इकाई नही मैं करोड़ो पदचाप हूँ मैं: रजनी तिलक की काव्य-चेतना


अनिता भारती 

रजनी तिलक  होतीं तो आगामी 27 मई को 60वां सालगिरह मना रही होतीं. पिछले 30 मार्च 2018 को उनका परिनिर्वाण हो गया. प्रथमतः सामाजिक कार्यकर्ता की छवि वाली राजनीतिलक को हिन्दी दलित साहित्य की प्रथम कवयित्री बताते हुए अनिता भारती ने उनकी काव्य-चेतना पर यह लेख लिखा है. 27 मई को उनके जन्मदिवस के पूर्व पठनीय यह लेख. रजनी तिलक  की छोटी बहन अनिता भारती स्वयं लेखिका, विदुषी और सामाजिक कार्यकर्ता हैं: 

रजनी तिलक संभवत हिन्दी दलित साहित्य की पहली कवयित्री हैं,  जिनकी कविताएं 80 के दशक में विभिन्न दलित पत्र- पत्रिकाओंं में छपने लगी थीं और लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने लगी थी। हालांकि उनका पहला काव्य संग्रह पदचाप' बहुत बाद में छपकर आया। काव्य संग्रह देरी से आने का कारण शायद रजनी तिलक का स्वयं अपने आप को साहित्यकार से अधिक सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ता मानना रहा होगा । चूकि रजनी तिलक अपने जीवन के अधिकतम सालों में  सामाजिक जीवन व दलित व स्त्री आंदोलन में सक्रिय रहीं, इसी कारण शायद किताब छपना न छपना उनके लिए कोई मायने  नही रखता था ।



दलित स्त्रीवाद के विभिन्न स्वर समेटे हुए उनका काव्य संग्रह पदचाप कई मायने में महत्वपूर्ण है। सबसे पहली बात तो यही है कि रजनी तिलक कई मोर्चों पर पूरी एक जमात के हक के लिए एक साथ डटी हुई थीं। वह जिनकी हिमायत में खडी थी उनमें  प्रमुख रुप से, दलित,स्त्री , दलित स्त्री, सर्वहारा वर्ग शामिल था. रजनी तिलक लगातार इन शोषित दमित उत्पीडित अस्मिताओं के संघर्ष और अधिकार की लड़ाई के पक्ष में और उनका दमन करने वाली ब्राहम्णवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ अपनी कविताएं लिख रही  थीं। स्त्री आंदोलन के अन्तर्गत उठने वाले सवाल, उनके अपने अंतर्द्वन्द्व, उनकी सीमाओं को पहचानते हुए उनके अनुभव उनकी कविताओं के मूल विषय रहे हैं। इसी तरह दलित आंदोलन की वैचारिकी के सवाल, उसमें दलित स्त्री की हैसियत, उसकी पीड़ा , उसकी आकांक्षा की बानगी उनकी कविताओं में देखी जा सकती है। सर्वहारा के सवाल वे एक जमात या वर्ग के रुप मे उठाती हैं। उनकी कविताओं मे वर्गीय चेतना, जातीय चेतना, और वैयक्तिक चेतना के स्वर प्रमुख रुप से दिखते हैं।

पदचाप कुल चौसठ पृष्ठों का काव्य संग्रह है। इसमें  कुल 59 कविताएं है . पदचाप का एक संस्करण के बाद दूसरा संस्करण 2008 में निधि बुक्स से आया है। वह अपनी भूमिका में लिखती है - मैं खुश हूँ कि स्पर्धा और छपने-छपाने की होड़ में जहाँ लेखक या प्रकाशक को अपनी पुस्तकों की मार्केटिंग के लिए मशक्कत करनी पडती , मुझे ऐसा नही करना पड़ा। न ही नामचीन व्यक्तियों को सिफारिश करनी पड़ी। पदचाप ने अपने पैरो चलकर अपनी पहचान बनाई है।- पृ-9

पदचाप में लिखे अपने आत्मकथ्य में दलित महिलाओं की स्थिति पर वह कहती है - आजादी की स्वर्ण जयंती और मानव अधिकार की घोषणा के पचास वर्ष बीतने जाने पर भी दलित स्त्रियों की हालत में विशेष परिवर्तन नही आया है।शिक्षा, राजनीति, प्रशासनिक सेवा, वाणिज्यिक क्षेत्र में उसकी पहुँच नगण्य है। अगर वो कहीं  है तो शहर की स्लम, धुूल व बदबूदार दूर-दराज गाँव देहातों के बाहर बनी बस्तियों में। -पृ -11

