घोंसला (स्वाति श्वेता) की कहानी

स्वाति श्वेता


सहायक प्रवक्ता, गार्गीकालेज', दिल्ली वि.वि. कैरेक्टर सर्टिफिकेट ( कहानीसंग्रह),ये दिन कर्फ़्यू के हैं (कविता-संग्रह). संपर्क: swati.shweta@ymail.com

मुझे लगता है कि अब मैं बुढ़ाने लगा हूँ । प्रायः कुछ न कुछ सोचता रहता हूँ । बच्चे बड़े हो गए और सबकी शादी भी हो गई । कहते हैं समय के साथ परिवार बढ़ता है । पर हम चार से दो हो गए और वे दो अब चार-चार हो गए हैं । मेरी पत्नी उम्र से पहले ही बुढ़ा गई । हमारा चौदह साल का कुत्ता जिसने हमारे साथ जिन्दगी के कई सुख-दुःख बाँटे थे, वह भी एक हफ्ते पहले गुजर गया और उसके साथ बच्चों के प्यार की अन्तिम कड़ी भी टूट गई ।

एक हफ्ते से मेरी पत्नी रोती चली जा रही है । मुँह से केवल ‘जैकी’ निकलता है । उसके पास जाता हूँ तो बच्चों की तरह फफक-फफक कर रोती है । उसका सिकड़, खाने का डिब्बा, पानी का बर्तन, उसका बिस्तर सब उसने एक कोने में रख दिया है । फिर भी बार-बार वहाँ जाती है, शायद यह सोचकर कि  ‘जैकी’ घर से बाहर पेशाब करने गया है और फिर आ कर अपना खाना खाएगा । मुझसे उसकी यह हालत कभी-कभी देखी नहीं जाती ।

ऐसा नहीं कि उसकी मौत का मुझे दुःख नहीं पर क्या करूँ ? पुरुष हूँ, पत्नी की तरह फफक-फफक कर रो नहीं सकता । एक अजीब सा खालीपन महसूस करता हूँ और चारों तरफ से हम दोनों अपने आपको एकान्त, बुढ़ापा, यादों और... घिरे महसूस करते हैं ।

खैर छोड़िए इतना बताना जरूरी है कि हम दोनों इस दो मंजिला घर में अकेले रहते हैं । कभी-कभी लड़ते भी हैं पर प्यार भी तो करते हैं । कभी-कभी लगता है कि घर में सब कुछ है फिर भी कुछ नहीं---
“सुनते हो । आज मेरा मन नहीं लग रहा है ।” ये मुझसे कहती हैं ।
“क्या करूँ ? तुम ही बताओ ।” मैं उत्तर देता हूँ ।
“यह भी कोई जवाब हुआ भला ।” ये खीझती हैं ।
‘तो फिर !’ मैं इन्हें और खीझाता हूँ ।
“तुम तो एक दम बुढ़ा गए हो । बिल्कुल अपने बाप की तरह ।”
“नहीं ! उनकी तरह तो बिल्कुल नहीं ।”
“क्यों ? ऐसा कैसे कह सकते हो ।”

“मैं तुम्हे लक्ष्मी जी थोड़े न कहता हूँ । वह तो माँ को सारा दिन लक्ष्मी जी, लक्ष्मी जी कहते थे । एक पल भी आँखों से माँ को ओझल नहीं होने देते थे ।” और ये हँस देती हैं और स्वीकृति भी दे देती हैं कि मैं, मैं ही हूँ, बदला नहीं हूँ ।

ऐसा क्यों होता है कि जैसे-जैसे आदमी की उम्र बढ़ती है वह शारीरिक रूप से कमज़ोर होने तो लगता है पर बाहर से वह निरन्तर प्रयास करता है अपने को मजबूत दिखाते रहने की । मुझे अब भी याद है बच्चे स्कूल से आकर अपनी माँ के आगे-पीछे भागा करते थे और ये उन्हें खाना खिलाने में इतनी व्यस्त हो जाया करती थीं कि प्रायः मैं इनकी चेतना से गायब हो जाता । मेरी बारी हमेशा बच्चों के बाद ही आती थी । बच्चों को खाना खिला ‘ये’ मुझे आवाज़ देतीं और मैं एक रूठे बच्चे की तरह उठ खाने की टेबल पर आ जाता ।



