चारपाई (रजनी दिसोदिया की कहानी)

रजनी दिसोदिया
साहित्यकार , आलोचक रजनी दिसोदिया मिरांडा हाउस मे हिन्दी की प्राध्यापिका हैं. संपर्क : ई -मेल : rajni.disodia@gmail.com,मोबाईल , मोबाईल : 9910019108 

                                              
सारा सामान ट्रक में लादा जा रहा था और वह टूटी चारपाई अभी बॉलकनी में ही खड़ी थी।बूढ़े रामस्वरूप बाहर, नीचे  कुर्सी पर बैठे, वहीं से बॉलकनी में खड़ी चारपाई को देख रहे थे। ऊपर से नीचे  सामान लाने वाले मजदूरों को वे बार-बार हिदायत दे रहे थे कि वह बॉलकनी में रखी चारपाई  भी ट्रक में रखनी है।उस चारपाई की हालत देख कर मजदूर यह अनुमान नहीं लगा पा रहे थे कि क्या सचमुच उसे ट्रक में लादा जाना है। उनका अनुमान था कि ये लोग इस कबाड़ को यहीं छोड़ जाएंगे तो हम इसे यहाँ से ले जाएंगे गर्मियों में झुग्गी  के बाहर एक चारपाई पड़ी रहे तो आए गए को ठहराने में कुछ आराम रहेगा। किन्तु हर बार के चक्कर में रामस्वरूप उन्हें वह चारपाई भी नीचे उतार लाने की जो हिदायत  दे रहे थे उससे उनका मन डोलने लगता था। सीढ़ीयों पर आते जाते एक दूसरे को मजाक में ठेलते हुए कह बैठते " कंजूस बुड्ढा खाट के पीछे पड़ा है , इस टूटी खाट को क्या अपनी अर्थी के साथ ले जाएगा।"  रामस्वरूप उन सबकी इस बातचीत को सुनकर भी अनसुना कर रहे थे। उनकी नज़रें उस चारपाई पर ऐसे अटकी पड़ी थी कि जैसे परियों की कहानी में राक्षस की जान पिं‍जरे के तोते में अटकी पड़ी रहती है। जैसे- जैसे सामान नीचे आ रहा था और वह चारपाई ऊपर वॉलकनी में ज्यों की त्यों रखी दिखाई दे रही थी वैसे -वैसे रामस्वरूप का पारा भी ऊपर चढ़ने लगा था। वे मन ही मन तय कर रहे  थे कि यदि यह चारपाई साथ नहीं ले जाई गई तो वे भी बहू-बेटे के साथ नए घर में नहीं जाएंगे , अकेले यहीं रह लेंगे। रामस्वरूप अपने जमाने के कम जिद्दी इंसान नहीं रहे। एक बार जो ठान लिया बस ठान लिया फिर समझाने वाला लाख समझाता रहे कि उनका निर्णय उन्हीं के लिए नुकसानदायक है तो भी अंगद का पांव अपनी जगह से हटे तो रामस्वरूप अपनी जिद से टलें।    




 रामस्वरूप बखूबी जानते थे कि यह सरकारी मकान है और उनके बेटे को अब इससे बड़ा मकान मिल गया है तो इसे तो छोड़ना ही होगा, पर उनकी जिद के सामने कभी उनके बाप की नहीं चली तो फिर ओमप्रकाश तो वैसे भी बेटा है।   एक मजदूर जो रामस्वरूप की ताजा झिड़की से तिलमिला गया था। " ले जाने दो साले बुड्ढे को, इस टूटी खाट के लिए इतनी घुड़कियाँ क्यों खाए।"   उसने बूढ़े के बेटे ओमप्रकाश से पूछा -” साहब बाबाजी कह रहे हैं वह बालकनी में खड़ी खाट भी ट्रक में रखनी है।"  उसने इस तरह पूछा था जैसे कह रहा हो आप लोगों को क्या शरम नहीं आती इतने बड़े आदमी होकर इस कबाड़ को भी बांधकर ले जा रहे हो। ऐसा नहीं थ कि ओमप्रकाश के कानों में अपने पिता का शोर , उनकी सख्त से सख्त होती आवाज़ नहीं पहुँच रही थी पर उस चारपाई को देखते ही उनकी हिम्मत पस्त हो जाती थी।चारपाई  क्या थी  बिलकुल ऐन्टिक पीस था।उसकी एक बाई आगे बढ़ रही थी तो दूसरी उससे बंधी होने के कारण उसके पीछे घिसट रही थी क्योंकि दोनों की उम्र में दस बरस का अन्तर तो जरूर था। उसके चारों पाए तक एक डिजाइन के नहीं थे। साफ़ पता चलता था कि  जरूरत के हिसाब से जब जो मिल गया उसे ठोक कर काम चलाया गया है। रस्सी भी पुरानी होते होते काली पड़ चुकी थी और बीच से टूट-टूतकर लटक रही थी।  कुल मिलाकर वह ओमप्रकाश को अपनी उस बेचारगी व मुफ़लिसी का प्रतीक नज़र आती थी जिससे  कड़े संघर्ष के बाद उन्होंने पीछा छुड़ाया था और उनके पिता थे कि वे अब भी उससे चिपटे हुए थे।  वे खुद मन में ठाने बैठे थे कि नए घर में तो इस कबाड़ को वह बिल्कुल नहीं ले जाएंगे। वसन्त कुंज इलाके में उन्हें टाईप फोर का बड़ा मकान मिला था। और मिलता भी क्यों ना , भारत सरकार के संस्कृति विभाग में वे उच्चपदाधिकारी थे। ऐसी जगह में उन्हें अपनी भद्द नहीं पिटानी थी कि वे इस कबाड़ को उठा कर वहाँ ले जाते। वे पूरी तौर पर जानते थे कि एक बार यह चारपाई वहाँ पहुँची तो पिताजी को इसे बाहर आँगन में बिछा कर बैठने से कोई रोक नहीं पाएगा। मजदूर ने साहब को ध्यानमग्न देखा तो फिर से पूछा- “ साहब बताएं क्या करना है।" ओमप्रकाश को कुछ समझ नहीं आया , अभी उन्होंने बला टालने की गरज से कहा कि उसे उठा कर कमरे में रख दो। उनका अनुमान था कि जब नीचे से बॉलकनी में चारपाई खड़ी नज़र नहीं आएगी तो पिताजी के ध्यान से भी उतर जाएगी और वहाँ पहूँच कर वे कह देंगे कि गलती से कमरे में रखी रह गई। 
         
