी लोगों को नहीं पची और विरोध-प्रदर्शनों की लहर तेज होने लगी, तो कहा गया कि ये लोग ऐसे माओवादी हैं, जो प्रधानमंत्री को राजीव गांधी की तरह (आत्मघाती बम से) मारने की योजना बना रहे थे, और माओवादियों के लिए 80 हजार के हथियार भी खरीदने वाले थे। यह कहने के साथ पुलिस ने एक चिट्ठी भी जारी कर दी, जिसे कि दिल्ली के रोना विल्सन के कम्प्यूटर पर पाया जाना बताया गया। इसमें वहीं बातें लिखी हुई हैं, जो पुलिस ने पहले बतायी थी (इसकी उलट बात कि पत्र में जो लिखा था, वही पुलिस ने बताया सही नहीं है, बहुत से तथ्यों से पत्र के झूठा होने का खुलासा हो जाता है)। इस पत्र, जो कि ‘केस प्रापर्टी’ है का पुलिस द्वारा यूं मीडिया में जारी करना गैरकानूनी तो था, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे पढ़कर इसकी विश्वसनीयता पर गम्भीर सवाल उठने लगे।

एल्गार परिषद में उपस्थित सामाजिक कार्यकर्ता बायें से जिग्नेश मेवानी, विनय, राधिका वेमुला, सोनी सोरी, उमर ख़ालिद


पत्र पर सवाल 
पहली बात तो यह कि माओवादी ऐसी योजनायें यूं पत्र लिखकर कबसे बनाने लगे? दूसरा ये कि माओवादी कभी आत्मघाती हमले नहीं करते, वे इसकी राजनीति में यकीन ही नहीं करते और आज तक उनका ऐसा कोई रिकॉर्ड भी नही है, इसी से इस पत्र के फर्जी होने की बात उजागर हो जाती है।  लगता है राजीव गांधी टाइप हत्या की बात जोड़ने वाले ने सोचा होगा कि यह लिखने से कांग्रेसियों और विपक्षी दलों का मुंह भी इनके समर्थन में बन्द किया जा सकेगा। जाहिर है यह पत्र छोटे पद पर बैठे किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि राजदरबार में बैठे शातिर दिमाग आदमी की शातिर योजना है।

‘अर्बन माओवादी थ्योरी’ दमन के हथियार के तौर पर
 सरकार द्वारा प्रचारित ‘अर्बन माओवादी’ शब्द इस सन्दर्भ में भ्रमित करने वाला है कि इस सरकारी जुमले में यह निहित है कि ‘अब तक माओवाद केवल रूरल यानि ग्रामीण क्षेत्र तक ही सिमटा था, अब यह शहरी भी हो गया।’ जबकि सच्चाई यह है कि भारत में माओवाद अपने जन्म नक्सलबाड़ी आन्दोलन के समय से ही ऐसे किसी बंटवारे में नहीं बंटा है। उस समय भी शहरों में पढ़ने वाले छात्र-छात्रायें इस आन्दोलन से प्रभावित हुए और इसका हिस्सा बने, इस पर ढेरों उपन्यास, कहानियां भी लिखे गये और फिल्में भी बनी हैं। कोलकाता का प्रेसीडेंसी कॉलेज इस आन्दोलन से इतना प्रभावित था कि आन्दोलन के उफान के दौरान तीन साल तक कॉलेज बन्द रहा। वर्तमान माओवादी पार्टी के नेतृत्व में भी शहरों में अपना छात्र जीवन बिताने वाले तमाम लोग हैं, जिनकी जानकारी खुद सरकारी खुफिया विभाग ही समय-समय पर देता रहता है। लेकिन सरकार इस मामले को इस तरीके से प्रचारित कर रही है, जैसे माओवादी आन्दोलन पहले जंगल और गांवों तक सिमटा था और अब वहां से निकल कर शहरों में आ गया है, इसलिये यह बहुत ही खतरे की बात हो गयी है। जबकि सच्चाई यह है कि माओवाद शहरों से लोगों को प्रभावित कर जंगलों और गांवों की ओर भी ले जाता रहा है। वास्तव में इस नामकरण द्वारा सरकार शहर में होने वाले आन्दोलनों को सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत करने के प्रयास में है। और यह प्रयास चिदम्बरम के गृहमंत्रित्वकाल से ही शुरू हो गया है।

