दलितों आंदोलनों को माओवादी बताने का पैटर्न पुराना है: सिविल सोशायटी में आक्रोश


स्त्रीकाल डेस्क 
6 जून की सुबह नागपुर-मुम्बई-दिल्ली से दलित कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी कर महाराष्ट्र पुलिस  1 जनवरी, 2018 को भीमा-कोरेगाँव में हुई हिंसा को माओवादियों द्वारा भड़कायी गयी हिंसा बताने में लगी है. दलित कार्यकर्ताओं-चिंतकों को माओवादी बताने का सराकारी पैटर्न पुराना है. उधर देश भर से बुद्धिजीवी सरकार के इस कदम की निंदा कर रहे हैं और आने वाले समय में सरकारी दमन को लेकर चिंतित हैं.  नागपुर से लेकर दिल्ली तक गिरफ्तारी के खिलाफ लोगों ने मोर्चा निकला. गिरफ्तारी पर आयी प्रतिक्रियायें:
एक्टिविस्ट संगठनों द्वारा जारी पोस्टर 


पढ़ें गिरफ्तारी की खबर : प्रोफेसर शोमा सेन, वकील गडलिंग, सहित 5 गिरफ्तार

सीमा आज़ाद, सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्यकार (इलाहाबाद)
महाराष्ट्र के क्रूर पेशवा राज को दलितों की सेना द्वारा भीमा कोरेगांव में पछाड़ने के 200 साल पूरे होने पर इस साल 1जनवरी को इस जगह पर लगभग 1लाख लोगों का जमावड़ा हुआ, जिसका नारा था- "नई पेशवाई को ध्वस्त करो।" पेशवाई का मतलब है- ब्राह्मणवाद, जो लोगों को जातियों में बांट कर कथित तौर पर "नीची जातियों" का शोषण करता है।  भीमा कोरेगांव में दलितों और पिछड़ी जातियों के इस जमावड़े से "पेशवाई की पोषक मौजूदा सरकार इतना बौखला गयी कि पहले वहां साजिशन हिंसा भड़काई, फिर दलितों को ही मारा पीटा, उन पर मुकदमा दर्ज किया, इस आयोजन की अगुवाई करने वाले विद्राेही पत्रिका के सम्पादक सुधीर ढावले के घर पर तलाशी अभियान चलाया उनका फोन और कम्प्यूटर जप्त कर लिया और आज तड़के उन्हें इसी आरोप में गिरफ्तार कर लिया। उनके अलावा नागपुर के प्रसिद्ध वकील सुरेन्द्र गाडलिंग और दिल्ली के एक्टिविस्ट रोना विल्सन को  TISS मुम्बई के एक्टिविस्ट महेश को भी इसी आरोप में गिरफ्तार कर लिया है। इसके अलावा महिला आन्दोलनों में सक्रिय नागपुर विवि की अध्यापक सोमा सेन के घर सुबह से तलाशी के नाम पर उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। सरकार के इस फासीवादी दमन की निंदा होनी चाहिए और इसका पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए।अभी पता चला कि प्रो सोमा सेन, जो कि नागपुर विवि के अंग्रेजी विभाग में विभागाध्यक्ष हैं, को भी गिरफ्तार कर लिया गया।

वीरेंद्र यादव, आलोचक हिन्दी साहित्य (लखनऊ)
वाम दलित बौद्धिकों के घर बिना FIR के छापे मारे जा रहे हैं और जनपक्षधर साहित्य बरामद कर उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है।क्या कोई ऐसा भी बुद्धिजीवी हो सकता है जिसके घर मार्क्स, लेनिन, चे ग्वेरा से लेकर भगत सिंह आदि का कुछ न कुछ साहित्य मौजूद न हो ?

