"ये निंदा प्रस्ताव नहीं है"

सुशील मानव 

हम जागरण संवादी में शामिल साहित्यकारों की निंदा नहीं कर रहे.. मरे हुए को और क्या मारना।  वे पहले ही बहुत कुछ मर-मारकर ही वहाँ तक गये होंगे।सबके अपने विचार, सरोकार, प्रतिबद्धता और हित हैं और वे अपने वैयक्तिकता में सोचने समझने और निर्णय लेने को स्वतंत्र भी हैं.. तो फिर हम या कोई और कौन होते हैं किसी की मजबूरी को किनारे करके उसकी निंदा करने वाले?

आखिर वे भी तो प्रतिरोध ही कर रहे हैं। फासिस्टों के मंच पर चढ़कर फासिस्टों का प्रतिरोध! बलात्कारियों के मंच पर चढ़कर बलात्कारियों का प्रतिरोध! पूँजीवादियों के मंच पर चढ़कर पूँजीवादियों का प्रतिरोध! सही भी है आखिर अपने मंच पर चढ़कर अपने में ही कह-सुन लेना क्या प्रतिरोध हुआ? अरे जिनका प्रतिरोध कर रहे हैं वो भी तो सुनें कि हम उनका प्रतिरोध कर रहे हैं। लेकिन ये तो बताइए की मुँह में उनका दिया रसगुल्ला दबाकर बोलिएगा कैसे? कि सींड़ा (चाशनी) चुएगा तो सीधा पैंट पर ही गिरेगा.

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कुछ साहित्यकारों का रोना है कि भाई अब तो मंच वैसे भी नहीं मिलता गर कोई मंच दे रहा तो क्यों न जाएँ। तो भाई मेरा आप लोगो से सीधा सा सवाल है कि आपको मंच चाहिए ही क्यों? अपनी बात रखने के लिए ही तो न। तो क्या फेसबुक आपको वो मंच नहीं दे रहा?साहित्यिक पत्रिकाएँ नहीं दे रही? और अगर नहीं भी दे रहे तो आपको अपनी बात कहने के लिए मंच ही क्यों चाहिए। बात ही कहनी है या चौधरियाना दिखाना है। गर बात ही करनी है तो लोगो के बीच जाइए ना। रखिए अपनी बात उनके बीच, करिए उनसे संवाद। उठिए बैठिए उनके बीच उनके सुख दुख का साझीदार बनिए। ऐसे ही जनवादी बने फिरते हैं। सीधे कहिए न कि मंच आपको जन से ऊपर उठने के लिए चाहिए। जन से ऊपर दिखने के लिए चाहिए। खासम-खास की अनुभूति और आनंद के लिए चाहिए, तो आप पहले ये निर्णय कीजिए की आपको चाहिए क्या, मंच या जन या कि दोनो? मंचीय कवियों को तो तीनो मिलते हैं मंच, जन और धन और बेहिसाब मिलते हैं। और तालियाँ तो बोनस में। हाँ इज्ज़त की बात फँसती है.


तो बलात्कार और फासिज्म को प्रमोट करनेवाली  संस्था के आयोजनों में भागीदारी करके तो इज्जत का फलूदा बनना वैसे भी तय हैं। कुछ को बेस्ट सेलर का लोभ है कि उनके मंच पर पहुँचे तो क्या पता अगली तिमाही उनकी भी कोई किताब बेस्ट सेलर घोषित हो जाए। तो अपनी किताबे तो नागार्जुन भीं बेचते थे। झोले में लेकर, वे किताबें घूम घूमकर बेंचते थे। वेद प्रकाश शर्मा सुरेंद्र मोहन पाठक ने अपनी किताबें झोले में लेकर घूम-घूमकर नहीं बेंची लेकिन बिके वो भी खूब। बस दोनों में फर्क है थोड़ा या बहुत निष्कर्ष आप निकालिए। नागार्जुन ने अपनी किताबें जन के लिए लिखी थी इसीलिए वो अपनी किताबें लेकर सीधे जन के बीच गए। सुरेंद्र मोहन और वेद प्रकाश ने बाज़ार के लिए लिखे थे इसीलिए वे अपनी किताबें लेकर बाज़ार के पास गए। तो भाई लोग पहले आप निश्चिंत हो लीजिए कि आपको किताबें बेचनी है या खुद बिकना है।

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पहले दिन तो फ्रंट पेज पर जो छापा दैनिक जागरण ने छापा ही जागरण संवादी के बहिष्कार की सुगबुगाहट बीच अगले दिन फिर छापा और संवादी के आगाज़ की उद्घोषणा के साथ और समानांतर छापा। दो चीजें एक साथ छपीं। एक जिसका साहित्याकार विरोध कर रहे थे और दूसरा जिसका वजूद ही साहित्यारों की भागीदारी पर टिका हुआ था, दोनों को एकसाथ छापकर दैनिक जागरण ने तमाचा मारा था, दोहरी वैचारिकता ढोनेवाले साहित्यकारों के मुँह पर। मानों दैनिक जागरण ने वैसा करके खुला ऐलान किया हो कि साहित्य का मंच उसकी फासीवादी बलात्कारी पत्रकारिता के पायों पर ही टिका है। ऐसा करके दैनिक जागरण समूह ने एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक खेल रचा।

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