हमें अपना आसमान खुद नापना होगा

अनुपमा तिवाड़ी
कविता संग्रह “आइना भीगता है“ 2011 में बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित. संपर्क : anupamatiwari91@gmail.com
अनुपमा तिवाड़ी

जीवन की वहीं तक सीमाएँ होतीहैं, जहाँ तक आप उन्हें तय करते हैं ! यहवक्तव्यसारे आसमान को आपके सामने खोल कर रख देता है और कहता है कि “सारा आसमान तुम्हारा है,तुमइसमें चाहे जितने पंख फैला सकते हो”.तो अब ये आसमान महिलाओं के लिए खुला है.  इस वर्ष भी पिछले वर्षों की तरह हीआ रहा है8 मार्च, यानि महिला दिवस !

क्या है महिला दिवस ?
पिछली कई शताब्दियों से दुनिया भर के अधिकतर समाजों में पुरुष वर्चस्व रहा है. इसी के चलते महिलाएं, अनेक प्रकार से विकास के दौर में पिछड़ती चलीजा रही थीं. जबदुनिया भर की लगभग आधी आबादी समानता के अधिकार से वंचित हो तो कैसेदुनिया, किसी देशऔर समाज में न्याय और खुशहाली की कल्पना की जा सकती है ? इसी स्थिति को देखते हुए 1908 मेंसबसे पहले 10 से 15 हजार महिलाओं ने न्यूयॉर्क में वोट देने की मांग को ले कर मार्च निकाला. जिसके एक वर्ष बाद 1909 में प्रथम राष्ट्रीय महिला दिवस 28 फरवरी को मनाया गया. 1910 में अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने मांग रखी गई और 19 मार्च 1911 को पहली बार ऑस्ट्रिया, जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया. 1913 मेंइसकीतिथि बदल कर 8 मार्च रखी गई. तब से आजतकयह दिन महिलाओं के हक़ और बराबरी के अधिकार के समर्थन में दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय  महिलादिवसके रूप में मनाया जाता है.

सिर्फ दिवस ही नहीं उसके अनुरूप क्रियान्विति की भी ज़रुरत
अनेक देशों ने महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए कुछ कानून बनाए हैं लेकिन उन कानूनों की हम आज सरेआम धज्जियाँ उड़ती देख सकते हैं. हर दिन नन्हीं बच्चियों से होते बलात्कार और फिर उनकी हत्या किसी से छुपी नहीं है.दुनिया भर में हर दिन अनेक स्तरों पर महिलाओं के साथ हो रही यौन हिंसा क्यामहिलाओं को इस उत्सव को मनानेके लिए उत्साहित कर पाती है ?अब महिलाएं इस दिन घूम – फिर लेने, एक दूसरे को बधाईयाँ दे- देने भर से बहलने वाली नहीं हैं. अब उन्हें उड़ने के लिए एक पूरा आसमान चाहिए जिसमें वो अपने पंख फैला सकें और मनचाही उड़ान भर सकें.



अब महिलाएं असली आज़ादी चाहती हैं. वे चाहती हैं जन्म के साथ इन्सान होने के वो सभी अधिकार जो प्रकृति ने उन्हें समान रूप से दिए हैं.जो कानून ने दिए हैं उनकी पूर्ण रूप से क्रियान्विति और जो नहीं दिए हैं उन्हेंमांगने की आज़ादी.महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति अबऔर अधिक सजग हो रही हैं. अब वोआज़ादीचाहती हैं. पढ़ने – लिखने की, स्वास्थ्य में बराबरी की सुविधा, घूमने – फिरने की पूरी आज़ादी, पेशा चुनने की आज़ादी, विवाह सम्बन्धी निर्णयों की आज़ादी. अपनी पहचान की आज़ादी, कार्यस्थल पर समान भागीदारी और अधिकार की आज़ादी.अब वो सवाल करने लगी हैं कि ऐसा क्यों है कि हमें एक पुरुष सेअपने को बचाकर रखना पड़े. हमारी इज्ज़त एक पुरुष के हाथ में हो. वे अब अपनी इज्ज़त के नए मापदंड गढ़ना चाहती हैं, जिसमें उनकी इज्ज़त उनकीस्वयं की मुट्ठी में हो और उस पर हमला करने वाले पर इन्सान कोअपने किए कुकृत्य पर उचित दंड मिले.वर्तमान स्थितियों के चलते अब दुनिया भर में महिलाएं अनेक मोर्चों पर खुल कर बाहर आ रही हैं.

