एनएच-91 ( राजेश मलिक की कहानी)

राजेश मलिक

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित. . कहानियों पर फिल्म निर्माण और नाट्य प्रस्तुति सम्पर्क:  malikraj2508@gmail.com. मो.9935827672,  790544623

 खट-खट-खट-खटऽऽऽऽऽऽ बूटों के उठते स्वरों से जेल के सारे कैदी इस तरह सतर्क हो गए जैसे  क्लास में अध्यापक के आते ही बच्चे सतर्क हो जाते हैं. हर होंठ जैसे सिल गए हों. लेकिन यह सब जेलर के गश्त तक ही सीमित था. गश्त खत्म होते ही बाँध फट पड़ता. फिर चारों तरफ ही-हूँ-हे-मेरी-तेरी-था-थी-हैं का स्वर गूँजने लगता. कुछ मुलाकाती कैदियों को ऐसे देख रहे थे जैसे चिड़ियाघर में लोग जानवरों को देखते हैं.

‘‘चल उठ, तुझसे कोई मिलाई करने आया हैं.’’ सिपाही का लहजा सख्त था.
बजरंगी सिर झुकाये उकुड़ू बैठा था जैसे उसने कुछ सुना ही न हो.
‘‘ओए लगड़े, मैं तुझसे ही कह रहा हूँ.....सुनता क्यों नहीं.’’
बजरंगी निःशब्द, एकटक ज़मीन को ताके जा रहा था. कान मानो संज्ञाविहीन हो गए हों. उसने धीरे से किसी तरह गर्दन उठायी. सुलगती आँँखें सिपाही के चेहरे से जा चिपकीं.
‘‘क्यों बे! मुझे क्यों घूर रहा हैं?’’ सिपाही उसे हड़काता हुआ चला गया.
बजरंगी उठा. पोलियो से पतली पड़ी अपनी एक टाँग को झुलाता, भचकता हुआ चल पड़ा और सलाखों तक आकर रूक गया.
‘‘बजरंगी भैय्या! मैं एक बुरी खबर लाया हूँ.’’
इतना सुनते ही उसकी कुन्द हो चुकी चेतना में कुछ हरकत-सी आयी और उसकी उचटती निगाह उस खबर देने वाले की तरफ उठी.

‘‘भैय्या! हमने बचाने की बहुत कोशिश की फिर भी ना बचा सके तुम्हारी अम्मा को.....’’ बात पूरी करते-करते वह रोआँसा हो गया.
बजरंगी अभी भी एकटक उसे देखे ही जा रहा था. फिर भचकता हुआ पलटा. वह व्यक्ति उसे पुकारता रहा. बजरंगी चलता रहा और उसे मुड़-मुड़ कर देखता रहा. जैसे उसके लिए शब्द अपना अर्थ खो चुके हों. वह कूल्हे उचकाता अपनी काल-कोठरी में जा समाया.

‘मर गयी....अम्मा भी मर गयी....दिदिया भी मर गयी....सब के सब मर गए.......’’ वह गर्दन तिरछी किए बड़बड़ाता रहा. एकाएक उसके चेहरे पर सूर्य की किरणें पसर गयी तो आँखें किचमिचा उठीं. बजरंगी बुत-सा उन किरनों को निहारने लगा और तब तक निहारता रहा जब तक कि गीली आँखें सूख न गयी. पलकें उठाकर सामने देखा तो अम्मा का धुंधला बिम्ब आँखों में तैर गया और फिर तैरता ही गया...........................
                         
