श्रम साध्य था किन्नरों से बातचीत कर उपन्यास लिखना: नीरजा माधव


थर्ड जेंडर  पर केन्द्रित प्रथम हिंदी उपन्यास यमदीप की लेखिका नीरजा माधव से एम. फ़ीरोज़ खान की बातचीत

क्या कारण है कि आज के लेखक हाशिये के लोगों पर लिखना नहीं चाहते?
देखिये, लेखन एक तपस्या है। आप ए.सी. में बैठकर उमड़ते बादलों को नहीं देख सकते। इसके लिए तो शहर निकलना पड़ेगा। सार्थक लेखन भी वैसी ही मांग करता है। जिस भी विषय पर लिखना हो तो आपका ज्ञान, आपका यथार्थ अनुभव उसमें से झलकना चाहिए। बन्द कमरे में आराम से लेटकर कोई भी एक थीम किसी से उधार लेकर एक कहानी का ताना-बाना बुन लेना मुश्किल नहीं है। इस प्रकार के लेखन से आप रेखाचित्रा तो बना सकते हैं, पर उसमें रंग नहीं भर सकते। रंग तो तभी भर पायेंगे जब उन रंगों को नजदीक से देखें, महसूस करें। हाशिये के इस समाज के बारे में लिखना श्रम-साध्य था। जैसे ‘यमदीप’ में किन्नरों  का एक सांकेतिक शब्द ‘गिरिया’ मैंने लिया। जरूरी नहीं कि दिल्ली के किन्नर भी ‘गिरिया’ ही बोलें, क्योंकि उनका कोई भाषायी व्याकरण शास्त्र नहीं है। क्षेत्र विशेष में उसका अध्ययन करने से ही पता चलेगा।



किन्नरों पर लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली? 
किन्नरों पर लिखने की प्रेरणा मेरे मन में सन् 1991 में ही आ गई थी जब मेरी बेटी कुहू का जन्म हुआ और उस अवसर पर तृतीय प्रकृति (थर्ड जेण्डर) के लोग मेरे घर मंगलगान करने और नेग लेने आये थे। उस समय आकाशवाणी में नौकरी कर रही थी मैं। मैंने सर्वप्रथम उन पर रेडियो के लिए फीचर बनाने का संकल्प लिया और अपनी रिकार्डिंग मशीन लेकर उनकी बस्तियों के कई चक्कर लगाए। कभी वे इण्टरव्यू देते और कभी फिर किसी दिन आने का वादा करके टाल देते। उस समय तक तथाकथित सभ्य समाज के लोग उनकी बस्तियों में जाना अपमान और व्यंग्य का विषय मानते थे। मेरे भी कार्यालय में मेरा संकल्प सुन सहकर्मी मज़ाक में मुस्कुराये थे पर मैंने अपना मिशन जारी रखा। बहुत मुश्किल से उन लोगों के गुरु से मिल सकी और तभी जाकर कुछ तृतीय प्रकृति के लोग अपना इण्टरव्यू देने के लिए तैयार हुए थे। पर पूरी बातें बताने को तैयार तब भी नहीं। बार-बार मेरे माइक को हटाकर कहते तुम बेटी सरकारी आदमी हो। हम लोगों को फंसा दोगी। अन्त में माइक, रिकार्डिंग मशीन के बिना ही कई-कई चक्कर इनकी बस्तियों के मैंने लगाए। आत्मीयता के साथ उनकी कोठरी में बैठकर उनकी आन्तरिक भावनाओं को कुरेदा तो बहुत ही मर्मान्तिक बातें मेरे सामने आईं। बहुत से रहस्यों से परदा उठा। अनेक सांकेतिक शब्द, जो वे लोग किसी अपने यजमान या ग्राहक के सामने प्रयोग करते थे, का अर्थ मैंने जाना। तो, प्रेरणा तो मेरी बेटी का जन्म ही था।

