तुलसीराम की बेटी ने लिखा राधादेवी को खत , एक शोधार्थी पर उठाई उंगली


पिछले कुछ दिनों से लेखक, चिंतक दिवंगत तुलसीराम के बाल-विवाह, और उससे उनकी पत्नी के हक को लेकर सोशल मीडिया पर हंगामा बरपा है. उनकी बेटी अंगिरा चौधरी को भी कठघरे में खड़ा किया जा रहा है. कहा यह भी जा रहा है कि वे फोन नहीं उठा रही हैं. स्त्रीकाल ने उनसे संपर्क किया तो उन्होंने अपना पक्ष रखा और राधादेवी को एक खत लिखकर कथित षड्यंत्रकारियों से सावधान रहने का आग्रह करते हुए उन्हें मदद की पेशकश की. पढ़ें यह लंबा खत...

इन आठ दिनों में जब से फेसबुक और दूसरे खुले प्लेटफॉर्म पर मेरे परिवार के खिलाफ दुष्प्रचार चलाना शुरू हुआ है , एक दो मेरे बहुत करीबी लोगों को छोड़कर अपने-पराये किसी ने भी इस सन्दर्भ में मुझसे संपर्क नहीं किया है।  कल स्त्रीकाल की तरफ से पहली बार इसपर मुझसे चर्चा की गई है।  इसलिए जब सारी चीजें खुले में चलाई ही जा रही है , मैं राधा देवी को लिखी अपनी चिट्ठी स्त्रीकाल से शेयर कर रही हूँ।  अगर वो उचित समझें तो इसे सार्वजनिक कर सकते हैं। इस खुले पत्र के लिए मैं अपना संपर्क पता इसमें से हटा रही हूँ।

अंगिरा, राधादेवी और तुलसीराम 



आदरणीय राधादेवी जी

ठीक दो साल पहले आपसे आजमगढ़ में आपसे पहली बार मुलाकात हुई थी।  आज फिर दो सालों के बाद आपको चिट्ठी लिख रही हूँ। मैं तो अपने पिता के याद में कराए जा रहे एक कार्यकर्म का हिस्सा होने इस उत्साह के साथ आजमगढ़ गई थी कि पहली बार 28 सालों में अपने पिता के पैतृक गांव देखूंगी लेकिन वहां जाकर तमाम चीजों के साथ साथ आपसे भी मुलाकात हुई। सब कुछ लगभग जस का तस था जैसा मेरे पिता ने उस जगह के बारे में दसियों बार बताया था सिवा आपके।  आपका तो जीवन में कभी उन्होंने कोई जिक्र ही नहीं किया था।  आपका अपना परिचय बताने पर मैं हतप्रभ सी आपके सामने खड़ी रही और आप मेरा हाथ पकड़ मुझसे बात करती रही।  उस किंकर्तव्यविमूढ़ता के बावजूद आपके आशीर्वाद के शब्द मुझे याद हैं।  "जा बेटी जहें रहिय, खुश रहिय" या ऐसे ही कुछ शब्द।  मैं एकदम नहीं कह सकती कि आपने मुझसे कोई कटु शब्द कहे।

फिर भी मेरी दुनिया बदल गई थी। जब तक आजमगढ़ रही, इस बारे में उसके बाद किसी से कोई भी बात नहीं हुई।  जैसे या तो कोई कुछ जानता ही न हो या कि सब लोग सब कुछ जानते हों। या तो सब हतप्रभ थे या किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहें। मेरे साथ में कुछ जेएनयू के प्रोफेसरों और मेरे कुछ दोस्तों में धर्मवीर गगन भी थे।  वे भले कुछ न बोले हों लेकिन मेरे लिए ये दुनिया बदल गई थी।

वापस आने के बाद मेरी भी हिम्मत नहीं हुई कि मैं अपनी माँ को यह बता सकूँ कि आजमगढ़ में एक महिला मिलीं जो अपने आप को मेरे पापा की पत्नी कह रही थी।  दोनों तरफ एक महिला  थी जिसके बीच में मैं एक बेटी। खैर, अगले कुछ दिनों में मेरी माँ तक भी ये ख़बर पहुंच ही गई। मेरी मां पर क्या गुजरी होगी इसकी कल्पना आप भी कर ही सकती हैं।  इतने बड़ी बात को न बताने का अपराधी मान मेरी मां ने मेरे एकमात्र चाचा जिनका मेरे घर आना जाना था उनसे भी संबंध विच्छेद कर लिया।  फिर जीवन चलता रहा और इस बीच दो साल गुजर गए।  पिता के तरफ से सारे संबंध ख़त्म ही हो गए थे और माँ के तरफ से सारी मौसियां और मामा भी पिछले महीने तक गुजर गए।