कितना आसान है किसी बौद्धिक को हिंसक विचारधारा का समर्थक घोषित कर राष्ट्रद्रोह का अपराधी करार देना। दरअसल यह सब प्रतिरोध की आवाजों को दबाने और डराने के हताश कारनामें हैं। कहने की जरूरत नहीं कि दमन जितना तेज होगा प्रतिरोध की जमीन भी उतनी ही पकेगी।



मनीषा बांगर, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, पीपल्स पार्टी ऑफ़ इण्डिया (हैदराबाद)

महाराष्ट्र मे Left ब्रहामणो ने कन्हैया,RSS ब्रहामणो ने भिडे को घुमाया भड़किले भाषण दिलवाये. दोनो बाहर और जेल मे है बहुजन #कोरेगांव

छाया खोब्रागडे, सामाजिक कार्यकर्ता (नागपुर)
महाराष्ट्र में सरकार चाहे जिसकी हो कांग्रेस की या भाजपा की दलित आन्दोलन और आक्रोश को वे नक्सल रंग देने की कोशिश करते ही हैं. खैरलांजी काण्ड के बाद जब 2006 में पूरे महाराष्ट्र में दलित आंदोलन तेज हुआ तो भी उस आन्दोलन को कांग्रेस के राज्य में गृहमंत्री आर आर पाटिल ने नक्सलियों का आन्दोलन बताया था. तब भी राज्य भर में इस बयान की तीखी प्रतिक्रिया हुई थी. इस बार भी भीमा-कोरेगाँव में हुई हिंसा का मुख्य आरोपी संभाजी भिड़े को सरकार बचा रही है, वह राज्य भर में रैलियाँ कर रहा है और उसकेएक  दिन पूर्व हुए 'यलगार परिषद' के आयोजकों को माओवादी बताकर गिरफ्तार कर रही है ताकि दलित-आक्रोश की बात को मनचाही दिशा दी जाये.


अभिषेक श्रीवास्तव, पत्रकार (नई दिल्ली) 

(आज की गिरफ्तारियों के बहाने ''Urban Naxals'' पर कुछ बातें)

पिछले चार साल में एक ट्रेंड पर ध्‍यान दें। अगले एक साल की तस्‍वीर साफ़ होती दिखेगी। केंद्र की सत्‍ता में आने के बाद भाजपा सरकार ने पहले एक साल में छिटपुट मूर्खतापूर्ण बयानों और दुष्‍प्रचार की राजनीति जम कर की। याद करें, 2014-15 में गिरिजाघरों पर हमले की कई खबरें आईं जो ज्‍यादातर भ्रामक साबित हुईं। इस बीच हिंदू राष्‍ट्र, दलित, कश्‍मीर, राम मंदिर, 370 और मुसलमानों को लेकर अंडबंड बयानबाज़ी हुई। यह पानी नापने का चरण था। अंतरराष्‍ट्रीय प्रतिक्रियाओं से जब अंदाज़ा लगा कि ईसाइयों के यहां पानी कम है और कश्‍ती डगमगा सकती है, तो तोप को शैक्षणिक परिसरों, मुसलमानों और दलितों की ओर घुमा दिया गया। दूसरा और तीसरा साल इन पर हमले का रहा।

दो साल में छात्रों, दलितों और मुसलमानों पर हमले का नतीजा यह हुआ कि इनके बीच एक एकता सी बनती दिखी। प्रतिक्रिया में दलित-मुस्लिम एकता, वाम-दलित एकता, बहुजन एकता जैसे नारे उछलने लगे। समाज तेज़ी से बंटा लेकिन बंटे हुए तबकों को तीन साल बीतते-बीतते समान दुश्‍मन की पहचान हो गई। गुजरात से कैराना के बीच छह माह में इसका चुनावी असर दिखा। तब जाकर पार्टी ने कोर्स करेक्‍शन किया। प्रधानजी ने हरी चादर ओढ़ ली और कश्‍मीर में इफ्तार करने चल दिए। इधर अध्‍यक्षजी ने 4000 लोगों को निजी संपर्क के लिए चुन लिया। इस बीच ईसाई भांप चुके थे कि संकट के इस क्षण में तोप उनकी तरफ वाकई घूम सकती है, लिहाजा असमय व बिना संदर्भ के आर्कबिशप का एक निंदा-बयान आया और खूब फला-फूला।