रजनी तिलक अपनी कविताओं में  प्रगतिशील तबके के छद्म मुखौटाधारियों से सतत टकराती है। अपने आत्मकथ्य में एक अन्य जगह वह लिखती है -  मेरा परिचय 1978 में प्रगतिशील साथियों से हुआ, जिनका विश्लेषण था कि दलितों की विवशता का मुख्य कारण आर्थिक शोषण है जिससे उनकी सामाजिक हैसियत तय होती है।पृ-9  क्या यह सही नही है कि रजनी तिलक ने अपने प्रगतिशील साथियों पर जो सवाल 1978 में खडे किए ,वह सवाल आज भी ज्यों के त्यों ही खडे हुए है उत्तर की आशा में।

एक ऐसा ही दूसरा सवाल दलित सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ताओं के सामने भी वह खड़ा करती हैं - मुम्बई  में नौकरी मिलने के कारण दलित साहित्य, दलित पैंथर, आंदोलन में स्त्रियों की भागीदारी की अनुपस्थिति और पितृसत्तात्मक रवैया भी देखने को मिला-(पृ12)

पदचाप में संकलित रजनी तिलक की कविताओं को मुख्य स्वर के आधार पर  चार भागों में बाँटा जा सकता है. उनकी कविताओं का प्रमुख स्वर आशावादी है। चाहे वह दलित स्त्री की स्थिति की बात हो या दलित समाज की या फिर सर्वहारा समाज की , वह उनकी स्थिति में बदलाव के लिए हमेशा आशावान रहती हैं. रजनी तिलक स्थितियां  पलटने और बदलने में विश्वास रखती है.उनकी कविताओं  का दूसरा मुख्य स्वर विपरित दमनकारी स्थिति से हारकर बैठने की बजाय उनके खिलाफ संघर्ष करना है। कवयित्री को हमेशा लगता है कि रात सुबह का आगाज है। इसलिए संघर्ष ही मुक्ति का एक मात्र रास्ता है।  उनकी कविताओं का तीसरा स्वर समानता में विश्वास होना है। वह लगातार अपने अंदर इस विश्वास को जगाएं रखती है कि एक दिन समाज में समानता का  बिगुल जरुर बजेगा। मुक्ति की कामना और मुक्ति का स्वप्न उनकी कविताओं का चौथा मुख्य स्वर है। जिसमें वह कामना करती है कि एक दिन मनुष्य को भेदभाव पूर्ण अन्याय से,शोषण से,भूख से, दुःख  से, उत्पीड़न से, गुलामी से, युद्ध से, जरुर मुक्ति मिलेगी और वह मानव होने की पूर्ण गरिमा को जरुर प्राप्त करेगा।

पदचाप में संकलित पहली कविता सावित्रीबाई फुले पर है.। कवयित्री लोगों से आहवान करती हैं कि आज सावित्रीबाई को पूजने की जगह अनुकरण करने की जरुरत है. क्योंकि सावित्रीबाई फुले ने ही दलित शोषित स्त्रियों को उनकी मुक्ति की राह दिखाई है:
दलित और पद-दलित स्त्रियों को
तुमने ककहरा ही नही सिखाया
भर दिया उनमें विद्रोह
धैठा था  एक द्वंद्व, एक जेहाद
पोंगा-पुरोहित व वेद शास्त्रों के खिलाफ


स्तंभ कविता में वह सावित्रीबाई फुले को अपने आदर्श के रुप में स्थापित करते हुए उन्हें नारीवादी दार्शनिक कहते हुए  कहती हैं:
तुम्हीं हो हमारी आदर्श
हमारे बंदी संस्कारों की,
वर्गीय-दर्प और उत्पीड़न की
पथ प्रदर्शक सावित्री
तुम्ही हो दर्शन हमारे नारीवाद की

अपनी एक अन्य कविता में युद्ध के स्थान पर बुद्ध की स्थापना जो कि शान्ति ,समता, बंधुत्व और विश्व शान्ति के प्रतीक हैं  को अपनाने की बात करती है। वह युद्ध की राजनीति पर प्रहार करती हैं. युद्ध में मारे गए व घायल हुए हिरोशिमा के बच्चों की माँ के दुख को महसूस करती है। हिरोशिमा की माओं के दुखों का वर्णन करते हुए वह कहती हैं-
हिरोशिमा की माँओं की सिसक
अभी बाकी है
ये जंग की तलवार
हमारे सिर से हटा दो
बारुद के ढेर पर
क्यों खड़ी है हमारी दुनिया ?

