फेसबुक पर की गयी टिप्पणियों का बजरंग बिहारी तिवारी ने दिया जवाब


पिछले दिनों हिन्दी साहित्य के आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी की मुखर आलोचना फेसबुक पर की गयी . उन पर दलित साहित्य को भटकाने और उसके संरक्षकत्व का दावा करने का आरोप भी लगा है. इस बार कथादेश के अपने कालम में उन्होंने उन आरोपों का जवाब दिया है. बजरंग जी सोशल मीडिया में नहीं हैं, आरोप उनपर सोशल मीडिया में लगा इसलिए स्त्रीकाल के माध्यम से कथादेश में छपा उनका यह जवाब. इसके प्रत्युत्तर के आलेख आमंत्रित हैं. 

बजरंग बिहारी तिवारी
प्रतिरक्षा में वि-नय
                         
सार्थक अध्ययन छोड़कर बेमतलब की बहस में उतरना पड़े तो दुःख होता है| पूर्व-निर्धारित लेखन-कार्य स्थगित कर निराधार आक्षेपों का उत्तर लिखना पड़े तो झुंझुलाहट होती है| कीचड़ उछालने वाले का मकसद विचलित करना-भर हो तो उसे सफलता की अनुभूति होती है| इस बार अपने पक्ष को प्रस्तुत करते हुए मुझे घोर व्यर्थता का अहसास हो रहा है| कुछ न बोलने से अवसाद कायम रहेगा इसलिए यह प्रत्युत्तर लिखना पड़ रहा है|

बजरंग बिहारी तिवारी


हुआ यह कि तीन-चार शुभचिंतकों ने अप्रैल (2018) के प्रथम सप्ताहांत में मुझे फोन किया और मेरे अनुरोध का मान रखते हुए मेरे वाट्सएप नंबर पर स्क्रीन-शॉट भेजा| यह शॉट एक फेसबुक पोस्ट का था| मेरा फेसबुक अकाउंट नहीं है इसलिए वहाँ चल रही गतिविधियों से वाकिफ नहीं रहता हूँ| पोस्ट सूरज बड़त्या की थी- “ब्राह्मण शंकराचार्य ने बौद्धिजम को ख़त्म करने के लिए प्रक्षिप्त बौद्ध बन जो काम किया था... ऐसे ही हमारे दलित साहित्य आंदोलन को खत्म करने के लिए एक प्रगतिशील ब्राह्मण दलित आलोचक बनकर हमारे बीच घुस आया है .. इसे ओमप्रकाश वाल्मीकि ने तब घुसपैठिया करार दिया था .. ये दक्षिण में जाके कहते हैं कि .. “दलित –आदिवासी को लिखना सिखाता हूँ .. उनका मेंटर हूँ...” क्या करें इनका...” यह पोस्ट उन्होंने दो अप्रैल को रात दस बजकर बाइस मिनट पर लिखी थी| यह समझना किसी व्यक्ति के लिए मुश्किल नहीं था कि वह ‘प्रगतिशील ब्राह्मण’ कौन है| इससे पहले वे अपने फेसबुक पर इस तरह की कई पोस्ट डाल चुके थे| उनके तीन-चार सहयोगियों ने ‘बजरंगी भाईजान’, ‘बजरंगदल’, ‘हनुमान तिवारी’ आदि लिखकर ‘टारगेट’ की पहचान भी जाहिर कर दी थी| रमणिका गुप्ता जी ने जब सूरज बड़त्या को अपनी पत्रिका का संपादक बनाया तो पत्रिका का एक वाट्सएप ग्रुप बना| इसमें मुझे भी जोड़ा गया| इसके एक एडमिन सूरज थे| उन्होंने अपनी प्राथमिकता तय करते हुए इस ग्रुप को वामपंथ विरोधी मंच बना दिया| दो-तीन प्रसंगों में उनसे बहस भी हुई| मुझे लगा कि यह ग्रुप छोड़ देना ही उचित होगा| मैं बाहर निकल आया|

