अभी तो बहुत कुछ शेष था ! (रजनी तिलक का असमय जाना)

संजीव चंदन

अलग-अलग सरोकारों के लोग, वामपंथी लेखक और एक्टिविस्ट, अम्बेडकरवादी लेखक और एक्टिविस्ट, सामाजिक संस्थाओं के लोग, महिला अधिकार के कार्यकर्ता, एलजीबीटी समूह की एक्टिविस्ट, विश्विद्यालयों के विद्यार्थी/शोधार्थी बड़ी संख्या में कल निगमबोध घाट पर राजनीतिलक को अलविदा देने आये, आख़िरी विदाई का यह दृश्य बहुत कम ही होता है. बड़ी संख्या में महिलाओं की उपस्थिति, पुरुषों से ज्यादा, बता रही थी कि किसी महिला-अधिकार की पुरोधा ने आख़िरी सांस ली है. अम्बेडकरवादी लेखकों के आँखों के आंसू बता रहे थे कि दलित लेखन और आन्दोलन की अपूरणीय क्षति हुई है. बिलखते लोग, विद्यार्थी इस बात की गवाही थे कि लोगों का कोई आत्मीय गया है, अपना गया है.

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हाँ, रजनी तिलक का असमय निर्वाण मेरे लिए व्यक्तिगत भावनात्मक आघात सा है, हम सबकी अपनी भूमिकाओं में एक साथी के जाने से खालीपन की हकीकत की तरह है. उनसे अंतिम बातचीत फोन पर हुई थी. उनका फोन आया था, किसी महिला साथी का मुद्दा स्त्रीकाल पर उठाना चाहती थीं. चाहती थीं कि उसकी बात स्त्रीकाल पर आये. मेरी बात भी उन्होंने उससे कराई. मैंने उससे खुद लिखने का आग्रह किया. इसके दो-तीन दिन पहले उन्हें मैंने फोन किया था, दलित स्त्रीवाद पर सबलोग के लिए लिखने के लिए. तब वे अस्वस्थ थीं, उन्होंने अपनी बेटी ज्योति से लिखवाने को कहा, ज्योति से बात करवाई, वह अंग्रेजी में ही लिख सकती थी. पिछले दो-तीन सालों से उनके साथ बातचीत और काम का हमारा नियमित सिलसिला था. कितना कुछ करना चाहती थीं वे, कितनी बेचैन थीं वे उन कुछ सालों में, हर मोर्चे पर हस्तक्षेप के लिए! बहुत सी योजनायें थीं, और बहुत सी योजनओं पर काम कर रही थीं- साहित्य, संस्कृति और बदलाव के हर मोर्चे पर. साहित्य उनके लिए सिर्फ साहित्यिककर्म भर नहीं था, परिवर्तन का एक माध्यम था और सामाजिक सरोकारों के साथ सक्रियता से रहित साहित्यकार को वे साहित्यकार मानने से इनकार करती थीं.