 ट्रक में जब सारा सामान लद चुका तो ओमप्रकाश पत्नी बेटी और पिता सहित अपनी कार में नए घर की ओर निकल पड़े। बेटा पीछे ट्रक के साथ अपनी बाईक पर आ रहा था। नया घर यूँ कोई बहुत दूर नहीं था। बस सरोजिनी नगर से निकलकर वसंतकुंज की ओर जाना था। पर कोई साथ ना हो तो मजदूर बीच रास्ते में कुछ सामान गायब कर देते हैं। पिछली बार आज से आठ साल पहले जब उन्होंने उत्तम नगर से सरोजिनी नगर शिफ़्ट किया था तो रास्ते से उनका एकमात्र ट्रांजिस्टर गायब हो गया था। इस बार इसीलिए उन्होंने बेटे को ट्रक के साथ  कर दिया था। उधर जब रामस्वरूप को वह चारपाई बालकनी में खड़ी नहीं दिखाई दी थी तो उन्होंने उसी मजदूर से पूछ लिया था कि वह चारपाई रख दी क्या? , जिसका जवाब -- " हाँ रख दी।" ,उसने कुछ उसी प्रकार दिया जैसे " अश्वथामा मारा गया नरो वा कुंजरो वा' का आधा वाक्य श्री कृष्ण के शंख की गूँज में छिप गया था। इसीलिए तसल्ली कर लेने के लिए उन्होंने  अब बराबर बैठे बेटे से पूछा--” वा खाट धर ली थी के ना।" उसी समय ओमप्रकाश का फोन बज गया जिसका फ़ायदा उठाते हुए ओमप्रकाश ने स्वीकृति में  सिर इस तरह हिलाया जिसका अर्थ हाँ भी हो सकता था और ना भी। ओमप्रकाश फोन पर अपने किसी मित्र से बतियाने लगे और इधर रामस्वरूप को ना जाने क्यों किसी षड़यन्र की बू आने लगी । इस अनुमान मात्र से कि वह चारपाई वहीं छोड़ दी गई है वे आपे से बाहर हो गए। 

--" तू ठीक-ठीक जवाब क्यूँ ना देता , साहब होगा तू अपणे घर का, उरै( यहीं) ही डाट (रोक) गाड्डी नै, मन्नै कोन्या( नहीं) जाणा थारे साथ, मैं तो ओड़ेही( वहीं) एकला पड़ा रहूँगा।" ससुर की ऊँची आवाज़ से विद्या ( ओमप्रकाश की पत्नी) के कान खड़े हो गए। उसने पिछली सीट से उचककर पूछा।
--” के होया बाऊजी।" 
“ अरै मनै थारा दोनुआँ से न्युँ कह राख्खी थी कि वा खाट भी लेय के चालणी सै।" रानस्वरूप की बात खत्म भी नहीं हुई थी कि विद्या बोली-- 
--“ तो खाट तो ट्रक मैं गेर( डाल) राक्खी सै।" 
 विद्या की बात से रामस्वरूप को कुछ राहत मिली फिर भी जब तक घर पहुँचकर वे वह चारपाई  अपनी आँखों से नहीं देख लेंगे तब तक उनके प्राण उनके शरीर में किराये पर ही रहेंगे। अब वे घर पहुँचने का इन्तजार करने के लिए खिड़की से बाहर झाँकने  लगे। अभी पिता के गुस्से के डर से ओमप्रकाश का चेहरा पीला पड़ गया था तो अब विद्या की बात से वह सफ़ेद हो गया। उनकी कनपटियाँ गर्म होने लगी। उन्हें लगा वह चारपाई  भूत की तरह उनके पीछा कर रही है।

