पहली ट्रांसजेंडर स्टूडेंट (पंजाब विश्वविद्यालय) के संघर्ष की कहानी


डिसेन्ट कुमार साहू

“किन्नर समाज में अछूत बने हुए है। आमतौर पर उन्हें स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में दाखिला नहीं मिलता। उनके लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है।”
सुप्रीम कोर्ट,  22 अक्टूबर 2013

पिछले कुछ समय में विभिन्न क्षेत्रों में ट्रान्सजेंडर ने संघर्ष करते हुए अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया है। यह बात चाहे भारत की पहली ट्रान्सजेंडर न्यूज़ एंकर पद्मिनी प्रकाश की हो, राजस्थान की पहली ट्रान्सजेंडर हवलदार बनी गंगा की हो या अन्य क्षेत्रों में उपस्थिती दर्ज कराने वाली ट्रान्सजेंडर की हो, सभी ने यह मुकाम अपने संघर्षों से हासिल की है। ये उपलब्धियां सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि इन्होंने कुछ करके दिखाया है और अन्य लोगों के लिए उदाहरण पेश की है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इन्होंने अपने लिए बनाई गई पारंपरिक ढांचे को तोड़ा है जो उन्हें समाज से बहिष्कृत होकर भीख मांगने के लिए मजबूर करती है। निश्चित ही इन एक-एक ईटों के सहारे पहचान और स्वीकार्यता की एक बड़ी भवन तैयार की जा रही है जहां मानवीय गरिमा के साथ जीवन का अधिकार हो। ऐसे ही बेहतर समाज की ओर कदम बढ़ाते हुए पंजाब विश्वविद्यालय ने ट्रान्सजेंडर विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान करने की घोषणा की है। इससे पहले यह विश्वविद्यालय, ट्रान्सजेंडर टॉयलेट बनवाने वाला पहला विश्वविद्यालय बनने के कारण देशभर में अपनी पहचान बना चुका था, साथ ही विश्वविद्यालय परिसर को भेदभाव मुक्त बनाने के लिए एंटी डिस्क्रिमिनेशन सेल भी बनाया गया है। हाल ही में चंडीगढ़ में ट्रान्सजेंडर कल्याण बोर्ड का भी निर्माण किया गया। इन उपलब्धियों के पीछे धनंजय की संघर्ष और साहस की कहानी है, जिन्होंने एक बेहतर समाज बनाना ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया और इसमें उन्होने काफी हद तक सफलता भी प्राप्त की है। उनकी सफलता को पंजाब विश्वविद्यालय के परिसर में महसूस कर सकते है जहां ट्रान्सजेंडर की उतनी ही स्वीकार्यता है जितनी अन्य लोगों की। उन्हें लोगों की भेदती या असहज करने वाली नजरों का सामना नहीं करना पड़ता, यही कारण है कि धनंजय मानती है कि पंजाब विश्वविद्यालय ट्रान्सजेंडर विद्यार्थियों के लिए बेहतर जगह बन रही है।