इन दो सालों में भी आपकी तरफ से कोई संवाद नहीं हुआ और हमारी तरफ से किसी संवाद की कोई वजह नहीं थी।  लेकिन पिछले 6 दिनों से एक बार फिर मैं भौचक हतप्रभ आपको अपने सामने पा रही हूँ।  फ़ेसबुक नाम का एक तरीका है जिसमे लोग कम्प्यूटर के माध्यम से लोग दुनिया के सामने खुलेआम अपनी बात रखते हैं , वहां आपकी कही हुई बातों का वीडियो बनाकर आपके लिए न्याय माँगा जा रहा है।  ये वीडियो तो 24 नवम्बर 2017 को ही कंप्यूटर पर यूट्यूब नाम की जगह पर आ गया था लेकिन आपके न्याय के लिए ठीक मेरे पापा की बरसी वाले दिन 13 फ़रवरी को ही चुना गया।  जीतेन्द्र विसारिया जिनका कहना है कि असल में वो राधादेवी के न्याय के लिए मुहीम चला रहे हैं , उन्होंने आपके न्याय के लिए 13 फ़रवरी आने का इंतज़ार किया या फिर एक और इत्तेफ़ाक़ ये है कि 13 फ़रवरी के दिन धर्मवीर गगन जिन्होंने पापा के ऊपर तुलसी राम विशेषांक निकाला और दो साल पहले मेरे साथ आपसे मिले थे, जीतेन्द्र विसारिया के साथ दीखते हैं।  तुलसी राम विशेषांक की वजह से धर्मवीर गगन तो हमारे बहुत करीबी थे, पचासो बार उसके सन्दर्भ में हमारे घर आये हैं , अपने जीवन की हर एक तस्वीर उनको दिखाई जिसमे से वो अपनी पत्रिका के लिए छांट सकें।  पापा से मिलने और उनके इंटरव्यू के लिए न जाने कितनी बार वो हॉस्पिटल भी आए, यहाँ तक कि जब मैं पहली बार आजमगढ़ आई तो वो मेरे साथ आये थे। खुद मेरी मां ने कइयों को उनकी पत्रिका में लिखने और कुछ आर्थिक मदद देने के लिए कहा था।  बस एक बार ही ऐसा हुआ कि उन्होंने हॉस्पिटल में आखिरी दिनों में बेड पर जर्जर स्थिति में लेटे पापा के बगल मुझे जबरदस्ती खड़ा करके फोटो लेने की बात कही थी तो मैं झल्ला पड़ी थी , लेकिन उसके बाद भी उन्होंने वैसी फोटो ली ही थी जो आज उनके विशेषांक में लगी हुई है।

जीतेन्द्र विसारिया को मैं निजी रूप से नहीं जानती लेकिन फेसबुक के माध्यम से मुझसे जुड़े हैं। पापा की वजह से कई लोगों से जुड़ी हूँ इस वजह से सबके लिखी बातें नहीं देख पाती, लेकिन राधा देवी को न्याय दिलाने की मुहीम में उन्हें प्रभा चौधरी और अंगिरा चौधरी के बारे में झूठ कहते यह शर्म नहीं आई कि हम दोनों का फ़ोन नेटवर्क से बाहर बता रहा है और सपर्क करने में वो असमर्थ हैं जैसे हमने अपना मोबाइल बंद कर कहीं छिप गए हों। जबकि सच है कि मैं लगातार इन दिनों अपने पढाई और अपने दोस्तों की वजह से सार्वजनिक स्थानों पर पायी गई हूँ जो मेरे फेसबुक पर भी देखा जा सकता है । मेरे पास ये सुविधा ही नहीं है कि मेरी माँ मौजूदा हालत में  घर में अकेली रहें और मैं घर के बाहर अपना मोबाइल बंद कर सकूँ। मोबाइल में एक व्यवस्था होती है कि अगर कभी किसी हालत में फोन न लगे तो आपको मिस्ड कॉल की जानकारी के साथ मैसेज आता है। मुझे आज तक एक भी ऐसा मैसेज नहीं मिला है। हालाँकि विसारिया मुझे मैसेज भेज ही सकते थे बजाय इसके कि हम माँ बेटी की ईमानदारी पर झूठे सवाल उठाने वाले पोस्ट में मुझे टैग करेंगे तो मुझे कम से कम उनकी ईमानदारी का एहसास हो ही जायेगा। मैंने चुपचाप वहां से अपने को अलग करना ही बेहतर समझा।