 ओमप्रकाश को याद है कि अभी पिछले छह दिसम्बर को जब कुछ मित्र लोग उनके घर में इकट्ठा हुए तो उस दिन भी पिताजी इसी चारपाई पर बड़े डठोरे से (गर्वित भाव से ) बैठे थे। उनके लिए वह चारपाई उनका वजूद थी जिसे शहर से गाँव आकर भी उन्होंने संजो कर रखा था। जबकि ओमप्रकाश के लिए वह उनके पिताजी की वह जिद थी जिसके द्वारा वे उनकी सारी उपलब्धियों  को धता बताते थे। उस समय पिताजी  अपनी ऊँची आवाज़ में लोगों को अपने जमाने के किस्से सुना रहे थे कि हफ़्ते भर तक ना नहाने वाली वो बामणियाँ जिनके घाघरों से सिड़ांध आती थी वो भी जब आस पास से गुजरती तो घाघरों को यूँ उकसा( उठाकर समेट लेना) लेती कहीं किसी से भिड़ ( छू) ना जाए। वे बता रहे थे कि अब तो क्या छूआछात है वो तो उनके जमाने में हुआ करती थी। उस समय मि० रंगा जो ओमप्रकाश के परम प्रिय मित्र है ने उन्हे एक कोने में ले जाकर कहा था-- “ क्या यार, कम से कम पिताजी को एक ढंग की चारपाई या फोल्डिंग तो ला दे।"  उसका भाव भी यही था कि  " साले ढेढ पढ़-लिख तो गए पर ढंग से रहना नहीं आया। उनका मानना था कि दलितों को समझना चाहिए कि क्यों बाबा साहब थ्री पीस सूट पहनते थे।  उस समय ओमप्रकाश के लिए अपने मित्र को यह समझाना भारी हो गया था कि समस्या नए फोल्डिंग की नहीं है बल्कि............ खैर रंगा तो फिर भी उनका दोस्त था जिसके मन में बात आई तो जबान पर भी आ गई, पर उनका क्या जो इशारों से एक दूसरे को वह खाट दिखाते  और ओमप्रकाश को यह लगता कि जैसे सरे आम किसी ने उनके कपड़े उतार लिए हों। उन्हें यह चारपाई  एक ऐसा लैंस मालूम पड़ती जिसके भीतर से उनका आज कल सब दिख जाता था जिसे वे बड़े जतन से ढके थे। उन्होंने सोचा था कि अब नया घर तो मिलने ही वाला है तो वहाँ इस चारपाई को लेकर ही नहीं जाएंगे और इधर विद्या ने उनकी सारी योजना पर पानी फेर दिया।



  
नए घर में आए एक हफ़्ता निकल चुका था।  लगभग सारा सामान अपनी - अपनी जगह ले चुका था पर वह चारपाई कभी इधर तो कभी उधर खड़ी होती पूरे घर में भटक रही थी, और उसके साथ रामस्वरूप भी। आज शनिवार था ओमप्रकाश ने सोचा था कि आज सभी छोटे बड़े काम निपटा देंगे। इतनी तैयारी के बावजूद रोज -रोज  सुनने को मिल ही जाता था कि बाथरूम मे टॉयलेट का सिसटर्न खराब है, कभी रसोई के पीछे की खिड़की का काँच टूटा पड़ा है। छत पर पानी इकट्ठा है। आज उन सबका इन्तजाम करना था।उधर रामस्वरूप भी आज का ही इन्तजार कर रहे थे। दिन चढ़ते ही उन्होंने ओमप्रकाश को घेर लिया।
-- रै ओमप्रकाश उरै सुण।( यहाँ आकर सुन )
-- हाँ , पिताजी। " उनके दिमाग के एन्टिना खड़े हो गए। वे पिताजी की आवाज के रूप को पहचानते थे।
-- ऐं घर मैं कितणा कमरा सैं।
-- चार।" उन्होंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।
-- इन चार कमरा मैं उस चारपाई  खातर (के लिए ) कोई जगह नहीं।
-- ओमप्रकाश का अनुमान ठीक था , मुँह से कोई शब्द न निकला। जवाब ना सुनकर रामस्वरूप का स्वर ओर ऊँचा हो गया।
-- तनै बेरा( पता) भी सै वा कित ( कहाँ ) पटक राखी सै।
-- “...........”
-- सबेरा की धूप साम तक खाट पै ही र्हवै सै,( रहती है ) थमनै वा कंडम ( बेकार ) करकै बगाणी( फेकनी) हो तो साफ़ बता दो।
-- तो पिताजी अब उसमैं बच भी के रह्या सै।" ओमप्रकाश ने हिम्मत करके कह तो दिया पर..।
-- तो भाई न्यूँ ( ऐसे )तो मेरा मैं के बच रह्या सै तम ( तुम ) मनै भी बगा ( फेंक ) दो।" अब रामस्वरूप भावुक होकर लगभग काँपने लगे थे। ओमप्रकाश यूं ही पिता के सामने ज्यादा बहस नहीं करते थे और अब तो वह असम्भव थी। यह रामस्वरूप का वह ब्रह्मास्त्र था जिससे वे जब तब ओमप्रकाश को निहत्था कर देते थे। अपने बेटे विवेक को यह हिदायत देकर की दादाजी जहाँ कहें उनकी चारपाई वहीं डाल दी जाए, ओमप्रकाश वहाँ से निकल आए। उधर पीछे से विवेक ने दादाजी को कन्धों से पकड़कर कुर्सी पर बिठाया और अन्तत: पूछ ही डाला --” क्या बात है दादाजी आप क्यों उस चारपाई के पीछे पड़े हो, आपके कमरे में लेटने को दीवान है बैठने को कुर्सियाँ हैं...........।" वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि डबडबाई  आँखों से रामस्वरूप ने उसकी ओर देखा--” पर भाई लेट -बैठ कै जिन्दगी कोन्या ( नहीं ) कटती.... फिर वे उठे और उन्होंने अपनी लाठी सम्भाली।, थम अभी क्यान्हैं (क्यों ) समझोगा...।" कह कर धीरे-धीरे बाहर निकल गए। विवेक ने भी समझ लिया कि कुछ बातों के तर्क तीर की तरह सीधे नहीं जाते बल्कि  अनेक तहों के नीचे  आड़े टेड़े चलते है कि ऊपर से दिखाई नहीं देता कि निशाना कहाँ है। उसने पिता के कहे अनुसार वह चारपाई  दादाजी के कमरे में लगा दी।