कवयित्री काफीहाउस में बैठकर देश दुनिया के मजदूरो किसानों दलितों के प्रति चिंता जताने वाले, उन पर साहित्य रचने वालों पर व्यंग्य करती हैं। उन्हें हैरानी है कि वे यह काम कैसे कर पाते हैं। 
कौन है वो ?
कॉफी होम में बैठ, खूब बतियाते है,
खेत- खलिहान, पर्यावरण पर
खूब लिखते हैं
खेतों में पैदा नही हुए
परंतु उनकी गंध सूँघते है,
दलित उत्पीड़न सहा नही
महसूस करते है
हो भाव विभोर
मार्मिक कविता लिखते है
मैं हैरान हूँ -
उन्होने हमारे दर्द
गीतों में पिरोए कैसे ?

इसी कड़ी में अपने संघर्ष के साथी कामरेड, जिन्हें  वह दादा यानि बड़ा  भाई कहती थी, मानती थी, जो एक बहुत बडे मानवअधिकारवादी कहलाते थे, उनके द्रारा किए गए विश्वास घात की पोल खोलते हुए कहती है कि क्या परिवार में पति के अलावा पत्नी और बच्चों के कोई  मानव अधिकार नही होते?  समाज बदलाव की लड़ाई में हम उस पक्ष को ही क्यों चुनते है जो सक्षम होता है, जिससे हमें फायदा होता है। पति और पत्नी यदि दोनों कामरेड हो तो क्या पति पुरुष का कामरेड साथी इसलिए उसके साथ खडे हो जायेंगे कि वह भी पुरुष है? यह कविता नितांत उनके व्यक्तिगत दुःख की है: 
दादा
तुमने मुझे स्नेह दिया
अपनी छोटी बहन समझ
सिखाया
तुम थे जिसने
उसे वकील का रास्ता दिखाया
विश्वास नही होता

जन-संघर्ष के अभियान में
मैं कब पीछे रही
पुलिस अत्याचार
राजनैतिक बंदियों के मुठभेड़
अत्याचारों की जाँच- पड़ताल
और रिपोर्ट,
इन सबकी अंतिम कड़ी में
तुम्हारे साथ सदा जुडी थी।

जानना चाहती हूँ आज मैं
बच्चों और स्त्रियों के सवाल
क्या मानव अधिकार नही ?
बच्चों की मुस्कान
औरत का स्वाभिमान
क्या उनका मानव अधिकार नही?

अपने कविता संग्रह पदचाप  में कवयित्री रजनी तिलक दलित आंदोलन में व्याप्त पितृसत्ता के खिलाफ, अपने पथ के साथ आंदोलन कारी दलित सामाजिक कार्यकर्ता को सचेत करती हैं कि मानव मुक्ति की लड़ाई सिर्फ पुरुषों की लड़ाई नही है उस लड़ाई में स्त्रियाँ भी बराबर की भागीदार है। सिर्फ पुरुषों के चाहने से ही क्रांति संभव नही है उसमें आधी आबादी के मुक्ति के सपने को भी जोड़ना पडेगा। 
मेरे दोस्त
मानव मात्र की मुक्ति के पक्षधर
अपने लिए मुक्ति चाहते हो
मेरा भी हक है

कवयित्री पुरुष से नही पितृसत्तात्मक मूल्यों से छुटकारा पाना चाहती है:
तुम्हारे साथ थी
कैदी थी तुम्हारी
अब अपने साथ हूँ
कैदी हूँ संस्कारों की