लेकिन अगर ये लोग पूरी दुनिया को यह कहते रहें कि प्रभा चौधरी और अंगिरा चौधरी ने राधा देवी का हक़ मार रखा है, बिना हमसे संपर्क करने की कोशिश किये हमें भगोड़ा भी साबित करेंगे और मेरे कई दोस्तों को भी चुपके से मेसेज में वीडियो भेजेंगे तो ये राधा देवी के न्याय को लेकर कितने ईमानदार हैं वो समझ सकती हूँ। दुआ करुँगी कि कम से कम अंगिरा चौधरी और प्रभा चौधरी को ऐसे न्याय के ठेकेदारों की जरूरत न पड़े।  जिस विडिओ को धर्मवीर गगन सभी को चुपके से मेसेज में भेज रहे हैं , उसमे विसारिया लिखते हैं कि " प्रोफ़ेसर बनने के उपरांत तुलसीरामजी ने राधादेवी को बिना तलाक दिए अपने से उच्चजाति की शिक्षित युवती से विवाह कर लिया" क्या धर्मवीर गगन को  नहीं पता कि वह युवती और मेरी मां उच्चजाति की नहीं हैं।  सभी दलित पुरुष थोड़ा विकास करते ही अपनी जाति से नफ़रत करने लगते हैं वाला जातीय तर्क साबित करके किसके लिए न्याय ढूंढ़ने निकले हैं गगन! क्या धर्मवीर गगन को नहीं पता है कि तुलसी राम के मरणोपरांत प्रभा चौधरी को कोई भी पेंशन नहीं मिलती है।  क्या धर्मवीर गगन को नहीं पता है कि राजकमल वालों की तरफ से साल में कितनी रॉयल्टी मिलती है ? क्या धर्मवीर गगन ये भी भूल गए कि घर में आमदनी का मासिक जरिया केवल मेरा स्कालरशिप है।

अगर ऐसा है तो आज दुःख है मुझे कि मरते वक़्त मेरे पापा ने गगन को अच्छा स्टूडेंट मान भरोसा किया था।  वो साल भर जुड़े रहकर एक तुलसी राम विशेषांक निकालते हैं , उसके एक साल तक फिर पच्चीसों बार उस पत्रिका का विमोचन करवाने के सिलसिले में आप हमारे घर से जुड़े रहते हैं और उनको घर की बेसिक सी बात पता नहीं चलती  या फिर उन्हें इसमें मजा आ रहा है कि दो महिलाएं कैसे किसी पुरुष के अभाव में घर चला रही हैं उसकी छीछालेदर हो। कितना आसान है झूठ कह देना कि हमारा फोन नेटवर्क से बाहर है या हमने अपना मोबाइल बंद कर रखा है या कभी कि हम इनका फोन उठा ही नहीं रहे।  जबकि अगर ये तनिक भी ईमानदार होते, हमसे व्यक्तिगत तौर पर मिलते , या फोन करते , नहीं उठाने की अवस्था में मैसेज करते , मैसेज का जवाब नहीं मिलने पर ईमेल करते , फिर उस ईमेल का जवाब भी नहीं मिलने पर उस ईमेल को सार्वजनिक करते।  लेकिन मैं पूरी ईमानदारी के साथ कह रही हूँ कि इन्होने  कुछ नहीं किया बल्कि जवाब न देने और फोन बंद करने का बेबुनियाद आरोप लगाकर हम माँ बेटी का भी चरित्र हनन किया है।  प्रोफ़ेसर तुलसीराम के ऊपर कीचड उछालने और उनके समाज के लिए दिए साहित्यिक योगदान को कमतर साबित करने की कोशिश की है।

