देहसत्ता का रहस्य ( दूसरी क़िस्त)

प्रमीला केपी
 प्राध्यापिका, श्रीशंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय, कालडी, केरल प्रोफेसर . संपर्क :prameelakp2011@gmail.com

पढ़ें पहली क़िस्त : देहसत्ता का रहस्य (पहली क़िस्त)


देहलेखन के महत्व को स्त्रीवादियों  ने काफी पहले ही पहचान लिया था और उन्होंने देह से लेखन करने का आह्वान किया था। मूक बहनें जब आवाज निकालती थीं तबसे उनकी आवाज में देह का बोधाबोध भी प्रच्छन्न ढंग में ही सही, अभिव्यक्त होता था। स्त्रैणानुभवों तथा देहसंवेदनाओं पर जाने-अनजाने सोचती हुई स्त्रियों में देहास्तित्व का बोध जाग उठता है। देह को सामाजिक दबाव में हेय समझा जाता था, लेखन व सोचविचार द्वारा स्त्री उस निराधार निष्कर्ष को पलटना चाहती है। अब तक उसकी देह की परिभाषा एवं उसके व्यापारों की व्याख्या कोई दूसरा कर रहा था तो अब वह खुद करने लगती है। स्वाभाविक तौर पर उसके विश्लेषण में स्त्रीपक्षीय तथा स्त्रीविरोधी पक्ष उभर आते हैं। अर्थात् पुंससमाज में जीवित-परिपोषित जीव होने के कारण उसके कार्यों में वर्चस्ववादी छाप लगना संभव्य है। स्त्रीवादी लेखन इस स्वाभाविकता को धीरे धीरे ही सही, टालने का काम भी है। विनिर्मित वस्तु से जीवित-प्रस्फुटित आत्मा और देहयुक्त स्त्री का विकास यहॉ से शुरू होता है। देह की नई व्याख्या देखकर दुनिया झुंझलाती है। मोली हेट ने बताया था कि ऐसी स्त्रियॉ पुंस संसार केलिए सिरदर्द बन जाती हैं, जो स्वात्म देह संबन्धी नव व्याख्याओं के साथ लेखन करती हैं। क्योंकि उनके द्वारा प्रयुक्त एवं प्रक्षेपित देहार्थ भिन्न या अलग है।7  गजब नहीं कि चालू तथा व्यवहृत परिभाषा पर प्रश्नचिह्न लगानेवाली स्त्री-यौनाभिव्यक्तियों पर पुंसभृकुटियॉ चढ लेती हैं। इस क्रम में परंपरागत अर्थसंसार में नवार्थ जोडा जाता है, जो बंद अर्थ के सामने मुक्त-अर्थ प्रसारित रखता है।

