अध्यादेश: बचपन से बलात्कार की सज़ा उम्र कैद या फाँसी!


देखने और सुनने में महिला-पक्षधर लगने वाला नया कानून- यानी बच्चियों से बलात्कार के मामले में फांसी मूलतः पितृसत्तात्मक और स्त्री विरोधी है-खासकर उस देश में जहाँ बलात्कार के अधिकाँश आरोपी परिचित होते हैं और बच्चियों से बलात्कार के मामलों में सजा बमुश्किल 3% होती है. एक ऐसे देश में जहां की सरकार में शामिल मंत्रियों को लगता है कि एक बड़े देश में एक-दो बलात्कार तो होते ही रहते हैं. जानें नये प्रस्तावित कानून पर न्यायविद अरविंद जैन और सामाजिक एवं थिएटर एक्टिविस्ट शुभा के विचार: 


अरविंद जैन

नया कानून ,अध्यादेश जारी होने के बाद हुए अपराधों में ही लागू होगा। अब तक के मामलों में, वही पुराना कानून लागू रहेगा। देखना यह है कि नए कानून के अंतर्गत, कितने अपराधियों को फाँसी की सज़ा मिलती है। कहीं ऐसा ना हो कि अदालतें, 'दुर्लभतम में #दुर्लभ' मामला ही ढूँढती रहे और ऐसे अपराधों में सज़ा, पहले से भी कम हो जाये।अदालतों की संवेदनशीलता और गंभीरता के बिना, यह मिशन अधूरा ही होगा।हाँ! अध्यादेश से निश्चितरूप से 'कठुआ' और 'उन्नाव' बलात्कार कांड के बाद उभरा जनाक्रोश, जरूर ठंडा पड़ेगा। 2012-13 फिर दोहराया गया। अगर सही से अनुपालन हुआ, तो यह अध्यादेश स्वयं (पितृ)सत्ता के गले में, फाँसी का फंदा सिद्ध होगा।

आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश, 2018 दिनांक 21अप्रैल, 2018 जारी हो गया और नया कानून लागू। अध्यादेश में भारतीय दंड संहिता, 1860, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1873, आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता और बाल अपराध संरक्षण अधिनियम, 2012 की कुछ धाराओं में संशोधन किया गया है। संशोधन के अनुसार 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामलों में भी, फांसी की सज़ा का भी प्रावधान हो गया।



अध्यादेश जारी होने के बाद, 12 साल से कम उम्र की बच्ची से बलात्कार की सज़ा उम्र कैद या फाँसी।न्यूनतम 20 साल कैद। फाँसी के फंदे से बचने के लिए, अबोध बच्चियों की हत्या की संभावना भी बढ़ेगी ही। अपराधी अपने ख़िलाफ़ सारे सबूत और गवाह भी मिटाने का भरसक प्रयास करता रहा है..करेगा। बाकी कुछ बचा तो, न्यायिक विवेक करता रहेगा, उचित सज़ा का फैसला।

पीड़िता की उम्र 16 से कम हुई, तो सज़ा दस से बीस साल तक और अभियुक्त को अग्रिम जमानत नहीं मिलेगी। जमानत के लिए भी 15 दिन का नोटिस अनिवार्य होगा। अग्रिम जमानत के बारे में दलित कानून में सुनाए, सुप्रीम कोर्ट फैसले की तरह क्या इस कानून का भी  विश्लेषण या व्याख्या करेंगे। कानून की संवैधानिक वैधता पर ही, सालों बहस होती रहेगी। और हाँ! अगर अपराधी 16 साल से कम उम्र का किशोर हो, तो क्या होगा? किशोर की परिभाषा (16 साल से घटा कर 12 साल) भी बदलनी पड़ेगी या नहीं?दूसरी तरफ अगर स्त्री की उम्र 16 साल से अधिक पाई गई, तो सज़ा सिर्फ 7 से 10 साल। क्यों? क्या अब अपराध की गंभीरता भी, उम्र के आधार कार्ड से तय होगी!