ऐसे हजारों ट्रान्सजेंडर बच्चे है जिन्हें अपनी पढ़ाई सहपाठियों तथा शिक्षकों के दुर्व्यवहार के कारण छोड़ देना पड़ा। जिनमें हंसी-मज़ाक से लेकर यौन हिंसा तक की घटनाएँ शामिल होती है। ऐसी परिस्थितियों में जब धनंजय ने पंजाब विश्वविद्यालय में पहली ट्रान्सजेंडर विद्यार्थी के रूप में प्रवेश ली तो यह खबर काफी दिनों तक चंडीगढ़ के अखबारों तथा सोशल मीडिया पर छायी रही। इस समय धनंजय मानवाधिकार विषय लेकर स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं। वैसे तो इससे पहले भी उन्होने दो बार स्नातकोत्तर करने हेतु प्रवेश लिया था लेकिन दोनों बार ही अपनी पढ़ाई पूरा नहीं कर पाए, इसके साथ ही तब उनकी पहचान एक पुरुष की ही थी। अपनी पहचान को स्वीकार करना तथा इस पहचान के साथ आगे की पढ़ाई करने का निर्णय धनंजय के लिए आसान नहीं था। वैसे तो समाज द्वारा बनाये गये इस द्विलैंगिक खांचे से उसका संघर्ष 4-5 वर्ष की उम्र में ही शुरू हो गया था जब उसने यह एहसास कर लिया था कि वह पुरुष शरीर में कैद कोई और है जो इस शरीर के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा है। उम्र की शुरुआती अवस्था में स्त्रैण हाव-भाव को लेकर किसी भी तरह की समस्या का सामना तो नहीं करना पड़ा जो आमतौर पर दूसरे ट्रान्सजेंडर को करना पड़ता है। धनंजय को घर के कामों में माँ का हाथ बटाना तो पसंद था ही, फ़्राक व माँ की साड़ी पहनना भी पसंद था। परिवार तथा रिश्तेदारी के सारे लोग उसे बहुत प्यार करते थे, हो भी क्यों न आखिर वह प्यारी-प्यारी बातें जो करता था। उस समय धनंजय को सभी लोग कहते 'कुडियां वर्गा द मुंडा'(लड़कियों की तरह लड़का)। 

धनंजय पढ़ाई में होनहार थे, उन्होने चंडीगढ़ के सेक्टर 46 के सरकारी कालेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। वे स्नातक स्तर पर कालेज भर में प्रथम आये इसके साथ ही उन्हें तीन साल तक कालेज कलर (college colour) भी चुना गया जो कालेज का मान-सम्मान बढ़ाने वाले विद्यार्थी को दिया जाता है। इसी दौरान 1989 से 1993 तक उन्होंने शास्त्रीय संगीत और नृत्य की भी दीक्षा ली। ज़िंदगी बिलकुल सामान्य सी पटरी पर चल रही थी लेकिन अपने बेटे के हाव-भाव देखकर शायद घर वालों को कोई चिंता सताए जा रही थी तभी तो घर वालों ने लाख मना करने के बाद भी बेटे को 21 वर्ष की आयु में शादी के बंधनों में बांध दिया। तब वे स्नातक की पढ़ाई कर ही रहे थे। आज भी धनंजय शादी की बात याद करती हुई अपराधबोध से भर जाती है और सिर्फ इतना कहती है कि 'काश यह नहीं हुआ होता' यह अपराधबोध उस स्त्री के प्रति है जिसे वह एक पुरुष के रूप में मुकम्मल प्यार न दे सकें। धनंजय भी उन ट्रान्सजेंडर में से एक हैं जिन्हें जबर्दस्ती शादी के बंधनों में बांध दिया जाता है। वे उस सोच के शिकार हुए जो शादी के बाद सब कुछ 'ठीक' हो जाएगा समझते हैं। 21 वर्ष की उम्र में भी धनंजय असमंजस की स्थिति से निकल नहीं पाये थे, शादी के लिए मना सिर्फ इसलिए कर रहे थे क्योंकि लड़कियों के प्रति कोई आकर्षण नहीं था।