हेलेन सिसु जैसी नारीवादिनों ने स्त्रियों से शरीर को देखने-परखने-स्वीकार करने का आह्वान इसलिए किया था कि पितृदायक समाज, स्त्रियों की देह और यौनिक वृत्तियों से अलग होने-रहने का अभिनिर्णय सुनाता है। दैहिक शुद्धता एवं नैतिक पवित्रता के पुंसमापदंडों में स्त्रीदेह का घोर-अपमान किया जाता है। सिसु के मतानुसार इस अपमान को समाप्त करने केलिए नई भाषा में अभिव्यंजना अनिवार्य है, जिसमें बेधने की शक्ति एवं धिक्कार की उूर्जा हो।8  गर्भ, प्रजनन, मातृत्व आदि देहकार्यों के सही वर्णन से दैहिक दासता व पारिवारिक गुलामी का अहसास स्त्रियों में संक्रमित होता है। यहॉ तक शौच्य तथा प्रसाधन संबन्धी कठिनाईयॉ उसपर मानसिक अन्यता थोपती हैं और उसे दूसरे खेमे पर धकेलती हैं। इन मानसिक स्थितियों को खोल रखनेवाली रचनाएं स्त्रियों केलिए अनिवार्य हैं। स्वाभाविक रूप से इनपर अश्लीलता, यौनता, असभ्यता के आरोप लग जाते हैं। शरीर व शारीरिक अवयवों के चित्रण में खतरा इसलिए है कि सामान्य समाज में इनके पुंस निर्मित अर्थ में ही प्रचलित व स्वीकृत हैं। उदाहरणार्थ योनि शब्द सुनते या पढते ही लोग उसके पूवार्थ पर ही सोचते हैं। इस क्रम में दूसरी विडम्बना यह है कि स्त्रियों के संदर्भ में इंसान का इंगित अक्सर देह मात्र रह जाता है।  उसपर यौनदृष्टि से देखा जाता है मानो यौनता के अलावा उसकी कोई दूसरी उपादेयता या कर्म है ही नहीं है। प्रेम में हो या मातृत्व में, स्त्रीदेहवर्णन में हर कवि अपनी मर्दवादी फान्टसियों में गोता लगाता है। विपरीत में सोचता है तो एकाधिक पुरूषों से संपर्क रखनेवाले स्त्रीपात्रों को, लेखिकाएं भी सदाचारविरोधिनी चित्रित करती हैं। हो सकें तो कहानी व उपन्यास के अंत में उनका नाश, पूर्वनिश्चित सा प्रस्तुत करती हैं। ऐसे उदाहरणों से कुलस्त्री व कुलच्छनी, स्वकीया व परकीया का द्वन्द्व खडा करके सामाजिक सदाचार व पारिवारिक सद्भाव को निर्दिष्ट किया जाता है। इस तरह अधीशत्व के परंपरागत पुरूषमूल्य को परोक्षतया स्त्रियॉ भी स्वीकार करती हैं। स्त्रीचरित्र को अहम स्थान देनेवाली भारतीय सभ्यता ने, कबसे, क्यों और कैसे इस तरह की स्त्रीनिंदा या सामाजिक दोहरापन चालू किया है, यह देखने के बजाय, अपनी परिधि खोलनेवालियों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष निंदा प्रकट की जाती है। आसार की बात है कि कई संदर्भों पर ये रचनाएं, मात्र स्त्रियों को नैतिक नियमों की संरक्षक बनानेवाली सामाजिक विडम्बना पर परोक्षता प्रश्न करती हैं। उनसे प्रतिकार करनेवालों के अनुसार सभी सामाजिक परिसंपत्तियों का स्वामित्व पुरूषों को दिया जाता है तो नैतिकता का दायित्व भी उसे ही देना और संभालना है।



स्त्रियों के देह विषयक आकलनों को नवसांस्कृतिक विश्लेषण केलिए उपयुक्त करना है। भले ही इनमें कई, यौनचित्रण के नाम पर मशहूर हैं, उनका साहित्यिक कार्य इस विषय को सिर्फ खोल देने भर में नहीं है। उनपर जीवन व मानवीय संबन्धों का बृहद् पाठविमर्श तैयार किया जा सकता है, जिनसे स्थापित-प्रवर्तित मापदंडों पर शंकाएं उभर आ सकती हैं। आधुनिकता के द्वन्द्वात्मक दर्शन से अभिप्रेरित व्यवहारों के कारण पुरूष पर जीत हासिल करने की इच्छा पालनेवाली स्त्री भी समाज में है। इसका कारण यह नहीं है कि वह स्वामिनी बनना चाहती है, कारण यह है कि वह हमेशा हारी हुई पाती है। उसका प्रयास पुंसाधिपत्य की दुनिया में कठिन है, कई संदर्भों पर असंभव है। समाज, संस्कृति, राजनीति व संबन्धों के सभी तत्व पुरूष के साथ और हाथ में हैं। इस कथन का यह भी अर्थ निकलता है कि उपर्युक्त सामाजिक अधिकारव्यवस्था में ही पुरूष बलशाली है, अन्यथा वह भी अकेला और दुर्बल इंसान है। अतः पुरूष को अधिकारी बना कर रहनेवाले सामाजिक-संजाल को विखंडित एवं विघटित करना है ताकि पुरूष और स्त्री समकक्ष के प्राणी होकर जीवित रह सकते हैं। अधीशत्व के जाल में हमेशा शिकार और शिकारी का द्वन्द्व होता है, जिसे तोड देने केलिए द्वन्द्व का फासला कम करना है। स्त्रदेखल से कम से कम, फासला कम होने की उम्मीद बनी रहती है।