उपन्यास का शीर्षक ‘यमदीप’ ही क्यों रखा?
 ‘यमदीप’ शीर्षक रखने के पीछे भी उनके जीवन की विडम्बना ही थी। अच्छे घरों में पैदा हुए ये थर्ड जेण्डर के लोग उस दीपक की ही तरह तो हैं जो दीपावली से एक दिन पूर्व यमराज के नाम निकालकर कूड़े-करकट या घूरे पर रख देते हैं लोग और पीछे पलटकर देखना मना होता है उस दीप को। इनका भी जीवन लगभग यम के उसी दीप की तरह होता है जिसे समाज में जगह नहीं मिलती और बदहाल बस्ती में भागकर जाना और वहीं समाप्त हो जाना इनकी नियति बन जाती है। एक सनातन परम्परा यम का दीया से इस प्रतीक को लिया है मैंने। भारत का हर व्यक्ति दीपावली पर्व और उससे पूर्व मनाई जाने वाली छोटी दीपावली आदि से अच्छी तरह परिचित है।

‘यमदीप’ लिखते समय किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?
 ‘यमदीप’ लिखने में कठिनाइयाँ आईं तो बस इसी बात में कि वे जल्दी कुछ बताने को तैयार नहीं होते थे। अपना परिचय भी नहीं देना चाहते थे। मेरे सामने ही अपने सांकेतिक शब्दों में कुछ बोलकर निकल जाते थे। कई बार उनसे मिलने पहुँची तो काम का बहाना बना निकल लिये। कई बार उनके गुरुजी ने भी भीतर से कहलवा दिया कि बाहर गये हैं। दरअसल वे किसी सामान्य मनुष्य को अपने बहुत नजदीक नहीं आने देना चाहते। उनसे कोई भी रहस्य जानने के लिए मुझे कई-कई बार उनकी बस्ती में जाना पड़ता था। यह एक कठिन काम था। इस कठिन काम में मेरी मदद करते थे मेरे पति डाॅ. बेनी माधव। उनकी बस्तियों में ले जाना और उनके घर के बाहर खड़े रहना, उफ् बहुत कठिन कार्य था। वे पुरुषों को अपने घर में प्रवेश नहीं करने देते थे। मेरे पति के लिए साफ शब्दों में कहते थे- बेटी तुम आ जाओ अन्दर। हमें इन्सानों से क्या काम? तो पुरुषों को वे इन्सान मानते थे। आप तो धीरे-धीरे बहुत परिवर्तन आ रहा है उन लोगों के भीतर।



यमदीप लिखने का अनुभव कैसा रहा?
 बहुत अच्छा। 1999 में मैंने इसे लिख लिया था और 2002 में सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से थर्ड जेण्डर पर प्रथम उपन्यास के रूप में यह प्रकाशित हुआ। लगभग तीन सौ पृष्ठों का उपन्यास। अनुभव तब और अच्छा लगा जब बिना किसी धरना, प्रदर्शन या जुलूस और नारेबाजी के सुप्रीम कोर्ट ने थर्ड जेण्डर को आरक्षण दे दिया। इस उपन्यास में मैंने थर्ड जेण्डर समुदाय के लिए शिक्षा, सुरक्षा और नौकरियों में आरक्षण दिये जाने और मुख्यधारा में समाविष्ट किये जाने की सर्वप्रथम मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय को मैं साहित्य की विजय मानती हूँ। अन्यथा न जाने कब तक यह तृतीया प्रकृति समुदाय गरीबी, बदहाली के अंधेरे में पड़ा रहता। अब कम से कम लोग उन्हें मनुष्य की तरह समझने तो लगे हैं। ‘यमदीप’ प्रकाशित होने के दस-बारह वर्षों बाद ही सही, कुछ लेखकों ने भी प्रयास किया कि वे इनके बारे में लिखें। स्वयं थर्ड जेण्डर के लोग भी अब आगे आने लगे हैं। यह मेरे लिए अत्यन्त सुखद है कि एक कार्य मैंने शुरू किया, उस पर लोगों का ध्यान गया।

नाजबीबी और मानवी का किरदार आपके मन में कैसे आया?
 उनकी बस्तियों में भटकते हुए मैंने स्वयं में मानवी को तलाश किया। यह बात अलग है कि मानवी हमारे तथाकथित सभ्य समाज की स्त्राी के संघर्षों का प्रतीक भी है। उसी प्रकार बस्तियों में आते-जाते कई पात्रों के जीवन से साक्षात्कार के बहाने नाजबीबी भी मेरी कल्पना में यथार्थ रूप धारण करने लगी। मेरी कल्पना और समाज के यथार्थ का प्रतिबिम्ब हैं नाजबीबी और मानवी।