कवयित्री इन्ही संस्कारो का, इन्ही ब्राहमणवादी मूल्यों का पिंजरा तोड़कर मुक्ति की कामना करती है। इस मुक्ति की राह को राह को पार करने के लिए वह बडे से बड़ा जोखिम उठाने को तैयार है. वह किसी लोभ लालच और उपलब्धी की मोहताज नही है. वह हर तरह के कंटक हटाकर आगे अपने आगे बढ़ने की जुगत निकालती है:
परिंदा हूँ
मुझे खुला आसमान चाहिए
न बरगला
मैं पिंजरा तोड़ के आई हूँ
मुझे मेरी मंजिल है प्यारी
न डिगा
मैं काँटे रौद के आई हूँ।

सवाल यह है कि कवयित्री रजनी तिलक की राह के वह कौन से काँटे हैं जिन्हे वह रौंद के आईं है। क्या यह काँटे समाज में दलित स्त्री की दयनीय स्थिति के है या उसको दोयम समझे जाने की पीड़ा के हैं। क्या इन काँटोें में सवर्ण स्त्रीवाद और दलित पुरुषवाद का हाथ है अथवा समाज की क्रूर जातीय व्यवस्था इसकी जिम्मेदार है। कुल मिलाकर यही दर्द उनकी कविताओं का मुख्य स्वर है। जहाँ वह व्यवस्था से लेकर अपने संगी साथियों से भी चुनौती झेलती है। कवयित्री बेहद चिंतित है कि दलित स्त्री किस तरह पशुवत जीवन जीती है:
ये
कंजरो की बस्ती
झुंड औरतें
निरीह बकरियों सी.
नीले पीले काले घाघरे,
बेमेल ढेर कंठियाँ,
कानों पर ढोती
आठ आने वाली झुमकियाँ.

स्कूलों से वंचित बच्चियाँ
ये भी है अपनी
माँ की आँखों की पुतलियाँ
सीलन भरी
सूअर बाड़े सी आवास पट्टियाँ
जिन्हे विकास और योजनाओं ने
चिन्हित नही किया

भेड़िए कविता के माध्यम से कवयित्री रजनी तिलक ने दलित औरतों के प्रति समाज की विकृत मानसिकता को उजागर किया है। यह समाज उस भेडिए की तरह है जो मासूम भेडो को अपना शिकार बनाता रहता है.
एक अकेली औरत
जिसे परिवार ने निकाल दिया
वह सड़क पर नितांत अकेली है,
भेड़ियों से दर्जने आँखे
लपलपाती जुबानें
उसे सूँघने का काम करती है

सवर्ण स्त्रीवाद जो कि यह कहता है कि सभी स्त्री एक है। सभी स्त्रियों की पहचान एक ही और वह एक मात्र पहचान है उसका स्त्री होना. पर रजनी तिलक उनकी सवर्ण मानसिकता पर सवाल खडे करती हैं, वे कहती हैं:
औरत औरत होने में
जुदा-जुदा फर्क नही क्या
एक भंगी तो दूसरी बामणी
एक डोम तो दूसरी ठकुरानी
दोनों सुबह से शाम खटती है
बेशक, एक दिन भर खेत में
दूसरी घर की चारदिवारी में
शाम को एक सोती है बिस्तर पर
तो दूसरी काँटो पर।

एक सताई जाती है स्त्री होने के कारण
दूसरी सताई जाती है स्त्री और दलित होने पर
एक तड़पती है सम्मान के लिए
दूसरी तिरस्कृत है भूख और अपमान से।

एक सत्तासीन है तो दूसरी निर्वस्त्र घुमाई जाती है
औरत नही मात्र एक जज्बात
हर समाज का हिस्सा,
बँटी वह भी जातियों में
धर्म की अनुयायी है
औरत औरत में भी अंतर है।

रजनी तिलक चूंकि गहरे तक दलित आंदोलन में जुडी रही इसलिए दलित आंदोलन के सामने जो खतरे है जिनके कारण उसके टूटने बिखरने का जो खतरा है , जो उसकी कमियां है, जो उसकी खासियत है या फिर जो उसकी ताकत है वह इस इन सबसे अच्छी तरह से वाकिफ थी. दलित आंदोलन के सामने आज जो सबसे बड़ी चुनौती है वह उसका उपजातीय समूह में बँटा होना और आपस में रोटी बेटी का संबंध न होना। दलित समााज का इस तरह उपजातीय में बँटने का कारण हिन्दू धर्म की जातीय व्यवस्था है। जो इंसान से इंसान को जाति के आघार पर अलग करती है। उनको रोटी बेटी के संबंध करने और एक साथ मिलकर रहने खाने पर पाबंदी लगाती है। ऐसा नही कि पूरे दलित समुदायों में आपस में रोटी बेटी का संबंध नही है। रोटी बेटी का संबंध अम्बेडकरवादी विचारधारा के साथी तो कर रहे है परंतु जो अभी अम्बेडकरवाद के प्रभाव से दूर है उन्ही के लिए कवयित्री कहती है:
हम दलित
अनेक उपजातियों में बँटे
अनेक भिन्नताओं में पले
भूख प्यास , घृणा, हीनता को भोगते
जिंदा है आज भी,
लिए लडाई अस्तित्व और समानता की