द्वन्द्वात्मक दृष्टि से देखा जाता है तो पुरूष को हराने या वश में करने केलिए यौनता स्त्री का सहायक उपकरण बन सकती है। इस तरह की कहानियॉ पुराण व इतिहास में उपलब्ध भी हैं। इनमें संस्थागत स्वरूप में यौनता का उपयोग वर्णित है, जहॉ पर उसका संवेदनापक्ष गौण या सीमित है। आंखों से नायक को नियन्त्रित रखनेवाली नायिकाएं पुरातन काल से साहित्यिक रचनाओं में आती हैं। पुंसत्व को वशीभूत करके, उससे समकक्ष का अस्तित्व स्थापित करनेवाली नायिकाएं बाद में उभर आती हैं। मर्दवादी, हिंसाप्रेमी, स्त्रीशोषक खलनायक को अपने वश में करनेवाली स्त्री का प्रतिपादन पहले सकारात्मक माना जाता था। बाद में इस दृष्टिकोण का उतना स्वागत नहीं किया जाता है। राष्ट्र् या समुदाय के हित में खलनायक को काबू में लेनेवाली नायिका, पाठकों या दर्शकों को गहरा छू लेती है। उसका सम्मान किया जाता है। परवर्ती विरचना में स्त्रीराजनीति के आख्यानों के बल पर ऐसी रचनाओं की यही व्याख्या की गई कि ये सब सत्ता एवं संरक्षकों द्वारा किए गए स्त्रीशोषण के उदाहरण हैं। स्त्रीयौनता के साहित्यिक एवं कलात्मक उदाहरणों के द्वारा स्त्री व पुरूष के बीच विद्यमान इस विषयक दृष्टिभेद की चर्चा आज संभव है। कठोर अवमानना और उपेक्षा के बावजूद, बच्चे या परिवार की खातिर त्याग सहनेवाली गृहस्थिनों व औरतों की कहानियॉ बहुत हैं। स्त्रियॉ भी इस मानसिक अभिभूतता या सामाजिक अनुकूलन की शिकार होती हैं कि प्रशासन या सत्ता की खातिर आत्मत्याग व देहत्याग में बड्डप्पन है।

बताया जाता है कि जहॉ पर स्त्री अपनी यौनता खोल रखती है वहॉ पर पुरूष भयभीत हो जाता है। इस कारण से भी वह निषेधों का संस्थागत जाल बुनता है और स्त्री को परिधिबद्ध कर देता है। अपनी इच्छा और मर्जी में विकल्पों की तलाश करनेवाला पुरूषसमाज, उन स्त्रियों को बदचलन घोषित कर देता है जिसके पास वह जाता है। प्रेम तिरस्कार के मारे आसिड अटैक, आक्रमण या हत्या कर देनेवाले प्रसंगों में यह स्वार्थ पाशवीयता, अमानवीयता और सादवाद में परिणत हो जाता है। तमाशा यह है कि सामाजिक व सांस्कृतिक जगत में स्त्री द्वारा यदि चयन किया जाता है तो उसे तुरंत यौनकुंठित घोषित किया जाता है, यह जरूरी नहीं कि वह यौनता संबन्धी मामला हो। मतलब है कि पितृदायक संसार में चालू स्त्रीनिंदा के सभी शब्द, यौनसूचक भी हैं। विपर्यय यह भी है कि यौनता के प्रसंग में पुरूष का वशीभूत होना स्वाभाविक माना जाता है, वहॉ पर स्त्री खलनायिका है, शिकारी है। उसका कार्य बोधनियन्त्रित है, सदाचार के खिलाफ भी है, जबकि सकल बलशाली घोषित पुरूष भोलाभाला है, जो किसी की कनखियों पर फिसल जाता है।