‘यमदीप’ लिखने से पहले और लिखने के बाद आप अपनी सोच में क्या अन्तर पाती हैं?
 लिखने से पूर्व कहीं-न-कहीं एक दुविधा थी मन में कि पता नहीं इस नये और उपेक्षित विषय को साहित्य समाज किस रूप में लेगा? पर जब इसका कई भाषाओं में अनुवाद और थर्ड संस्थाओं द्वारा नाट्य मंचन हुआ तो मुझे सन्तोष हुआ कि चलो, लिखना व्यर्थ नहीं गया। जे.एन.यू. सहित अनेक विश्वविद्यालयों में इस पर शोध-कार्य हो चुके हैं। कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों हेतु भी प्रस्तावित है यह उपन्यास। (हँसते हुए) कई पुरस्कारों से वंचित भी किया गया इस उपन्यास को। कथा यू.के. सम्मान के लिए तो लन्दन के हिन्दी लेखक श्री तेजेन्द्र शर्मा ने ही फेसबुक पर लिखा था जब ‘यमदीप’ को लेकर ‘पहले हम पहले हम’ का वाक् युद्ध छिड़ा था। तो ‘यमदीप’ के साथ यह सब बहुत हो चुका है। लेकिन सत्य तो सत्य ही रहेगा। मेरी आदत कभी नहीं रही कि एक उपन्यास लिखने के बाद साल दो साल उसकी समीक्षा या प्रमोशन के लिए कोई प्रयास करूँ। एक कृति लिख लेने के बाद प्रायः उसे भूलकर मैं अगले में खो जाती हूँ पाठकों का दुलार उसे चाहे जहाँ तक पहुँचा दे।

‘यमदीप’ पढ़ने के बाद आपके परिवार और मित्रों की क्या प्रतिक्रिया थी?
 सभी को चैंकाने वाला कथानक लगा था। एक अछूत विषय। इसके पूर्व भी कुछ लिखा गया होगा पर इतना विश्वास से कहा जा सकता है कि उनके इतना करीब जाकर आन्तरिक जीवन की मार्मिक कहानी शायद पहली बार जो सभी के हृदय को द्रवित कर गई थी। परिवार और मित्रों में मेरे सभी पाठक भी आ जाते हैं। उनके प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन आया सभी के। कुछ ने यह भी कहा कि ये थर्ड जेण्डर के लोग इतने भी निश्छल और ईमानदार नहीं होते जैसा यमदीप में चित्रित किया गया है। पर मैं जानती हूँ ये सब सतही जानकारियाँ हैं। कुछ लोग कहते हैं कि ' किन्नर बनाए भी जाते हैं इनके द्वारा।' मैंने उनके गुरु से पूछा भी था यह सवाल। दुखी स्वर में बोले थे- ‘‘देख लो बेटी मेरी कोठरिया। किसको पकड़ कर, कहाँ लेटाकर, किस औजार से आपरेशन कर देंगे हम? अस्पताल में एक फोड़ा का आपरेशन करने में भी डाॅक्टर लोग इतनी दवाइयाँ, सुइयाँ लगाते हैं तब ठीक होता है। हम कितना पढ़े-लिखे हैं कि अपने से दवा देकर सब ठीक कर लेंगे।’’ उनके गुरु का यह उत्तर मुझे भी बिल्कुल सत्य लगा था। अंग-भंग कर देने मात्रा से भीतर जो हारमोन्स का प्राकृतिक स्राव होता है, वह भी स्त्री-पुरुष में अलग-अलग, उसे तो किसी आपरेशन से बन्द नहीं किया जा सकता।
तो ‘यमदीप’ लिखने में लोगों की तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ भी खूब मिली और अनुभव भी कई तरह के हुए। आज लिखने के बाद असीम सन्तोष है कि एक वंचित और उपेक्षित समाज के बारे में मैंने लिखा जो ईमानदार है, शारीरिक रूप से बलवान है पर भीतर से भावनात्मक रूप से टूटा हुआ है, प्रकृति के एक क्रूर मज़ाक से उसका धरती पर जीना दूभर बना हुआ है। उसे हमारे स्नेह और संवेदना की आवश्यकता है। उसके बारे में अफवाहें फैलाने की जरूरत नहीं।