  विद्या रसोई सम्भाल रही थी। पिछले घर की अपेक्षा इस घर की रसोई काफ़ी बड़ी थी। पिछवाड़े की खिड़की से इतनी रोशनी और हवा अन्दर आती थी कि गर्मी में भी वहाँ काम करना अच्छा लगता था। बेटी सुमन भी माँ के साथ लगी कुछ मदद करा रही थी। ओमप्रकाश पिता के हाथों परास्त होकर इधर ही आ निकले।अब उनका सारा आक्रोश विद्या पर उतर जाने को उतारु हो रहा था। वह ही उस चारपाई को इस घर में लेकर आई थी। इसी कारण जो ओमप्रकाश पिता के आगे जो नहीं बोल पाए वह सब उसे सुनाने को आए थे।
-- हो गई तसल्ली। उन्होंने आते ही तीर सा छोड़ा।
-- किस बात की?” विद्या पूरे एक हफ़्ते से घर की सैटिंग में लगी थी। बच्चे और पति अपने अपने काम पर चले जाते थे दिनभर वह अकेली खट रही थी। उस पर यह ईनाम उसे मंजूर न था। इसलिए उसने उस तीर को वहीं तोड़- मरोड़कर फेंक दिया।
-- तुम्हें आखिर किसने कहा था , वो चारपाई  ट्रक में रखवाने के लिए ?” वे सीधा मतलब की बात पर आए।
-- अब इस चालीस  बरस की उम्र में भी हर काम आपसे पूछ-पूछकर करूँगी क्या ? “ विद्या सीधा उत्तर देने को तैयार ही नहीं थी। 

विद्या के स्वर की तेजी और तल्खी से ओमप्रकाश कुछ मद्दिम पड़े। जानते थे कि आखिर उसी के पिता का मन रखने को विद्या उस चारपाई को यहाँ लेकर आई है। पर यह घर उनका भी तो है कम से कम उनकी इच्छा भी जान ली जाती। पति को चुप देखकर विद्या को भी अपने ऊपर अफ़सोस हुआ। वह रसोई से दूध उठाकर बाहर डाइनिंग टेबुल पर रखने आई और बोली। " शान्ति रखो सब ठीक हो जाएगा।"  ओमप्रकाश चुपचाप घर के पीछे वाले पिछवाड़े की ओर चले गए।अपना ध्यान बंटाने को वे सोचने लगे कि यदि इस पूरे स्थान पर घास लगवा दी जाए तो चार लोगों के बैठने लायक जगह बन जाएगी। उधर सुमन ने अपनी माँ से पूछा।-” माँ दादाजी को उस चारपाई से इतना अटैचमैन्ट क्यों है ?  पापा इतने बड़े अफ़सर हैं कितने लोग हमारे घर आते है वे सब क्या सोचेंगे ?" सुमन ने वही सब कुछ उगल दिया जो अक्सर जब तब अपने पिछले घर में इस उस से सुनती रहती थी। विद्या ने इस प्रश्न के जवाब में दूसरा प्रश्न किया।" तुम क्यों अपने सारे टूटे फूटे खिलौने बटोर कर यहाँ ले आई जबकि अब तो तुम उनसे खेलती नहीं।" सुमन बाहर साल की वह बच्ची जो बचपन की पकड़ से छूट कर किशोरावस्था की दहलीज पर खड़ी थी, यह समझ ही ना पाई कि माँ क्या कहना या समझाना चाहती है और रूठ गई। " आप तो जब देखो मेरे खिलौनों के पीछे पड़ी रहती हो। कहीं रखो दादाजी की चारपाई पर मेरे खिलौनों की ओर देखना भी मत।" कहकर वह पाँव पटकती हुई बाहर चली गई।पर विद्या का उद्देश्य पूरा हो गया।
       