भीमा कोरेगांव पहला मामला नहीं है, जिसका सरकार ने शहरी माओवादियों द्वारा आयोजित करने के नाम पर दमन किया गया। जैसे-जैसे जनता का आक्रोश बढ़ता जा रहा है और इसे संभालना सरकार के हाथ से बाहर होता जा रहा है, वह उसके दमन के लिए ऐसे ही नाम से सम्बोधित करती है। इसके बाद बहस इसके इर्द-गिर्द केन्द्रित होने लगती है कि ‘मामला माओवादियों से जुड़ा है या नहीं’। खासतौर से ‘गोदी मीडिया’ के माध्यम से इस बहस को हवा भी दे दी जाती है। इस ‘गोदी मीडियाई’ हवा में  यह बहस ही गायब हो जाती है कि जिस व्यक्ति या आन्दोलन पर दमन हुआ, वह क्या था और कैसा आन्दोलन था।
येल्गार परिषद के आयोजकों में से एक डा  बाबासाहेब अम्बेडकर के प्रपौत्र प्रकाश अम्बेडकर


दलितों-पिछड़ों के हर संघर्ष को नक्सलवादी कह देने का रिवाज 

पिछले कई सालों से खासतौर पर 2014 से, मनुवादियों-ब्राह्मणवादियों के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधियों के सत्ता में आ जाने के बाद से दलितों-पिछड़ों पर हमले बढ़े हैं। लेकिन दमन हमेशा डराता नहीं है, यह क्रोधित भी करता है इस कारण प्रतिरोध भी उतना तीखा होता जा रहा है, जिससे नये पेशवाओं की बौखलाहट बढ़ती जा रही है, लेकिन आज के समय के इन पेशवाओं की समस्या यह है कि ये शूद्रों या पिछड़ी जातियों को ‘शूद्र‘ ‘नीच’ या  ‘अछूत’ कहकर या इस नाम पर उनका उत्पीड़न नहीं कर सकती। इसलिए वे पहले उन्हें नया नाम देते हैं-‘माओवादी’ या ‘नक्सलवादी’। इस नामकरण के बाद इन पर दमन करना लोगों की नजर में भी ‘लोकतान्त्रिक’ हो जाता है।
सहारनपुर में हिन्दुवादी संगठनों ने मिल कर दलितों की बस्ती में बलवा किया, जब भीम आर्मी ने इसके खिलाफ प्रदर्शन किया, तो योगी सरकार प्रचारित करने लगी कि ‘भीम आर्मी का सम्बन्ध नक्सलियों से है।’  इस घोषणा के बाद इनके चन्द्रशेखर आजाद ‘रावण’ सहित कई नेताओं को गिरफ्तार कर उन पर ढेरों मुकदमें जड़ दिये गये, जिसके कारण एक साल बाद भी इनकी रिहाई सम्भव नहीं हो सकी है। इतना ही नहीं इस घटना के एक साल पूरे होने पर 5 मई को भीम आर्मी के जिला संयोजक के भाई की हत्या राजपूतों की अघोषित आर्मी ने कर दी, लेकिन उसका नाम ‘अज्ञात’ रखकर किसी की भी गिरफ्तारी नहीं की गयी।