सुरक्षा और समान जीने का अधिकार, हर महिला की अस्मिता का मुद्दा 

हाल ही में हॉलीवुड की 300एक्टर, एजेंट्स, डायरेक्टर्स, राइटर्स, प्रोड्यूर्स, एक्सीक्युटिव्ज़ने टाइम्सअप केम्पेन,न्यूयॉर्क की शुरुआत की है. जिसमें उन्होंनेपुरुष वर्चस्व वाले कार्यस्थलों पर संघर्ष कर अपने अधिकार को ले कर चुनौती दी है. इस केम्पेन में वे खुल कर अपने साथ हुए और हो रहे गैरबराबरी वाले व्यवहारों और यौन हिंसा से जुड़े अनुभवों को साझा कर रही हैं और दोषियों के खिलाफ खुल कर कार्यवाहियों की मांग कर रही हैं. इस केम्पेन में इन महिलाओं ने 13 मिलियन का फंड भी बनाया है. जिससे नर्स, मजदूर, किसान, फेक्ट्री में काम करने वाली और रेस्टोरेंट जैसी जगहों पर काम करने वाली महिलाएं भी धनाभाव में कानूनी मदद प्राप्त कर  सकें. इसमें ऐसा कानून लाने का भी प्रस्ताव रखा जा रहा है जिसमें महिलाओं के साथ हो रहा गैरबराबरी पूर्ण व्यवहार और यौन हिंसा पर एक्शन नहीं लिए जाने पर उस संगठन/ फेक्ट्रीको दण्डित / फाइन करने का प्रावधान होगा. एकजेंडर पैरिटी बनाई जा रही है जो कि महिलाओं के साथ समान अधिकार को ले कर कार्य करेगी. इस अभियान की पहल करने वाली महिलाओं की अपील है कि जब भी कोई महिलागोल्डन / ब्ल्यू एवार्ड लेने जाएँ तब कालाकपड़ा पहनें या हाथ पर काली पट्टी बाँधें जो कि इस बात का प्रतीक है कि वे समान अधिकार के विचार को समर्थन देती हैं.  अब ट्वीटर पर महिलाएं ‘मी- टू’हैश टेग के साथ अपने बचपन, किशोर उम्र में हुए यौनिक दुर्व्यवहारों और अब भी वे किस – किस प्रकार से यौन हिंसा का शिकार हो रही हैं इस पर खुल कर अपनी बात सबके बीच साझा कर रही हैं.

इस वर्ष इन महिलाओं ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की थीम को ‘प्रेस फॉर प्रोग्रेस 2018’ नाम दिया है. जिसमें वे प्रेस के माध्यम से भी अपनी बात जन – जन तक पहुँचाना चाहती हैं. वर्तमान स्थितियों को देखते हुए एक अनुमान है कि इस गति से यदि इस मुद्दे पर काम होता है तो भी एक संतोषजनक स्थिति प्राप्त करने में कम से कम 200 वर्ष लग जाएंगे. ‘प्रेस फॉर प्रोग्रेस 2018’ थीम के अंतर्गत महिलाओं के समान अधिकारों को ले कर किसी देश विशेष की ही नहीं बल्कि दुनिया भर की महिलाओं के लिए यह मुद्दा उठाया जा रहा है.

अपनी कमान अब अपने हाथ में रखनी होगी
अब हर एक महिला को अपनी जगह से उठना होगा.1928में सेंट लुईस, मिसौरी अमेरिका में जन्मीं माया एंजलो अश्वेत कवियित्री, उपन्यासकार, निबंधकार, चलचित्र कथानक, लेखिका, अभिनेत्री, व्याख्याता और सिविल राइट्स एक्टिविस्ट थीं. उन्हें 50 से अधिक मानद उपाधियाँ और अनेक राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय पुरुस्कारप्राप्त हुए.वर्ष 2011 मेंउन्हेंअमेरिका का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘प्रेसिडेंशियल मैडल ऑफ़ फ्रीडम’ प्रदान किया गया.वे दुनिया भर में  एक संघर्षशील और जुझारू महिला के रूप में याद की जाती हैं. एक अश्वेत लड़की जिसके सौतेले पिता ने उसका यौन शोषण किया और जिसे अपने जीवन में देह व्यापार तक करना पड़ा उसकी जिंदगी की राह भी क्याकोई कम मुश्किल भरी होगी ? उनके जीवन से हमएक औरत की ताकत का हम अंदाज़ा लगा सकते हैं.वे स्वयं आगे बढ़ीं,उन्होंने स्वयंजीवनसे जूझकरएक सम्मानजनक मुकाम हासिल किया.



ये जो रूकावट की जंजीरें हमारे पैरों में पड़ी हैं वे कुछ तो समाज नेहमारे पैरों में डाली हैं और कुछ हमने स्वयं ही सामाजिक स्वीकारोक्ति के चलते अपने पैरों में डाल रखी हैं.लेकिनअब इन बेड़ियों को खोलने की पहल हमें स्वयं ही करनी होगी. जिस दिन हमने यह तय लिया उस दिन हम इन बेड़ियों से स्वयं ही मुक्त हो जाएँगी.
 हाँ, इसकी शुरुआत छोटे – छोटे समूहों से की जा सकती है. गुजरात में लगभग 40 वर्ष पहले महिलाओं ने एक संगठन बनाया था ‘सेवा’. जो कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कार्यरत है. अभी हाल ही में जयपुर के गाँधी नगर रेल्वे स्टेशन की पूरी कमान महिलाओं ने संभाली है. येशुरुआत है लेकिन अंततः हमें मिलकर काम करना होगा क्योंकि पुरुष और महिलाएँ दो धुरी नहीं हैं वे एकदूसरे के पूरक हैं. किसी भी पुरुष या स्त्रीविहीन समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. एक समान अधिकार और सम्मान का रिश्ता ही सबसे न्यायपूर्ण और सुखद रिश्ता होता है जिसकी अभी दरकार है. तोबहनोंउठो! तोड़ दो / गुलामी की जंजीरों को / बाहर आओ/ खुली हवा में/ फेफड़े भर कर सांस लो और उड़ चलो/उस हवा के साथ/जो जाती है/उन्मुक्त आकाश तक !

तस्वीरें गूगल से साभार 
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