उक्त फेसबुक पोस्ट के बाद उस पर कई टिप्पणियाँ आईं| मैंने किसी मित्र से वह सारी सामग्री प्रिंट फॉर्म में मांग ली| कुल मुद्रित पृष्ठों की संख्या 15 निकली| इन टिप्पणियों से गुजरते हुए तय किया कि व्यापक पाठक समुदाय के समक्ष अपना पक्ष रख देना चाहिए| फेसबुक सार्वजनिक मंच है| वहाँ हुई बहस में सभी हिस्सेदार अपने नाम के साथ आते हैं| इस प्रत्युत्तर में मैं इसलिए सबकी टिप्पणियाँ उनके नामों के साथ दे रहा हूँ| सूरज की पोस्ट पर पहली टिप्पणी यजवीर सिंह विद्रोही की आई| उन्होंने सिर्फ एक शब्द से अपना काम चलाया- ‘तिवारी’| इसके बाद रश्मि प्रकाशन ने लिखा- “बताइये यह तो हाल है|” सूरज ने तुरंत जवाब लिखा- “बुरा हाल हैं .. कहें तो एक किताब लिख दें इस पे .. |” रश्मि प्रकाशन ने फ़रमाया कि एक किताब से काम नहीं चलेगा, “कम से कम ग्यारह लिखनी पड़ेगी|” यह भी कहा कि देर करने से फायदा नहीं है| पोस्ट पढ़कर यह जानने की उत्सुकता हुई कि रश्मि प्रकाशन की तरफ से कौन लिख रहा है| ज्ञात हुआ कि इसके स्वत्वाधिकारी हरे प्रकाश उपाध्याय हैं| रश्मि प्रकाशन के नाम से वही लिखते हैं| किन्हीं रुद्र प्रताप ने लिखा कि टारगेट का “नाम लेना जरूरी नहीं पर पहचानना और सतर्क रहना जरूरी है|” प्रमोद कुमार को नाम बताना अनिवार्य लगा| उनकी पोस्ट लगी- “पं. बजरंग बिहारी तिवारी” | सूरज ने इस पर अपनी प्रसन्नता जाहिर करते हुए एक स्माइली लगाई| देव कुमार ने हौसला आफजाई करते हुए लिखा- “सूरज बाबू! पूछिए मत, लिख डालिए|” उमाशंकर सिंह परमार ने गदगद स्वर में सूरज के संकल्प का अनुमोदन किया- “आपके हाथ चूमने का मन कर रहा है| साथी| आइ लव यू|” कवि असंग घोष ने इसे आगे बढ़ाते हुए सलाह दी कि “दोनों महानुभाव लिख डालो एक-एक किताब|” उमाशंकर सिंह परमार ने सूरज को अपना प्रस्ताव याद दिलाया- “सूरज भाई साब से मैंने बहुत पहले कहा था, मैं तो कहूँ कि अभी समय है इन आलोचक के लिए एक लेख बना दीजिए इसी माह “लहक” के लिए”| इसके बाद राकेश शर्मा का आक्रोश फूटा- “ऐसे घुसपैठियों का बहिष्कार करें और साथ ही साथ बेनकाब भी करते चलें|” अरुन कुमार का गुस्सा सातवें आसमान पर दिखा- “अब तो हदें पार हो गई हैं, उसका सही चेहरा सबके सामने लाना पड़ेगा| सुना है कि कुरुक्षेत्र के किसी कार्यक्रम में जय श्री राम के नारे भी लगा कर आया है ये ब्राह्मणवादी|” अरुन कुमार से विगत दो-तीन वर्षों से मेरा ठीक-ठाक परिचय रहा है| आप केन्द्रीय विद्यालय में हिंदी टीजीटी हैं| मुझे एकाधिक बार अपने विद्यालय में व्याख्यान के लिए बुलाया भी है| इलाहाबाद में जलेस द्वारा ‘जाति, वर्ग और जेंडर’ पर (1-3 अक्टूबर, 2016 को) आयोजित कार्यशाला में वे प्रतिभागी भी रहे हैं| मैं इस कार्यशाला के संयोजकों में से एक था| अब उनका यह परिवर्तित तेवर चकित करने वाला था| उनके कथन में आए “सुना है” को अपेक्षित सावधानी से ग्रहण करते हुए सूरज ने लिखा- “अगर ये सच है तो दिल्ली के प्रगतिशील इसे बाहर करें ... वरना वे भी जातिवादी कहायेंगे...” फैजाबाद के अनिल कुमार सिंह ने राज़ खोला- “क्या बात करते हैं| ये जलेस का उपसचिव है| बाभन होने के प्रताप से ही|” अनिल ने यह भी बताया कि “अभी धनबाद के सम्मलेन में” इसे उपसचिव बनाया गया है| उन्होंने अरुन कुमार से उनके ‘जय श्रीराम’ वाले रहस्योद्घाटन के बावत डबल भाईचारे के साथ पूछा- “इसकी सही सूचना कैसे मिलेगी भाई अरुण भाई”| उन्हें उत्तर मिला- “सर तथ्यों के साथ मिलते ही आपको भेज दूँगा, कुछ चीजें हाथ लगी हैं”| हाथ लगने वाली वे ‘कुछ चीजें’ क्या थीं इसके बारे में न अनिल सिंह ने पूछा न किसी और ने| विकी प्रताप सिंह ने बेशक ‘कुछ चीजें’ हाथ लगने पर उल्लसित स्वर में लिखा- “सत्य ज्यादा दिन छुपता भी नहीं|” उल्लास को चेतावनी से नत्थी करते हुए उन्होंने दूसरी पोस्ट लिखी- “भेड़ की खाल में भेड़ियों की कमी नहीं है... भगाओ नहीं तो खा जाएगा|” विकी प्रताप सिंह ने अपनी दोनों पोस्ट रोमन में लिखी| सुभीते के लिए मैंने उसे नागरी में लिखा है| सूरज ने उनके उल्लास को ईंधन मुहैया कराते हुए कहा- “बिलकुल साथ मिलकर भागेंयेगे साथी|” मानना चाहिए कि ‘भागेंयेगे’ से उनका आशय ‘भगाएँगे’ ही रहा होगा| अनिल सिंह ने अपने क्रोध का दमन उचित न समझकर नई पोस्ट डाली- “अगर ये प्रगतिशील है तो सूरज पश्चिम में उगता है!!” सूरज ने इस पर विषादी टोन में कहा कि “लेकिन सब इनको प्रगतिशील तो कहते हैं ..?” अनिल सिंह ने विषाद का तोड़ निकालते हुए जोड़ा- “कहते नहीं भाई इसे जलेस के जातिवादी नेतृत्व ने उपसचिव बना दिया है संगठन का|” विषाद दरका तो सूरज ने फिर पोस्ट लिखी- “तब तो ये ठीक से धरे जायेंगे अब ... आप वो रपट भेजिये .. दक्षिण वाली रपट मेरे पास आ गई .. कुरुक्षेत्र वाली भी आयेगी जल्द..” साथी को उत्साहित पाकर अनिल सिंह ने उकसाया- “ये नए दलित लेखक साथियों की भोली महत्वकांक्षा को भुनाता है उन्हें इधर उधर छपवा कर|” अरुन ने उत्साह में भरकर लिखा कि छपना चाह रहे ये लेखक “छपास रोग से ग्रस्त” हैं| धनबाद वाले कार्यक्रम की डिटेल्स मुहैया न करवा सकने के मलाल में डूबे अनिल सिंह को तिनके का सहारा मिला| तिनके को उन्होंने तिल समझा और मुहावरे के अनुसार ताड़ मानकर उस पर चढ़ गए| कल्पित ताड़ ने कल्पवृक्ष का काम किया| इतनी ऊँचाई पर पहुँचे कुंठामूर्ति अनिल को वह सब दिखा जिसका वे तसव्वुर कर रहे थे! उत्सवमूर्ति की मुद्रा बनाए मंडली के रंजनार्थ उन्होंने यह पोस्ट लिखी- “अयोध्या में इसने दलित आंदोलन के साथियों में फूट डाल दी| प्रेस क्लब में मीटिंग में इसका व्याख्यान सुनने आए आधे लोग संघ परिवार के थे| मैं अखबार की कट्टिंग भेज दूँगा| हालाँकि संजय भारतीय, आशाराम जागरथ और सी.बी. भारती जैसे वरिष्ठ दलित लेखक साथियों ने इसको कस के लतियाया भी था अपने जवाब में| तुलसीदास से समन्वय करवा रहा था|” मनोवांछा पूरी होती देख सूरज ने पहले तो “अखबार की कट्टिंग” भिजवाने का अनुरोध किया फिर याद आने पर कि सारा अभियान तो फेसबुक पर चल रहा है, अपने को सुधारते हुए अपनी बिंदु-बहुल शैली में लिखा- “भिजवा दीजिये भाई ... वो सब चाहिये ... यहीं पोस्ट कीजिए सब देखें इनकी प्रगतिशील करतूत ..” चर्चा में डॉ. राजेश चौहान जुड़े और दिशा दी- “छल करना ब्राह्मणवादी संस्कृति की पहचान है, आप उनके मिथकों को ही देख लीजिए|” इस स्थापना की संपुष्टि की आनंद सागर ने| अपनी विचित्र रोमन वर्तनी में उन्होंने लिखा- “प्रगतिशीलता नहीं ये भेड़िये है जो मेमनों की मास्क (masque) पहने हुए है, हमें उन्हें अनमास्क करना ही होगा ...” कुंठामूर्ति की उक्त पोस्ट से संकेत ग्रहण कर अरुन कुमार ने बताया- “भाई साहब इस घुसपैठिये को संघी लोगों से भी कोई ऐतराज नहीं है तभी तो उनकी गोद में बैठकर कार्यक्रम कर रहे हैं|” चर्चा में देर से प्रवेश करने वाले नामदेव ने ‘विचार मिमांसा’ की और कहा- “ऐसे में कुछ पंगु अछूत लोग अभी भी इस पंगु दर्शन के भक्त बने हुए हैं जिनकी बिना पर ये सर्वज्ञ महामानव इतराते हैं, इठलाते हैं|” इस विमर्श को बलराज सिहमार ने धोखा-पद्धति पर मौलिक चिंतन करते हुए इस तरह आगे बढ़ाया- “धोखा देना, वो भी पीछे से, झूठ बोलना ये तो पुरानी परंपरा है इनकी.....” डॉ. के.के. कुसुम ने अपना सच अपने विन्यास में सामने रखा- “हम तो इन चोटी जनेऊ धारियों का प्रारम्भ से ही धुर विरोधी रहे हैं!’ सूरज ने तुरंत जवाब दिया- “मैं तो बहुत पहले से ही इनको समझ गया था सर” | इस बार असंग घोष ने उफनते रोष के साथ लिखा- “ये घालमेल में सिद्धहस्त है|” लखनऊ से वीरेन्द्र यादव ने जोड़ा- “विरादराना संबंध तक तो ठीक है, लेकिन घुसपैठिया बनकर जबरन प्रवेश करने के अपने खतरे है|” ‘घुसपैठियों से सावधान’ कहते हुए भी तो घुसपैठ की जाती है! नीलम जेएनयू की पोस्ट आई- “और भी लोग घुसपैठ करने का प्रयास कर रहे हैं सूरज जी|” ईश कुमार गंगानिया ने अपना नजरिया रखा- “क्या आप समाज के बिकाऊ लोगों को रोक पाएंगे जो बिकाऊ होने का टैग लगाए घूम रहे हैं और खुले आम बिक रहे हैं? जरा इस नजरिए से भी सोचें...” सूरज ने उन्हें उत्तर दिया- “ये बेनकाबी अभियान है सर ... बिना प्रमाण के बात नहीं हो रही ... इसी पोस्ट पर देखिये कितने प्रमाण आ गये ..” सम्मोहित मंडली कैसे पूछ पाती कि वे प्रमाण कहाँ हैं! अपनी पोस्ट पर मिलने वाले ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ को सूरज शायद प्रमाण मान रहे थे! प्रफुल्ल रंजन ने ‘स्थापित दलित साहित्यकारों’ को सुझाव दिया कि वे ‘प्रगतिशील अवसरवादियों’ को समझें| नरेश बंजारा ने लोकतंत्र में सरकार द्वारा खड़े किए गए पैरासाइट के विरुद्ध सड़कों पर उतरने की सलाह दी| प्रह्लाद दास ने शिवपालगंजी फार्मूला सुझाया- “डीटीडीसी अच्छा कोरियर सर्विस देता है| एक फटा जूता भेज दीजिये|” यहूदीकरण अभियान को तार्किक परिणति तक पहुंचाते हुए सत्य प्रकाश ने लिखा- “मेरा मानना है सर कि ब्राह्मण केवल ब्राह्मण होता है| इसके अतिरिक्त यदि कुछ होता है तो उसका ढोंग|” गौतम रावत ने इस उपसंहारात्मक कथन को तत्काल अपना समर्थन दिया| अब तक अनिल सिंह ने प्रमाण जुटा लिया था| उन्होंने दो अखबारों की क्लिपिंग लगाई| पहली कतरन में जो रिपोर्ट थी उसका शीर्षक था- ‘अटपटे ही रहे हैं दलित साहित्य व राजनीति के रिश्ते’ और दूसरी रपट का शीर्षक था- ‘चिंतन का प्रणालीगत होना आवश्यक है’ | दोनों में से कोई भी रपट उनकी किसी भी बात का संकेत नहीं दे रही है| ऐसा लगता नहीं कि उन्होंने इन कतरनों को पढ़ने की जहमत उठाई हो| वैसे, पढ़ने की जहमत उठाते कोई नहीं दिखा| नहीं तो इन अखबारी कतरनों में आए तथ्यों को कुंठामूर्ति की इलहामी बातों से मिलान का काम संपन्न हो जाता!
लेखक सूरज बडत्या और उनकी एक कृति 