अभी दौर है।  लोग कहीं का दीखते दीखते कहीं का हो ले रहे हैं। 52 सालों के बाद जब कोई कहने वाला ही नहीं रहा कि 52 साल पहले क्या हुआ, धर्मवीर गगन और उनके मित्र आपको न्याय दिलाने निकले हैं तो जिसे भी अन्यायी साबित करना हो कर लें।  अंगिरा चौधरी भी अन्यायी हैं और प्रभा चौधरी भी।  तुलसी राम को साबित करना तो सबसे जरूरी है।  इससे आपको न्याय मिले न मिले लेकिन शायद इनको नौकरियां मिल जाए।  आज के दौर में ऐसे भी हम दलितों पिछड़ों को नौकरियां मिलनी कठिन हो गई हैं।  सुन रही थी कि मुर्दहिया और मणिकर्णिका को कॉलेज की किताबों में शामिल करने की बात चल रही थी, ऐसे में उम्मीद है कि इन्हे जल्दी ही नौकरी मिल जाएगी और फिर कभी किसी और का विशेषांक निकालने की नौबत नहीं आएगी।

खैर, अब बात कह दी ही गई है कि मेरी मां और मैं अपने पिता द्वारा छोड़ी अकूत सम्पति पर जो सिर्फ आपका हक़ है पर जबरदस्ती गैरकानूनी ढंग से कब्ज़ा जमाए बैठे हैं, तो बता ही दूँ कि मेरे पिता के मरने के बाद रिटायरमेंट के पैसे से हम दोनों के रहने के लिए छत की व्यवस्था हो सके। लेकिन आत्मविश्वास और ईमानदारी इतनी दी है कि बिना बिके और बेईमान हुए जीवन जी सकूँ।  मेरे लिए यही उनकी विरासत है।  आज भी मुझे गर्व है कि मेरे पिता ने कभी मुझसे झूठ नहीं कहा।  बेटी तो केवल मैं ही हूँ जिसके जन्म से लेकर उनके मरने तक वे हमेशा साथ रहे और यह तथ्य अब तक तो अविवादित है। मुर्दहिया और मणिकर्णिका की कितनी ही बातें उन्होंने मुझसे ढेरों बार बताई थी।  जो नहीं बताई वो उन्होंने नहीं लिखा।  क्या वजह रही ये वही बेहतर बता सकते थे लेकिन सामाजिक शास्त्र के लोग इसके मतलब निकाल ही सकते हैं।  आज आपके वीडियो के बाद और जीतेन्द्र विसारिया की फेसबुक वाले कम्प्यूटर को देखकर अपने पिता के जीवन का महत्वपूर्ण घटनाक्रम बनाती हूँ तो समझ आता है कि

65 साल की उम्र में मेरे पिता 2014 में रिटायर होते हैं।

1949 के लगभग में मेरे पिता का जन्म होता है।

01 जुलाई 1964 को पंद्रह साल की उम्र में मेरे पिता ने गांव हमेशा के लिए छोड़ दिया. खुद मुर्दहिया में मेरे पिता ने ये लिखा है।  मैं उनके कहे को झूठ नहीं मान सकती वैसे ही जैसे मैं आपके कहे को नकार नहीं रही। मेरे पापा ने खुद कहीं किसी से कहा है कि घर छोड़ने पर भी मेरे दादा मौरी विधि द्वारा आपका गौना कराकर लाते हैं। खुद इस विडिओ में आपका कहा सुना जा सकता है कि जब साथे रहबे नहीं किये तो बच्चा कैसे होता।

17 (मध्य अप्रेल 1966) की उम्र में वो आजमगढ़ बारहवीं पास करते हैं और घर हमेशा के लिए छोड़ देते हैं।

21 जनवरी 1976 को पापा बनारस हमेशा के लिए छोड़ दिल्ली आ जाते हैं।

21 मार्च 1988 को मेरे पिता की प्रभा चौधरी यानि कि मेरी माँ से शादी होती है जिसके बाद मेरा जन्म होता है।

05 दिसंबर 2008 में उनकी दोनों किडनियां फेल हो जाती हैं और तब से नियमित रूप से डायलिसिस शुरू हो जाता है. इसकी जानकारी वहां गांव में पापा के भाई को भी रहती है।

अक्टूबर 2010 में पापा के मरने की अफवाह फैलती है।  दलितों की एक साहित्यिक सभा में उनको श्रद्धांजलि भी दे दी जाती है। अंततः लम्बे समय की बिमारी के बाद 13 फ़रवरी 2015 को मेरे पिता की मृत्यु होती है।