 जुलाई का महीना था। बारिश एक या दो बार तो हुई पर उसके बाद बादल ना जाने किस ट्रैफ़िक जाम में फंस गए। दिन भर उमस बनी रहती। पसीना एक बार जो आता फिर सूखने का नाम ना लेता। घर में केवल एक ही ए०सी० था वो भी मास्टर बेडरूम में जिसमें आजकल मेला सा लगा रहता था। बच्चे स्कूल -कॉलेज से आकर वहीं धमक जाते। विद्या भी फ़टाफ़ट बाहर काम निपटाकर अन्दर आ जाती। ऐसा नहीं था कि रामस्वरूप को उमस परेशान नहीं करती थी। पर क्या करते ए०सी० उनकी सेहत को रास नहीं आता था। दिनभर चारपाई पर करवटें बदलते पर कोई चैन नहीं पड़ता। आज उन्होंने अपनी चारपाई घर के बाहर वाले छोटे से खुले आँगन में लगवा ली थी। यहाँ चार बजे के बाद से ही छाया आ जाती थी और सात बजे तक अच्छा बैठने लायक माहौल बन जाता था।उस पर आस पास के पेड़ों से कुछ हवा निकल आती तो जैसे मजा ही आ जाता। बाहर चारपाई की खटर-खटर सुन कर सुमन ने गर्दन बाहर निकाली और दादाजी को बाहर बैठा देख कर वह भी उनके पास आ गई और मचककर उनके साथ बैठ गई।पर यह क्या चारपाई तो एक दम झूला हो रखी थी। उसने वापस उठते हुए दादाजी से पूछा।--” दादाजी आप इस पर सोते कैसे हो, ये तो बीच में से बिल्कुल लटकी पड़ी है।" रामस्वरूप आज अच्छे मूड में थे। हँस कर बोले--” तूने वो बाणिये वाळी बात ( कहानी ) कोन्या सुणी।" दादाजी के किस्से कहानियाँ सुमन की कमजोरी थे वह तपाक से बोली। - “ सुनाओ ना वो कहानी।" अगर कोई सुनने को तैयार होता तो रामस्वरूप घण्टों ऐसी कितनी ही कहानियाँ कितने ही अलग- अलग अंदाज में सुना सकते थे। पर इस नई दुनिया में समय किसके पास था। टी० वी० के सामने बैठकर लोग दूसरों के घरों की कहानियाँ जानना पसंद करते थे अपनो की कहानियाँ उन्हें पसंद न थी। वे झट से तैयार हो गए। " एक बाणिया ( गाँव का दुकानदार ) था। उसकै धोरै (पास ) भी इसी ही खाट थी। उसके छोरा नै भी एक दिन इसी तरहियाँ ( तरह ) पूछी - ' बापू यो खाट तो कतई झूला बरगी ( जैसी ) हो रही सै। तू इसनै परै गेर( दूर फेंक ) दे।' तो बाणिया बोला - ' तनै ना बेरा ( मालूम ) यो खास बात सै इस खाट मैं, गर कोई रात बिरात घर मैं चोर बड़ जाँ ( घुंस जाए ) ओर मेरे सुत्ता कै ( सोते हुए पर) ऊपर लट्ठ ( मोटा मजबूर डण्डा ) मारैं तो मेरे लागै क्यों ना लट्ठ बाईंया पै ही टिक के रह जा।' ( मझे चोट नहीं लगेगी डण्डे की चोट चारपाई की दोनों  तरफ़ की लकड़ी पर लगेगी।) तो फेर बाणिये का छोरा फेर बोला -- ' ओर बापू गर चोर तेरे खाट कै निच्चा सै ही मारैं तो ?' बाणिया गुसा मैं भर गया - ' साळा तू जायकै बताया , उननै ना बेरा हो तो।" ( बेवकूफ़ तू जाकर बता आ यदि उन्हें ना पता हो तो।) सुमन हँसते-हँसते लोट-पोट हो गई। उसकी और दादाजी की मिश्रित हँसी सुनकर विद्या और विवेक भी बाहर आ गए। दो कुर्सियाँ लाकर वहाँ रख ली गई। विवेक को वहाँ खड़ा देखकर रामस्वरूप ने कहा -- “ रै विवेक इस खाट की पंगात ( जिस ओर पैर रहते हैं।) ही खींच दे। तेक ठीक-ठाक हह ज्यागी ( हो जाएगी ) नहीं तो हाँ म्हारी सुमन भी इसका मजाक उड़ावै सै।" सुमन वहाँ कुर्सी पर बैठी-बैठी अपने पाँव हिलाने लगी। विवेक ने सुमन के सिर पर एक चपत लगाई और बोला-- “ आप बता दो कैसे खींचनी है।"