ज़ाहिर है, चौथे साल की शुरुआत में दलित, मुसलमान या ईसाई को छूना हाथ जलाने जैसा होता। नए दुश्‍मन की स़ख्‍त ज़रूरत आन पड़ी। एक ऐसा दुश्‍मन जो सर्वस्‍वीकार्य हो। जिससे वोट न बंटे, चुनाव न प्रभावित हो। जो लोकप्रिय विमर्श का हिस्‍सा भी बन सके। ध्‍यान दीजिए कि 2014 से लेकर इस साल की शुरुआत तक माओवाद के मोर्चे पर गहन शांति बनी रही। अचानक मार्च-अप्रैल के महीने से माओवादियों के हमलों और उन पर सैन्‍यबलों के हमलों की ख़बरें नियमित हो गईं। फिर एक बड़ा एनकाउंटर हुआ। कोई चालीस कथित माओवादी मारे गए। उसका छिटपुट प्रतिशोध भी हुआ। समस्‍या केवल यह थी कि सुदूर सुकमा या गढ़चिरौली में हो रही घटनाओं से लोकप्रिय जनधारणा को गढ़ना संभव नहीं था। इसे शहर केंद्रित होना था ताकि समाचार माध्‍यम उसे उठाएं और लोगों तक पहुंचाएं।

नए दुश्‍मन पर वैसे तो काम बहुत दिनों से चल रहा था लेकिन फिल्‍मकार विवेक अग्निहोत्री ने बिलकुल सही समय पर इसकी एक थीसिस लिख दी- ''अरबन नक्‍सल्‍स''। किताब का लोकार्पण हफ्ते भर पहले हुआ, जमकर प्रचार किया गया और कल ही यह किताब दूसरे संस्‍करण के लिए प्रेस में चली गई। कल शाम ट्विटर पर किसी ने विवेक को लिखा- ''विवेक जी महाराष्ट्र में आज ही अर्बन नक्सली अरेस्ट हुये, आपकी किताब का यह शुभसंकेत है...'' जिसके जवाब में लेखक ने लिखा- ''आगे आगे देखिए होता है क्या। श्री @rajnathsingh @HMOIndia ने बड़ी शांति से काफ़ी अच्छा काम किया है।'' आज सुबह तक महाराष्‍ट्र और दिल्‍ली को मिलाकर कुल पांच गिरफ्तारियां हो गईं। विवेक अग्निहोत्री परसों हैदराबाद जा रहे हैं अपनी किताब लेकर। देश भर में घूमेंगे और ''अरबन नक्‍सल'' का प्रचार करेंगे। टीवी चैनल देखिए, ''अरबन नक्‍सल'' खूब चल पड़ा है।

विवेक ने 2014 में इस विषय पर ''बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम'' फिल्‍म बनाई थी। ज़मीन पर फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट अब रची जा रही है। यही उपयुक्‍त समय है। अब दलितों, मुसलमानों को नहीं मारा जाएगा। उससे चुनाव प्रभावित होगा। अब उन्‍हें सताया जाएगा जो वोट नहीं देते। जिनके वोट न देने से किसी को फ़र्क नहीं पड़ता। हां, इनकी पकड़-धकड़ से लोकप्रिय धारणा को ज़रूर भाजपा की ओर वापस मोड़ा जा सकेगा। और दिलचस्‍प तब होगा जब इन ''अरबन नक्‍सल'' की गिरफ्तारियों के खिलाफ सामूहिक रूप से न मुसलमान बोलेगा, न दलित और न ही ओबीसी। किसी को नक्‍सल का सिम्‍पेथाइज़र होने का शौक नहीं चढ़ा है।



विवेक अग्निहोत्री ने ठीक लिखा है- ''आगे-आगे देखिए होता है क्‍या।'' चुनाव तक भाजपा का अगला एक साल बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों, एक्टिविस्‍टों को समर्पित होगा। दो साल पहले जो ''अवार्ड वापसी गैंग'' या ''टुकड़े-टुकड़े गैंग'' वाला नैरेटिव रचा गया था, उसके जमीन पर उतरने का वक्‍त अब आया है। मानकर चलिए कि जनता इन गिरफ्तारियों के पक्ष में ही होगी। जो विरोध में होंगे, धीरे-धीरे एक-एक कर चुपाते जाएंगे। इस तरह मार्च 2019 तक दो अहम काम होंगे- पहला, शहरी नक्‍सल की धरपकड़ की आड़ में असली नक्‍सल को भविष्‍य के लिए बचाकर रखा जाएगा। दूसरा, मतदाता बनाम अमतदाता का एक फ़र्क परसेप्‍शन में पैदा कर दिया जाएगा। जो देश को प्‍यार करेगा, वो मतदान करेगा। मतदान नहीं करने वाला देशद्रोही होगा, भीतर होगा। और देश मने? ज़ाहिर है...!

दिये गये बयान संबंधितों के फेसबुक पेज से या फिर उनसे बातचीत के आधार पर 

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