इसके बाद नैमिशराय जी ने अपनी उत्सुकता प्रकट की- “सूरज जी, आप उस प्रगतिशील ब्राह्मण का नाम क्यों नहीं बताते है, क्या उससे डरते है? आप में हिम्मत नहीं है तो मैं बता दूँ|” बलरामपुर के हिंदी अध्यापक चंद्रेश्वर ने ज़ोर देकर कहा- “नाम आना चाहिए|” सूरज ने पुनः अपनी शैली में राज़फाश किया- “बजरंगी उस्ताद को बिहारी ... से लेकर तिवारी तक सब जानते हैं ...” हरे प्रकाश उपाध्याय ने अट्टहासी इमोजी के साथ लिखा- “हनुमान जब नाम सुनावे भूत-पिशाच निकट नहीं आवे” इसके बाद चंद्रेश्वर ने भाईचारे की भावना को मजबूती देते हुए कहा- “बहुत सही शिनाख्त की है, भाई सूरज बड़त्या जी ने| दलित विमर्श के नाम पर पता नहीं क्या-क्या लिखते रहते हैं| सब गड्डमड्ड है|” मुहावरे के निहितार्थों से बेपरवाह आत्मश्लाघा में डूबे शब्द इस तरह प्रगट हुए- “जानते सभी थे बस घंटी बांधने में कतरा या हिचक रहे थे ....” यह सूरज की पोस्ट थी| मेरे पास जो प्रिंट आउट है उसमें यही तक की प्रविष्टि है| इसके बाद किसने क्या लिखा, नहीं मालूम| मालूम करने की इच्छा भी न रही| स्थालीपुलाक न्याय के तर्क से इतना पर्याप्त लगा|

