सजर्नर ट्रुथ : क्या पश्चिम की इस सावित्रीबाई को आप जानते हैं?

 प्रेमकुमार मणि
 प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं. संपर्क : manipk25@gmail.com

प्रेमकुमार मणि

भारतीय उपमहाद्वीप के समाज में जात-पात की अवस्थिति के कारण कुछ लोगों को लगता है कि गैरबराबरी और शोषण की जटिलताएं केवल हमारे यहां है और बाकि दुनिया में केवल अमीरी -गरीबी का भेद है . ऐसा वही लोग कहते हैं ,जिन्होंने दुनिया के सामाजिक इतिहास को नहीं जाना है ,या कम जाना है . गैरबराबरी की जटिलताएं दुनिया भर में अपने -अपने तरीके से रही हैं .शोषण भी कई जगह बहशी ढंग के रहे हैं . दुनिया भर के उत्पीड़ित इंसानों ने अपने -अपने तरीके से ; बराबरी और मानवता की स्थापना केलिए अपने -अपने समाजों में संघर्ष किये हैं . इनके ब्योरे दिलचस्प और शिक्षाप्रद हैं .

आज हम संयुक्त राज्य अमेरिका की उस महिला के बारे में बात करना चाहेंगे जिन्हे Sojourner Truth के नाम से जाना गया ; - जिसने रंगभेद के खिलाफ और महिलाओं की आज़ादी केलिए उन्नीसवीं सदी में यादगार संघर्ष किया . उनके संघर्ष हमे आज भी उत्साहित करते हैं . सोजॉर्नर ट्रुथ का पूर्व नाम Isabella Van Wagener था , अपने उम्र के अट्ठाईसवें साल में उन ने अपना नामान्तर किया . दरअसल यह भी उनका एक विद्रोह ही था .
Isabella का जन्म 1797 में न्यूयोर्क के अल्स्टर काउंटी में एक गुलामं परिवार में हुआ . माँ का नाम एलिज़ाबेथ था -जिन्हे लोग माउ-माउ बेट के नाम से पुकारते थे . पिता का नाम था जेम्स बौम्फ्री . माता -पिता उन्हें प्यार करते थे ,लेकिन गुलामों का बचपन क्या हो सकता था . बाद में अपने उदासी भरे बचपन का ब्यौरा त्रुथ ने बेबाकी के साथ अपनी आत्मकथा में व्यक्त किया है .



अमेरिका में गुलामी का विचित्र इतिहास रहा है . पुराना अमेरिका वहां के आदिवासियों का था . समुद्री रास्तों की खोज का जनून जब यूरोप में गहराया ;तब नए -नए देशों और द्वीपों की तलाश होने लगी . पंद्रहवी सदी के आखिर में कोलम्बस ने भारत की खोज करते -करते अमेरिका की खोज कर ली थी . जिस हिस्से में वह पहुंचा था उसे आज भी वेस्ट इंडीज (पश्चिम का भारत ) कहते हैं . यूरोपियनों के वहां पहुँचते ही आदिवासियों के दुर्दिन की शुरुआत हो गयी . हमारे देश में भी यह हुआ . लेकिन वहां जो हुआ वह अवर्णनीय है . जो विवरण लेखन के माध्यम से उपलब्ध है वे रोंगटे खड़े करने वाले हैं .

