श्री श्री की कविताएँ

श्री श्री 

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ,कहानियां, आलेख प्रकाशित. . सम्पर्क:  shreekaya@gmail.com 
1.
कई बार ज़मीर इतना जिद्दी हो जाता है
जैसे किसी पुरानी इमारत की सीढ़ियां
और आखिरी सीढ़ी तक पहुँचते हुए
हम अपने भीतर से
कई आवाज़ों को बेदखल कर देते हैं
बातचीत के टुकड़ो में षड्यंत्र की उबकाई
और कोहराम करती किसी तीसरी दुनिया की रोशनी
धीमी गति से हमारे करीब आने लगती है
लेकिन हमेशा मृत
उतनी मृत जैसे मेरी कॉफी का खाली मग
बुझी सिगरेट की बची राख
और जिस्म को घायल करती प्रेम की क्रूरता
मुझे पागलपन की हद तक हँसी आ जाती है
आत्मा के जिस्म को क्षुद्रता से तबाह करने वालों पर
उन लोगों पर भी
जो जीवन के दुखों को प्रेम नहीं कर पाते
हार जाना चाहते हैं उसे जुए में
और त्याग नहीं पाते
अपने ऐतिहासिक प्रेमी
सीलन भरी माएँ
और बर्फ हो चुके पिताओं को
स्वप्न जब भी टूटते हैं नींद में
हम बेदखल हो जाते हैं अपने समीकरणों से
मात्र घटना बन जाते हैं अतीत की
और यह भी
कि कभी-कभी कोई घाव
हमें जगाए रखे सदा के लिए
कि रोना रोशनी बन जाए
और रोशनी गुमराह कर दे हमें
मरियम के पीछे
चुपचाप चलने की ग्लानि को
हम कह सके सच्ची विदा

2.
तुम्हें अपने पुरखों की आँखें विचित्र एकांत में चूमनी थी
तुमने मेरी पीठ का तिल चूम लिया
मुझे यह तुम्हारी असभ्य क्रूरता लगी
तुम्हें अपने अस्तित्व से बाहर की लड़ाई में किसी अंधे को दृष्टि देनी थी
तुमने घोर निराशा से ग्रस्त
अपना प्रेम देने के लिए मुझे चुन लिया
अशरीरी सभ्यता में तुम्हारा नाम एक मजाक है
नीरो की गलतियां तुम्हें लुभाती रही
इतिहास को पढ़ने की दौड़ में
तुम प्रेम कविताएं लगातार अपने तलवों के नीचे जमा करते गये
शरद ऋतु के आरंभ में तुम्हारे मुँह से निकला खून
तानाशाह की जबान सदियों से बोलता आ रहा है
तुम बेफिक्रे सुनामी की तरह
कितना कुछ खुद में समा लेना चाहते हो
स्वस्तिक चिन्ह तुम्हारी कालिमा को
अब तक जीवित रखे हुए है
यह मृत संसार है
और चर्च के घंटे हमेशा हवा की लहरों पर शोर करते रहते हैं
तुम्हें सांत्वना चाहिए
और मुझे तुम्हें दो टुकड़ों में बांटना है

3.
कमल पुष्पों की सौहार्द स्निग्धता में
चावल और रोली की कलश आहुति चलती रही
होता रहा श्रृंगार रक्ताभ चरित्रों से
अग्निवाहक सिन्दूर मथुरा से भाई लाया
और लाल धोती माँ के पीहर से आई
केले के पत्ते और लौंग से बंधी
यह विशिष्ट संस्कार था मृत देह का
मृत और अंतिम ध्वनि में बची स्मृति कोष्ठकों का आलाप था
चन्दन लकड़ी से मृत स्वप्नों को दीप्तिमान किया
गंगाजल से परिक्रमा के धागे बांधे
मगर खुलते गये तिमिर के नयन कमल
प्रतीक्षा कब से आहत थी
यह तुम न जान सके कभी
और सुना था इस मृत देह के पार भी होता है
देह का एक आश्रम
जहाँ धान
कपास और प्रेम सब उपजता है अपनी कंदराओं में
मेरे मोह के अश्रु जब न बींध पाये तुम्हारा हृदय
तो इसी परिणिति में होना था प्रेम का आरम्भ
खुलनी थी
वह गांठे जिनमें तुम्हारा निर्दोष संयम बंधा था
क्या तुम नही थे विदेह की गाथा के प्रथम बिंदु
और
मैं सारांश इस कथा की

4.
बची रहेगी प्रेमियों में आत्मीयता
जब तक जाड़ा रहेगा हल्का भी
ज़रूरी है एक अभ्यास
निकट आने का उनमें
ताप और अलाव के मध्य
चाय का एक गर्म प्याला
सर्द चुम्बन की जुम्बिश
स्मृति के जड़ों में
अगले मौसम तक
यूँ ही स्थिर रहेगी

5.
प्रेम मेरे पुरखों की आँखों का आँसू था
जो बिना गिरे ही
उनकी चिताओं में जल गया
तब से मेरा किया तर्पण श्रापित है
और मेरा शरीर
मेरी मौन प्रार्थनाएँ

6.
तुम्हे लौटना होगा
अपनी यौन इच्छाओं के साथ व्याकुल देह को रिक्त कर
मुझसे आसक्ति के बंधन का निर्वाह करना होगा
क्यों तुम मेरी मादक आत्मा की राह में खड़े हो
उतर जाओ
उन खाली सीढ़ियों से.
अपने डूबता हृदय को संभालो
सुनो
जासूसी उपन्यास पढ़ने वाले
मैं एक गौरैया हूँ
मेरे स्वर में ताज़ा और सुगन्धित मधु है
और मैंने हत्या की है उन छोटे प्राणियों की
जिन्होंने मेरे स्वर को इतना तल्लीन बनाया है
करनी पड़ी हत्या
क्योंकि उनका प्रेम मुझे डसता था
पर मैं कसम खाती हूँ
मुझे दुःख हुआ था
बस इतना ही जितना तुम्हारी हत्या करने में होता
तुम्हारा संहार कर मुझे तृप्ति मिलेगी
मैं सच कहती हूँ.
हुगली नदी का जादुई जल मेरे हाथ में है
उस जल की सौगंध
बताओ किस रीति से हत्या करू तुम्हारी
क्या बर्बाद कर दूँ तुम्हारी उम्र
या किसी बंगाली बाबा से पुड़िया ले आऊं
ताकि तुम्हे खिला सकूँ मिष्टी दोई और चाय के साथ
मैंने गिरीश घोष से जड़ी-बूटी तो खरीद ली है
तुम्हारे यौनिक भूत की पिपासा का अंत करने के लिए
गिरीश घोष ने पान खाते हुए मुझे सब विधि समझाई
कि प्रेम का अर्थ बहुत गहन होता है
भूत की लकड़ी के तंत्र से कही ज्यादा गहरा और असरदार
इस लकड़ी का काढ़ा कड़वा होता है थोड़ा
तो तुम अपनी जिव्हा की नोक से चखना
और अपने स्वर का मधु मिला देना
हत्या के बाद मुझे सच में कोई ग्लानि नही हुई
खाती हूँ तुम्हारी कसम
मेरे भटकते प्रेमी
तुम्हारी सूनी आँखे सदा मेरी स्मृति में रहेंगी

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