13 फ़रवरी 2016 को आपसे मुलाकात होती है जहाँ मुझे आपका परिचय पता चलता है जो दो चार दिनों के बाद माँ को भी पता लगता है।

13 फ़रवरी 2018 को एकाएक एक वीडियो के माध्यम से सबको बताया जाता है कि "बतौर हक़ या मानवीय आधार पर ही सही आधा अंश या कुछ राशि, गुज़ारा भत्ता के रूप में प्रभा चौधरी की ओर से राधादेवीजी को अवश्य पहुँचानी चाहिए, जिससे वे जीवन रहते परवश और भुखमरी की शिकार न हों!! दिल्ली स्थित बुद्धिजीवी साथी और प्रोफ़ेसर तुलसीरामजी की पुत्री कॉमरेड Angira को भी इस हेतु आगे बढ़कर पहल करनी चाहिए। ...आदरणीय राधादेवी भयंकर गरीबी और भुखमरी की शिकार हैं!"

जैसा कि मैंने ऊपर बताया कि आपके न्याय के पुरोधाओं ने सबको ये बात बताई लेकिन जब तक मुझे पता चलती , तब तक बात मेरी माँ को आपके हक़ मारने वालों के रूप में स्थापित करने की कोशिश शुरू हो जाती है।  जो औरत लगातार 30 साल तक मेरे पापा के साथ रहती है , हर सुख दुःख में साथ रहती है वो एकाएक "दूसरी औरत" बना दी जाती है। कितने न्यायप्रिय लोग हैं कि दो पूर्णतः व्यस्क प्रबुद्ध लोगों की साथ जीने के सचेत निर्णय को एक अबोध बच्चों की शादी से एक पल में धराशायी कर दे रहे हैं। उनके जीवन भर के संघर्ष को एक पल में इसलिए ख़ारिज कर दिया जाय कि उन्होंने समाज के बकवास नियमों से विद्रोह करने का निर्णय लिया! लोगों को आज लिगालिटी-इलिगालिटी दिख रहा है वो भी आज 2018 की नज़रों से।  क्या वो भूल रहे हैं कि 1965-1970 तो क्या मोटा मोटी मानिये तो 1991 के पहले क्या सरकारी क़ानून इतना मजबूत था कि सरकार और समाज के बीच के अन्तर्सम्बन्ध आज जैसे थे?  सामाजिक नियम ही सर्वोपरि थे।  मेरे पापा के समाज में तो पुनर्विवाह का भी प्रचलन था। आपके अनुसार दो साल की उम्र में हुयी शादी को उन्होंने नहीं माना।  एक बार छोड़ दिया तो कभी पीछे मुड़ के भी नहीं देखे।  इस सन्दर्भ में भी उन्होंने कुछ नहीं लिखा तो शायद इधर मेरी माँ और मैं थी तो दूसरी तरफ आपकी निजता की चिंता भी हो ही सकती है।  वो क्यों लिखते! आजमगढ़ छोड़ने के बाद 47 साल वो जीवित रहे। जो एक आरोप लग रहा है कि "बड़ा आदमी " बनने के बाद वो बदल गए तो आजमगढ़ छोड़ने से लेकर उनके "बड़ा आदमी" बनने में 22 साल का समय है। उन 22  सालों के बाद भी 27 -28 साल के करीब तो केवल हम उनके साथ थे।  मैं बिलकुल समझ सकती हूँ कि इस समाज में खासकर हमारे समाज में महिलाओं की जो स्थिति है शायद आप पापा को अकेले नहीं ढूंढ पातीं।  लेकिन आपके तो 5 भाई थे। विसारिया जी की ही बातों से पता चलता है कि ऐसी स्थिति तो थी ही कि भाई आपकी मदद करते।  उनके लिए तो ढूँढना मुश्किल न था अगर उन्हें नहीं पता रहा होगा तो।  धर्मवीर गगन जैसे समाजसेवकों की भी कभी कमी नहीं रही समाज में जो आपको खबर देता अगर आपने कोशिश की होती।  बचपन से ही मैंने घर में आजमगढ़ से कइयों को कभी किसी काम के लिए तो कभी ऐसे ही मिलने के लिए आते देखा है। लेकिन आप कभी नहीं आयीं। न ही आपके तरफ से कोई आया।  मुझे भी तभी पता लगा जब मैं वहां गयी।  अभी भी आपने किसी को हमें कोई खबर पहुंचाने नहीं कहा बल्कि जब कोई समाजसेवी आपके पास पहुंच रहा है तो आप उससे अपनी बात कह रही हैं जिसका कि वीडियो बनाकर लोग समाजसेवा कर रहे हैं। वजह सोचने की मैंने भी बहुत कोशिस की है।  हो सकता है कि आपका आत्मसम्मान आपको पापा से दूर करता हो।  लेकिन एक तरफ आपका आत्मसम्मान आप पर इतना हावी हो कि मेरे पापा मरते रहे लेकिन आप एक बार भी नहीं आयीं और दूसरी तरफ आज उनके मरने के बाद लोग आपके लिए बतौर हक़ और मानवीय आधार की बात करते करते मुझे और मेरी माँ को पलक झपकते मेरे पापा की जिंदगी में ग़ैरकानूनी करार दिए जा रहे हैं।  अगर क़ानून ऐसा है तो ऐसे क़ानून को मैं तो नहीं मानती।  मैं तुलसी राम की बेटी हूँ और प्रभा चौधरी मेरी माँ हैं।  यही अंतिम सच है।  मेरा बाप एक दिन में नहीं मरा, 8 साल तो हमारे हर तीसरे दिन हॉस्पिटल में डायलिसिस करवाते ही गुजरे हैं अगर बाकी दिनों को छोड़ भी दिया जाय तो।  उस समय मेरे बाप के पास जो महिला थी वो गंभीर आर्थराइटिस के बावजूद उनके साथ हॉस्पिटल आती जाती थी तो वो मेरी माँ प्रभा चौधरी थी। मेरे बाप की दवाइयों से लेकर खाने तक का हिसाब जिस महिला ने रखा वो प्रभा चौधरी थी।  कितना बताऊँ , सोचियेगा कभी।  शादी के पहले का तो कोई गवाह नहीं हमारे पास, लेकिन पिछले तीस सालों में अगर मेरे बाप ने एक पन्ने की रद्दी भी तैयार की तो उसके उत्पादन में प्रभा चौधरी का श्रम भी शामिल है।  और अगर इन तीस सालों में आप एक बार भी उनके रहते आयी होतीं तो आज मैं इतना व्यथित नहीं होती।  आप राधादेवी जो समाज की सतायी हुयी हैं हो सकती हैं लेकिन आप मेरी माँ नहीं हो सकतीं।  मैं कैसे मान लूँ कि जिस महिला के लिए मेरा मरता हुआ बाप भी कुछ न था आज वो एकाएक मेरी रिश्तेदार हो जाय।