 सूरज बड़त्या की जिस पोस्ट से यह अभियान शुरू हुआ उसमें कई झोल हैं| अभियान में उनके सहयोगी बने पचीसेक लोगों में से किसी को यह नहीं सूझा कि वे पोस्ट-कर्ता से पूछ सकें कि दक्षिण में तो पाँच राज्य हैं ‘बजरंगी उस्ताद’ ने किस राज्य के किस शहर के किस भाग में दलित-आदिवासी के मेंटर होने का दंभ जाहिर किया था? यह बयान किस सन में किस तारीख को दिया गया? इसका अगर कोई प्रमाण है तो उसे प्रस्तुत क्यों नहीं किया जा रहा? प्रमाण देखने-जाँचने के बाद निंदा अभियान चलाना क्या उचित नहीं होता? ‘दलित-आदिवासी को लिखना सिखाता हूँ’ यह बयान ही बेहद हास्यास्पद और हल्का है| इस पर बहस करना अपनी अक्लमंदी को भी जग जाहिर करना है| उक्त बयान किसी के कान में मंत्रवत दिया गया था या वहाँ पर अन्य लोग भी थे| क्या पोस्ट लिखने से पहले किसी स्रोत से सूचना पुष्ट की गई? अगर किसी सभा में यह बात कही गई हो तो प्रिंट/इलेक्ट्रॉनिक/सोशल मीडिया में भी उसका संज्ञान लिया गया होगा| वे सबूत तो एक बार देख ही लेने चाहिए थे! ‘कौआ कान ले गया’ का हल्ला मचने के बाद सबसे पहले अपना कान टटोलना चाहिए| कौवे का पीछा करना समझदारी नहीं मानी जाती| शंकराचार्य को ‘प्रच्छन्न बौद्ध’ कहा गया है| यह ‘प्रक्षिप्त बौद्ध’ कहाँ से आ गया? अगर पोस्ट-कार शब्द-प्रयोग को लेकर सचेत नहीं है तो क्या उसके ‘फालोवर्स’ भी उसी मनःस्थिति के हैं? जिस व्यक्ति को निशाने पर लिया गया उसकी कुछ किताबें हैं, कुछ लेख हैं| क्या इनसे उक्त बयान का मिलान किया गया? यह सवाल भी किसी ने नहीं किया कि ओमप्रकाश वाल्मीकि ने किस अवसर पर, लिखित या मौखिक रूप में ‘घुसपैठिया’ कहा है| उनके एक कहानी संग्रह का नाम ‘घुसपैठिये’ (राधाकृष्ण प्रकाशन, 2003) है| इसमें इसी शीर्षक से एक कहानी है| कहानी मेडिकल कॉलेज में एक दलित छात्र की सांस्थानिक हत्या पर केंद्रित है|