यह बताना होगा कि यौनता विषयक या सूचक रचनाएं, उस संबन्धी सदाचारवादी नियमों के उल्लंघन या अतिलंघन की प्रेरणा में ही लिखी नहीं जाती हैं। कई प्रसंगों में, स्त्रीपक्षीयता का विश्लेषण और परंपरागत यौनता के विखंडन केलिए उन्हें उपयुक्त किया जा सकता है। इसलिए संदेह नहीं होना चाहिए कि ’प्यार में डूबी हुई मॉं’9  जैसा विषय जब तक किसी एक व्यक्ति तक की नजर में असभ्य एवं अश्लील है, तब तक उस कविता का सृजनात्मक व वैचारिक मूल्य सामाजिक एवं साहित्यिक जगत पर स्वीकृत होता रहता है। सच यह है कि सभी काल व समय में, सभ्यता ने प्यार में डूबनेवाली मॉओं व पत्नियों को सामने पाया है। उनपर, उनकी देहाकांक्षाओं पर ऑखें मूंदने से कोई विशेष लाभ नहीं है, बस इससे सामाजिक कपटता का परिचय मिलता है। यह सहज है कि कोई मॉ या पत्नी, किसी आदमी या औरत के प्यार में डूब जाती है। सदाचारवादी निष्कर्ष देने में नहीं, वैचारिक उद्वेलन छेडने में रचनाओं का कार्य है। यौनता को अश्लीलता या श्लीलता के परे सांस्कृतिक एवं सृजनात्मक बनाए रखने में खुली तथा व्यावहारिक दृष्टि की महती भूमिका है।



यौनता का भी अपना स्वनिर्णीत जैविक परिधियॉ हैं, होनी चाहिए। वह किसी धर्म या समाज के निर्दिष्ट नियमों के अधीन नहीं हैं। वासना से लैस आंखों से स्त्री देह को देखनेवाली पुंसदुनिया से लेखिकाएं यह बताना चाहती हैं कि उनमें भी यौनता है, देह संवेदना है, जो जैविक प्रवृत्त होती है। यह बताती हुई उसे कोई बदचलन पुकारता है तो उससे उसका कोई लेनादेना नहीं है। क्योंकि जो व्यक्ति इस विषय पर गत्यात्मक नहीं है, उसपर सकारात्मक सोचता तक नहीं है, तो उसकी किसी राय या अपशब्द से परेशान होने का कोई अर्थ नहीं है। दांपत्य के बाहर जाने की नियति हो या कुलमहिमा से भागने की कोशिश, स्त्रियों की यौन-यात्रा संस्थागत गुलामी से बाहर होने की नीयत रखती है। उसमें खुद की देहमहिमा को सुरक्षित रखने की नीयत भी शामिल है। इसलिए कहानियों व उपन्यासों में हो या कला या फिल्मों में, परिवार के भीतर होनेवाले बलात्कार, माने मेरिटल रेप का वे वितृष्णापूर्वक बखान करती हैं, जिसके अतिरेकों व आक्रमणों पर धर्म, समाज व सत्ता हमेशा मौन रहती है। धीरे धीरे ही सही, स्त्रीपक्षीय कला व साहित्य में वैवाहिक संस्था के भीतर चालू अतिरेकों व शोषणों का परिचय हो ही रहा है। पति सहित समस्त पुरूषों के देहशोषण पर प्रतिकार करनेवाली औरतें, वैवाहिक यौनता के संस्थागत अधीशत्वों को बाहर रखना चाहती हैं। बताया जाता है कि बलात्कार से पीडित लडकी या स्त्री को जीवनभर उसकी खौफनाक याद सताती है। यौनता से प्रेरित समझाए जाने के कारण उस कृत्य पर वह जुगुप्सात्मक ही सोच सकती है। असल में यौनता के साथ बलात्कार का संबन्ध पुर्नविश्लेषित करने का समय आया है। मनोवैज्ञानिकों व समाजवैज्ञानिकों का मत है कि बलात्कार शिकारी मानसिकता से प्रेरित पाशविक आतंक है, उसमें देहानंद नहीं है। बदले में यौनता तन-तन की संवेदनात्मक स्फूर्ति है, जिससे इंसानों को अनंद मिलता है। अतः शारीरिक निंदा, चाहे वह घर के बाहर घटित हो या भीतर, उसे अलग-अलग देखने की पुंसवादी कपटता को स्त्रीविमर्श खोलने का प्रयास करता है। भर्ता के सामने खुली व त्यागमयी रहने का हठ सुनानेवाली पुंसदुनिया सार्वजनिक जगहों पर स्त्री से बंद और सीमित रहने का जिद् करती है। यह देहसहित स्त्री की भी निंदा बन जाती है। फिर भी पति के सामने ’सबकुछ’ प्रस्तुत करनेवाली कुलवधु औरत को छोडकर पति बाहर जा सकता है, जाता भी है। पर पत्नी का किसी भी कारण पर बाहर झांकना, सामाजिकता के खिलाफ होनेवाली यौनिक उच्छृंखलता है। अतः जब तक उसका बदन है, तब तक उसपर घरेलू भावशुद्धि का आवरण बना रहता है।

