मुश्किल डगर को आसान बनाया दलित महिला उद्यमी कृष्णा कुमारी ने

राजीव सुमन


साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाली दलित महिला उद्यमी की कहानी कह रहे हैं राजीव सुमन. डिक्की (दलित इन्डियन चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) की सदस्य कृष्णा कुमारी यद्यपि दलित शब्द के इस्तेमाल के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन अभी तक हम पैंथर आंदोलन से जुड़ी दलित शब्द की ऐतिहासिकता, निहित आक्रामकता, गौरव बोध  और राजनीतिक बयान के कारण इस शब्द का इस्तेमाल करते हैं.

यह कहानी एक ऐसी लड़की की है, जिसके गाँव में लडकियां प्राथमिक या माध्यमिक शिक्षा के बाद स्कूल की पढाई आगे नहीं कर पाती थीं. वह पहली लड़की थी जिसने दसवीं की पढाई पूरी की. 12वीं की पढाई पूरी करने के बाद उसके साथ भी वही हुआ, जो पितृसत्तात्मक जकडन में फंसी लडकी के साथ होता है-शादी, और उसके बाद पढाई का छूटना. यही हाल इस लडकी यानी, कृष्णा कुमारी के साथ भी हुआ- 20 सालों बाद वह स्नातक की अपनी पढाई पूरी कर सकी, घर गृहस्थी में फंसकर.

पति गोविन्द राम, इस मामले में सहयोगी सिद्ध हुए कि वह आगे अपनी मंजिल बनाने के लिए निकल पड़ी. कृष्णा और उनकी बेटी दिव्या, दोनो ने, लगभग  एक साथ स्नातक की परीक्षा दी, यानी बेटी एक साल बाद के बैच में थी.  उसके बाद उन्होंने 2012 में फैशन डिजायनिंग का कोर्स किया. यह सब उन्होंने पीछे मुड़कर देखने के लिए किया नहीं था , इसलिए आज वह कृष्णा क्रिएशन्स नाम से कुशन और बेडशीट का कारोबार कर रही हैं- एक उद्यमी के रूप में अपनी पहचान बनाकर अपने साथ कुछ और महिलाओं को भी रोजगार दे रही हैं.



कृष्णा कुमारी 

कृष्णा का जन्म हरियाणा के पलवल जिले के एक गाँव रायदसका में हुआ था. माता-पिता रामश्री और ग्यासी राम की छः संतानों में से एक कृष्णा ने 1991 में 10वीं की परीक्षा पास कर गाँव की अन्य लड़कियों के लिए निर्धारित शिक्षा की सीमा को तोड़ा. गाँव में माध्यमिक से आगे का स्कूल न होने के कारण दूर जाना पड़ता था, उन्होंने माता-पिता से सायकिल खरीदवाई और पढाई की मंजिल पर बढीं.

उन्होंने बताया कि पहली बार जब मैं अपने पति (वित्त मंत्रालय में अंडर सेक्रेट्री पद पर कार्यरत) के साथ एक मॉल में घूमने गयी, वहीं डिजायनर बेडशीट देखकर इसी दिशा में बढ़ने का मन बनाया. उन्होंने उसके बाद कुछ कुशन डिजायन किये, जिसे जब लोगों से प्रशंसा मिली तो एक कारोबारी के रूप में आगे बढ़ने का मन बनाया. शुरुआती पूंजी के लिए उन्होंने एनआईटी-4 के कम्युनिटी सेंटर में नौकरी की और पूंजी जमा की.

बाजार के बारे में वे बताती हैं कि अब तो वे ऑनलाइन मार्केटिंग भी कर रही हैं, इसके पहले दिल्ली हाट या सूरजकुंड मेला, प्रगति मैदान के ट्रेड फेयर अथवा मुम्बई ट्रेड फेयर जैसी जगहों पर अपने उत्पाद बेचती रही हैं. इन दिनों एक्सपोर्ट की प्रक्रिया की ओर कदम बढ़ा रही हैं.

कृष्णा क्रिएशन का उत्पाद 


कृष्णा कहती हैं कि ‘महिलाओं को पर्दे से मुक्त होना चाहिए, पर्दा प्रथा का खात्मा जरूरी है.’ इसके बाद वे हर महिला को पढने का आह्वान करती हैं. कहती हैं ‘कभी देर नहीं होती. पढाई कभी भी शुरू की जा सकती है और यदि आर्थिक आत्मनिर्भरता भी हो जाये तब तो उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए सबसे बढिया है.’ बताती हैं कि शादी के बाद ससुराल पक्ष पढाई करने देने का समर्थक नहीं था, खासकर सास, बाद में मेरी पढने की इच्छा का सम्मान मेरे पति गोविन्द राम जी ने किया.’  डिक्की (दलित इन्डियन चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) की सदस्य कृष्णा कुमारी यद्यपि दलित शब्द के इस्तेमाल के पक्ष में नहीं हैं, वे कहती हैं कि ‘हमसब खुद को अम्बेडकरवादी कहें तो बढिया है.’ उनका संकल्प है कि जल्द ही वे हरियाणा और राजस्थान में पर्दा से मुक्ति अभियान की शुरुआत करेंगी.

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