 इसी तरह ‘जय श्रीराम’ वाला नारा लगाने का मामला है| अरुण  कुमार के अनुसार यह नारा मैंने कुरुक्षेत्र में लगाया| उन्होंने यह दावा भी किया कि उनके पास कुछ साक्ष्य हैं| अगर साक्ष्य हैं तो उसे उन्होंने अपनी पोस्ट के साथ संलग्न क्यों नहीं किया? बाद में भी क्यों नहीं लगाया? यह शुद्ध रूप से चरित्रहनन का, लांछित करने का प्रयास है| इसके लिए साक्ष्य का भ्रम ही पैदा किया जाता है, कभी सबूत मुहैया नहीं कराए जाते| वास्तविकता यह है कि मैं कुरुक्षेत्र गया था| प्रो.सुभाष चंद्र और उनकी टीम द्वारा आयोजित ‘हरियाणा सृजन-उत्सव’ (23-25 फरवरी, 2017) में ‘सत्ता, सृजन और समाज’ विषय पर अपनी बात भी रखी थी| मेरा पूरा व्याख्यान यूट्यूब पर उपलब्ध है| इस कार्यक्रम की विस्तृत रपट प्रतिष्ठित पत्रिका ‘देस हरियाणा’ में प्रकाशित भी हुई है| अरुन को यह सब पता होगा| नैतिकता की मांग थी कि वे अपने मनोनुकूल बनाकर ही सही, न्यूनतम सूचनाएं देते|
   दलित आंदोलन के मूल में उत्पीड़ित होने का बोध है| उत्पीड़न के विरुद्ध स्वाभिमान से खड़े होने, संगठित होने की प्रक्रिया ही दलित साहित्य को जन्म देती है| इस प्रक्रिया में जो अवरोध आते हैं या जो बाधाएं खड़ी की जाती हैं वे आक्रोश को पैना बनाती हैं| पूर्वजों की स्मृति को अपने अनुभव का हिस्सा बना सकने वाले दलित लेखक का संघर्ष गहरा, बहुआयामी और ऐतिहासिक हो जाता है| प्रधानतः अपने अनुभव तक सीमित रह जाने वाले लेखक की लड़ाई कम पेचीदा किंतु ज्यादा सटीक और धारदार होती है| पहली श्रेणी आयत्त अनुभव की है तथा दूसरी अर्जित अनुभव की| इस बीच एक तीसरी श्रेणी भी बनती दिख रही है| यह किसी महत् उद्देश्य से नहीं बल्कि कॅरियर बनाने, छवि चमकाने के मकसद से क्रियाशील हुई है| ‘सिंथेटिक विक्टिमहुड’ वाली यह श्रेणी ज्यादा आक्रामक है, अत्यधिक मुखर है| सामाजिक वास्तविकता से इसका कोई जैविक, आवयविक संबंध नहीं है| इसकी आक्रामकता भी इसीलिए सिंथेटिक है| सूरज इसी सिंथेटिक श्रेणी के प्रतिनिधि हैं|