कात्यायनी की एक कविता है-’देह न होना’। उस कविता में देह को स्त्री मानने की दुनियाई अतिरेकता का बयान है-देह नहीं होती है/ एक दिन स्त्री/ और/ उलट-पुलट जाती है/ सारी दुनिया/ अचानक!10  देहजन्य यह अन्यताबोध, किसी पुरूष की कलम से इस तरह अभिव्यक्त होता नहीं है। काया, कभी उसे इस प्रकार का कचोटता अनुभव नहीं देती है। बदले में वह कर्ता एवं भोक्ता की जिस्मानी खुशी एवं मजा व्यक्त करता है। कालबोध की नवधारा में कभी उसे अपराधबोध महसूस होता है कि वह ठीक नहीं कर रहा है-मैं उसे प्रेम नहीं करता था/ मैं उसे अब भी प्रेम नहीं करता/ मैं उसे पसंद करता था/ मैं उसे पाना चाहता था/ दरअसल मैं उसकी देह को पाना चाहता था।11

स्त्री का स्त्री के प्रति जो स्नेह या प्रेम हो सकता है, होता है, उसपर मात्र यौनदृष्टि डालना सदैव ठीक नहीं रहता है। आपसी साझेदारी लिंगस्तर के द्वन्द्वपूर्ण मिश्रण का मात्र कमाल नहीं है। समान लिंगजीवियों के बीच में भी जीवन की साझेदारी हो सकती है। उनके बीच में यौनिक साझेदारी भी है तो उसे संवेदनात्मक परिणति के रूप में देखने की विशाल मानसिकता, लोकतंत्रीय जगत को स्वायत्त होनी चाहिए। इंसानी रिश्तों को व्यापक मानने व बनाने केलिए लोकतंत्रीय यौनदृष्टि की सख्त जरूरत है। यौनता की विभिन्न रीतियों पर युक्तिसंगत देखना-समझना है। शीला किटसिंजर के मतानुसार समलिंगस्तरीय जीवों के बीच का संबन्ध, आत्मविश्लेषण केलिए उन्हें तैयार करता है, जिससे प्रेम को लेकर उनकी परंपरागत जानकारियों व संस्थागत सीमित अभिरूचियों में विस्तार आ जाता है।12  ठीक तरह देखा जाता है तो यह मालूम होता है कि इस विषयक रचनाएं साझेदार लोगों केलिए ही नहीं, परिवार और समाज के सदस्यों को भी आत्मविमर्श, समाज विमर्श एवं सत्ताविमर्श का अवसर देती हैं। पवन करण की कविता ’मौसेरी बहनें’ की पंक्तियॉ इस प्रसंग में किंचित परिचय सामने रखती हैं, जिनपर स्त्रीपक्षीय व विरोधी वाचन संभव हो सकते हैं-’दरअसल उन्हें उपेक्षाओं ने मौसेरी बहनें बनाया है/ निराशा ने बनाया है उन्हें एक-दूसरे के प्रति विश्वसनीय/ एक-दूसरे केलिए दीवार की तरह डटकर खडे हो जाना/ उन्हें चाटने को लपलपाती जीभों ने सिखाया है।’ 13 संदर्भवश यह जोड देना है कि कवि की पंक्तियों में गुंफित पुरूषदृष्टिकोण की सीमाएं खोल देनेवाली पाठिका का यह दायित्व भी है कि उसमें या उससे प्रवाहमान स्त्रीवादी दृष्टि को अग्रषित करे और उसे अपनी दृष्टि से मिलाकर व्यापक बनाए। पूरी प्रक्रिया में यह ध्यान रखे कि नकारात्मक या विपरीत पक्षों पर पाठकीय-जश्न संपन्न न हो, जिससे अंततः पुंसवादी रवैया मजबूत बनने का सामाजिक खतरा व्यापृत होता है।