विद्या को याद है कि ये चारपाई ओमप्रकाश के उस पुराने मकान मालिक के यहाँ पड़ी थी जिसके यहाँ वे कभी अपनी पढ़ाई के दौरान किराये पर रहा करते थे। नौकरी लगी , ब्याह हुआ, और एक के बाद दूसरा दूसरे के बाद तीसरा किराये का मकान बदलते कभी इस चारपाई का किसी को कभी ध्यान ही नहीं आया। वो तो जब आठ साल पहले उन्हे सरोजिनी नगर में सरकारी मकान मिला और वे लोग गाँव जाकर माँ बाऊजी को भी अपने साथ रहने के लिए ले आए तो माँ ने ही एक दिन कहा - “ अरै ओम तेरी वा चारपाई कित ( कहाँ )सै जो हम घराँ से तेरे खातर लाया था।" और फिर ढूँढ ढाँढ कर इस चारपाई को घर लाया गया। अभी पिछले दो साल पहले जब इसकी रस्सी इतनी पुरानी पड़ गई  कि उसकी फाँस भी जब तब हाथ में चुभने लगी तो माँ बाऊजी की नाराजगी की परवाह न करते हुए उसे छत पर वहाँ रखवा दिया गया जहाँ से धूप – पानी से बचकर वह अपनी जिन्दगी के बाकी दिन निकाल सके। दुबारा वह चारपाई छत से उतर कर कब घर में दाखिल हो गई इसके बारे में कोई ठीक -ठीक नहीं जान सका पर विद्या को पता है कि माँ के जाने के कोई दो तीन दिन बाद बाऊजी बालकनी में उसी चारपाई पर बैठे रूमाल से अपने आँसू पौंछ रहे थे। विद्या ने कुछ नहीं पूछा और न किसी को कुछ पूछने दिया। आज विद्या का मन हुआ कि बाऊजी से इस चारपाई के बारे में बात की जाए। वह उठ कर चारपाई की पंगात कसने में बेटे की मदद करने लगी। पंगात कपड़े की रस्सी की बनी थी। उसे छूते हुए विवेक ने कहा।" दादाजी ये रस्सी तो कपड़े की बनी है।" रामस्वरूप ऊपर आसमान की ओर देखने लगे जैसे वह आसमान उनकी पलकों पर टिका हो फिर वहीं उसके अपनी पलकों पर टिकाए बोले ---” हाँ भई इसी रस्सी तो गाम्मा ( गाँवों ) में ही बणा करें.... “ फिर थोड़ा उत्साहित होकर बोले की " या रस्सी तेरी दादी नै बणाई थी जब तेरा पापा खात्तर हम इसनै गाम से ठायकै दिल्ली लाये थे। तेरी दादी नै उरै ( यहाँ ) आयके इसकी नई पंगात  भरी कदै छोरा का पावाँ मै फाँस ना चाल जाँ।" ( पाँव में रस्सी की फांस ना चुभ जाए।)
-- क्या............? आप इस चारपाई को गाँव से यहाँ लाए थे ? अमेजिंग दादाजी, विवेक के मुहँ से निकला। " सचमुच  आप तो कमाल हो। 

सचमुच यह अचम्भा था। विद्या ने भी नहीं सोचा थे कि इस चारपाई ने इतना लम्बा सफ़र तय किया होगा। भले ही उनका गाँव हरियाणा में था पर चार पाँच घण्टे का रास्ता तो था ही। उस पर बस या गाड़ी में उसने किसी को चारपाई लेकर सफ़र करते नहीं देखा था।तो किस तरह इस चारपाई को उठाकर ये लोग गाँव से यहाँ लाए होंगे इसे जानने के लिए  उसने पूछा -
-- “ पर बाऊजी आप इसने उठा के किस तरह लाए।"