‘‘बेटा! मत जाओं शहर, हम जैसे-तैसे मेंहनत-मजूरी करके जी लेंगे पर तुम्हारे बिना हम नहीं जी पायेगे.’’
‘‘मैं कोई ज़िंदगी भर के लिए थोड़े ही जा रहा हूँ बस कुछ ही दिनों की तो बात हैं वापस आते ही तुम्हें और दिदिया को साथ शहर ले जाऊँगा.’’
‘‘फिर भी बेटा, मेरा मन नहीं कहता कि तुम मुझसे दूर जाओं.’’
‘‘तुम समझती क्यों नहीं अब तुम्हारी वो उमर नहीं रही कि  इतनी मेहनत-मजूरी कर सको, बप्पा के न रहने बाद तुमने ही तो हम दोनों को संभाला हैं और वैसे भी आज नहीं तो कल दिदिया का ब्याह करना हैं, क्या ऐसे बैठे-बैठे कुछ हो पायेगा? अम्मा! तुम मेरी नहीं दिदिया की सोचो?’’
‘‘ठीक है बेटा! तुम जो ठीक समझो पर तुम्हारे खाने और रहने का क्या होगा?’’
‘‘तुम उसकी चिंता क्यों करती हो, भोलेनाथ! हैं ना वह सब ठीक कर देगें..’’

 जेल की काल-कोठरी में बैठा बजरंगी बीती बातों को सोचते ही सिहर उठा. उसे लगा अम्मा ने पहले उसके सिर को सहलाया फिर उसके बहते हुए अश्कों को पोछा. वह कुछ पलों तक खामोश रहा. फिर रूधे गले से बुदबुदाया, ‘‘तुम कहाँँ चली गयी अम्मा मुझे अकेला छोड़कर.......तुम्हारे बिना कैसे जी पाऊँगा मैं.....’’ वह अनायास फफक पड़ा. उसकी आँँखों के सामने अधेरा छाने लगा. उसी अन्धकार में दिदिया का चेहरा कौंध गया. वह जब अन्तिम बार आयी थी उससे मिलने..............


‘‘तुम फिर आ गयी, कितनी बार कहा हैं दिदिया कि यहाँ मत न आया करो.......यह जगह भले लोगों की नहीं हैं.’’
‘‘ना आऊँ तो क्या करूँँ, तुम जब महीने-महीने भर घर की कोई खोज-खबर नहीं लोगे तो मुझे आना ही पड़ेगा....अगर तुम इतने ही भले होते तो मुझे गली-गली ताले-चाकू ना बेचने पड़ते. मगर तुम्हें क्या,बहिन मरे या जिये चाहे लोगों की उल्टी-सीधी बात सुने पर तुम्हें तो पीने के लिए बस अपनी दारू चाहिए.’’
‘‘कौन साला कहता हैं कि मैं दारू पीता हूँ, रही बात गली-गली फिरने की तो तुम अपने मन से फिरती हो.’’ बजरंगी की भौहें सिकुड़ने लगीं.
‘‘मैं कोई शौक से नहीं फिरती जो तुम मुझ पर आँख चियारते हो, अम्मा की दवा और इस पेट के खातिर.....’’ उसने अपने पिचके पेट पर हाथ रखते हुए कहा.
‘‘क्या यहाँ नोटों का पेड़ लगा हैं....कई-कई दिन गुजर जाते है तब कहीं एक ल्हाश आती हैं हाथ में........अब मैं उससे अपना पेट भरूँ कि तुम.....’’

‘‘हाँ-हाँ! और भी कुछ कह लो.....चुप क्यों हो गए? अब यही सब सुनना तो बाकी रह गया हैं. अरे मेरा नही तो अम्मा का कुछ ख़्याल किया होता वह बेचारी कितनी आस लगाये तुम्हारी राह ताकती रहती है.’’ कहते-कहते उसकी आँखें छलक आयी थीं.
‘‘तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे अम्मा का सारा ध्यान तुम ही रखती हो, मैं तो कुछ करता ही नहीं.’’ बजरंगी की पलकें नीची हो आयी थीं.
‘‘यह तो तुम खुद ही जानते होगे... और हाँ! मैं तुम्हें यह याद दिलाने आयी थी कि नरसों रक्षा-बंधन है मैं और अम्मा तुम्हारी राह देखेगें.’’ दिदिया भड़ास निकालती हुई सड़क के उस पार चली गई.
मोटी मूँछ वाला मोटा मुंशी हर बार की तरह उसे भूखी नज़रों से सड़क पर जाते हुए घूरता रहा. जब तक कि वह उसकी आँखों से ओझल ना हो गयी.
बजरंगी-मुंशी की ललचाई निगाहों को ताड़ गया था. उसका मन हुआ था, कि जाकर उस मुंशी के बच्चे की आँँखें नोच ले. और उसे यह बता दे कि गरीब हैं तो क्या हुआ उसकी भी मान-मर्यादा हैं. पर क्या करता वह गरीब ही नहीं, लाचार भी था.
                 