समाज का सताए हुए तो मेरे पापा भी हैं। आज राधादेवी और प्रभा चौधरी में भले एक फर्जी विवाद हो लेकिन जैसा पहले भी मैंने कहा कि अंगिरा चौधरी निर्विवाद है जब तक कम से कम कोई और समाजसेवी आगे न आए। अपनी उम्र के साथ मेरा दावा है कि मुझसे ज्यादा तो इस दुनिया में किसी इंसान को तो प्रेम नहीं ही किया होगा।  लेकिन उस इंसान की मजबूरी को समझिये कि वो मुझसे भी ये बात नहीं कह पाए।  आज सोचती हूँ कि आखिरी दिनों में हॉस्पिटल के बेड पर लेटे वो क्या सोचते होंगे।  इस दुनिया की समझदारी तो उन्हें रही ही होगी कि आज न कल ये बात मुझे पता चलेगी। लेकिन जब तक हो सका तब तक उन्होंने छिपाकर रखा।  एक विद्रोह भी है जिसको छिपाने का संघर्ष भी है।  हमारी भलाई, उनकी अपनी भलाई या फिर शायद आपकी भलाई। जिस महिला से उन्होंने 50 साल के लगभग से  कोई संबंध न रहा हो, और वह महिला भी उनके सामने दोबारा नहीं आई हो उसको अपने संस्मरण में ज़िक्र करते भी तो क्या करते। जो भी हो लेकिन इस समाज ने उनसे उनका आजमगढ़ छीन लिया।  और उसी समाज की साजिश है कि जिसने उनसे उनका अतीत छीन लिया आज वर्त्तमान और भविष्य भी छीनने की कोशिश में हैं।

