अनुप्रिया पटेल के साथ ईव टीजिंग: क्या 'मर्दों' पर ओहदे का फर्क भी नहीं पड़ता!

राकेश सिंह 

यूपी के मिर्जापुर में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल के काफिले को ओवरटेक करने की कोशिश करते हुए कार सवार तीन युवकों ने उनके साथ बदसलूकी की। आरोप है कि युवकों ने मंत्री के वाहन के करीब पहुंच कर अपनी कार से सिर और हाथ निकाल कर भद्दे इशारे किए। तीन युवक गिरफ्तार तो कर लिये गये लेकिन यह घटना महिलाओं के प्रति समाज/पुरुषों के नजरिये की बानगी है-महिला चाहे कोई भी हो ओहदेदार या बिना ओहदे के. इस घटना के जेंडर पक्ष पर राकेश सिंह की त्वरित टिपण्णी. जेंडर फ्रीडम के लिए देश भर में राकेश चार साल से सायकिल यात्रा कर रहे हैं, लोगों को संबोधित कर रहे हैं. 


मंत्रीजी के साथ बदतमीजी हुई।
कब हुई?
कल।
कहाँ हुई?
वाराणसी जनपद में।
आरोपी कौन हैं?
बीएएमएस के स्टूडेंट्स।



अमूमन ओहदेदार, ताक़तवर, सुरक्षाप्राप्त शख़्सियत के साथ बदतमीजी की ऐसी वारदात तब तक नहीं होती जब तक उनका जेंडर 'पुरुष' से इतर न हो। यानी स्त्रियों और तीसरे जेंडर के लोगों के साथ ऐसा होता है। अपनी यात्रा के दौरान पुलिस और प्रशासन समेत विभिन्न नौकरी-पेशों में उच्च पदों पर कार्यरत नागरिकों से मिलने-बात करने का अवसर मिला। एक ही पद पर कार्यरत पुरुष और स्त्री अधिकारी की सोच व जीवनचर्या में अक्सर  भिन्नता दिखी। स्त्री अधिकारियों ने कहा कि आते-जाते कभी-कभी अपने दफ़्तर के बाहर मातहत कर्मचारियों की बातें सुनकर उन्हें घिन्न आती है। वर्दी में न हों तो किसी दिन उनमें से ही कोई कुछ कह दे।

अपने ज़माने में जो जेंडर आधारित व्यवहार हम देखते हैं उसकी निर्मिति उस चिंतन की उपज हैं जहाँ 'चुतिया' और/या इसमें नाना किस्म के उपसर्ग या प्रत्यय जोड़कर तैयार हुए शब्दों और मुहावरों से भड़ास निकालना सहज मान लिया गया है। मोहब्बत के इज़हार या गुस्सा प्रकटीकरण हेतु माँ, बहन, बेटी, दादी, समधन, भाभी, मामी, बुआ, मौसी, नानी के आगे 'तेरी/तोरी/तुम्हारी' और पीछे 'की' लगाकर होने वाले उच्चारणों से कहने-सुनने वाले के ज़हन पर फ़र्क़ नहीं पड़ता? ऐसा किसी मासूम और निरपेक्ष जीवनदर्शन की वजह से नहीं बल्कि कुटिल और क्रूर  जीवनदर्शन के कारण। औरत की मूरत या मूरत सी औरत, बस! काठ या पाथर की औरत देवी रहेंगी बाक़ी जन्मे या न जन्मे, जनम लिये तो जिये अथवा न जिये, जिये तो कैसे जिये, क्या खाये, क्या पहने, बोले-बतिआए, किनसे बोले/बतिआये, किनसे न, क्या पहने, पढे, क्या पढे, कहाँ पढे, क्यों पढे, कितनी देर तक घर से बाहर रहे, आने-जाने का रुटीन, पेशा क्या चुनें, शादी कैसे, कब, किससे, शादी के बाद करियर के बारे में सोचे अथवा न ... ये वैसे मसलें हैं जिनसे रू-ब-रू अमूमन हर कन्या होती है।

इनमें से कुछ कुछ प्रश्न बालकों के हिस्से भी आते हैं, मगर वे निर्णय लेने के योग्य माने जाते हैं। बदचलनी के पाठ की शुरुआत परिवार में होती है। परवरिश की प्रक्रिया को ठहर कर महसूस करेंगे तो लगेगा कि परिवेश ने मर्दज़हन में बदचलनी फिट करने में सधी भूमिका निभाई। मगर शुरुआत से लड़कों की बदचलनी को अनदेखा किया गया, चटखारे लिये गये। बदचलनी जब बढने लगी तब उन्हें उनकी निर्णय क्षमता या दबंगई बताई गई। सहज मान लिया गया। जिन धर्मों या धर्मों के रुपों का प्रदर्शन और अनुसरण अपना ज़माना कर रहा है, वे व्यवहारतः जेंडर असमानता, मर्दसत्ता, स्त्रियों व अन्य जेंडर के साथ पुरुषों के अमानुषिक व्यवहारों को संरक्षण देते हैं। प्रोत्साहन भी। बनारस पर एक बार और नज़र मार लीजिए, तय करने में सुविधा होगी। भर ललाट त्रिपुंड छापकर गर्दन में भगवा अंगोछा अटकाये अपने ज़माने के धर्मरक्षकों की दिनचर्या पर नज़र धँसाएँ, सब साफ़-साफ़ देख-बूझ पाएँगे।



इस सरज़मीम पर उतरने वाली औरतों के हिस्से जोखिम और चुनौतियों का बड़ा जखीरा है। आँत से मिजाज तक:करवाहटें, वंचनायें, पक्षपात और हिंसा! इसी दौर में आसपड़ोस से बदलाव की सुगबुहाटें रह-रह कर, दब-छुपकर ही सही, आने लगी हैं। उम्मीदों का पँख लगाए आसमान नापने निकली औरतों को गर्म हवाओं से टकराते देख रहे हैं हम। सुकून मिलता है। अनुप्रिया पटेल वैसी ही एक शख़्सियत हैं।

अनुप्रिया पटेल के साथ बदतमीजी करने वाले बीएएमएस के छात्र हैं। मान लीजिए, ये लड़के एमबीबीएस कर रहे होते या पुलिस के दारोग होते, सेना में मेजर होते या सरकार में मंत्री या मुक्तिमार्ग बताने वाले ज्ञानी; क्या फ़र्क़ पड़ता? ऐसे लोगों या पेशेवरों के नाम आते रहते हैं। इसीलिए कि परवरिश ने अनावश्यक ताक़त व निर्णयबोध को इतना बड़ा हिस्सा बना दिया व्यक्तित्व का कि मानवीयता की पटरी से उतरते हुए मामूली फ़र्क़ तक नहीं पड़ता।

जबकि थोड़ी उदारता और थोड़ा मानुसपन 'मर्द' को गाली या अपराध बनने से रोक सकते हैं


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