बच्चे कुछ बड़े हुए तो हम सब एक साथ खाने लगे । मालूम ही नहीं हुआ और बच्चे बरसात की घास की तरह बढ़ते चले गये । मैं अपने कार्यों में व्यस्त रहा । चाहते हुए भी अधिक समय बच्चों के पास नहीं बैठ पाया । पर कोई यह नहीं कह सकता कि मैंने उन्हें समय नहीं दिया । उनके हर सुख, हर दुःख में मैं उनके साथ खड़ा था । एक पिता होने का पूरा दायित्व तो मैंने निभाया पर पुरुष होने के कारण बाहरी दायित्व भी अधिक थे । पत्नी ने सब शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी नौकरी नही की । हमेशा बच्चों में लिपटी रहतीं ।

“सुनिये ।”
“हाँ कहो ।” मैंने कहा ।
“ये ऊपर बैठकर क्या सोचते रहते हैं ? नीचे आईए ! खाना लग गया है ।”
“आता हूँ ।” मैंने फिर से कहा ।
अगले ही क्षण मैं नीचे आ जाता हूँ ।
“क्या बनाया है ?” मैंने हाथ धोते हुए उत्सुकता दिखाई ।
“कद्दु की सब्जी, बैंगन आलू फोरन और कद्दु का चक्का ।” पत्नी ने बताते हुए कहा ।
“वाह आज तो मजा आएगा । अच्छा ये तो बताओ कल क्या बना रही हो?” मैंने अपनी इच्छा जताई ।
“कल !”
“हाँ कल! अरे बेटा-बहू आ रहे हैं ! अब तो हमारी पोती आठ साल की हो गई होगी । नहीं ?”
“हाँ, आठ साल चौदह दिन ।” मेरी पत्नी ने मुझे सुधारते हुए कहा ।
“तुम हिसाब-किताब में बहुत सही रहती हो ।”
वह कुछ नहीं बोलती हैं ।
“आओ तुम भी तो अपनी प्लेट लगवाओ ।”? मैंने कहा ।
“नहीं मैं बाद मैं खा लूँगी । आप खा लीजिए ।” उसका एक वाक्य का उत्तर था ।
“अरे मेरी स्वीटहार्ट, मेरे साथ भी तो बैठ कर खाओ । जब बच्चे छोटे थे तब भी नहीं खाती थी और अब जब बच्चे सब अपनी-अपनी दुनिया तलाशने निकल चुके हैं तब भी नहीं !”
मैं बोलता रहा पर उसने मेरी किसी भी बात का उत्तर  नहीं दिया । खाना खा मैं उसके पास आया तो देखा कि वह कुछ उदास है । मैंने उसके सिर पर हाथ रखते हुए पूछा-“क्या बात है ? कुछ तो बोलो ।”

“कुछ नहीं । आप कुछ देर आराम कर लीजिए । मैं दीपा के साथ रसोई समेट लेती हूँ ।” इतना कह वह दीपा को आवाज़ लगा कमरे से बाहर चली जाती है ।

कुछ तो है जो आज वह मुझसे छिपा रही है । और उस कुछ को मैं जानता भी हूँ । पर न जाने क्यों चाहता हूँ कि वह उसे स्वर दे । पर वह मेरे हर प्रयास को विफल बना केवल मौन बुनती है ।