धनंजय के लिए आगे की ज़िंदगी और भी कठिन होने वाली थी, उसे दुखों का दरिया पार करना था। स्नातकोत्तर करने के लिए सन 1993 में इतिहास विभाग में प्रवेश लिया लेकिन स्त्रैण हाव-भाव के कारण छेड़-छाड़ तथा सीनियरों के द्वारा यौन उत्पीड़न का शिकार हुए। आखिरकार तंग आकार विभाग छोड़ देना पड़ा लेकिन पढ़ाई से लगाव होने के कारण अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए फ्रेंच तथा रशियन भाषा में डिप्लोमा किया। वर्ष 1993 में ही वे लिपिक पद हेतु विश्वविद्यालय में चुने गए, इसके साथ ही आगे की पढ़ाई भी करना चाहते थे अत: 1994 में एलएलबी करने के लिए पुनः विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया लेकिन इस बार फिर से वह हैवानों से बच नहीं पाये और हास्टल में सीनियरों द्वारा उनके साथ बलात्कार किया गया (उसके साथ जबर्दस्ती गुदा मैथुन किया गया)। इस घटना ने शायद उसे अंदर तक तोड़ कर रख दिया था, वह नहीं चाहती थी कि यह सब उसे और सहना पड़े अतः उसने पढ़ाई छोडने का निर्णय लिया। इसके बाद भी वह कलर्क के रूप में विश्वविद्यालय में काम कर ही रहे थे, लेकिन एक षड्यंत्र यहाँ भी इंतजार कर रहा था। आगे धनंजय बताती है "1998 में पेपर लीक हुआ, इस मामले में मुझे झूठे तरीके से फंसा दिया गया। पुलिस कस्टडी में मुझे कई तरह की प्रताड़नाओं से गुजरना पड़ा, पुलिस वालों के द्वारा भी मेरा यौन उत्पीड़न हुआ।" एक तरफ अदालती मामला तो दूसरी तरफ "मैं कौन हूँ" इस सवाल का अब तक जवाब ना मिलना, ने धनंजय को गहरी निराशा और तनाव में डाल दिया था। यह सन 1998 का साल था, कहीं से भी इस निराशा और तनाव की स्थिति से निकलने की उम्मीद न दिखाई देने पर मन में आत्महत्या कर लेने का ख्याल आने लगा। इस निराशा के कारण ज़्यादातर समय घर से बाहर भटकते हुए बीतने लगा। ऐसे ही एक दिन जब वह पार्क में सोये थे तो एक व्यक्ति पास आकार उससे समय पूछने लगा, समय बताने पर आग्रह करता है कि वह उससे बात करना चाहता है। शायद उसे कुछ अनुभव हो गया था। एक-दूसरे के साथ अनुभव साझा करते हुए वह व्यक्ति धनंजय से कहता है कि "तुम गे (समलैंगिक पुरुष) हो।" अपने समान अनुभवों के कारण धनंजय को भी लगा कि शायद वह सही कह रहा हो। उस दिन से पहले तक उसने 'गे' शब्द कभी नहीं सुना था, अर्थ से तो अब भी अनजान ही था। मतलब पूछे जाने पर उस व्यक्ति ने बस इतना कहा था कि "जो आदमी, आदमी की ओर आकर्षित होता है।" यह धनंजय के लिए जादुई शब्द था, जिसने उसके भावनाओं को एक पहचान दे दी थी। उसने यह भी बताया कि ऐसा महसूस करने वाला वह दुनिया में अकेला व्यक्ति नहीं है, उसने चंडीगढ़ में ही समूह के अन्य सदस्यों से धनंजय को मिलवाया भी। उस दिन को याद करते हुई धनंजय कहती है "उस दिन मैं बहुत खुश थी, पहली बार लगा कि मैं अकेली नहीं हूँ, मेरे जैसे और भी लोग है।" अब ज़्यादातर समय नए दोस्तों के साथ ही गुजरने लगा था, उनसे मिलना, बात करना, एक-दूसरे से मज़ाक करना अच्छा लगने लगा था। आखिर खुद को 'मैं कौन हूँ' इसका जवाब जो मिल गया था। ज़्यादातर मामलों में एलजीबीटीक्यू पहचान वाले लोगों के  लिंग अभिव्यक्ति (जेंडर एक्स्प्रेशन), यौन रुझान (सेक्सुयल ओरिएंटेशन) को बहुसंख्यक समाज द्वारा कलंकित तथा हेय दृष्टि से देखें जाने के कारण एलजीबीटीक्यू पहचान वाले लोग अपनी अभिव्यक्ति या रुझान को पाप या गलत मानने लगते है। जब उन्हें यह एहसास होता है कि यह गलत या असामान्य नहीं है तथा उनके जैसे और भी लोग है तो यह उनके लिए दुनिया की सबसे खुशी देने वाली चीज होती है।