 डॉ. कुसुम वियोगी को दिए गए उत्तर में वे कहते हैं- “मैं तो बहुत पहले से ही इनको समझ गया था सर” | इस ‘बहुत पहले’ पदबंध के क्या मायने हैं? कितना पहले? पहले समझने का क्या परिणाम हुआ? ‘बजरंगी उस्ताद’ का इस्तेमाल या उनके लिखे की उपेक्षा? जब सूरज बड़त्या ने मुझे अपनी किताब ‘सत्ता संस्कृति और दलित सौंदर्यशास्त्र’ (2010) भेंट की तो कहा कि इस पर जरूर लिखिएगा| लंबे समय तक किताब रखी रही लेकिन इस पर लिखने का मौका न मिला| सूरज यदा-कदा याद दिलाते रहे| मैंने काफी बिलंब से ‘पुस्तक-वार्ता’ पत्रिका के मार्च-अप्रैल 2016 अंक में इस पर लिखा| तब तक शायद सूरज मेरी ‘असलियत’ समझ नहीं पाए थे| समझ गए होते तो वे मेरे लिखे को अपनी तौहीन मानते और उस पर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराते| विरोध दर्ज कराने के बजाय उन्होंने मुझे अपना कहानी संग्रह ‘कामरेड का बक्सा’ भेंट किया| यह बात अक्टूबर 2016 की है| इस संग्रह का ‘समर्पण’ पढ़कर आश्चर्य हुआ क्योंकि तब तक मैं उस ‘धैर्यवान’ कांग्रेस नेता को इस रूप में नहीं जानता था- “आदरणीय/ डॉ. जनार्दन द्विवेदी जी/ को/ जिन्होंने एक नये मार्ग को चुनने और/ चलने का रास्ता सुझाया/ जो एक धैर्यवान नेता से पहले/ बुद्धिजीवी हैं!” अपनी पुस्तक कौन किसको समर्पित करता है, यह उसका अपना विवेक है| इसे भरसक मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए| लेकिन, इस प्रसंग में एक ‘बुद्धिजीवी’ के रूप में जनार्दन द्विवेदी के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति ही उल्लेखनीय बात लगी! किताब भेंट करते हुए सूरज ने अपनी सुंदर हस्तलिपि में मेरे लिए जो शब्द लिखे उन्हें ससम्मान जनता-जनार्दन के दरबार में प्रस्तुत करना चाहता हूँ- “दलित साहित्य के/ गंभीर अध्येता एवं गंभीर आलोचक/ डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी को/ इस उम्मीद के साथ/ की इसे पढ़कर सलाह/ देंगे एवं इस पर कहीं/ लिखेंगे|/ आपका/ सूरज बड़त्या/ 6/10/16”. इसके बाद उनका याद दिलाने का अभियान शुरू हुआ| मुझे इस संग्रह की पाँचों कहानियाँ ठीक लगीं थीं और इन पर लिखने का मन भी था पर पहले जमा काम निपटाने में देर लग रही थी| इधर सूरज जी व्यग्र हो रहे थे| आखिरकार मैंने अपनी प्राथमिकताओं में किंचित फेर-बदलकर संग्रह की समीक्षा लिखी| यह समीक्षा लखनऊ से प्रकाशित दैनिक ‘जनसंदेश टाइम्स’ के रविवारीय संस्करण में दिनांक 11.6.2017 को छपी| समीक्षा पढ़कर सूरज ने मेरे वाट्सएप नं. पर यह संदेश भेजा| शुक्र है कि यह संदेश डिलीट होने से रह गया- “शुक्रिया बजरंग जी ... कम शब्दों में शानदार और सार्थक लिखा है कमियों और कमजोरियों पर भी कुछ शब्द लिखते तो उचित होता ...... विस्तार लेख हो तो मुझे मेल कर दीजिये शुक्रवार को आऊँगा ... पैठे की मिठायी संग ..... सादा लंच करूँगा ...” इसके साथ उन्होंने दो स्माइली लगा दी थी| मैंने सोत्साह उसी दिन यह समीक्षा दो-तीन वाट्सएप समूहों में लगा दी थी| समीक्षा पढ़कर एक शुभचिंतक का फोन आया| उन्होंने समीक्षा पर कोई टिप्पणी करने के बजाय कहा कि “अब आपके दिन बहुरेंगे|” इस वाक्य का इतना भीषण मतलब निकलेगा, अंदाजा न था!