उना में गाय मारने के नाम पर पांच दलितों की सरेआम पिटाई की घटना के विरोध में जब वहां जिग्नेश मेवानी के नेतृत्व में देश भर के दलित और मुस्लिम संगठनों ने एकजुट प्रदर्शन किया, तो उस जुटान को भी नक्सलियों द्वारा प्रायोजित बताया गया। जबकि वहां भी हिन्दुवादी संगठनों ने बलवा  किया और प्रदर्शन से लौट रहे लोगों पर हमले किये, लेकिन न तो इन्हंे रोका गया, न ही किसी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गयी। यहां तक कि तूतीकोरिन में प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने और 13 लोगों की सरकारी हत्या के बाद यह सफाई दी गयी कि इस प्रदर्शन को नक्सलियों ने आयोजित किया था।  इसके अलावा सिंगूर, नन्दीग्राम, कलिंगनगर, जगतसिंगपुर, रायगढ़, नर्मदा जैसे तमाम विस्थापन विरोधी आन्दोलनों पर भी माओवादी नक्सलवादी का ठप्पा लगाकर उनका दमन किया जा रहा है और आगे भी किया जायेगा, ऐसा लगता है। लेख लिखे जाने तक तमिलनाडु के मदुरई में आठ लाइन सड़क निर्माण योजना में उजाड़े गये किसानों के आन्दोलन की अगुवाई कर रहे दो सामाजिक कार्यकर्ताओं और तूतीकोरिन आन्दोलनकारियों के मुकदमें देख रहे एक वकील वंचिनाथन को पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है।

यहां यह महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या माओवादी का ठप्पा लगा देने के बाद उस व्यक्ति या आन्दोलन पर किसी भी तरह का दमन जायज हो जाता है? सरकार की इस ‘ठप्पाकरण’ की नीति के दौर में इस पर विचार करना बेहद जरूरी हो गया है। इस ‘ठप्पाकरण’ के बाद सरकार इन आन्दोलनकारियों से सबको नहीं भी तो कुछ लोगों को अलग-थलग कर देने में कैसे सफल हो जाती है? दरअसल आन्दोलनों को माओवादी आन्दोलन कह कर दमन करने और लोगों से काट देने की मानसिकता देश की जनता की मानसिकता से जुड़ी है। कॉमन सेन्स यह कहता है कि कोई भी आन्दोलन, आयोजन और उसका मुद्दा लोकतांत्रिक है या नहीं, यह अधिक महत्वपूर्ण, न कि ये, कि इसे कौन आयोजित कर रहा है। माओवादी विचारधारा का समर्थन करने वाला भी यदि किसी लोकतान्त्रिक मुद्दे पर लोकतान्त्रिक तरीके से ही आन्दोलन या धरना प्रदर्शन कर रहा है, तो उस आन्दोलन को इस आधार पर नहीं रौंदा जा सकता कि यह आन्दोलन माओवादी कर रहे हैं। यही असली लोकतन्त्र है। लेकिन सरकार ने अपने तानाशाहीपूर्ण कृत्यों को जारी रखने के लिए यह प्रचार किया हुआ है कि किसी प्रतिबन्धित संगठन से सहानुभूति रखना या सहमति रखने से ही उस व्यक्ति या संगठन का विरोध-प्रदर्शन करने का अधिकार छिन जाता है। इस प्रचार के आड़ में वह हर तरह के आन्दोलनों को कुचलने के लिए स्वच्छंद हो जाते हैं।

दुखद यह है कि इस सरकारी प्रचार के छलावे मंे केवल आम लोग ही नहीं है, बल्कि ढेरों बुद्धिजीवी और प्रगतिशील लोग भी है। जो खुद बहुत सारे आन्दोलनों से लोगों को यह कह कर दूर करते हैं कि ‘इसमें माओवादी शामिल हैं।’ साम्राज्यवादी देशों से फण्ड और स्कॉलरशिप प्राप्त करने वाले एनजीओ, बुद्धिजीवी और कई वामदल तो सिर्फ इसी आधार पर माओवादियों के जनवादी आन्दोलनों के खिलाफ खड़े हो जाते हैं। लोगों की आन्दोलनों की चेतना को कुंद करते हुए वे एक कदम आगे बढ़कर इस तरह का प्रचार करने लगते हैं कि ‘इनके कारण सभी जनआन्दोलनों पर दमन बढ़ रहा है।’ ऐसा प्रचारित कर वे जनवादी आन्दोलनों के साथ नहीं, बल्कि सरकारी दमन के साथ खड़े हो जाते हैं। वास्तव में यह भी ‘नयी पेशवायी सामन्ती’ सोच का ही विस्तार है कि ‘फला क्षेत्र में केवल वे ही रहें, दूसरों का प्रवेश न होने पाये ताकि उनका विदेशों-देशों से मिलने वाला फण्ड सुरक्षित बना रहे। ऐसी सोच रखने वाले बहुत से लोगों और संगठनों का नाम यहां लिखा जा सकता है, लेकिन ऐसा करने से वे इस अलोकतान्त्रिक सरकार के और भी कृपापात्र बन जायेंगे।
शोमा सेन गिरफ्तारी के पूर्व 