सुधीर पूरे दस वर्षों बाद घर आएगा । दस वर्ष कैसे निकले हैं क्या बताऊँ? मेरे पास कम्प्यूटर नहीं हैं और ना ही स्मार्ट फोन  कि मैं अपने बेटे की तस्वीर और आवाज़ उससे बातें करते समय देख -सुन लिया करूँ !ऐसा नहीं कि खरीद नहीं सकता बस चलाने से डरता हूँ , कभी चलाया नहीं न इसलिए I पर अब सोचता हूँ कि खरीद लूँ । सारी जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुका हूँ । जो कर्ज आज तक लिये थे सब चुका दिया । अब कम्प्यूटर  भी खरीद सकता हूँ और एक सस्ता स्मार्ट फोन भी और अब तो दाम भी कम हो गए है । पर ये मानती नहीं । कहती हैं कि अब कोई इच्छा नहीं ।

मेरी आँखों के आगे से भुलाए नहीं भूलते वे पल जब सुधीर पी.एच.डी करने कैलिफोर्निया जा रहा था और ये दहाड़े मार-मार कर बेहोश हो रही थीं । सुधीर कहता था माँ मैं तुम से अलग नहीं हो सकता और मैं नहीं जाऊँगा । पर मैं शायद माँ-बेटे के बीच आ गया । “कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है” मेरा यही वाक्य शायद मेरी पत्नी की जिन्दगी का बीज वाक्य बन गया।

हमारा दूसरा बेटा मुम्बई में नौकरी करता है । कोहलापुर से मुम्बई कोई बहुत दूर नहीं फिर भी हम से मिलने तीन-चार साल पर तीन-चार दिनों के लिए आता है । पहले पहल जब बच्चे घर से बाहर गए तो फोन की हर घण्टी के साथ ये दौड़ी आतीं । नौकर को दूर से चिल्लाती बोलती-“उठ, फोन उठा जरूर सुधीर  या अरुण का फोन होगा ।” पर अब फोन बजता रहता है और वह उठाती भी नहीं मानों फोन की आवाज़ अब उन्हें सुनाई ही नहीं देती है ।


मेरी दुनिया मेरी मन्नो जी, मेरी पत्नी मेरा सब कुछ है । मन्नो जी के बिना जीवन की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता । पर एक दिन इन्होंने कहा-“सुनिए अब हम दोनों सत्तर पार कर चुके । मेरी तबियत भी ठीक नहीं रहती । अपना ध्यान रखना सीख लीजिए । कहीं ऐसा न हो कि एक रात सोऊँ तो अगली सुबह उठ ही न पाऊँ । तब क्या करेंगे ? रसोई में नमक, हल्दी, चावल, दाल, तेल, मसाले, आटा किन-किन डब्बों में पड़े हैं मेरे रहते जान लो । पानी सुबह पाँच से सात ही आता है इसलिए मोटर उसी समय चलाना Iदूधवाला और अखबारवाला इतना ही नहीं प्रेसवाला सब चोर हैं इनकी बातों पर विश्वास कभी मत करना । अपना हिसाब हमेशा रखना । झाडू-पोछे वालियों से अपने सामने काम करवाना । उन पर घर नहीं छोड़ना । नहीं तो पता चलेगा कि सारा घर साफ हो गया । दवाई महीने में दो  बार ले कर आती हूँ और आपके नीले डिब्बे में रहती है । वहाँ से आपके इस छोटे डिब्बे में समय-समय पर भरती रहती हूँ और...”

मन्नों जी उस दिन न जाने और क्या-क्या समझाती रहीं पर मैं मानो बुत बन चुका था । उत्तर में केवल आँखों से आँसू ही निकले ।

“अरे, रो क्यों रहे हो ? जिन्दा हूँ अभी मैं ! मरी नहीं हूँ । मैं नहीं समझाऊँगी तो कौन समझाएगा ।”

बच्चों के चले जाने के बाद मैं ही मन्नो जी का पति और मैं ही उसका बेटा और मैं ही उसका पोता-पोती था । वह कभी पत्नी बन के तो कभी माँ बन के तो कभी दादी बन के मुझसे बातें करती । उसका मुझसे रूठना, मुझे डाँटना और फिर छोटे से बच्चे की तरह मुझे पुचकारना-दुलारना, सब मुझे अच्छा लगता । बच्चे बड़े हो गए और उनके साथ मन्नो जी की ममता भी ।

दोनों बेटों ने अपनी पसंद से शादी की । मन्नों जी के सारे अरमान दिल में ही रह गए । बेटों की खुशी के लिए सब कुछ किया । सुधीर जब अपर्णा को कैलिफोर्निया ले जा रहा था तब मन्नों जी के डर ने शब्दों का रूप ग्रहण किया-“अपर्णा, सुधीर मेरा लाड़ला बेटा है । हम माँ-बेटे को एक कड़ी में बाँधे रखोगी न !”