किन्नरों के लिए समाज का नज़रिया कैसा होना चाहिए?
मेरी पूर्व की इतनी बातों का अर्थ साफ है कि सहानुभूतिपूर्ण और संवेदनापूर्ण होना चाहिए। वे भी हमारे, आपकी तरह मनुष्य हैं। हमारे घरों में ही वे पैदा हुए हैं। उनकी अलग से कोई जाति या धर्म नहीं है। प्रकृति के एक क्रूर मजाक को पूरे समाज को उसी प्रकार स्वीकार करना चाहिए जैसे परिवार में किसी दिव्यांग बच्चे को हम संभालकर रखते हैं।

‘यमदीप’ लिखने के अलावा आप किन्नरों के लिए और क्या करना चाहती हैं?
साहित्य का काम ‘टार्च बियरर’ का होता है। वह समाज को दिशा देता है। अंधेरे कोनों को सामने लाता है। साहित्य को कहा जाता है कि समाज का दर्पण होता है, तो दर्पण कई प्रकार का होता है। कुछ दर्पण ऐसे होते हैं जिनमें आपना ही चेहरा इतना विदू्रप दिखाई देता है तो किसी में हास्यास्पद। किसी-किसी दर्पण पर गन्दगी जमी हो तो भी चेहरा साफ नहीं दिखाई देता। अब तय तो पाठक को करना है कि वह किस प्रकार के साहित्य में समाज का चेहरा देखना चाहता है। आज साहित्य के नाम पर बहुत कुछ विद्रूप और हास्यास्पद भी लिखा जा रहा है। तो साहित्य के लिए यह संकट का भी समय है। इन्हीं संकटों में भी नई राह बनाने का भी समय है। जो मूल्यवान साहित्य होगा, वही बचा रह जायेगा।
रही मेरे और भी कुछ करने की तो बता दूँ कि मैं कोई समाज सेविका या राजनीतिज्ञ तो नहीं हूँ कि उनके लिए अलग से कुछ और कर सकूँ। हाँ, कलम हमारा हथियार है, उसके माध्यम से एक बहस हमने छेड़ दी है। आगे समाज और राष्ट्र की जिम्मेदारी है

आप अपने जन्म, स्थान, शिक्षा, घर-परिवार और साहित्यिक पृष्ठभूमि के बारे में विस्तार से बताइये?
मेरा जन्म 15 मार्च 1962 को जौनपुर जिले के एक गाँव में हुआ था। पिता शिक्षक थे और माँ धर्मनिष्ठ एवं सम्पूर्ण एक आदर्श भारतीय स्त्राी। प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की प्राथमिक पाठशाला से लेकर उच्च शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से। अंग्रेजी विषय में एम.ए. और पी-एच.डी. बी.एच.यू. से ही सम्पन्न। लोक सेवा आयेग, उ.प्र. द्वारा शैक्षिक सेवा से चयनित हुई परन्तु उसी समय कुछ महीनों के अंतराल पर संघ लेख सेवा आयेग द्वारा आकाशवाणी/दूरदर्शन के लिए राजपत्रित अधिकारी के रूप में चयनित और उसी सेवा में रहने का निर्णय लिया। भारत के विभिन्न केन्द्रों पर सेवाएँ दीं। साहित्य लेखन साथ-साथ चलता रहा।
परिवार में मेरे पति डा. बेनी माधव (प्राचार्य) और दो बच्चे कुहू और केतन हैं। भारत सरकार ने सन् 2016 में राष्ट्रीय पुस्तक ‘न्यास’ भारत का ट्रस्टी सदस्य नामित किया।
साहित्य के साथ-साथ शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत में विशेष रुचि। इस समय सारनाथ वाराणसी में स्थायी निवास है। पिताजी से प्रेरणा मिली लिखने की। छात्रा जीवन से लेखन शुरू कर दिया था। पत्र-पत्रिकाओं में लेख और कविताएँ प्रकाशित होती रहती थीं।

आपकी प्रिय विधा कौन सी है और क्यों?
 मेरी प्रिय विधा तो कथा ही है पर कविताएँ और ललित-निबंध भी लिखती हूँ। क्यों लिखती हूँ, इसका जवाब स्थूल रूप में नहीं दिया जा सकता। बस कोई अदृश्य शक्ति ये सब लिखने को प्रेरित करती है।

एम. फ़ीरोज़ खान वांग्मय पत्रिका के सम्पादक हैं. सम्पर्क: vangmaya@gmail.com
तस्वीरें गूगल से साभार 
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