दिदिया के जाते ही बजरंगी को अपनी गलती का अहसास हुआ. उसने प्रण किया कि वह कभी शराब नहीं पियेगा. ना ही थाने के किसी सिपाही का अब वह काम करेगा. सिर्फ वह काम करेगा जिससे चार पैसा उसके हाथ में आये.
‘‘दिदियाऽऽऽऽऽ.’’ बजरंगी एकाएक चीख़ पड़ा. मानो नींद से जागा हो.
‘‘ऐ बे, गला क्यों फाड़ रहा हैं? जब देखो दिदिया-अम्मा-दिदिया-अम्मा...साला रटा करता हैं.... कितनी बार कहा हैं कि तेरी दिदिया-अम्मा मर गयी, मगर साले की समझ में नहीं आता.’’
बजरंगी पलकें नीचे किये मूक-सा सुनता रहा. यह लफ़्ज एक नहीं कई बार उसके चैतन्य पर गूँजें. फिर गूँजते गए. गूँजते गए-‘कितनी बार कहा हैं कि तेरी दिदिया-अम्मा मर गयी मगर साले की समझ में नहीं आता.......’
बजरंगी की आँखें अंगार की तरह चमक रही थीं, किसी को नहीं छोड़ूगाँ सब को मार डालूगाँ....सब को.............’

कबूतरों की फड़फड़ाहटों से उसकी सोच टूट गयी. उसने देखा छत के आलें में दो कबूतर अपने बच्चों के साथ गुटर-गूं-गूटर-गूं कर रहे थे. वह देखता रहा एकटक. एकाएक उसकी पलकें नीचे हो आयी थीं. हाथ-पैरों के नाखूनों से लगता था जैसे बरसों से नाखुन काटे ही ना गए हो. वह नाखुनों को देखता ना जाने कहा खो गया था............................



‘‘इतना बड़ा हो गया हैं और नाखुन नहीं काट पाता......अगर कल मैं न रही तो तब कौन काटेगा तेरे यह नाखुन?’’
‘‘ऐसा कभी मत कहना अम्मा, तुम हो तो सब कुछ हैं.’’
‘‘बस तुम दोनों के घर बस जाये और हमें क्या चाहिए.’’

 ‘‘नहीं अम्मा! नहींऽऽऽ.’’ उसकी चीत्कार से जेल की कोठरी कांप उठी थी. उसने अपनी हथेलियों से चेहरे को ढक लिया और सिसक-सिसक कर रोने लगा. फिर कुछ सोचते हुए उसने झट से उँगालियों के सारे नाखुन कुतर डाले. और विक्षिप्त-सा हाथ फैलाकर अनाप-शनाप बकने लगा- ‘‘देख अम्मा! देख, मैंने सारे नाखुन काट डाले.....सारे......अब तो तुम खुश हो न...... तो लौट आओं अम्मा.....लौट आओंऽऽऽऽऽ’’