गुलाम प्रथा का केंद्र न्यूयार्क  था . यह न्यूयार्क  पहले न्यू एमस्टर्डम कहा जाता था . 1664 में इंग्लैंड ने डचों से इसे छीन लिया और इसका नाम न्यूयार्क कर दिया . अंग्रेजों ने यहां अपने उपनिवेश बनाने शुरू किये . वे अफ्रीका से काले नीग्रो लोगों को जहाज में भर -भर कर लाते और जानवरों की तरह नीलामी लगाते . जो लोग इन्हे खरीदते उनके ये गुलाम या दास होते थे . इसे ही गुलामगिरी या दासप्रथा कहा जाता है . 1720 ई. तक न्यूयार्क की कुल इकतीस हज़ार की आबादी में चार हज़ार दास थे . इनकी सामाजिक स्थिति भारत के दलितों से भी बदतर थी . जानवरों की तरह इनकी खरीद -बिक्री होती और इसके लिए मंडियां लगती . नीलामी की बोलियां लगती ,जिनमे पुरुषों की शारीरिक ताकत और स्त्रियों की ताकत के साथ उनकी प्रजनन क्षमता का हवाला दिया जाता . स्त्री के होने पर अधिक कीमत मिलती ,जैसे बैल के मुकाबले गाय की कीमत अधिक होती है .यह इसलिए कि गुलाम औरतों से हुए बच्चों पर मालिकाना हक इनके मालिक का होता था . ये मालिक इन बच्चों को बेच कर धन कमाते थे . इन गुलामों को कोई नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं थे .

अन्य गुलामों की तरह इसाबेल्ला को भी बचपन में ही इनके मालिक ने बेच दिया . वह माँ -पिता से दूर हो गई . यही गुलामी का रिवाज़ था . जब वह तेरह साल की हुई ,तब उसे एक दूसरे मालिक ने खरीद लिया . इस नए मालिक का नाम था जॉन डूमोंट . यह मालिक पहले वाले की अपेक्षा उदार था .इसके साथ इसाबेल्ला सत्रह साल रहीं . जॉन डूमोंट ने जिस दिन इसाबेल्ला को ख़रीदा ,उस ने अपनी डायरी में लिखा -" She was about thirteen , but stands nearly six feet tall " मनुष्य के मापने का तब यही रिवाज़ था .

ट्रुथ 


इसाबेल्ला बचपन से जुझारू थीं .अन्याय का संभव विरोध वह करतीं . एक गुलाम साथी थॉमस ,जिसे वह टॉम कहती थीं ,से उन्होंने एक जद्दोजहद के उपरांत विवाह किया और पांच बच्चों की माँ बनीं . जैसा की गुलामी का दस्तूर था , सभी बच्चे बचपन में ही बेच दिए गए . लेकिन जितना संभव हुआ , इसाबेल्ला ने उन्हें पढ़ाया था .

अट्ठाइस साल की उम्र में इसाबेल्ला ने अपना नाम बदलकर सोजॉर्नर ट्रुथ कर लिया ,क्योंकि वह गुलामी के नाम से मुक्ति चाहती थीं . इस बीच अमेरिका में सामाजिक क्रांति धीरे धीरे ही सही ,लेकिन हो रही थी . बुद्धिजीवियों का ध्यान इस अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के खात्मे पर था ,लेकिन यथास्थिवादी लोग , जैसे कि हमारे भारत में भी ताकतवर हैं , वहां भी थे और वे परिवर्तन के विरोधी थे . 4 जुलाई 1776 को अमेरिका आज़ाद हुआ और वहां डेमोक्रेसी स्थापित हुई .लेकिन डेमोक्रेसी तो बहुमत का होता है और कम संख्या वाले लोगों का शोषण होने की सम्भावना यहां ज्यादा हो जाती है; यदि इसपर नैतिकता या वैचारिकता की नकेल न हो . 1799 में वहां एक कानून बना कि 4 जुलाई 1799 के बाद जन्मे हुए गुलाम बच्चे पच्चीस (मर्द ) और अट्ठाइस (स्त्री ) की उम्र में गुलामी से मुक्त हो जायेंगे . इस कानून के पास होते वक्त Truth केवल दो साल की थी . उन्हें इसका लाभ नहीं मिलने वाला था . बाद में , 1817 में 1799 के पूर्व जन्मे बच्चों पर भी यह कानून लागू हुआ और इसके अनुसार अपने अट्ठाईसवें साल में वह गुलामी से मुक्त हुईं .