परिवर्तित दुनिया के अनुकूल, इंसानी संबन्धों की विविधता एवं व्यापकता को समझाने की खातिर ऐसे प्रसंगों का स्त्रीपक्षीय वाचन अनिवार्य है। इंसानी रूचियॉ और भावात्मक संवेदनाएं स्थायी नहीं हैं, उन्हें निर्दिष्ट बताने का श्रम असंगत है। यौनता भी जीवन भर की स्थायी संवेदना नहीं है। पुरूषदुनिया से अपनी स्नेहाकांक्षाओं की पूर्ति नहीं होती है, तो यह सहज संभव्य है कि कोई इंसान उसका विकल्प तलाश करे। घरेलू क्षेत्र में प्रताडनाएं और उत्पीडन सहना पडता है तो कोई स्त्री, अपनी सहेली से सांत्वना खोजती है, जो उसकेलिए स्वाभाविक आसार बन सकती है। पति व घर की सुरक्षा होते हुए भी यदि स्त्रियॉ इस तरह की बाहरी सांत्वना चाहती हैं तो यह भी समझ लेना चाहिए कि उनकी यौनता, मात्र देहकेन्द्रित कार्य नहीं है। संवेदनात्मक दुनिया में देह के साथ मन की अभेद्य अनुभूतियों का समवाय है। पारस्पर्य की खोज में स्त्री बाहर झांकती है। यदि उसे वह घर के भीतर मिलता है तो वह बाहर झांकने की नीयत नहीं रखती है। सामान्य अर्थ में ही परिवार के बाहर झांकनेवाली स्त्रियॉ पुंसव्यवस्था और पुंसकेन्द्रित कुटुम्बव्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। इसलिए स्त्रियों के घनीभूत संवेदनात्मक आदर्श में एक साथी हमेशा बना रहता है, जिसके साथ उसका प्यार और आनंद का सपना हमेशा बना रहता है। गतकालीन कवयित्रियों में कई ने उसे ’कृष्ण’ पुकारा था।



बताया जाता है कि स्त्री केलिए यौनता, मात्र लिंगावयवों की कार्यकलापी अभिव्यंजना का आविष्कार नहीं है। स्त्री की पूरी देह उस कर्म में सहायक है। तभी देह का अपमान उसे आत्म का अपमान लगता है। यौनता उसकेलिए आनंद का एकोन्मुखी कार्य नहीं है, बदले में वह उसका प्रेम विनिमय है, जीवन की समग्रता का स्त्री-अनुभव है। लेन-देन के परे विद्यमान समग्र अनुभव के पल तभी उसे स्वायत्त होते हैं जब वह एकाधिक से एक बन जाती है। उन पलों को वह स्थायी बनाना चाहती है। इसलिए वह आदर्श साथी की खोज करती है। मतलब पुरूष केलिए यौनता जहॉ अस्थायी और पलभर का अनुभव है, स्त्रीदेह उसके विपरीत में जाकर उसे समग्र अनुभव बनाना चाहती है। जोड देना है कि पुंसाधिपत्य की दुनिया में वह इस अनुभव से अधिकतर वंचित रहती है। दूसरे स्त्रीसंबन्धी विषयों के समान यौनता पर भी स्त्रीलेखन की परंपरा गौण है। साथ ही इस विषयक पाठों में पुंसदृष्टिकोण मुखर है। इनकी बताई राहों पर ही काफी समय तक स्त्रियों की रचनाएं चली आई हैं, अबकी स्त्रीपक्षीय रचनाएं इनसे भिन्न होकर अलग धारा पकडने लगी हैं। इस धारा की रचनाएं आत्मस्नेह, वर्गप्रेम आदि के साथ स्वत्वविमर्श को भी संभालने का रूख रखती हैं।