रामस्वरूप की आँखे चमक उठी, इस चमक में साकार हो उठी वह यात्रा जिसमें वह चारपाई  जिसके चारों पाए निकाल कर बाँध दिए गए थे और जिसकी चारों बाईंयों को उसकी रस्सी समेत इस तरह समेटा गया था कि वह कम से कम जगह घेरे। पर इसके बावजूद ट्रेन में चढ़ने वाली हरेक सवारी उससे ठोकर खाती और रामस्वरूप और उनकी पत्नी की ओर हिकारत से देखती हुई ' कि ना जाने कहाँ - कहाँ से आ जाते हैं ' , आगे बढ़ जाती। और वो टी०टी० जो रामस्वरूप की भाषा में बिल्कुल गैल ( पीछे पड़ जाना) ही हो लिया था। उसे कैसे चकमा दिया गया , यह बताते - बताते रामस्वरूप की आँखों में हँसते- हँसते आँसू आ गए थे। इस उम्र में इतना हँसने से उनकी साँस फूलने लगती थी। बीच-बीच में वे अपनी उखड़ती साँस को भी सम्भालते जाते।  आज पिछले साल भर के बाद रामस्वरूप पहली बार इतना हँसे थे।  दोनों बच्चों के साथ विद्या वर्षों की दूरियाँ पार करके वहाँ जा पहुँची थी जहाँ से इस चारपाई की जीवन यात्रा शुरू होती थी। रामस्वरूप ने बताया कि उन्हें पत्नी का गौना कराने जाना ही था कि उससे कुछ दिन पहले उनके पिता ने किसी तकरार के बाद उन्हें न्यारा ( परिवार से अलग ) कर दिया पर बाँटे ( बँटवारे )में एक मटका अनाज तक नहीं दिया। नई नवेली दुल्हन को कहाँ बैठाऊँगा , क्या  खिलाऊँगा , यह सोच कर उनके हाथ पाँव फूल गए। कहीं से पाँच रुपये उधार लेकर  उन्होंने  थोड़े आटे , चावल और इस खाट का इन्तजाम किया।इसके साथ ही पति पत्नी ने अपनी गृहस्थी शुरू की। फिर इसी चारपाई पर उनके एक के बाद एक सात बच्चे  गरीबी और अज्ञान के चलते , आते रहे - जाते रहे।  केवल एक यह ओमप्रकाश ही बचा जिसने भी इसी चारपाई की बाई पकड़ कर चलना सीखा। विवेक ने हिसाब लगाया कि इस हिसाब से इस चारपाई की उम्र कोई साठ साल के करीब ठहरती है। अब वह खूब कस – कस कर पंगात को खींच रहा था। कुर्सी पर बैठे रामस्वरूप उसे मुग्ध भाव से देख रहे थे।   चारपाई में आया झोल भरने लगा था। वह फिर से बैठने लायक हो रही थी। चारपाई की उम्र का अंदाजा लगा कर विवेक ने कुछ सन्देह पूर्वक पूछा।-- “ दादाजी जब आपने यह चारपाई खरीदी....”   उसकी बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि रामस्वरूप ने बीच में ही टोका-- “ रै बेकूप खरीदी कोन्या सिरफ  रस्सी खरीदी थी। यो चारपाई तो अपना हाथा सै बणाई थी। विवेक और सुमन की आँखों में प्रश्नवाचक चिह्न देखकर उन्होंने  खुलासा किया। " खेत मैं दो किक्कर खड़े थे। कुल्हाड़ी से उसकी लकड़ी काटी और समारकै ( संवार कर ) पाए और बाई बणाई और फेर तेरी दादी और मैन्नै दोनुआँ ने यो रस्सियाँ सै बण (बुन ) दी।" रामस्वरूप के स्वर में गर्व और दर्प की द्वाभा सी तैर गई। उन्होंने पास खड़ी सुमन की पीठ पर धौल देकर कहा--” तैनै बेरा है तेरी दादी की उमर उस बखत कुल जमा पन्द्रहाँ साल थी और के चटाचट भाज भाज ( भाग – भाग कर ) के काम करा करती। और थम बाळक ,  पाणी गिलास भी ठाता थारे जोर पड़ै सै।" ( पानी गिलास उठाना भी तुम्हें भारी पड़ता है। )
-- “ फिर भी दादाजी तब से अब तक यह चारपाई टूटी नहीं ? " विवेक ने अपनी जिज्ञासा पुन: प्रकट की।
-- “ टूटती तो जब भाई जब हम टूटण दाँ... , जब जो बाई टूटती नई घाल ( डाल ) देता।या देख , उन्होंने चारपाई की एक बाई की ओर इशारा किया।, इस उरली ( इस तरफ़ वाली) बाई कै नीचे हमनै सरिया बाँध राख्या सै। कहते कहते रामस्वरूप यूँ जी उठे जैसे कल की ही तो बात हो और वे अपने हाथों को इस तरह देखने लगे कि उनके हाथों में लोहे की तार को खींच खींच बाँधने के निशान फिर से उभर आए हों। विवेक ने नीचे झुक कर उस बाई के नीचे बँधे तीन पतले सरियों को देखा जो लोहे की तार से इस तरह बँधे थे कि उपर से देखने पर पता ही नहीं चलता था कि यह चारपाई इतनी मजबूत है।
--” वाह दादाजी आप तो पढ़े नहीं अगर आप को मौका मिलता तो आप जरूर इंजीनियर होते।" विवेक ने उस बाई पर हाथ फिराते हुए कहा। विवेक इंजीनियरिंग  कर रहा था और अब अपने भीतर इंजीनियर बनने के पुश्तैनी गुण तलाश रहा था।विवेक की बात से रामस्वरूप की आँखों में एक तड़प सी उठी। अनपढ़ होने के कारण फैक्टरी में उनकी कभी कोई तरक्की नहीं हुई जबकि साहब लोगों का मानना था कि यदि एक कागज का टुकड़ा उनके पास भी होता तो रामस्वरूप भी किसी ठीक-ठाक ओहदे पर होता। इसके बावजूद उन्हेँ आज भी अपने उस निर्णय पर कोई अफ़सोस नहीं है जिसकी वजह से उन्हें अनपढ़ रहना पड़ा। हुआ यह  कि दस साल की उम्र में उनका दाखिला स्कूल में कराया गया तो उन्होंने सारी नीच जात के लड़कों के साथ संडास के साथ बैठना मञ्जूर नहीं किया। वे पहले ही दिन उस साळे मास्टर के माथे में पत्थर मार कर भाग आए।इसके बाद उन्होंने  गाय चराना मञ्जूर किया , पत्थर फोड़ना मञ्जूर किया पर पिता के लाख डराने -धमकाने के बावजूद स्कूल जाना मञ्जूर नहीं किया।
       
 यूँ गर्मियों के दिन थे और आठ बजते- बजते अन्धेरा दस्तक देने लगता था। चारों प्राणी उस समय इस देश और काल से परे अपना नया देश -काल गढ़ रहे थे कि उसी समय ओमप्रकाश ने अपने दो सहकर्मियों के साथ प्रवेश किया।नज़र सीधी चारपाई पर पड़ी॥ हल्के धुँधुलके का फायदा उठाकर वे दोनों आगन्तुकों को सीधे अन्दर कमरे में ले गए। पीछे- पीछे विद्या भी चाय पानी का इन्तजाम करने के लिए रसोई की ओर चली गई। उसने  भीतर जाकर चाय का पानी चढ़ाया ही था की पीछे से तीर की तरह एक बाक्य आया --
-- “ सही जुलुस निकाल रखा है।" 
-- “ आप भूल जाते हैं कि आप कल्चरल डिपार्टमेंट में हैं।"  इस मामले में विद्या उस दीवार की तरह थी जिस पर जितने वेग से बॉल फेंकी जाती वह उसी वेग से उसे लौटा देती। ओमप्रकाश उसके व्यंग्य को समझ गए थे।
-- “ तुम्हें तो कहीं लेक्चरर होना चाहिए  था। अच्छा भाषण दे लेती हो।
-- “ बन ही जाती अगर तुमने बीच में टाँग न अड़ाई होती।"
    ओमप्रकाश वास्तव में अन्दर से बड़े दुखी थे  और उन्हें आशा थी कि विद्या उनकी पीड़ा को जरूर समझेगी। पर उनका प्रयास ही सही नहीं था तो अंजाम तो बुरा होना ही था। इसलिए  अपनी बात को वे बाद में शान्ति के साथ समझाएंगे ऐसा सोच कर वे पुन: ड्राइंग रूम में आ गए।