“अभी कैसे बता सकती हूँ मम्मी जी, वह तो समय ही बताएगा ।” अपर्णा का यह एक वाक्य मन्नों जी के ऊपर वज्रपात की तरह गिरा ।

तब का गया सुधीर अब आएगा । अपर्णा ने ठीक ही कहा था ।

मन्नों जी के घुटने इन सालों में जवाब दे चुके थे । और एक दिन तो मन्नो जी...



“ऑपरेशन करना पड़ेगा । पाँच से छह लाख रुपये और तीन महीने उनकी सेवा ।” मुझे अच्छे से याद हैं डॉक्टर साहब के वे शब्द । मेरे पास न तो इतने पैसे थे कि मन्नों जी के घुटने बदलवा सकूँ और न ही इतनी शारीरिक क्षमता की दौड़-भाग कर सकूँ ।

दोनों बेटों से फोन पर बात की और स्थिति से अवगत कराया सुधीर ने कहा कि वह तीन लाख तक भेज देगा पर उससे ज्यादा और न भेज पाएगा । वह भी अपनी पत्नी को बिना बताए । मैंने कहा भी कि अपर्णा को बता कर काम करो । पर सुधीर ने कहा कि अपर्णा को बताया तो वह एक भी पैसे नहीं भेजने देगी I किसी भी बात की  जिद करने पर वह तलाक देने की धमकी देती है । ऐसी स्थिति में पैसे छुपा कर ही भेज सकता हूँ और आने का सवाल नहीं क्योंकि अपर्णा जाने नहीं देगी । खैर ! सुधीर के भेजे तीन लाख रुपयों से मदद तो जरूर मिली ।

अरुण आर्थिक और शारीरिक दोनों ही रूप से सहयोग न दे पाया । उसकी भी कोई मजबूरी रही होगी । शायद सुधीर की तरह । मन्नो जी को अपनी अपाहिजता पर इतना रोना नहीं आया जितना रोना अपने बेटों की अपाहिजता पर आया । मैंने बहुत समझाया पर... ।

खैर छोड़िए !

मन्नो जी ठीक हो गईं । अब पहले से कहीं ज्यादा तेज़ चलतीं । अगर मैं यह कहूँ कि मन्नों जी अब तितली की तरह उड़ती हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी । जिन्दगी के सारे रंग जो धीरे-धीरे मृत होते जा रहे थे उनमें मन्नो जी ने एक बार फिर प्राण फूँक दिए । अब लाल रंग उन्हें लाल ही लगता और सफेद उन्हें सफेद ही । एक बार फिर मन्नो जी ने अपने जीवन के केनवस को रंगों से भरना शुरू किया । मुझे खुशी मिली कि मेरी मन्नों फिर से लह-लहा रही है । अबकी बार रंगौं के विचित्र चयन देखने को मिले । ऐसे रंग जो पहले कभी नही देखे गए थे । मैंने मन्नों जी से जानना चाहा पर उनका जवाब केवल इतना था कुछ रंग जिन्हें उन्होंने अपने चित्रों में भरे थे यह सोचकर कि उनसे चित्र और अधिक निखरेगा और अधिक सजीव हो उठेगा उन्होंने विपरीत परिणाम दिए । इसलिए अब चाह कर भी मैं उन रंगों को भर नहीं सकती --“आदमी उँगली जलाकर ही तो सीखता है न जी, ठीक कह रही हूँ न ।”