सूरज के व्यक्तित्व को समझने के क्रम में कई लोगों से बात करनी पड़ी| उस बातचीत का ब्योरा देना आवश्यक नहीं समझता| लेकिन जो ब्योरा लिखित रूप में पहले से ‘पब्लिक डोमेन’ में है, उसका हवाला देना जरूरी लग रहा है| यह बेहद दुखद प्रसंग है जिसे भारी मन से याद करना पड़ रहा है| ‘हंस’ पत्रिका के अप्रैल 2003 अंक में प्रसिद्ध रचनाकार-बुद्धिजीवी कात्यायनी का लेख छपा था- ‘एक यक़ीन की मौत या एक अकेली लड़ाई की शोकांतिका?’ इसमें उन्होंने अर्चना की आत्महत्या का मुद्दा विश्लेषित किया था| सूरज से अंतरजातीय विवाह करने वाली “अर्चना, जिसने वर्ष 2003 की भोर की उजास फूटने से ठीक पहले अपने लिए मृत्यु का अंधकार चुन लिया|” आत्महत्या से पहले भयंकर आत्म-यंत्रणा से गुजरते हुए अर्चना ने अपनी डायरी में जो दर्ज किया उसके कुछ हिस्से को कात्यायनी ने अपने लेख में उद्धृत किया है| उस हिस्से का एक अंश यहाँ दे रहा हूँ- “अब जब भी कोई अच्छी-अच्छी उसूलों की बात करता है, तो अंदर से हँसी और गुस्सा दोनों आते हैं कि पता नहीं खुद ये कितनी कोशिश करते होंगे| कितना process चलाते होंगे, कितना स्त्री सम्मान जैसी अवधारणाएं मन में होती होंगी| ‘बहनचोद’ जैसी गाली आम है... ‘बहन की लौंड़ी’ इस शब्द का मतलब मुझे नहीं पता पर सुन लेती हूँ क्योंकि कर्म ऐसे होते हैं और जब क्रोध इस सीमा तक आ जाए तो प्रिय बहनों को लेकर दी गई ये गालियाँ भावों की अभिव्यक्ति बन जाती हैं| घटिया आदि तो आम बात है|”



इस ट्रैजिक परिघटना की समाजशास्त्रीय व्याख्या करते हुए कात्यायनी ने लिखा- “सूरज प्रकाश स्वयं को वामपंथी विचारों को मानने वाला एक दलित बुद्धिजीवी है| ऐसे कथित वामपंथियों-प्रगतिशीलों की कमी नहीं है जो अपने निजी जीवन में पितृसत्तात्मक समाज के सभी मूल्यों-संस्कारों को जीते हैं| ऐसे तमाम लोगों को अपने ‘महान क्रांतिकारी चिंतक’ होने का खूब मुगालता होता है| पूरा समाज न सही तो कम से कम ‘उनकी स्त्री’ उनकी ‘महानता’ को, उनकी व्यस्तताओं-परेशानियों को समझे, उनकी सनक को बर्दाश्त करे और सुघड़ गृहणी बनकर उनके लिए कुर्बानी दे|” अपने विश्लेषण को समापन तक पहुँचाने से पहले कात्यायनी ने यह भी जोड़ा- “सूरज प्रकाश ऐसे ही अराजक-अकर्मक नकली प्रगतिशीलों में से एक है| जो अपने विचारों को सामजिक प्रतिष्ठा और तरक्की की सीढ़ियाँ बनाते रहते हैं, गोष्ठी कक्षों से लेकर काफ़ी हाउस तक डोलते रहते हैं और फिर रात को ‘सामाजिक-सरोकार-जनित’ अपने तनावों को शराब के प्याले में डुबोते रहते हैं| ऐसे ‘वामपंथी’ चरित्रों ने वामपंथ के विरुद्ध पूर्वाग्रह पैदा करने में अहम् भूमिका निभाई है| दिल्ली की अनुष्ठानिक सरगर्मियों और अकर्मक विमर्शों में ऐसे लोग भी खूब बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं| जहाँ कोई जोखिम नहीं सिर्फ बातों का सौदा होता हो, वहाँ भला सूरज प्रकाश जैसे लोगों के असली चेहरे की शिनाख्त भी कैसे हो सकती है?”