 रात का सारा काम निपटाते- निपटाते साढ़े  दस बज गए थे। यह समय ओमप्रकाश और विद्या का था जिसमें दिन भर के थके पथिकों की भाँति वे एक दूसरे को सारे दिन का हाल-चाल सुनाते थे। कमरे में ए०सी० चल रहा था । थोड़ी देर बाद दोनों का दिल और दिमाग ठण्डक से भर गया। साथ के फ़ोल्डिंग पर सुमन सो रही थी। उसकी बस सुबह सात बजे तक आ जाती है।  अचानक से ओमप्रकाश को लगा कि आज बाऊजी के कमरे से कोई आवाज नहीं आ रही । अभी वे वहाँ से गुजर कर आए थे तो  वहाँ की छोटी बत्ती भी नहीं जल रही थी।विवेक अपने कमरे में था वहाँ की लाइट भी जल रही थी।  ए० सी० की आवाज के बावजूद पिताजी के कमरे में होने की आहट उन्हें मिलती रहती है। उन्होंने  विद्या से पूछा " क्या बात है पिताजी की कोई खाँसने तक की आवाज नहीं आ रही।"
-- “ कहीं बाहर ही तो नहीं सो गए।"  विद्या को अफ़सोस हुआ कि आज मेहमानों के चक्कर में वह बाऊजी को भूल ही गई।



-- क्यूँ , बाहर क्यों सो गए , बाहर तो बिना पंखे और मच्छरदानी के मच्छर जान खा जाएंगे।" उन्होंने जल्दी से उठकर अपने पैरों में चप्पल डाली। उनके दिमाग में अगले ही पल यह ख्याल आया कि आज वह चारपाई क्योंकि बाहर ही थी तो कहीं उसी पर तो वे नहीं सो गए। जब सुबह लोग उठेंगे तो क्या सोचेंगे । यही ना कि इतने बड़े घर में इस बूढ़े बाप के लिए कोई जगह नहीं। उनके दिमाग में गर्म पानी के बुलबुले उठने लगे। बाहर आकर देखा तो उसी टूटी चारपाई पर बैठे रामस्वरूप अपने कुर्ते से मच्छरों को उड़ा रहे हैं।चारों ओर घुप्प अन्धेरा है और कोई पत्ता तक नहीं खड़क रहा जैसे तूफ़ान के आने के पहले का सन्नाटा हो। ओमप्रकाश के दिल के किसी कौने में एक टीस सी हुई। ---
 -- “ क्या पिताजी आप अभी तक बाहर ही बैठे हैं , इतने मच्छरों में आप सो ही नहीं पाओगे।"
 
बाहर मच्छरों और गर्मी से रामस्वरूप भी परेशान थे। वे भी अन्दर जाना चाहते थे पर क्या करते चारपाई तो बाहर थी और उसे उठाना उनके बस में ना था। ओमप्रकाश ने बिना कुछ आगे पूछे , कहा --” आप अन्दर चलो मैं चारपाई  लेकर आता हूँ।" रामस्वरूप भी बिना कुछ कहे उठ खड़े हुए और अन्दर की ओर चले दिये। जब पिताजी की चारपाई उनके कमरे में लगाकर ओमप्रकाश वापिस अपने कमरे में आए तो उनके दिमाग में गर्म पानी के बुलबुले फिर से बनने और फुटने लगे।

-- “ पता नहीं क्या बताना चाहते हैं इस चारपाई से चिपटे रहकर।"
-- “ वे माँ को भूल नहीं पाते।" विद्या ने समझाने की गरज से कहा।
--” माँ तो कमरे में है।" ओमप्रकाश ने चिढ़ कर कहा। उन का इशारा उस बड़ी तस्वीर की ओर था जिसे उन्होंने माँ की मृत्यु के बाद पिताजी के लिए ही बनवाया और उन्हीं के कमरे में लगा दिया।
-- “ वो माँ की तस्वीर है , चारपाई में माँ खुद मौजूद है।" विद्या का आर्द्र स्वर जैसे ही बाहर आया घर के  बाहर जोर से बिजली चमकी और  खिड़की से इतनी रोशनी अन्दर फेंक गई की एक बार को घर के अन्दर का सारा अन्धेरा दूर हो गया। उसके बाद उस चमक का पीछा करती हुई बिजली की जोर दार कड़क सुनाई दी। शायद बारिश आने वाली है। इतनी उमस के बाद उसे आना ही था।

तस्वीरें गूगल से साभार 

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