‘‘उठ बे बजरंगीया, उठ.’’
‘‘ज.....जी........ह.....जूर.......’
‘‘जा जल्दी जा, दरोगा जी ने तुझे चीर घर बुलाया हैं.’’ सिपाही कहकर बरामदे की तरफ बढ़ गया. चीर घर का नाम सुनते ही बजरंगी का मन खुशी से नाच उठा. उसने पहले ईश्वर का धन्यवाद किया. फिर गुनगुनाता हुआ रिक्शा लेकर चल पड़ा. वह रिक्शा ऐसे भगाये जा रहा था जैसे कोई खजाना मिल गया हो. कई मोड़ों के पश्चात् वह चीर घर जा पहुँचा.
‘‘कहाँँ मर गया था बे? हम तेरे बाप के नौकर है जो बैठे है इतनी देर से..’’
 दरोगा आँखें तरेरकर गरजा, ‘‘जा भाग यहाँ से कोई लाश-वाश नहीं हैं.’’ बजरंगी के साँवले चेहरे पर खौफ की रेखाएँ उतर आयी थीं. शब्द टूट गए थे, ‘‘ह....जू.....र....व...वो.....म....मैं......’’
‘‘भागता है कि लगाऊँ दो-चार.......’’
बजरंगी को लगा जैसे किसी ने उसे ऊँचे पर्वत से नीचे फेंक दिया हो. उसे लगा अगर यह लाश ना मिली तो उसके सारे सपने ख़ाक हो जायेंगे. उसने पुनः गुहार लगायी, ‘‘हजूर! भगवान के लिए ऐसा जुल्म मत करिये आप बड़े लौगन की किरपा से हमार पेट चलत है, हो सके तो क्षमा कर दीजिए.’’ कहकर बजरंगी पैरो से जा लगा.
‘‘चल उठ, बहुत नौंटकी हो गई......अब खड़ा-खड़ा मुँह क्या ताक रहा है.... यह ले बीस का नोट और जाकर दो ठंड़ी बोतल ले आ.’’

बजरंगी के जाते ही दरोगा-सिपाही की तरफ मुख़ातिब हुआ, ‘‘यह बताओ इस वक्त तुम्हारे पास कितने पैसे है?’’
‘‘सर!पचास रूपये.’’
‘‘क्यों? क्या कल जीप स्टैण्ड से पैसे नहीं मिले थे?’’
‘‘जो मिले थे उससे तो कल रात बिरयानी और दारू आयी थीं.’’
‘‘हूँ.’’ दरोगा ने सिर हिलाया, ‘‘ऐसा करो तुम अस्पताल के सामने जाकर ठेले वालों से आज के पैसे ले आओं.’’
बोतल आ गयी थी. दरोगा ने हाथ लगाकर बोतल का स्पर्श किया और आश्वस्त होकर पीने लगा. दूसरी बोतल बजरंगी ने सिपाही की तरफ बढ़ा दी. सिपाही गट-गट करता एक ही साँस में बोतल डकार गया. फिर अनायास बोल पड़ा, ‘‘सर! सरकार के डेढ़ रूपये से कही दाह संस्कार होता हैं?’’
दरोगा को खामोश होता देख सिपाही चला गया.
मगर उसकी छोड़ी चिंगारी अभी भी दरोगा के सीने में दहक रही थी,‘सर! सरकार के डेढ़ रूपये में कहीं दाह संस्कार होता हैं?’


दरोगा सोचने पर विवश था,‘सरकार का क्या उसने तो सिर्फ निर्देश दे दिए कि डेढ़ रूपये में लावारिस लाशों का दाह संस्कार करो, पर कोई सरकार से यह पूछे कि डेढ़ रूपये में कितनी लकड़ियाँ आती हैं?’
‘‘मैं जाऊँ हजूर?’’ बजरंगी के पूछते ही दरोगा की तन्द्रा भंग हुई.
‘‘अबे जा......’’
बजरंगी ने सिपाही की मदद से लाश को रिक्शे पर लिटाया. तभी मुंशी ने उसकी हथेली पर सौ-सौ के दो नोट रख दिए.
लाश से उठती सड़ाँध बजरंगी के नथुने को फाडे़ दे रही थी. झट से उसने गमछे को मुँह पर लपेटा और गद्दी पर जा बैठा. उसका बायाँ पैर पैडिल पर घूमने लगा. लेकिन दायाँ पैर पैडिल के ऊपर ही झूल रहा था. किर्र-किर्र करता रिक्शा खड़न्जे से उतर कर पक्की सड़क को रौंदने लगा.
आग उगलती हुई धूप में बजरंगी के ज़िस्म से पसीने की बूँदें इस तरह टपक रही थी जैसे जलती हुई मोमबती से मोम. हवा मूक थी पेड़ गुमसुम.

