समानांतर इतिहास और अन्य कवितायें (नीरा परमार की)

नीरा परमार
 कविता, कहानी और शोध -आलोचना के क्षेत्र में योगदान. एक कविता और कहानी संग्रह प्रकाशित . संपर्क : parmarn08@gmail.com

तब बाबूजी बूढ़े होने लगते हैं !

तब
बाबूजी बूढ़े होने लगते हैं -
जब
दरवाजे की ओट से
कानों से टकराने लगती हैं
जीवन भर की
जमा-जथा की
हिसाब करती
फुसफुसाहटें !
जब बेटे-बहुओं की
हिसाबी उँगलियाँ  जोड़ने लगती हैं
बची-खुची बीती उमर के साथ
गाँव में छूटे
पुरखों के खेत, बगीचे,
घर-आँगन की भूली हुई गिनती !
तब
बाबूजी के झुक जाते हैं कंधे
सूनी आँखें
मृत्यु-लोक की राह खोजती
आकाश को तकने लगती हैं
जब
लाचार
जीवन-संगिनी को
बूढ़े हाथों से झाडू थामे
आँगन बुहारते
देखते भर रहते हैं !


समानान्तर इतिहास

इतिहास
राजपथ का होता है
पगडंडियों का नहीं!
सभ्यताएँ / बनती हैं इतिहास
और सभ्य / इतिहास पुरुष !
समय उस बेनाम
क़दमों का क़ायल नहीं
जो अनजान
दर्रों जंगलों कछारों पर
पगडंडियों की आदिम लिपि —
रचते हैं
ये कीचड़-सने कंकड़-पत्थर से लहूलुहान
बोझिल थके क़दम
अन्त तक क़दम ही रहते हैं
उन अग्रगामी पूजित चरणों के समान
किसी राजपथ को
सुशोभित नहीं कर पाते

शताब्दियाँ —
पगडंडियों से
पगडंडियों का सफ़र तय करते
भीड़ में खो जाने वाले / ये अनगिनत क़दम
किसी मंज़िल तक नहीं जाते
लौट आते हैं
बरसों से ठहरी हुई उन्हीं
अँधेरी गलियों में
जो गलियाँ —
रद्दी बटोरते छीना-छपटी करते कंकालों
कचरों के अम्बारों
झुग्गी-झोपड़ियों के झुके छप्परों से निकलते
सूअरों-मुर्गियों के झुंड में से
होकर गुज़रती है !

रौशन सच

कभी हमारे
करोड़ों करोड़ नन्हे हाथों ने
छुआ था उजाले को !

हमें खबर भी नहीं हुई –
कब किसी ढाबे
किसी ठेले
किसी गलियाती मालकिन की
रसोई में
जूठन धोते–धोते
उम्र के संग वह रौशन सच
मटमैला पड़ गया

कभी ताजा छीले भुट्टे–सी सुगंध बन
जगमगाहट आती थी सपने में
किस्सा था, बीत गया -

अब तो
साँचों में मोम ढालते
बीड़ियाँ लपटते
चूड़ियाँ बनाते
छप्पर के
किसी कोने में
सूरज को खोंस दिया है

 बाल मजदूर

बरसों से –
बोझा ढोती पीठ
क्या तू भी कभी
किताबों का बस्ता
उठाएगी ?

फूटे करम से
गिट्टी-पत्थर कूटते हाथ
क्या तुम भी कभी
कापी-किताब थामोगे ?


भूखमरी की आग से
झुलसी उंगलियाँ
कभी क्या तुम भी
कलम को
सूरज की दवात में डुबो
किसी दिन को
अपने नाम दस्तखत करोगी ?

अन्तहीन पगडंडियाँ 

जंगल-नदी
झाड़ी-झाँखर से गुजरती
सदियों सी लम्बी
अन्तहीन,
दुर्गम पगडंडियों पर
चलते चले जा रहे थके क़दम !

माथे पर
पहाड़ सा बोझा ढोते
काले सूरज सा काला नसीब लिए
नंगे-भूखे
पशुओं से बदतर
जलालत झेलते
ये मानव
ठिठके भकुआए से तकते
दूर दीखते चौड़े-चिकने पथ पर
फर्राटे से उड़,
अदृश्य होते
उत्तेजक संगीत के शोर में डूबे
वाहनों के काफलों को

प्रतिरोध

तुम्हारे माथे पर / यह
भारी डगमगाती विष्ठा की बाल्टी नहीं
तुम्हारी हैसियत है
जो सदियों से
मनुष्य को समाज ने
अपने और तुममें —
अन्तर याद दिलाने के लिए रखा है

उनके लिए
यही है तुम्हारा वजूद जो तुम्हें अपने और —
इस विष्ठा-सने झाड़ू
अस्पृश्य बाल्टी / भिनकती मक्खी में
कोई फ़र्क़ महसूस करने नहीं देता
उन सबके लिए
क्या यह कम राहत नहीं
कि तुम
पीढ़ियों से उनके और
उनके पिताओं-दादाओं-परदादाओं के लिए
बिना व्यवधान प्रतिरोध के
रोज़ तड़के आती रही हो
बिना सवाल किये
जुगुप्सित बाल्टी कसकर हाथों से भींचे
उस नरक की ओर
बेझिझक बढ़ जाती रही हो
जिसके छुआ जाने भर से
चमड़ी जूठी पड़ जाती है
माथे पर तुम्हारे जब तक यह सनद है
तब तक उनकी व्यवस्था को राहत है कि
तुम्हें किसी
नाम-पहचान-अधिकार की
परवाह न होगी !
याद रखो माथे पर जब तक
यह भरी डगमगाती विष्ठा की बाल्टी है
तुम्हें अपने और इस विष्ठा-सने झाड़ू —
अस्पृश्य बाल्टी, भिनकती मक्खी में
कोई फ़र्क़ महसूस नहीं होगा !


 अन्तर्सजा

बहुत देख लिया
नून-तेल आटा-दाल
बटलोई-कड़छुलवाली
रसोईघर की खिड़की से
बादल का छूटता
कोना
यह सोफा कुर्सियां मेज पलंग फूलदान
उधर धर दो

कैलेण्डर में सुबह-शाम बंधे
गलियारे में पूरब-पश्चिम कैद
उस कोने में वह स्नान कोठरी
घिरा बरामदा इधर हटाकर

तारों का कद छूती
पहाड़ों की ये चोटियां
इस खिड़की पर गिरते
झरने की धारा
यहां टिका दो !

चन्द्र ज्योत्स्ना पीकर उफनाया
समुद्र टंगेगा
हवाओं में धुलती बदलती ऋतुएं
जंगलों की बनघास की सुगन्ध
आकाशगंगा में नहाए
ग्रह-उपग्रह नक्षत्र निहारिकाएं
करवट बदलने को करतीं विवश

ये से इस तरह रख दो
इस आले और उस तख्ते पर
बीच दहलीज़
पश्चिम के दरवाजे़ और पूरब के चौरे पर
तुम्हारी व्यवस्था में
अपनी धरती पर बिछाना है मुझे
उत्तरी ध्रुव तक फैला
नीले झूमर-सा झिलमिलाता
... आकाश... !

तस्वीरें गूगल से साभार 

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