यहां चर्चा का विषय सिर्फ यह है कि जब तक लोगों की लोकतांत्रिक चेतना यहां तक नहीं पहुँचती, कि हर किसी को जनवादी तरीके से विरोध प्रदर्शन या सभा समारोह करने का अधिकार  है, तब तक सरकार जनवादी आंदोलनों को अपने द्वारा प्रतिबंधित किसी भी संगठन से जुड़ा बताकर उसका दमन आराम से करती रहेगी, अपने बनाये जनद्रोही कानूनों के तहत लोगों को जेलों में डालती रहेगी। आज के समय में यह उसके लिए सबसे आसान तरीका है, जो कि लोकतन्त्र बचाने नहीं, बल्कि उसकी ही हत्या करने वाला तरीका है। इसे रोकना भी आज की जनवादी ताकतों का मुख्य काम होना चाहिए। लोकतन्त्र की रक्षा के लिए किसी भी दमन में सिर्फ यह देखना ही काफी है कि वह व्यक्ति/संगठन/आयोजन/प्रदर्शन लोकतान्त्रिक था या नहीं? न कि सरकारी प्रचार में आकर यह देखना कि उसमें माओवादी/नक्सलवादी थे या नहीं। जिस तरह सरकार द्वारा प्रतिबंधित किसी भी संगठन के व्यक्तियों, माओवादियों, अलगाववादियों या किसी भी अपराधी को फर्जी मुठभेड़ में मार देना गैरकानूनी है, उसी तरह किसी को भी लोकतान्त्रिक मुद्दों पर लोकतान्त्रिक तरीके से धरना प्रदर्शन या समारोह करने से रोकना भी गैरकानूनी है। लेकिन हमारे देश का चलन तो यह है कि साम्प्रदायिकता फैलाकर लोकतन्त्र को छूरा घोंपने वाले संगठनों को कहीं भी कोई भी आयोजन करने की, यहां तक कि अस्त्र-शस्त्र प्रदर्शन और प्रशिक्षण की भी खुली छूट है, लेकिन लोकतान्त्रिक हक अधिकार की मांग करने वाले संगठनों को प्रतिबंधित किया जाता है, फिर प्रतिबन्धित होने के नाम पर उन्हें धरना प्रदर्शन से रोका जाता है, उन्हें जेलों में डाला जाता है। भीमाकोरेगांव आयोजन के सिलसिले में गिरफ्तार किये गये पांचों लोगों के परिचय और इस घटना के बारे में जानिये तो स्पष्ट होता है कि ये पांचों लोेग कोई भी ऐसा काम नहीं करते थे, या कभी किया था, जो कि लोकतन्त्र विराधी हो, बल्कि ये सभी लोग लोकतंत्र को मजबूत करने के संघर्ष के साथ खड़े हैं। फिर भी ‘अर्बन माओवादी’ के ठप्पे ने इनके सारे कामों को लोकतन्त्र विरोधी करार दे दिया। ऐसे बढ़ते मामलों में माओवादी होने या न होने के सरकारी तर्क का समर्थन करना या इस बहस में उलझना भी अन्याय के साथ खड़े होना है। भीमाकोरेगांव मामलों में हुई ये पांचों गिरफ्तारियों और भीमाकोरेगांव के आयोजन को इसी बहस में उलझाकर  नयी पेशवा सरकार ने एक अन्यायी चाल चली है, कोर्ट इस बहस से कितना प्रभावित होगा, इसके बारे में सभी को अनुमान है, लेकिन उसके बाहर इस बहस से बाहर निकलकर सरकार के इस अन्यायी कदम की निंदा करना, एकजुटता बनाना, विरोध करना ही लोकतन्त्र के बचाव के लिए जरूरी है।

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