लाश देखकर एक ने हाथ जोड़े तो दूसरे ने सिर पर हाथ रख लिया और तीसरे ने सिर झुका दिया. बजरंगी जल्दी से जल्दी गाँँव पहुचना चाहता था. इसलिए वह रिक्शा भगाये जा रहा था. उड़ते हुए आवारा बादल कभी-कभी सूर्य के समझ आ जाते तो बजरंगी को कुछ राहत महसूस होती. एक ही धुन थी कि गाँव पहुँँचना है, अपनों के पास.

‘‘दो सौ में दो शूट का कपड़ा........’’
आवाज सुनते ही बजरंगी की निगाहें ठेले की तरफ घूम गयी. कपड़े रंग-बिरंगें थे. उसने सोच लिया था कि जब वह लाश फेंक कर वापस आएगा तो इसी में से एक जोड़ा कपड़ा दिदिया के लिए ले लेगा.
बजरंगी को अहसास हुआ जैसे दिदिया उसके सम्मुख आ खड़ी हुई हो और कह रही हो, ‘‘इस जनम में तो कपड़ा मिलेगा नहीं मुझे.......मगर हाँ, अगर मैं मर गई तो कफ़न जरूर मिल जाएगा....’’
ट्रक की ध्वनि उसके विचारों को रौदती हुई चली गयी थी. कई रिक्शे, मोटर साइकिल उसके अगल-बगल हो गए.

अचानक एक मोटर साइकिल वृद्धा को रौंदती हुई चली गई. उसने झट से रिक्शा रोका और चिल्लाता हुआ मोटर साइकिल के पीछे भागा, ‘‘अरे उसे कोई रोको......पकड़ोंऽऽऽ.’’ बजरंगी हाँफता-हाँफता गिरता हुआ बचा.
लोग अनदेखा करते हुए चले जा रहे थे. बजरंगी भचकता हुआ वृद्धा के निकट आया. वृद्धा का सिर एक तरफ लुढ़का था. खून ऐसे फैला था जैसे किसी ने सड़क के माथे पर बिंदिया लगा दी हो.
इतने में क्षणिक कौतुहलवश लोगों की भीड़ लाश के चारों ओर थोड़ा दूरी बनाए हुए जमा होने लगी थी. कि तभी संयोग वश पुलिस का एक दल भी वहाँ आ धमका.
बजरंगी रिक्शा लेकर चला ही था कि कानों में आवाज चुभी, ‘‘पहले पोस्टमार्टम होगा फिर कोई लाश को हाथ लगायेगा.’’

बेचारी कौन थी? कहाँ की थी, कुछ पता नहीं.....चीर घर में सड़ेगी बेचारी.....रंगीले तो बिना पैसे के हाथ भी नहीं लगायेगा.......’ बजरंगी मन ही मन में बुदबुदाये जा रहा था. इसी उधेड़बुन में वह त्रिवेणी घाट जा पहुँचा. उसने देखा, नदी सिकुड़ी हुई थी.

‘‘क्यों न इधर से ही रिक्शे को नीचे ले जाऊँ.’’बजरंगी बुदबुदाया. उसकी उँगलियाँँ ब्रेक पर कस गई. वह हौले-हौले ब्रेक में ढ़ील देकर रिक्शा आगे सरकाने लगा. एकाएक रिक्शे का तारतम्य टूट गया. और कई पलटी के बाद वह रिक्शे के साथ ही औधे मुँह जा गिरा.
उसकी देह कई जगहों से रगड़ गयी थी पर उसे अपनी तनिक चिंता नहीं थी. चिंता तो थी उस किराये के रिक्शे की जो क्षत-विक्षत था.