अब भी पेपर लीक वाला मामला चल रहा था। धनंजय बताती है "मैं पुलिस कस्टडी में थी, पुलिस ने जमानत के कागजात बताकर अन्य कागजातों पर मेरा हस्ताक्षर ले लिया और अदालत द्वारा जून 2000 में मुख्य अपराधकर्ता ठहराएँ जाने के कारण मुझे जेल भेज दिया गया। फरवरी 2001 में जमानत पर रिहा हुई। यह पूरा मामला 2014 में जाकर समाप्त हुआ। यह मेरे जीवन का सबसे बदतर समय था, शायद इन्हीं मुश्किलों ने मुझे लड़ना सीखा दिया।" 2001 से ही उसने एक गैर सरकारी संस्था के साथ मिलकर एलजीबीटीक्यू मुद्दों पर काम करना शुरू कर दिया। उस समय उनका ज्यादा ज़ोर एमएसएम (समलैंगिक पुरुष) पर ही था इसलिए अब भी वह ट्रान्सजेंडर समूह से ज्यादा मिल नहीं पायी थी। 2009 में दोस्तों के साथ मिलकर एनजीओ(गैर-सरकारी संगठन) रजिस्टर्ड कराने के बाद किन्नर समुदाय के साथ मिली और उनके साथ काम करने लगी। "2013-14 तक मैं खुद को गे ही मानती थी लेकिन डेरे (किन्नर समुदाय) के लोगों से मिलते रहने और अपने अनुभवों से लगा कि मैं गे नहीं ट्रान्सजेंडर हूँ।" इस तरह 43-44 साल गुजर गए खुद की पहचान करते हुए, आधे से ज्यादा जीवन दो जेंडरों के बीच झूलते हुए निकल गया था।

अपनी पहचान के बारे में निश्चित होने के बाद एलजीबीटीक्यू समूह के लोगों के लिए उस पहचान के साथ लोगों के सामने आना महत्वपूर्ण कदम होता है। ज़्यादातर ट्रान्सजेंडर के साथ यह आसान नहीं होता, क्योंकि परिवार व समाज का दबाव ऐसा न करने का होता है, या फिर समाज में ऐसे व्यक्तियों के पहचान को कलंकित किए जाने के कारण खुद ऐसे पहचान वाले लोग खुद की पहचान को गलत समझने लगते है। लेकिन धनंजय ने कभी भी अपनी पहचान को गलत नहीं माना। वह कहती है कि 'अगर हमें खुद अपनी पहचान को लेकर शर्म या झिझक हो तो लोग भी उसी नजरिए से देखेंगे। आज लोग मुझसे बात करते है, मुझे उनका साथ और सहयोग मिलता है क्योंकि मैंने अपनी पहचान को कभी गलत नहीं माना।' पंजाब विश्वविद्यालय से धनंजय का बचपन से नाता रहा कारण मामा और पापा यहाँ काम करते थे। यहाँ के लगभग लोग उसे बचपन से ही जानते थे। वह कई इमारतों की तरफ इशारा करके बताने लगती है कि कहाँ पर क्या था और कहाँ पर वह अपने दोस्तों के साथ खेला करती थी। इस तरह उसकी लड़कपन की खुशनुमा यादें इस विश्वविद्यालय से जुड़ी थी तो दूसरी तरफ अपना आत्म-सम्मान भी उसने यही खोया था, इसलिए उसने मन ही मन यह निश्चय कर लिया था कि वह अपना खोया हुआ आत्म-सम्मान और अधिकार यही से लेगी। यही कारण है कि उसने विश्वविद्यालय में फिर से आना चुना।