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राजनीतिलक की आख़िरी विदाई 


इन दो-तीन सालों में हमने कुछ सामूहिक गोष्ठियां आयोजित की, एक साथ कुछ घटनाओं की फैक्ट फाइंडिंग की, कई धरने-प्रदर्शनों में शिरकत किया और कुछ आयोजनों में साथ-साथ मंच पर रहे. पहली बार उन्होंने 2013 में फोन किया था स्त्रीकाल के ‘दलित स्त्रीवाद’ अंक के प्रकाशन के बाद. वे चाहती थीं कि इस कड़ी में और अंक आयें, क्योंकि एक अंक में बहुत कुछ शामिल कर पाना संभव नहीं है- वे चाहती थीं दलित स्त्रीवाद का एक रचनात्मकता का अंक आये. एनएफआईडव्ल्यू के साथ स्त्रीकाल की एक बैठक में आईं तो ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’ की पुरजोर वकालत की उन्होंने. उन्होंने बताया कि ‘महिला आरक्षण के भीतर दलित-आदिवासी  महिलाओं को तो स्वतः ही आरक्षण मिल जा रहा है, हमारी लड़ाई ओबीसी महिलाओं के लिए उसमें कोटा निर्धारित करवाने की है.’ उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि महिला आरक्षण के भीतर आरक्षण की दलील लेकर ओबीसी-दलित नेताओं से महिलाओं का संगठन मिला था, जिसमें वे खुद भी शामिल थीं. वे चाहती थीं कि महिला आरक्षण की मांग बहुजन महिलायें अपने नेतृत्व में करें ताकि आरक्षण के भीतर आरक्षण का मुद्दा कमजोर न पड़े. उनकी दलील थी कि यदि यह आन्दोलन नीचे से, ग्रामसभाओं से शुरू हो तो, उनकी सहभागिता से शुरू हो तो हम महिला आरक्षण जल्द हासिल कर सकेंगे, क्योंकि वहाँ बड़ी संख्या में आरक्षित वर्ग की महिलायें हैं.
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रजनीतिलक की आत्मकथा अपनी जमीं अपना आसमां के विमोचन अवसर पर  बाएं से दाये, हेमलता माहिश्वर, प्रोफेसर अभय मौर्या,  संजीव चंदन , रजनीतिलक, बजरंग बिहारी तिवारी 


वैचारिक रूप से स्पष्ट होने के कारण ही वे अपनी बात पूरी ताकत से रखती थीं, इसकी परवाह किये बिना कि कोई इससे नाराज भी हो रहा है या नहीं. मतभिन्नताओं को बेबाकी से रखना, एक हद तक लड़ लेना और रिश्तों में पुनः सहज रहना कोई उनसे सीख सकता था. यही कारण था कि जिस स्त्रीवादी आन्दोलन के भीतर वे सवर्ण तत्व देखते हुए उसकी आलोचना करती थीं, उसके कई अग्रणी कार्यकर्ता कल उन्हें अंतिम विदाई देने आये. वे सबकी सीमाएं सिर्फ पहचानने में यकीन नहीं करती थी, बल्कि सीमाओं से उसे अवगत कराने में भी यकीन करती थीं. वे 1942 में डा.अम्बेडकर की अगुआई में हुए महिला सम्मेलन के 75वें साल स्त्रीकाल द्वारा जेएनयू में आयोजित बातचीत में पहुँचीं और फिर नागपुर में भी इस सम्मेलन की 75वीं जयन्ती पर देश भर से महिलाओं का सम्मेलन आयोजित करने में अगुआई की. वहाँ वेश्यावृत्ति के ऊपर हुए विवाद को वे सम्यक दृष्टि से देख सकने की क्षमता रखती थीं. वहाँ कुछ स्त्रीवादी कार्यकर्ताओं ने वेश्यावृत्ति को यौनकर्म का दर्जा देते हुए उसे कानूनी बनाने की मांग रखी तो स्वाभाविक रूप से दलित महिलाओं ने ऐतराज किया. रजनीतिलक भी इस ऐतराज से इत्तेफाक रखती थीं, लेकिन उसी वक्त वे यह कह पाने की क्षमता भी रखती थीं कि ‘ वेश्यावृत्ति में पीड़ित महिलाओं के साथ, उनके लिए जितना काम वामपंथी महिलायें अथवा वे महिलायें करती रही हैं, जो कानूनी बनाने की मांग कर रही हैं, उतना दलित महिलाओं का संगठन नहीं कर पाता, हमारा जुडाव उनसे नहीं है, हम अपने मुद्दों में उन्हें शामिल नहीं करते.’