बजरंगी तहमद झारते हुए उठा और शिकायत भरी नजरों से आसमान की तरफ देखा, ‘‘हे भगवान! यह तूने क्या किया?’’ बजरंगी बड़बड़ाता हुआ रिक्शा लेकर सड़क पर आ गया.
चारों तरफ देखने के बाद उसे एक रिपेयरिंग की दुकान दिखी जो एक गुमटी में सिमटी थी. उसने रिक्शे के एक-एक भाग के बारे में मिस्त्री को अवगत कराया. सारी बात सुनने के बाद मिस्त्री ने अपनी मजूरी बता दी.

बजरंगी ने एक नहीं कई बार जेब को टटोला. मगर बटुवे का कहीं अता-पता नहीं था. वह वापस घाट की ओर भागा. गाँव पहुँचने की शीघ्रता उसके मस्तिष्क को कुतरती जा रही थी. वह भचकता हुआ पुल के नीचे जा पहुँचा. और विक्षिप्त-सा बटुवा इधर-उधर खोजने लगा. बटुवे की तलाश में वह लाश को भी उलट-पुलट कर देख लेना चाहता था. लाश का  कफ़न कई जगहों से तार-तार हो गया था. लाश पेट के बल थी उसका आधा भाग पानी में था.


बजरंगी ने सहमे-सहमे लाश की तरफ हाथ बढ़ाया. मारे सड़ाँध के उसे उबकाई आने लगी. उसने झटके से मुँह पर गमछा बाँधा. और लाश को बाहर खींच लिया और उसके एक-एक भाग को टटोलने लगा पर समस्या अभी भी वहीं थी.

झाड़ी में खड़ा एक कुत्ता जवान लपलपा रहा था. जिसकी लार ज़मीन पर टपक रही थी. कुत्ता इस इंतजार में था कि वह हटे और वह अपनी भूख शांत कर सके. तभी कुत्ता आसमान की तरफ मुँह उठाकर गुर्रा पड़ा, ‘‘ऊँ....ऊँ...ऊँऽऽऽऽऽ.’’ जैसे उस पेट भरने वाले को धन्यवाद दे रहा हो या इंसान की हैवानियत पर गुर्रा रहा हो.
अचानक हवा के तीव्र झोंके से पूरा वातावरण काँप-सा गया. दैत्यों के भाँँति एक साथ कई पेड़ झूमने लगे. हाहाकार का डरावना संगीत चारों तरफ चीत्कारने लगा.

बजरंगी आँख बंद किये एक तरफ दुबका खड़ा था. जैसे ही आँख खोली कि उसकी निगाहें तीर की भाँति लाश से जा चुभी. चेहरा देखते ही बजरंगी सन्न रह गया. जैसे पछाड़ खाकर गिर पड़ेगा. मुँह खुला का खुला रह गया. पूरे ज़िस्म में एक कंपकपी-सी दौड़ गयी, ‘‘दिदियाऽऽऽऽऽ.’’
वह चीखता हुआ घुटनों के बल बैठ गया. धीरे-धीरे उसकी चीख़ घुटती गयी. शब्द मारे भय के अंदर ही अंदर जैसे दुबक गए हों. मन-मस्तिष्क जैसेे दोनों फ्यूज हो गए हों. तभी रंगीले के एक-एक शब्द बजरंगी के कानों में चुभने लगे, ‘मैंने इतनी लाशें देखी मगर इस लाश को देख ना सका.......’
यह वाक्य एक नही कई बार बजरंगी के ज़ेहन में गूँजा. फिर मुंशी की घूरती आँखें, ललचायी आँखें दिदिया को जाता हुआ देख रही थी. यह दृश्य अनगिनत बार बजरंगी की आँखों पर चलता रहा. आँँखें इस कदर लाल हो गई थी जैसे पूरी देह का रक्त उसकी आँखों में उतर आया हो.
वह भचकता हुआ थाने की तरफ चल पड़ा. मुंशी की आकृति के आगे सारी आकृतियाँ, सारी खुशिया, सारे सपने धुल गए थे.
रह-रहकर दिदिया के वाक्य मन में उबल रहे थे, ‘भैय्या! तुम तो कपड़ा दे ना सके मुझे, पर देखों समाज ने मुझे कैसा कपड़ा दे दिया हैं....कैसा कपड़ा देऽऽऽऽऽऽ’
बजरंगी ने दोनों हाथों से कान बंद कर लिया था. लग रहा था जैसे कान फट जायेंगे. उसके दाँत किटकिटाने लगे. बजरंगी चलता रहा. आँसू पोेछता रहा. सोचता रहा, ‘मैं कोई शौक से नहीं फिरती हूँ जो तुम मुझ पर आँख चियारते हो.....अम्माँ की दवा और इस पेट के खतिर.....’
बजरंगी पागलो की तरह बड़बड़ाता हुआ चलता जा रहा था, ‘‘दिदिया.....कपड़ा....रक्षाबंधन......सब कुछ खत्म हो चुका था.