उनकी बात में न आना
मकसद है उनका हमें लडाना
असमानता ना फले फूले चारो ओर
लड़ना है हमें असमानता से
गढ़नी है भाषा, बढाना है विज्ञान,
तभी बनेगा जातिविहीन समाज


कवयित्री रजनी तिलक जानती है बल्कि यूं कहे यह उनके अनुभव का विशाल दायरा है कि वे जिसे हमारे प्रगतिशील साथी सर्वहारा जमात कहते है दरअसल वह हमारे दलित मजदूरों का पूरा एक वर्ग है जो फैक्ट्री, खेत खलिहान, असंगठित में रात दिन खटता और पिसता है। मजदूर है इस देश का दलित कविता में रजनी तिलक यही बता रही है कि:
हर कष्ट में मुस्कुराता तेरा चेहरा,
जैसे भट्ठी में तपता सूर्ख लोहा
दलित ! तुम हो इस देश के मजदूर

गर्मियों में लहू टपकता, बन पसीना तुम्हारा
सर्दियों में अर्ध वस्त्र , ठंड से बेहाल बेचारा
दलित !तुम हो इस देश के सर्वहारा.
रजनी तिलक एक प्रदर्शन में 


कवयित्री सिर्फ दलित सर्वहारा वर्ग की पहचान ही नही करती अपितु उसको दलित दरिद्र में ढ़केलने वाले पूँजीपतियों पर भी प्रहार करती है और कहती है कि दलित मजदूरों की दूर्दशा का सामाजिक शोषण के साथ-साथ उनका आर्थिक रुप से शोषण भी है:
शोषण के अधिकारी, ये पूँजीवादी
इंसानियत के गद्दार, हैवान के साथी,
तुम्हें  न देते दो जून भरपेट रोटी
दलित ! तुम ही हो
इस देश के भूमिहीन कृषक सर्वहारा


यदि किसी को कवयित्री और सामाजिक नेत्री रजनी तिलक के स्त्रीवादी, समाजिक राजनैतिक आंदोलनधर्मी, सामाजिक राजनैतिक और वैयक्तिक जीवन को आंकना हो, उनके सामाजिक सरोकार जानने हो, उनकी इच्छाएं आकांक्षाएं समझनी हो, उनका समाज बदलाव का स्वप्न देखना हो तो उनकी पदचाप शीर्षक वाली कविता जरुर एक बार पढ़ लेनी चाहिए। पदचाप कविता एक बेहद सशक्त कविता है। 'करोड़ो पदचाप हूँ'में वह बयान करती हैं:
मैं दलित अबला नहीं
नये युग की सूत्रपात हूँ
सृष्टि की जननी,
नये युग की आवाज हूँ
मेरा अतीत
बंधनों का
गुलामी के इतिहास का
युगों युगों के  दमन का वहन है।

अब-
मैं छोड़ दूंगी गुलामगिरी,
तोड़ दूंगी बेड़िया
सृजन में बाधक प्रेम की।

मेरा दुःख
 दुःख नहीं
आशाओं का तूफान है
मेरे आँसू आँसू नहीं है
जंग का पैगाम है
इकाई नही मैं
करोड़ो पदचाप हूँ
मूक नही मैं
आधी दुनिया की आवाज हूँ
नए यूग की सूत्रधार हूँ.

अनिता भारती साहित्य की विविध विधाओं में जितना लिखती हैं , उतना ही या उससे अधिक सामाजिक मोर्चों पर डंटी रहती हैं  खासकर दलित और स्त्री मुद्दों पर. सम्पर्क : मोबाईल 09899700767.

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