निर्भय कांड के बाद, भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 में 2013 संशोधन द्वारा सहमति से सहवास की उम्र 16 साल से बढ़ा कर18 साल की गई थी। अब यहाँ फिर से वही 'सौलहवें साल' के मानसिक संस्कार, सिर चढ़ बोलने लगे हैं।

प्रावधान तो बन-बना दिया गया है कि दो महीनें में जांच, दो महीनें में मुकदमा, दो महीनें में फैसला यानी छह महीनें में प्रक्रिया पूरी करनी होगी।पर यह सब, बिना नए ढांचे के होगा कैसे? हम जानते हैं कि 'फ़ास्ट ट्रैक', कब और कैसे धीरे-धीरे 'स्लो ट्रैक' में बदल जाता है।'निर्भया केस' (2012) को ही देख लो...फाँसी का फैसला होने के बाद भी, ना जाने कहाँ अटका-लटका हुआ है।

कहना न होगा कि बलात्कार के हर मुकदमें में स्त्री शिकायतकर्ता/पीड़िता है या सिर्फ एक गवाह! वो अपने ही साथ हुए दुष्कर्म की गवाह है,चश्मदीद गवाह। उसे बताना है, वो सब कुछ कब,कहाँ,कैसे और क्यों! स्मृतियों के सब छाया-चित्र दिखाने हैं घटना-दुर्घटना के, जिसकी वो गवाह है।एक बार फिर दोहराना है, बलात्कार अध्याय।बार-बार दोहराना है दिमाग में, कि कहीं कुछ छूट ना जाए और न्यायधीश उसे ही 'झूठी' ना समझ बैठे। गवाह इतने दबाव-तनाव में और बाकी सब यह जानने की प्रतीक्षा में कि आगे क्या हुआ, कब हुआ और कैसे! इस तरह, हाँ इसी तरह होती है अपने ही खिलाफ़, स्त्री की गवाही।

सच तो यह है कि अभी भी "घटनाघाट से न्यायपुरम के बीच कानून की कच्ची सड़क पर,गहरे गड्ढे और थोड़ी-थोड़ी दूरी पर #टोलटैक्स। सालों बैठे रहो धूप में और करते रहो फैसले का इंतज़ार। फैसला हो जाए तो, अपील दर अपील। सदियों पुराने खंडहर से वातानुकूलित खंडहर तक की अंतहीन यात्रा। मिस्टर इंसाफ और कानून कुमार के बारे में, विस्तार से फिर कभी....!"

स्त्री और बच्चों के विरुद्ध अपराध बढ़ रहे हैं चूंकि कानून कमजोर हैं। व्यवस्था कमजोर है। पुलिस कमजोर है। कोर्ट कचहरी कमजोर है। न्याय व्यवस्था बहुत महंगी है। पुलिस संवेदनशील नहीं है। मीडिया और तमाम मनोरंजन के क्षेत्र महिलाओं को सिर्फ एक वस्तु, एक ऑब्जेक्ट के रूप में पेश कर रहे हैं। छोटे पर्दे से लेकर बड़े पर्दे तक और अखबारों के चिकने पन्नों तक, औरतों को तमाम आकर्षक उत्पादों की तरह ही पेश किया जा रहा है। एक ऐसे उत्पाद के रूप में जिसे भोगा जाना बहुत स्वभाविक है। ऐसे में इस सबका नतीजा अंततः महिलाओं के विरूद्ध अपराध के रूप में ही सामने आता रहा है।समय रहते इसके बारे में भी गंभीरता से विचार करना पड़ेगा, हालांकि पहले ही बहुत देर हो चुकी है।

इस अध्यादेश को भी, एक और कानून समझो। यूँ देश में बहुत से कानून हैं, मगर कोई कारगर कानून नहीं है, कानून है तो उसका अनुपालन नहीं। यह कहना कि केवल कानून बनाने से कुछ नहीं होगा, एक हद तक सही लग सकता है। मगर अपराध रोकने के लिए या उन पर काबू पाने के लिए कुछ कठोर कानून बनाना भी जरूरी है।कानून हो ना हो, तो सोचो कि क्या हालत होंगे! देश में कानून का राज है, तो कानून का वर्चस्व भी बनाए-बचाए रखना होगा। स्त्री के विरुद्ध निरंतर बढ़ रही यौन हिंसा को रोकने के लिए, कुछ कठोर कानून और कुछ कठोर कदम उठाने ही पड़ेंगे....वरना!