और मैं मन्नो जी के उस कथन पर सहमति दिए बिना नहीं रह पाता ।

आज मेरी मन्नो मेरे पास है । मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य है । मैं मन्नो के साथ टेलीविजन देखता हूँ, मन्नो के साथ बागवानी करता हूँ । मन्नो के सा थ कसरत करता हूँ । मन्नो के साथ टहलने जाता हूँ पर बच्चों को याद मन्नो के साथ नहीं करता हूँ । या यूँ कहूँ कि बच्चे तो मुझे कभी विस्मृत ही नहीं हुए जो उन्हें याद करूँ । वे तो मेरे साथ पल-प्रतिपल हैं । मन्नो जी आज भी सुधीर और अरुण को प्यार करती हैं । आज भी उनके बचपन को याद करती हैं जब मेरी मार से उन्हें बचाने के लिए वे न जाने क्या-क्या कहानियाँ गढ़ा करती थीं । जब उनकी एक फरमाइश पूरी करवाने के लिए वह निरन्तर मेरे आगे-पीछे घूमती थीं । मन्नो जी कुछ भी तो नहीं भूली हैं । मन्नो जी ने अपने आपको बस इन्ही यादों के सुपुर्द कर रखा है । इन यादों में किसी का भी हस्तक्षेप उन्हें पसन्द नहीं ।

 रात हुई तो मन्नों जी ने दीपा से नए पर्दे, नया टेबल क्लाथ, नया बेडशीट सब निकालने को कहा । मैं खुश था कि सुधीर का स्वागत करने की तैयारियाँ शुरू हो गईं थी । सुबह सब बदल देना था । कल शाम तक सुधीर हम लोगों के बीच होगा । मेरी पोती मेरे पास होगी । अब तक तो फ्लाइट में बैठ चुका होगा । मन्नो जी रात का काम समेट जब सोने आती हैं तो फोन बजता है ।

“अब इस समय किसका होगा?” मैं आश्चर्य से कहता हूँ ।

मन्नो जी चुप बिस्तर पर लेटी रहती हैं ।

मैं ही उठता हूँ । फोन सुनता हूँ और फिर बिस्तर पर आकर लेट जाता हूँ । मुँह में थूक जम चुका है उसे घोंट जाता हूँ ।
“मन्नो ।”
“हूँ ।”
“पूछोगी नहीं किसका फोन था ।”
“किसी अपने का ही होगा ।”
“सुधीर का था । वह नहीं  आ रहा है । कह रहा था कि कोई जरूरी काम आ गया है । अभी व्यस्त है । विस्तार से बाद में बात करेगा ।”

मन्नो जी  की कोई प्रतिक्रिया नही आती है । मैं आधी रात तक छटपटाता रहता हूँ और इस छटपटाहट में कब नींद लग गई पता ही नही चला ।

सुबह जब आँख खुली तो दस बज रहे थे । मैंने देखा घर के सारे पर्दे बदल दिए गए थे, टेबल क्लाथ नये लगा दिए गए थे । उठ कर सुधीर के कमरे में गया तो सब कुछ नया वहाँ व्यवस्थित रूप से दिखाई दिया । मुझे लगा कि शायद रात को मैंने जो कहा था वह मन्नो जी सुन नहीं पाई ।

“मन्नो सुधीर नहीं आ रहा है ।”

“छोड़ दिए घोसलों में चिड़िया के बच्चे फिर नहीं आते । वे अपने नये घोंसले बनाते हैं । पर चिड़िया ये जानते हुए भी आपना घोसला साफ रखती है कि क्या पता कभी वे बच्चे इधर से गुज़रे । मैंने तो बस अपना, घोंसला साफ रखा है” इतना कह मन्नो जी मुझे हाथ-मुँह धोने को कहती हैं ।

“नाश्ता तैयार है ।”
“क्या बनाया है ?”
“पूड़ी और आलू झोर ।”
और हम दोनों टेबल पर एक साथ पूड़ी और आलू झोर खाने बैठ जाते हैं । दीपा गरम-गरम पूड़ियाँ निकालती जाती  है।
                                                   

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