बसंत के विदा होने से पहले

अमृता सिन्हा


स्वतंत्र लेखन, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित संपर्क: a.sinhamaxnewyorklife@ymail.com

बसंत के विदा होने से पहले 

सुनो
थोड़ी सी धूप
थोड़ी सी कोयल की कूक
थोड़ी उजास फूलों की
थोड़ा सा इत्र इश्क़ का
अँजुरी भर हसीन यादें
शर्मीले से एक बोसे का चिराग़
भेजा है मैंने
हवाओं के साथ
तितलियों की कोमल पंखों के साथ
फुदकती गिलहरियों के साथ
और
थोड़ा इस जाते हुए
बसंत के साथ
तुम
महसूस करना
आँखें मूँद कर
मन के हर कोने में
पाओगे पहरा, मेरी यादों का
मेरी मुस्कुराहटों का
क्योंकि ये दिन तुम्हारे नाम का है
ओ ! प्यारे बसंत मेरे !

अस्तित्व

तुम्हारा प्रेम उस आधार- कार्ड
की तरह है
जिसके बिना मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं
जिसे रखती हूँ मैं ख़ूब संभाल कर
किसी प्रेम-पत्र की तरह
हर पल इस क़दर
जैसे मेरा वजूद
सिमटा हो इस अदने से काग़ज़
के टुकड़े में ।
जैसे,
मेरी पूरी पहचान, मेरा परिचय
मेरे होने का सच ,,,, हो सिर्फ इतना ही
यह वही काग़ज़ का टुकड़ा है
जो दिखाता है समय समय पर
हमें हमारी औक़ात
कि इसका छूट जाना , गुम हो जाना
कितना ख़तरनाक हो सकता है
यह उस प्रसूता से पूछो
जिसकी इच्छाओं पर ताला जड़ गया था
और उम्मीदें संदूकों में दम तोड़ रही थीं
जिसका प्रसव इस आधार - कार्ड के
आगे छोटा पड़ गया था
सचमुच ,आधार-कार्ड के जेब में ना होने
का अहसास भी
कितना भयावह है,
ठीक उसी तरह ,जैसे
भूलने की सोचना तुम्हें
आज के बदलते परिवेश में
इसकी उपस्थिति उतनी ही प्रासंगिक है
जितना कि
सपने देखने से
सपने उगने तक
आवश्यक है
आँखों से झरे आँसू में बरक़रार रहे
नमक का स्वाद ।

सपनों के उगने तक

सुबह हो रही थी
पर बिटिया
अब तक सो रही थी
स्कूल जाना था उसे
सो ज़ोर से झिंझोड़कर
जगाया
तकिये में मुँह छुपाते हुए
कहा उसने
सोने दो न माँ
अभी देख रही हूँ सपने
सपना पूरा होनेतक
सोना चाहती हूँ मैं ।
मैं किंकर्तव्यविमूढ़
खड़ी रही
कुछ देर
बिटिया के सपने में
ख़लल नहीं बनना चाहती थी
सो देखने दिया उसे सपना
एक दिन जागती आँखों से
भी ज़रूर देखेगी सपने
इसी उम्मीद के साथ
दिया उसे सपनों की सौग़ात ।
क्योंकि
उसका हर सपना पूरा हो
यही तो मेरा भी सपना है ।


फ़ितरत इंसानों की         

परिंदे भयभीत थे
वे चीख़ रहे थे समवेत स्वरों में
भाग रहे थे इन्सानों से
उनका चौकन्ना रहना जायज़ था
क्योंकि वे जानते थे फ़ितरत इन्सानों कीं
उनको डर था
उन बहेलियों से जो न जाने
कब से ताक़ लगाये बैठे थे
जाल बिछाये पेड़ों के पीछे
पंखों के दुश्मन हैं ये
बाज़ नहीं आते पंख कतरने से
उनकी वहशियाना हरकतें
तो तब भी बेपर्दा होती हैं जब
जब बिना पंखों वाली चिड़िया
आज़ाद की जाती है और वे भागती हैं
सरसराती हुई, निकाली जाती हैं ज़बरन
कभी
मंदिरों के तहख़ाने से
कभी मस्जिद से सटे गंधाते कमरों से
कभी पाकिस्तान की बख्तरबंद  गाड़ियों में मिलती हैं ठूँसी हुई
कभी निकाली जाती हैं अफ़ग़ानिस्तान में सफ़ेदपोश
घरों के अंडरग्राउंड कमरों से
कभी भेजी जाती हैं इराक़
कभी साऊदी अरब
होती हैं ये शिकार कबूतर बाज़ों की
कुछ ही नसीबों वाली होती हैं
जिनकी होती है रिहाई
उन मासूमों की चीख़ें
दहशत से भरी, ख़रगोश सी सहमी
ख़ामोश हो जाती हैं
और
उनकी मौन चीख़े
नहीं पहुँच पाती
देश के किसी कोने में
यहाँ तक कि
संसद के अतिसुरक्षित
बंद ,वातानुकूलित कमरों तक भी नहीं
जहाँ सियासतदां
मसरूफ होते हैं
अपने मुख़्तसर
अट्टाहासों में, अनर्गल बहसों में
और
ग़ैरज़रूरी कहकहों में ।

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