बिजली का कहीं अता-पता नहीं था. बजरंगी दबे पाँव बरामदे में जाकर लेट गया आधी रात के इंतजार में कि कब, कैसे, किस वक्त मुंशी को मारना हैं.
आख़िरकार वह क्षण आ गया. उसने इधर-उधर देखा दोनो बंदूकधारी गहरी निद्रा में विलीन थे. बजरंगी दबे पाँव चलता जा रहा था.
पीठ घुमाये मुंशी लिखने में इस कदर मशगुल था, कि उसे बजरंगी के आने का आभास तक नहीं था हुआ. मुंशी को देखते ही गुस्से की चिंगारी भभक उठी. जैसे-जैसे उसके कदम मुंशी की तरफ उठ रहे थे. वैसे-वैसे दिदिया का चेहरा उसकी आँखों में डूबने-उतरने लगा था. वह सारे दृश्य-अदृश्य उसकी आँखों के सामने नाच उठे. लपक कर उसने मुंशी की गर्दन को कस लिया.
‘‘छोड़ो मुझे.....छोड़ोऽऽऽऽ.’’
‘‘तुझे छोड़ दू कमीने......तुझे.......’’ बजरंगी की आँँखों पर दिदिया का चेहरा उतर आया था जैसे वह कह रही हो, ‘इस कमीने को मत छोड़ना भैय्या , मत छोड़नाऽऽऽ’
बजरंगी की उँगलियाँ मुंशी के गर्दन पर धसती जा रही थी.
‘‘ब......चाओं...बचाओंऽऽऽ’’ मुंशी ऐसे फड़फडा रहा था जैसे कोई चिड़िया शिकारी के पंजे में फड़फड़ाती हैं.
दो बंदूकधारी आए और बजरंगी को घसीटते हुए ले गए. वह चीखता-चिल्लाता रहा पर उसकी एक नहीं सुनी गयी.
‘‘बंद कर दो साले को.’’ मुंशी फुफकार पड़ा, ‘‘साला! हरामजादा, मुझे मारने आया था....मुझे....ऐसा केस बनाऊँगा कि साला ज़िंदगी भर जेल में सड़ता रहेगा.......’’

‘‘यह ले.’’ सरकती हुई थाली सामने से आयी. सिपाही के वाक्य ने बजरंगी के ध्यान को तार-तार कर दिया. कच्ची-पक्की जली रोटियां, पानी जैसी दाल उसकी आँखों के सामने थी.
तभी कुछ आवाज़ उसके कानों में उतरी, ‘‘जानते हो दो दिन से मुंशी की लड़की लापता थी....कल उसकी लाश एनएच-91 के किनारे  मिली. सुनने में आया हैं कि पहले बलात्कार हुआ हैं फिर उसकी हत्या.....’’
‘‘जब दूसरों की बहु-बेटियों की इज्जत से खेलोंगे तो यही सब होगा.....’’ सिपाही का स्वर नम था.
 बजरंगी घुटने के बल सिर पकड़ कर बैठ गया और फिर सवालिया निगाहों से आसमान की तरफ ताकने लगा.

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