                                                         
शुभा
फांसी की सज़ा किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।यह बलात्कार के सामने समर्पण ही है।बलात्कार की पक्षधर सरकार और विचारधारा फांसी की सज़ा लाकर समस्या को हल न करने कीअन्तिम और फाईनल घोषणा कर रही है।राजसत्ता और नागरिकों के बीच संवैधानिक माध्यमिकता को कुचलकर न्याय-व्यवस्था को निष्प्राण करते हुए फांसी की सज़ा का प्रावधान कई तरह की आशंकाओं और डर को जगाने वाला है।निरंकुश हिंसक सत्ता, हत्या को कई तरह से आसान और निरापद बनाने की कोशिश में है।बच्चियों के साथ बलात्कार को कम करने या ख़त्म करने के लिए जो काम करने ज़रूरी हैं उनमें से कुछ इस प्रकार हैं---
राजनीति को अपराधीऔर अपराध-तन्त्र से अलग करना।
भ्रष्ट्राचार ख़त्म करना और राजनीति से अपराधिक निजी पूंजी को अलग करना।
जस्टिस वर्मा कमैटी की सिफारिशों को लागू करते हुए पुलिस रिफ़ार्म करना।
लिंग और जाति के आधार पर भेदभाव ख़त्म करने के लिये सकारात्मक भेदभाव के सिद्धांत को अपनाकर इन्सैंटिव देते हुए संसाधनो तक उनकी पहुंच सुरक्षित करना।
बकरवाल समाज सहित सभी जनजातियों को जल, जंगल, जमीन के अधिकार देना।
2002 में हुए नरसंहार के अपराधियों को सज़ा देना और अल्पसंख्यकों को शिकार बनाने वाले हिन्दू धर्म का बहाना बनाकर आतंक फैलाने वाले संगठनों को प्रतिबंधित करना।धर्म के नाम पर नफरत फैलाने वाले सभी संगठन बलात्कार को "बदला लेने " का औजार बनाते हैं।
ग्रामीण ,भूमिहीन दलित स्त्री-पुरुष को संयुक्त पट्टा देकर भूमि -वितरण।भूमिहीन आबादियों पर लगातार बलात्कार होते हैं।
सभी को रोज़गार और कपड़ा, रोटी ,मकान व शिक्षा की गारंटी।

ये अधिकार न होने कारण ग़रीब आबादियों के बीच से साधन-सम्पन्न अपराधी अपने रंगरूट भर्ती करते हैं,निराशा भी अपराधों को जन्म देती है।ग़रीब आबादी के बच्चों और औरतों का निरन्तर भीषण शोषण और यौन उत्पीड़न होता है।श्रम कानूनों के अभाव में श्रमिक स्त्रियों और उनकी बच्चियों को यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया जाता है।स्वतंत्र मीडिया के अभाव में बलात्कारियों और यौन शोषण करने वालों के हौसले बुलन्द रहते हैं। विधान सभा, संसद और कैबिनेट स्तर तक महिलाओं के प्रति अपराध, बलात्कार और हिंसा के आरोपी मौजूद हैं।बलात्कार के पक्ष में बड़ा उत्साहपूर्ण वातावरण बना हुआ है। अभी बहुत बातें रह गई हैं जो फिर कही जाएंगी।

मौजूदा सरकार इनमें से कोई क़दम बलात्कार को ख़त्म करने की दिशा मे नहीं उठा सकती ।वह विपरीत दिशा में यानि बलात्कार के लिए उत्साहवर्धक परिस्थिति तैयार करने में लगी है। इस बात को छुपाने के लिए फांसी का कानून बना रही है।सरकार ख़ुद सभी कानूनों का दुरूपयोग  कर रही है इसलिये हमें इस क़ानून से डरना चाहिए।

बलात्कार पर अभी बात शुरू हुई है। (शुभा का मत उनके फेसबुक पेज से साभार). अरविन्द जैन का मत उसने बातचीत पर आधारित 
तस्वीरें गूगल से साभार 

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