गुलामी से मुक्त होते ही सोजॉर्नर त्रुथ सक्रिय हो गईं . वह न तो पढ़ना जानती थीं ,न लिखना . लेकिन उनकी चेतना जाग्रत थी . वह मनुष्य की गरिमा को समझती थीं . ईसाइयत में उनकी आस्था थी और वह कहती थीं कि ईश्वर की नज़र में सब बराबर हैं . जैसे भारत में भक्तिकाल के कवियों ने राम या हरि के नाम लेकर ब्राह्मणशाही पर जोरदार हमला किया था और बराबरी का शंखनाद किया था ; वैसे ही सोजॉर्नर ट्रुथ  ने गोरे वर्चस्ववाद के खिलाफ हल्ला बोल दिया . यह अमेरिकी वर्चस्ववाद भारतीय वर्चस्ववाद से कहीं अधिक क्रूर और अमानवीय था .Truth ने पहले स्वयं को तैयार किया ,अपने परिवार को व्यवस्थित किया और फिर सामाजिक क्रांति केलिए कूद गईं . गुलाम बस्तियों में वह दौरा करने लगीं . वह लोगों से बातें करतीं और विश्वास दिलातीं कि ईश्वर उनके साथ है .उनकी नज़र में काले -गोरे सब बराबर हैं . यह गैर बराबरी चाहे वह काळा -गोरा का हो या मर्द -औरत का ;शैतानों की कारस्तानी है . वह पढ़ना -लिखना बिलकुल नहीं जानती थी ,लेकिन अपनी आध्यात्मिकता के आधार पर वह लोगों से कहतीं कि ईश्वर से उनकी बातें होती हैं . लोग उन्हें ध्यान से सुनते थे .उन्हें सुनने केलिए भीड़ जुटने लगी और वह दूर -दूर जाने लगीं .पूरे अमेरिका के गुलामों को उन्होंने शोषण के खिलाफ जाग्रत किया . सम्मान से लोग उन्हें आंटी त्रुथ कहने लगे .



1850 में ओलिव गिल्बर्ट के साथ मिलकर उन्होंने अपने जीवन की कहानी लिखवाई - Narrative of Sojourner Truth . जब किताब छपी तब खूब बिकी . इसकी आमदनी से त्रुथ ने बेंटले क्रिक में घर बनवाया और जमीन का टुकड़ा ख़रीदा . जब अमेरिका में दासप्रथा की समाप्ति के सवाल पर गृहयुद्ध हुआ ,तब उन्होंने उस में बढ़ -चढ़ कर हिस्सा लिया .वह गुलाम बस्तियों में घूम घूम कर लोगों को जाग्रत करती रहीं . 1864 में वह अब्राहम लिंकन से मिलीं और उन्हें अपना समर्थन दिया . लिंकन ट्रुथ का बहुत सम्मान करते थे और उन्हें आंटी कहते थे . जैसा कि सब जानते हैं गुलामी की प्रथा दूर करने के फैसले के के कारण लिंकन को 1865 में गोली मार दी गई थी .

26 नवम्बर 1883 को 86 साल की उम्र में ट्रुथ का निधन मिचिगन के बैटल क्रीक में हुआ .

किसी की तुलना दूसरे से ठीक -ठीक तो नहीं हो सकती ,लेकिन भारतीय सन्दर्भ में सावित्री बाई फुले को हम उनके साथ रख सकते हैं . निसंदेह ट्रुथ का काम और संघर्ष कठिन था ,लेकिन उनकी ही तरह विपरीत स्थितियों में सावित्रीबाई ने भी स्त्रियों और शूद्रों की मुक्ति केलिए संघर्ष किया . जोतिबा फुले ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'गुलामगिरी ' उन अमेरिकी लोगों को समर्पित किया है , जिन्होंने दासप्रथा के खिलाफ संघर्ष किया है . निश्चय ही टूथ  उसमे शामिल हैं . यह किताब 1873 में लिखी गई है . ट्रुथ  तब जीवित थीं . यह दो देशों के संघर्ष के आत्मीय सूत्र हैं .

तस्वीरें गूगल से साभार

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