पढ़ाई करने का निर्णय तो ले ही लिया था अब बारी थी अगले कदम की यानि लोगों के बीच जाकर जेंडर तथा यौनिकता के मुद्दे पर बात करने की। विश्वविद्यालय में ट्रान्सजेंडर के रूप में प्रवेश लेना और लोगों के द्वारा स्वीकार्यता प्राप्त कर लेना, यह सब कुछ अचानक नहीं हुआ था यह उसके मेहनत का ही फल था। वह कहती है 'इसके लिए मैंने 4-5 साल तक तैयारी की, इस विश्वविद्यालय में मैंने इन मुद्दों को लेकर 2012 से ही काम शुरू कर दिया था। मैंने अलग-अलग विभागों के छात्रों तथा शिक्षकों से बात-चीत शुरू की। मैंने बात करते हुए एक चेन बनाया ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकूँ। इसी बीच हमने 2013 में पहली बार यहां (चंडीगढ़) प्राइड मार्च का आयोजन किया। उस समय विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी कह दिया था कि यहाँ से चले जाओ, यहाँ कार्यक्रम मत करो। हमें हटाने के लिए सुरक्षा गार्ड भी आ गये, लेकिन हमारे समर्थन में छात्र-छात्राएँ तथा शिक्षक सामने आये। उन्होने प्रशासन से बात की और हमें कार्यक्रम की शुरुवात विश्वविद्यालय से ही करने के लिए कहा।' आज भी समाज की मुख्यधारा ट्रान्सजेंडर के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता, धनंजय ने इसी खाली जगह (gap/space) को भरने का प्रयास किया।

अप्रैल 2014 में सुप्रीम कोर्ट के थर्ड जेंडर पहचान संबंधी निर्णय आने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन से प्रवेश फॉर्म में थर्ड जेंडर का कॉलम देने लिए लिए कहा गया। 2016 में पंजाब विश्वविद्यालय की पहली ट्रान्सजेंडर विद्यार्थी के रूप में धनंजय ने प्रवेश लिया। अब भी कुछ लोगों के लिए धनंजय का ट्रान्सजेंडर पहचान स्वीकार करना मुश्किल था। उन्हें लगता था कि अब तक तो लड़का था फिर कैसे ट्रान्सजेंडर हो सकता है, तो वहीं कुछ लोगों के लिए अब भी हंसी-मज़ाक की पात्र मात्र थी। धनंजय अपने सहपाठियों के साथ हुए पहले परिचय के बारे में बताती है "जब मैंने बताया कि मैं शादी-शुदा हूँ तो लोगों को लगा कि मैं नकली हूँ और सिर्फ कुछ लाभ प्राप्त करने के लिए नाटक कर रही हूँ। इसका कारण उनके दिमाग में ट्रान्सजेंडर के प्रति बैठी कई भ्रांतियाँ थी, लेकिन जब धीरे-धीरे उन्हें मेरे बारे में पता चलता गया तो वे मेरे साथ खड़े होते गए।" पूर्व के अनुभवों (यौन उत्पीड़न, छेड़-छाड़) के कारण अब भी वह कहीं अकेले जाने से डरती थी, ऐसे में उन्होंने लड़कियों को एक बेहतर साथी पाया जो उनकी समस्याओं को समझ रही थी और सहायता के लिए भी तत्पर थी। विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने के बाद एक बड़ी समस्या टॉयलेट की थी कि कौन सा टॉयलेट उपयोग में लिया जाए। कुलपति को जब इस समस्या से अवगत कराया गया तो उन्होने जल्द ही अलग टॉयलेट बनाने का आश्वासन के साथ अस्थायी तौर पर लड़कियों की टॉयलेट के उपयोग करने सहमति प्रदान की।



