राष्ट्रपति के कार्यक्षेत्र में मोदी-सरकार का हस्तक्षेप, बिना सहमति के जारी किया अध्यादेश


स्त्रीकाल डेस्क 

क्या केंद्र सरकार सारी संवैधानिक संस्थाओं  को नष्ट करने की मुहीम पर है या सरकार के मुखिया, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,  स्वयं को ही सरकार और संविधान दोनो समझते हैं? यह सवाल उठ रहा है सरकार द्वारा हाल में जारी अध्यादेश पर, जिसमें बलात्कार को लेकर फांसी की सजा का प्रावधान किया गया है. सरकार और शासक पार्टी भाजपा वैसे भी सवालों के घेरे में है कि एक ओर कठुआ बलात्कार के मामले में बलात्कारियों के पक्ष में सड़क पर उतरे भाजपा विधायकों पर पार्टी कोई कार्रवाई नहीं कर रही है, कर्नाटक विधान सभा में पोर्न देखने वाले अपने नेताओं को टिकट दे रही है, उन्नाव बलात्कार मामले में गिरफ्तार भाजपा विधायक को निलंबित तक नहीं कर रही है, वहीं दूसरी ओर जनाक्रोश को देखते हए अध्यादेश लेकर आ रही है, जिसकी संवैधानिक वैधता पर ही सवाल उठ रहे हैं.



अध्यादेश की वैधता पर सबसे पहले सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और महिला कानूनविद अरविंद जैन ने अपने फेसबुक पोस्ट पर कल, 24 अप्रैल की देर शाम,   लिखा, ' 

#अध्यादेश 
बिना राष्ट्रपति की मंजूरी के अध्यादेश जारी!

आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश, 2018 दिनांक 21अप्रैल, 2018 (शनिवार) को ही जारी हो गया। पर उल्लेखनीय है कि मंत्री मंडल की बैठक शनिवार, 21अप्रैल, 2018 को करीब 11-12 बजे हुई थी और (Hindu में छपी रिपोर्ट के अनुसार) इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हुए, रविवार, 22 अप्रैल को।

ऐसे में, अध्यादेश 20-21 अप्रैल, 2018 की मध्य रात्रि 00 बजे से कैसे लागू हो सकता है? आजतक नहीं देखा-सुना कि राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने से पहले ही, अध्यादेश जारी हो या कर दिया गया हो। अब इस कानून की क्या संवैधानिक वैधता होगी।

फैक्ट चेक के लिए हमने जब जारी हुआ अध्यादेश देखा तो उसमें 21 तारीख से लागू होने की बात लिखी थी। होना यह चाहिए था कि इसे कैबिनेट और राष्ट्रपति के आदेश के बाद की पहली रात, यानी  22 तारीख की रात, को 12 बजे लागू से लागू होना चाहिए था।



खबर है कि इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए कुछ लोग हाई कोर्ट जाने वाले हैं ताकि इसे ठीक तरीके से लागू किया जा सके और अपराधियों को सजा सुनाते वक्त इसकी संवैधानिक वैधता को  आरोपियों का पक्ष चुनौती न दे  पाये. साथ ही हाई कोर्ट से यह अपील भी की जाने वाली है कि सरकार संवैधानिक नियमों और संस्थाओं को खत्म न करे यह सुनिश्चित हो.


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