मेरे साथ यौन हिंसा के अपराधी: वे मामा थे, वे चाचा थे, एक संघी एक वामपंथी


क्वीलिन  काकोती

यौन शोषण के शिकार सभी साथियों 
मेरा यह पत्र उन सारे साथियों को संबोधित है जो कभी मजाक में या कभी जोर-जबरदस्ती से अपने परिचितों द्वारा या किसी अजनबी द्वारा यौन शोषण के शिकार रहे हों. मैं बहुत सोचने के बाद, बहुत मानसिक पीड़ा से गुजरने के बाद और बहुत धैर्य रखने के बाद इस विषय पर लिख पाने की हिम्मत जुटा पा रही हूँ. इम्तियाज अली की फिल्म हाई वे में आलिया भट्ट का चरित्र बचपन में परिवार के किसी सदस्य द्वारा यौन शोषण की शिकार लडकी का चरित्र है, जो बाद में स्टॉकहोम सिंड्रोम, अपने अपहरणकर्ताओं के साथ सहानुभूति या प्रेम का सिंड्रोम, से ग्रस्त हो जाती है. आलिया भट्ट को अपने अपहरणकर्ता से, रणदीप हुडा से, प्यार हो जाता है. मेरे ख्याल से आलिया को एक अपराधी से प्यार नहीं होता बल्कि एक अजनबी से प्यार होता है, जिसका उसके परिवार से कोई संबंध नहीं है और जो उसे उसके परिवार में घटी स्मृतियों से दूर ले जाता है. इस फिल्म को देखे काफी साल हो गये लेकिन यह आज भी मेरे जेहन में ज़िंदा है, जैसे कि वह मेरी ही कहानी है.



शायद ही कोई ऐसी लडकी होगी, जिसे ऐसे बैड टच या बलात्कार से न गुजरना पडा हो. असमिया में एक कहावत है 'हरिनार मांगसोई बैरी', यानी हिरण का मांस ही उसका दुश्मन होता है. लड़कियों को यह कहावत अक्सर सुनाई जाती है यह सन्देश देकर कि लडकी का शरीर ही उसका दुश्मन होता है, इसलिए उसे अपने आपको बचाकर रखना चाहिए. हालांकि लड़कों को कभी यह शिक्षा नहीं दी जाती कि लडकी का शरीर तुम्हारी संपत्ति नहीं है और उसे उसकी इच्छा के बगैर नहीं छूना चाहिए. दिक्कत हमारे बीच भी है कई बार हम बोल नहीं पाते और कई बार हम औरतों को जब अपने किसी बेटी, बहन, भतीजी, के साथ ऐसी घटना का पता चलता है तो आपस में कानाफूसी के स्तर पर दबा देते है, जबकि हमें चाहिए था कि अपराधी चाचा, भाई, मामा, पिता को बुलाकर सजा दें, दिलवायें.

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आपसब के साथ भी ऐसा हुआ होगा तो कहें, मैं तो बहुत दिनों की चुप्पी के बाद कह पा रही हूँ. रिश्ते के भाई द्वारा बैड टच का पहला अनुभव मुझे 10-11 साल की उम्र में हुआ था और वह 17-18 साल का था. अब सोचती हूँ तो कई बार उसे किशोर युवा की उत्सुकता या कुंठा मान भी लेती हूँ. हालांकि यदि लड़कों को लड़कियों की इच्छा के बिना न छूने की नसीहत दी गयी होती तो वह नहीं होता. लेकिन मैं उन घटनाओं के अपराधियों को आज भी भूला नहीं पाती, जिन्होंने मेरे व्यक्तित्व, मेरी मानसिक स्थिति को भी गहरे हद तक प्रभावित किया था. एक दूर के रिश्ते के मेरे मामा और एक चाचा ने जो किया उसे क्या कहूं? मामा अब इस दुनिया में नहीं हैं, वे आसाम में आरएसएस के एक बड़े स्वयंसेवक थे. मैं 9-10 साल की थी तब उनके बैड टच की शिकार थी. वे अक्सर घर आते. मुझे गोद में बैठा लेते और मेरे यौन अंगों को छूते थे. मैं आज उस वाकये को समझ पाती हूँ, तब तो समझ पाने की हालत में भी नहीं थी. वे डींगे बहुत हांकते थे. बताते कि आजादी की लडाई में जेल भी गये. वहाँ जेल में वे एक मुस्लिम कैदी को पीटते थे. उनके ही शब्दों में ' जेल में एक गोरिया था, उससे मैं जानबूझकर लड़ लेता था और पीटता था.' असमिया में मुसलमानों को अपमानजनक तरीके से 'गोरिया' कहा जाता है.