धनंजय जितना महत्वपूर्ण कक्षा में समय बिताने को मानती है उतना ही महत्वपूर्ण वह अन्य लोगों के साथ मिलना और बात करने को भी मानती है यह इस दृष्टि से कि ताकि सोशल स्पेस में ट्रान्सजेंडर की मौजूदगी सामान्य हो जाए। वह इस संदर्भ में कहती है 'अगर मुझे सिर्फ पढ़ाई करनी होती तो चुपचाप अपनी कक्षाओं में शामिल होती और चली जाती लेकिन इससे क्या होता? लोगों का ट्रान्सजेंडर समुदाय के प्रति जो नजरियाँ है वह जस का तस बना रहता।'  ज़्यादातर ट्रान्सजेंडर किशोरावस्था में आते तक अपनी पहचान के बारे में निश्चित हो जाते है। यह स्कूली शिक्षा का अंतिम पड़ाव (10वीं या 10+2वीं) या स्नातक की पढ़ाई का शुरुआती समय होता है। ऐसे में जब उन्हें उसकी पहचान के कारण परिवार व समाज से बहिष्कृत किया जाता है तब उसके पास किसी प्रकार की सहायता के लिए व्यवस्था नहीं होती। रोटी और सुरक्षा के तलाश में या तो वे डेरा में शामिल हो जाते (यहाँ भी अपनी आजीविका के लिए बधाई, मंगनी ही करना होता है) है या सेक्स वर्कर के रूप में काम करने लगते है। इसका कारण यह भी है कि कोई छोटा सा काम भी उन्हें मयस्सर नहीं हो पाता है, इन दोनों ही अवस्था में उसका आगे का भविष्य खत्म सा हो जाता है। आखिरकार इन दोनों ही स्थितियों में उन्हें बहिष्कृत जीवन ही गुजारना पड़ता है। बहुत सारे ट्रान्सजेंडर पढ़ाई तो करना चाहती है लेकिन उन्हें सहपाठियों तथा शिक्षकों की उपेक्षा, मज़ाक का पात्र बन जाने के कारण पढ़ाई छोड़ देनी पड़ती है। धनंजय को भी इन्हीं परिस्थितियों से गुजरना पड़ा, अतः उन्होने प्रशासन के सामने शिक्षा, आवास तथा भोजन जैसे बुनियादी चीजों को निशुल्क उपलब्ध कराने की मांग रखी इसके साथ ही भेद-भाव मुक्त माहौल को सुनिश्चित करने के लिए कहा ताकि समाज में स्वीकार्यता के साथ एक बेहतर जीवन के लिए तैयार हो सकें। इन मांगों के प्रति प्रशासन का रवैय्या सकारात्मक रहा है।

धनंजय के प्रयासों से आज पंजाब विश्वविद्यालय ट्रान्सजेंडर विद्यार्थियों के लिए बेहतर जगह बनती जा रही है। इस सत्र में 5 ट्रान्सजेंडर विद्यार्थियों ने अलग-अलग विषयों में प्रवेश लिए है। भविष्य में इस संख्या के बढ़ने को लेकर धनंजय सकारात्मक है, वे बताती है कि अलग-अलग जगहों से लोग विश्वविद्यालय में प्रवेश संबंधी पूछताछ के लिए फोन करते रहते है। इस तरह के प्रयासों का लाभ असमंजस की स्थिति से निकलने, अपनी पहचान निर्धारित करने तथा एक बेहतर रोल मॉडल के लिए होगा। फैशन डिजायनिंग में स्नातक कर रही प्रीत कहती है 'मैं बहुत दिनों से महसूस करती थी कि मैं लड़की हूँ लेकिन बदनामी, पारिवारिक-सामाजिक दबाव के कारण खुद को कभी व्यक्त नहीं कर पायी थी। लेकिन जब मैं दीदी(धनंजय) से मिली तो मुझे हिम्मत मिला कि मैं जैसा महसूस करती हूँ वैसा ही रहूँ।' प्रीत के इस कदम के बाद परिवार वालों ने प्रीत को घर से निकाल दिया, इस समय प्रीत अपने बुआ के साथ रहती है। आज तक लोगों ने ट्रान्सजेंडर को पारंपरिक कामों से अपनी आजीविका चलाते हुए देखा है, खुद ट्रान्सजेंडर भी यहीं मानकर चलते थे कि यही हमारा काम है ऐसे में इस तरह के बदलाव लोगों का ट्रान्सजेंडर को देखने की दृष्टिकोण में बदलाव लाएगी। पिछले 13 साल से विश्वविद्यालय के कैंटीन में काम करने वाले रंजीत कहते है 'आज तक मैंने उनके (धनंजय) बारे में किसी को बुरा कहते हुए नहीं सुना है, जब उनका व्यवहार सबके साथ अच्छा है तो कोई बुरा क्यों बोलेगा? उनको यहाँ पढ़ते देखने से पहले मैं यही सोचता था कि हिजड़ा सिर्फ ट्रेनों में पैसा मांगते है और नाच-गाने का काम करते है, अब मैं ऐसा नहीं सोचता हूँ।'