तुलसीराम एक कार्यक्रम में बोलते हुए 

लेकिन चाहे जैसे भी हो, उनका अतीत आज हमारे सामने है।  समाज ने आपके साथ अन्याय कर  असल में जो मेरे पिता के पूरे ही अतीत को एक रंग से रंगने की कोशिश की है उसे मैं समझ सकती हूँ।  आपके साथ न्याय होना असल में मेरे पिता के साथ न्याय होना भी होता। लेकिन ये तब नहीं हो सका और एक ख़ास मानवीय संवेदना के तहत ही सही लेकिन मुझे ऐसा  तो लगता ही है कि आज आप वक़्त के ऐसे मोड़ पर हैं जहाँ हर किसी को किसी न किसी की जरूरत तो होती है। पर दूसरी संवेदनाएं भी हैं।  मैं तुलसी राम की बेटी के साथ साथ प्रभा चौधरी की भी बेटी हूँ।  मेरी जिम्मेवारियां मेरी मां प्रभा चौधरी के साथ भी हैं लेकिन फिर भी मुझसे जितना बन पाएगा आपके जीवन-यापन के लिए करने की कोशिश कर ही सकती हूँ। इस समाज में तो हक़ पत्नी और बेटी दोनों को ही है।  आपके पत्नी के हक़ वाले मामले में नैतिक रूप से तो मुझे इतना ही समझ आता है जो मैं बिलकुल करना चाहूंगी और विधिक रूप से तय करने की क्षमता न तो मुझमे है न ही ये उतना सरल है।  लेकिन हाँ , एक बेटी के रूप में मैं अपना और आपका दोनों का हक़ समझती हूँ।  जैसा कि आपने वीडियो में बताया कि 1965 आपके पिता ने भाइयों को 150 रूपये बैल खरीदने के लिए दिए थे।  जो निश्चित ही उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी राशि है।  और जोड़ी बैल रखने वाले किसानों की स्थिति से समझ आता ही है आपके पिता की हालत सुदृढ़ थी।  मैं बिलकुल चाहूंगी कि आप और आपके लिए न्याय मांगने वाले लोग एकतरफा हक़ की लड़ाई न लड़ें और पिता से भी न्याय की मांग करें। आपका अपने पिता की भी संपत्ति में आपका हक़ है जिसे आपके भाइयों ने दबा रखा है। मायका और ससुराल के बीच झूलने की बात पर इतना तो कह ही सकती हूँ कि मायका तो आपका अपना है।  वहां के आपके निर्विवादित अधिकार हैं। अगर आपके लिए न्याय मांगने वाले लोग आपकी इस लड़ाई में आपका साथ न दें तो समझ लीजिये कि ये बहुत ही षड्यंत्रकारी किस्म के इंसान हैं जो महज अपने फायदे के लिए शोर कर रहे हैं।  पिता पर हक़ के मामले में मैं तो खुद खड़ा होने को तैयार ही हूँ।  वादा करती हूँ कि आप और हम दोनों जब अपने अपने पिता पर हक़ की लड़ाई के लिए खड़ी होंगे, आप मुझे अपने साथ पाएंगी। मैं आपको अपने घर का पता और अपना मोबाइल नंबर भेज रही हूँ। कभी कोई जरूरत हो तो आप सीधे मुझसे संपर्क कीजिये।  तुलसी राम और प्रभा चौधरी की बेटी होने के नाते मुझसे जितना बन सकेगा वो मैं जरूर करुँगी.

एक वादा आपसे और करती हूँ। महिला होने के नाते जो समाज ने आपके साथ किया वो मैं अपने साथ तो नहीं ही होने दूंगी।  आज मेरे घर में कोई पुरुष नहीं है।  नजदीकी रिश्तेदारों में भी नहीं।  लेकिन जो मंसूबे लोगों ने बनाये हैं उसमे सफ़ल नहीं होंगे।  मैं तुलसी राम के विरासत को चंद षड्यंत्रकारी लोगों के हाथों नीलाम नहीं होने दूंगी।  अगर मूर्खता मेरे पिता की विरासत थी तो मेरी विरासत में तो मुझे संघर्ष मिले हैं। 

अंगिरा चौधरी 

तस्वीरें गूगल, फेसबुक  से साभार 

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