सबसे ज्यादा भयानक था चाचा की कुंठा का शिकार होना. उसने मेरी मानसिक स्थिति को सबसे ज्यादा प्राभावित किया. चाचा कम्युनिस्ट आन्दोलन से जुड़े रहे हैं. वे 'बैड टच' तक ही सीमित नहीं रहे. उन्होंने मेरे साथ जबरदस्ती भी की-बलात्कार किया. तब मैं स्कूल में थी. मेरे 9वीं से 11 तक की पढाई के दौरान उनका कई बार शिकार हुई. पहली बार, जब गरमी की छुट्टियों के दौरान उनके घर गयी थी. मैं किसी से कह नहीं पाती थी. कभी चाचा के पास जाने से मना किया भी तो माँ और दूसरे लोग समझते कि पढाई न करने के डर से मैं उनसे भागती हूँ. वे बड़े स्ट्रिक्ट थे और बच्चों से पढाई-लिखाई के बारे में स्ट्रिक्ट बातें करते थे. मुझे गर्मियों की छुट्टी में उनके यहाँ पढने के लिए ही भेजा गया था. यह भी सच है कि उन्होंने मुझे पढ़ाया भी. लेकिन मेरे साथ जो जबरदस्ती करते थे उसका असर ज्यादा गहरा रहा. तब वे एक हैवान की तरह होते थे. आज मैं जब उस इंसान की बातें सुनती हूँ या उसे देखती हूँ तो एक जुगुप्सा से भर जाती हूँ. हालांकि शुरू में तो मुझे उनपर काफी गुस्सा था लेकिन धीरे-धीरे मैं उन्हें माफ़ कर चुकी हूँ, वे अब मेरे जीवन में होते हुए भी नहीं है. लेकिन वे घटनाएँ मेरी जीवन की स्थायी ट्रॉमा हैं.

आज, मुझे लगता है कि मेरा सीधे माँ को न बताना मेरे जीवन पर किस तरह भारी पडा. लडकियों को अपनी बातें अपनी माँ-बहन से कहनी चाहिए और माँ-बहनों को भी चाहिए कि वे लड़कियों के साथ घटी ऐसी घटनाओं की पर्देदारी न करें. मेरे मामले में स्थिति एकदम अलग है. परिवार यद्यपि लोकतांत्रिक और वामपंथी विचारों का है, लेकिन माँ बाहर के मेरे दोस्तों (लड़कों) से मेरा घुलना-मिलना पसंद नहीं करती थीं. ओवर प्रोटेक्टिव थीं. उनकी सोच में कास्ट और जेंडर दोनो प्रभावी थे. पिता कभी सीधे नहीं कुछ कहते लेकिन माँ से कहवाते थे. यह एक डेमोक्रेटिक लेकिन जातिवादी और पितृसत्ता से रचा-बसा ब्राह्मण परिवार रहा है. हालांकि वे अपने घर के मामले में ही चूक गये और अपनी बेटी को इस स्थिति से बचा नहीं सके.



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यह हम सबके लिए अच्छा होगा कि अपने ट्रामा से निकलें और अपने मन में दबी बातों को कहें, किसी से भी, जिसे अपना समझती हों/ समझते हों या सार्वजनिक तौर पर कहें. जैसे आज मैं आपसब से अपनी बात कह कर थोड़ा अलग महसूस कर रही हूँ. लेकिन मेरी गुजारिश उन सबसे से है जो उत्पीड़क हैं कि वे सोचें कि उन बच्चियों या बच्चों के साथ क्या गुजरता होगा, जब आप उन्हें गलत तरीके से छूते हैं या उनसे जबरदस्ती करते हैं.

हमसब को यह कोशिश करनी चाहिए कि अपने बच्चों को ऐसी स्थिति से न गुजरने दें. अपराधियों के खिलाफ मुंह खोलें उन्हें सजा दिलवाएं और बच्चों को ऐसी स्थितियों से आगाह करें. सोचें कि बच्चे जब ऐसी स्थितियों के शिकार होते हैं तो उनके व्यक्तित्व पर क्या असर पड़ता है! वे जीवन भर इसके ट्रॉमा से निकल नहीं पाते. वे लोगों पर विश्वास करना छोड़ देते हैं. अपनों से एक विलगाव के स्थिति में आ जाते हैं. जैसे हाईवे में आलिया भट्ट अपनों से दूर करने वाले अपने अपहरणकर्ता, एक अजनबी को ही अपना मान लेती है.

क्वीलिन काकोती स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं.  संपर्क: kakoty.quiline@gmail.com 
तस्वीरें गूगल से साभार



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