होलिका जुड़वाती स्त्रियाँ

सुशील मानव


स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन तथा एक्टिविज्म. सम्पर्क: susheel.manav@gmail.com फोन- 0639349135
   
क्या आपको पता है कि एक इलाके में स्त्रियाँ होलिका जलाये जाने पर विलाप करती हैं. मर्दानी संस्कृति को धिक्कारती हैं. और मर्दाने जोश के साथ उसे जलाने वाले हर साल जलाते हैं, स्त्रियाँ हर साल विलाप करती हैं. सुशील मानव की ये कवितायें आपको स्त्रियों के इस धिक्कार और मर्दों के लम्पट उत्साह का दृश्य बुनती हैं. 
    
  (1)
आधी रात जमावड़ा लगाए पुरुषों ने फूँकी थी जहाँ होलई
और मनाते रहे उत्सव झाँझ-मजीरा-ढोल बजाते पूरी रात
वहाँ भोर भए छाती पीट विलाप रहीं स्त्रियां
मना रहीं हैं मातम गाँव भर की औरतें
जुड़वा रहीं होलिका कारन कर-करके

हाय! हाय! होलिका, हा! बहिनी हा! होलिका हो!
हाय! बहिनी फूँके तापे घेरकर तुमको हत्तियारे!
आग लगे इनके बल में यश में पौरुष में
आग में झोंके जैसे तुमको होलई बहिनी ये
जरि-बरि जाए ऐसे सत्ता इनकी, इनकर गुरूर

फिर दोनों आँखों और लोटे में भरे हुए जल
परिक्रमा कर करके जल गिराती होलई जुड़वाती हैं स्त्रियाँ
जुड़आ जुड़आ हे होलिका बहिनी जुड़आ
जुड़आ जुड़आ हे होलिका बहिनी जुड़आ
शिश्नित वजूद ढोतीं हम विक्षिप्त स्त्रियाँ
तुम्हें जुड़वातीं हैं, हे बहिनी जुड़ाओ
कि अकेली तुमहीं नहीं जली हे बहिनी होलिका
सदियों के दाहकाल में संग तुम्हारे जलती रहीं हम स्त्रियां भी
हमारी उम्मीद, हमारा संघर्ष सब-कुछ तो जला था संग तुम्हारे
कि उस रोज अकेली तुम नहीं जलाई गई थे घेरकर
राक्षसी करार करके इतिहास के ढूँठ पर टाँग दी गई
तुम्हारे प्रतिरोध के पराक्रम को सींचती
जुड़वातीं हम बहिनियाँ हे होलिका, हे बहिनी जुड़ाओं


फिर छल-बल से मात खाए योद्धा की भांति
अपने दुःख को गा-गाकर शरापती हैं स्त्रियाँ
हे होलई बहिन तुम्हरे दहन की ई ऊँची लपटें झौंसें झौंसे
झौंस दें उनका पुरुषापा आपा, हे होलई बहिनी जुड़आ
जलन की पीड़ा अथाह में झोंक दए तुम्हें जो बलबलाए पौरुष बल में
हे बहिनी भभाकर भंभाभूत हो जाए एक दिन वो पौरुष, पुरुष वे
जुड़आ जुड़आ हे होलिका बहिनी जुड़आ
विलाप रहीं हम स्त्रियाँ छतियाँ पीट जैसे
होइ जाए उच्छिन्न ऐसे एक दिन
एक दिन उनकी संस्कृति शिश्नोदरी, हे बहिनी जुड़आ

       (2)
फिर हुड़दंग मचाते पुरुषों के जोश पर उड़ेलते हुए पानी
होलई की परिक्रमा करती धिक्कारती हैं औरतें हाथ दिखा दिखाकर
धिक! धिक! धिक
हाय! धिक!  धिक!
धिक धिक ये उन्माद
धिक धिक ये मर्दोल्लास
परपीड़क आनंद के भोगी ओ अमानुषों धिक्कार
हत्या की बर्बरता का ज़श्न मनाते ओ दुष्टों, मुँहझौंसों धिक्कार
हर घर से माँग ले आए, घर घर से बटोर ले आए
एक स्त्री की हत्या में हर घर का अवदान है,
ये लकड़ी उपली कड़सा रँहठा,
सरसोंता झाँखर झलांसी चइला, उफ्फ़!
हरे भरे जवान पेड़ों को काट काट यूँ दाहते
कि ये धरती का दुःख विराट, और ताज़्जुब
नहीं शिक़न नहीं, दर्प लोटता तुम्हारे चेहरों पर
हरे हरे हमारे दुख सा
हरा चना हरी मटर हरी जई
उखाड़कर भूनते हुए होरहा
तुम अपनी बर्बरता का ज़श्न मना रहे हो
हरे हरे मन से हम मना रहीं मातम
वीरांगना बहिनी की हत्या का
होलिका बहिनी की हत्या का
       
(3)
हा! होलिका, हा! बहिनी करती स्त्रियाँ वापिस लौटती हैं घर
फिर घर से पोतनउरी लिए बाहर निकलती हैं स्त्रियाँ
उन्हें आता देख खुद को बचाते पराते हैं पुरुष
और छिड़कती हुई पिरोड़ी चँहटा
दूर तक पहँटती हैं स्त्रियाँ, गारी गाते हुए
जिसके भावार्थ कुछ यूँ कि
हे, देवताओं दुराचारियों
गिर जाए कटकर वो शिश्न
कमजोर नसों पर है जिसकी टिकी संस्कृति तुम्हारी
वृंदा की योनि को तलवार बनाकर अंधक की हत्या करने वाले

ओ दुराचारी, ओ हत्यारे
क्या तनिक भी न धिक्कारा तुझे
तेरी महान संस्कृति ने!
शिश्नोदरी संस्कृति ने!
याचक प्रेमी बनकर रानी कयादु की मन-साखों पर कूँकने वाले ओ धूर्त
क्या तनिक भी न लाज़ आई तुझे
कयादु की योनि पर अपनी संस्कृति का तंबू गाड़ते?
किसी कौए का घोंसला नहीं थी कयादु की कोख
जो तू छोड़ गया उसमें अपनी संस्कृति का वजूद
किसी नर कोयल की माफिक़ बड़ी मक्कारी से
ओ हत्यारे, ओ दुराचारी देवताओं
हमारी ही योनियों पर हो खड़े लड़े तुमने धर्मयुद्ध सारे
शिश्न ही तुम्हारा विष्णवास्त्र, शिश्न ही इंद्रास्त्र ब्रह्मास्त्र
जानती हैं हम स्त्रियां

रुको रुको ओ शिश्नोदरी के जनों रुको
कि तुम्हारी कायरता के बदले हम
मलने आईं हैं तुम्हारी मुखों पे अवीर
मुँह छुपाए भागते ओ कायरों रुको रुको
जैसे फोड़तीं हम पोतनउरी ऐसे
फूटे अंडाशय तुम्हारे ओ रुको रुको
और फिर पोतनउरी फोड़ वापिस लौटती हैं स्त्रियाँ।
नहाती हैं लट खोलकर।

तस्वीरें: साभार गूगल

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