धनंजय विश्वविद्यालय परिसर में हुए परिवर्तनों के बारे में बताते हुए कहती है "पहले लोग बात करने, मिलने में शर्म महसूस करते थे। कहीं से गुजरता तो लोग मेरे हाव-भाव देखकर हँसते, मज़ाक बनाते। लेकिन आज लोगों ने हमें हमारी पहचान के साथ स्वीकार कर रहे है। शुरुआत में लोग एलजीबीटीक्यू पहचानों के बारे में नहीं जानते थे, विशेष रूप से ट्रान्सजेंडर के बारे में उनके दिमाग में बहुत सारी भ्रांतियाँ थी। वे सभी को 'गे' समझते थे। लोगों के बीच रहने से यह हुआ है कि आज इसी विश्वविद्यालय में 10 से भी ज्यादा शोध ट्रान्सजेंडर के ऊपर हो रहे हैं। वे संवेदनशील हुए है, उनकी सोच में बदलाव आया है। उन्हें पहली बार पता चल रहा है कि हमें किन समस्याओं से गुजरना पड़ता है। इन बदलाओं के बाद  भी मुझे इस विश्वविद्यालय से बहुत सारी उम्मीदें है।"



इन तमाम संघर्षों के पीछे एक ही आग्रह है कि हमें भी इंसानों की तरह स्वीकार्यता मिले। ताकि धनंजय जैसे लाखों ट्रान्सजेंडर को अपने परिवार, समाज, संस्कृति से विस्थापित ना होना पड़े। आपको उनकी जेंडर व यौनिक पहचान को स्वीकार करने से पहले उन्हें एक व्यक्ति के रूप में स्वीकार करना पड़ेगा। सफलताओं की कहानी सिर्फ इसलिए है ताकि उन्हें आप कमतर ना समझने लगे, ताकि उन्हें बंद खांचों के बाहर भी समझ सकें। क्या इससे पहले भी कोई ए. रेवती जैसी लेखिका नहीं हो सकती थी? हो सकती थी लेकिन कभी हमने उन्हें सुनने की जहमत नहीं उठाई। क्या इससे पहले किसी धनंजय को इन अमानवीय यातनाओं से नहीं गुजरना पड़ा होगा? आज भी उन्हें अमानवीय अत्याचारों को सहना पड़ रहा है सिर्फ इसलिए क्योंकि हमने उन्हें वे जैसे है और जैसा रहना चाह रहे है वैसे पसंद नहीं करते। वह तभी स्वीकार किए जाएंगे जब वे हमारी मानकों पे फिट हो।

(यह आलेख धनंजय के साथ की गई बातचीत  पर आधारित है)

लेखक म.गां.अ.हि.वि.वि. वर्धा के  समाजकार्य विभाग में शोधार्थी हैं. संपर्क: dksahu171@gmail.com, मोबाइल: 9604272869


तस्वीरें गूगल से साभार
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