सूरज ने 2 अप्रैल को अपनी ‘साहसी’ पोस्ट लिखी थी| सब जानते हैं कि यह तारीख स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे संगठित, सफल और अविस्मरणीय ‘भारत बंद’ की गवाह है| ‘भारत बंद’ का आवाहन क्यों किया गया? यह सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा दलित उत्पीड़न के फौजदारी मामलों में लागू क़ानून को कमजोर कर देने से उपजा आक्रोश था| दलित समुदाय पर हिंसक हमलों में इधर जितनी वृद्धि हुई है वह किसी से छिपी नहीं है| ऐसे वक्त में ‘एससी/एसटी अट्रोसिटी एक्ट’ को ‘डायल्यूट’ किया जाना अकल्पनीय खतरे की घंटी थी| प्रबुद्ध समुदाय ने इसे समझा और ‘भारत बंद’ को जान-माल की बाजी लगाकर सफल बनाया| उधर विश्वविद्यालय में नया रोस्टर लाकर नियुक्तियों में आरक्षित तबके के प्रवेश को रोकने का फरमान आ गया| यह भी पीड़ा, बेचैनी और आक्रोश का बड़ा कारण बना| ऐसे वातावरण में सूरज ने अपनी प्राथमिकता तय करते हुए जो लिखा वह उनके चरित्र को, उनके सरोकारों को एक बार फिर जाहिर कर देता है|

मामला अगर व्यक्तिगत खुन्नस की सामान्य अभिव्यक्ति का होता तो इस अभियान के प्रति उदासीन रहा जा सकता था| इस अभियान की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो पाएंगे कि तैयारी पहले से शुरू कर दी गई थी| ‘दलित साहित्य में बजरंग दल’, ‘तिवारी की घुसपैठ’ जैसे ‘वन लाइनर’ कमेंट पहले से आ रहे थे| इस बार की पोस्ट अभियान को निर्णायक स्थिति की तरफ ले जाने की मंशा से परिचालित लगी| सूरज की पोस्ट में आए अंतिम वाक्य को देखिए- “क्या करें इनका...” यह टोन उसी प्रकार का है जैसा धर्माधारित राष्ट्रों में ईशनिंदा अपराध के मामलों में होता है| कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत किए बगैर भीड़ से ‘अपराधी’ के लिए सजा मुक़र्रर करवाने का काम इसी तरह किया जाता है| हमारे समाज में इसका ज्वलंत उदाहरण अखलाक का मामला है| कुछ इसी टोन में सोम संगीत ने भीड़ से पूछा होगा- “क्या करें इनका?” सूरज लिखते हैं- “इस बार ये प्रमाण के साथ धर लिए गए...” सोम संगीत ने इसी तरह फ़्रिज से ‘प्रमाण’ निकालकर दिखाया होगा| वह ‘प्रमाण’ इन दिनों जाने किस लैब में जाँचा जा रहा होगा! सूरज की पोस्ट फॉलो करने वालों को भी ‘प्रमाण’ की चिंता नहीं होनी थी, नहीं हुई| ‘क्या करें इनका’ वाले आह्वान पर ध्यान दिलाने के लिए एक निरापद-सा समाधान रखा गया- “कहें तो किताब लिख दें इस पे”? फॉलोअर्स ने इशारा समझा| कुछ हलके-फुलके समाधानों का संकेत भी किया| एक सलाह थी कि जैसा एक भेड़िए के साथ किया जाता है वही इसके साथ हो, दूसरी सलाह फटा जूता भेजने की थी, एक सलाह लतियाने की मिली ...| जिस वक्त देश को निजी हाथों में में सौंपने का काम तेजी से प्रारंभ हुआ- रक्षा क्षेत्र, खुदरा व्यापार और रेलवे आदि में शत-प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, किसानों की जमीन को कारपोरेट के सुपुर्द करना, शिक्षा-स्वास्थ्य-रोजगार आदि की दुर्दशा ठीक उसी समय सांप्रदायिक उन्माद में उछाल, अख़लाक़ की हत्या| लोगों का ध्यान भटकाने के मकसद में यह उन्माद निश्चय ही सहायक हुआ| जिस वक्त दलित समाज आक्रोशित है, आंदोलित है, अपेक्षाकृत संगठित है उस वक्त अस्तित्वगत, अस्मितागत राजनीतिक मुद्दे की जगह व्यक्ति-विशेष को मुद्दा बना देना संदेह पैदा करता है और एक बड़े पर्दानशीं खेल का संकेत करता है|
कथादेश से साभार 

बजरंग बिहारी तिवारी समर्थ आलोचक हैं और दलित साहित्य एवं मुद्दों पर अपने लेखन से हस्तक्षेप करते रहे हैं. 


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