रजनी तिलक होने के कई मायने थे. वे दलित साहित्यकारों के भीतर पितृसत्ता को बार-बार चिह्नित करती थीं, उनसे लड़ भी लेती थीं. उन्होंने डा. धर्मवीर के विरुद्ध भी स्त्रीवादी स्टैंड लिया था. यह कविता राजनीतिलक ही लिख सकती थीं, ‘ कथित दलित साहित्यकारों/ तुम्हारी ओछी नजर में/ स्त्री का सुंदर होना/ उसका मैरिट, सुंदर न होना उसका डिमैरिट!/ सवर्णों की नजर में/ वे ही है मैरिट वाले/ तुम हो डिमैरिट/ मैरिट का पहाडा जैसा उनका/वैसा ही तुम्हारा/ फिर तुम्हारा विचार नया क्या?/ कौन सा सामाजिक न्याय कौन सा तुम्हारा? इस बेवाकी के बावजूद वे दलित साहित्यकारों को प्रिय थीं, वैसे ही जैसे आलोचना के बावजूद सवर्ण स्त्रीवादियों को या फिर अपनी साथी दलित स्त्री लेखिकाओं और कार्यकर्ताओं को. वे स्पष्ट वक्ता थीं. कई बार मुझसे भी तीखी असहमति जतायी उन्होंने, मुझे खरी-खरी सुनाया भी, लेकिन वह उनका स्वाभाविक उदगार भर होता था, व्यवहार नहीं- हमारे स्नेह के रिश्ते कभी खंडित नहीं हुए.

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सोचता हूँ कि क्या उन्हें दुनिया से जाने का अहसास हो गया था, थोड़ी बीमारी तो कुछ महीनों से थी उन्हें, लेकिन उसकी परवाह कभी नहीं की. वे देश भर में महिला आरक्षण के लिए घूमना चाहती थीं, दिल्ली से बाहर. उन्होंने इन्हीं दिनों अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच बनाया. इस मंच को लेखन और जमीन पर सक्रियता दिलाने की कोशिश की. बनते ही कई यात्राएं उन्होंने दिल्ली के आस-पास की, जहां दलित महिलाओं का उत्पीड़न हुआ हो. वे दलित महिला कथाकारों का संग्रह लाना चाहती थीं, उर्मिला पवार की किताब का अनुवाद मराठी से अनुवाद करवा रही थीं, अपनी आत्मकथा का दूसरा भाग लगभग लिख चुकी थीं-कितना कुछ, उनके पाँव में सच में पहिया लगा था और हृदय में अभिव्यक्ति की बेचैनी थी. दिसम्बर में हमने द मार्जिनलाइज्ड प्रकाशन से उनके द्वारा संपादित किताब ‘सावित्रीबाई फुले समग्र’ प्रकाशित की.

कितना कुछ याद करूं! इन सब मोर्चों पर सक्रिय थीं और निजी स्तर पर उतनी ही बेचैन. अपनी इकलौती संतान ज्योति के लिए उनकी चिंतायें, उनकी चाहत उन्हें बेचैन किये था. पता नहीं क्यों उन्हें ज्योति का जीवन अनिश्चित लगता था- नहीं, नहीं वे पारम्परिक माँ नहीं थीं, वे उसके जीने के, उसके निर्णय के अधिकार पर काबिज होना नहीं चाहती थीं, वे बस उसे खुश देखना चाहती थीं. चाहती थीं कि लेखन और शोध के क्षेत्र में वह बड़ा काम करे. उन्हें लगता था कि दलित स्त्रीवाद के क्षेत्र में कितना कुछ काम करना शेष है, ज्योति वह करे. उन्होंने कोशिश की कि ज्योति और अपराजिता (जेएनयू की शोधार्थी, जिसने प्रोफेसर गोपालगुरू के साथ दलित महिला लेखन पर शोध किया है) मिलकर इस क्षेत्र में काम करें. उन्होंने अपराजिता को चंडीगढ़ में ज्योति के पास बुलाया भी. मुझसे वे काफी कुछ शेयर करतीं- मैं एक प्रगतिशील बेचैन माँ को देख रहा था, उन्हें समझता ज्योति नयी पीढी की है, वह अपने बेहतर मार्ग तय कर लेगी!

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स्त्रीकाल और राष्ट्रीय दलित महिला आन्दोलन के कार्यक्रम में 


रजनी दी किसी के जाने पर मैं अमूमन रोता नहीं, लेकिन आप, आप मुझे रुलाने के लिए, हम सबको उदास करने के लिए क्यों छोड़ गयीं,असमय ! अभी तो बहुत कुछ शेष था!!
लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं. सम्पर्क: 8130284314


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