मलयालम की मशहूर एवं वरिष्ठ लेखिका ललितांबिका अंतरजनम् की एक विशिष्ट कहानी ;प्रतिशोध की देवीद्ध का जिक्र इस प्रकरण को ठीक तरह से व्यक्त कर सकता है। एक उत्तम पत्नी अपने पति से जीवन की समग्रता में साथीपन चाहती है। लेकिन पति, अपनी मर्दवादी आजादी में दूसरी स्त्रियों के पास जाता है। पत्नी को खाना-पीना और आवास तो देता है। पर जब भी वह उसके पास जाती है, भगा देता है। पुरूष के पास यौनपूर्ति केलिए विकल्पों की गुंजाइश है, वहॉ स्त्री ब्याहे पति से भी वंचना एवं उपेक्षा सहती है। पत्नी से वह बताता है कि उसे शयनेषु वेश्या पसंद है। पति बाहर जाता है, तो उसके पास कोई विकल्प नहीं बचता। वह पति के आदेशानुसार, देह की खुशी खोजती है, वह वेश्या बनने का प्रयास करती है, बदचलन घोषित होती है। उसके खाते में अपना न्याय है। वह सोचती है कि शीलावति अपने पति की इच्छापूर्ति में शीलवति और सुचरिता घोषित हुई थी। यहॉ पर वह अपने देव समान पति की इच्छापूर्ति केलिए ही वेश्या बनती है। अतः वह भी शीलवति और सुचरिता है। सभी उसके पास आते हैं, अब वह सिर्फ उस पुरूष की प्रतीक्षा में खडी है, जिसकेलिए वह वेश्या बन गई। प्र्रतीक्षा की परिणति में एक दिन पति वेश्यागृह पहुॅचता है, पर सामने उसे पाकर भयभीत, चिल्लाता हुआ भाग जाता है। अपनी यौनता पर फैसला करनेवाली स्वाधीन स्त्री को पाकर भागने के अलावा पुरूष के पास दूसरा चारा नहीं है। यह भी बताना उचित है कि यहॉ पर एक स्त्रीकहानीकार सोच समझकर ही अपनी स्त्रीपक्षीय कहानी की परिधि से यौन-स्वार्थी पुरूष को भगा देती है, जो उनकी साहित्यिक प्रतिबद्धता का सही लक्षण है।

संदर्भः 
  7. Hite, Molly.1988, Writing and Reading The Body:Female Sexuality and Recent Feminist Fiction, Feminist Studies14.1,p.121
  8. Cixous, Helen.1981, The Laugh of the Medusa in, Elain Marks & Isabelle de Courtvron (eds), New French Feminisms, Sessex: The Harvester Press. P.246
  9. पवनकरण। 2004, प्यार में डूबी हुई मॉ, स्त्री मेरे भीतर, नईदिल्लीः राजकमल प्रकाशन, पृ 91
  10. कात्यायनी। 2008, देह न होना, सात भाईयों के बीच चम्पा, लखनउः परिकल्पना प्रकाशन, पृ 16
  11. पवनकरण। मैं उससे अब भी प्रेम नहीं करता, उपरोक्त,पृ 34
  12. Kitzinger, Sheila. उपरोक्त P-98
  13.पवनकरण। मौसेरी बहनें, उपरोक्त, पृ 22

तस्वीरें गूगल से साभार 
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