‘एक था गुल…’अलविदा शशि कपूर


स्वरांगी साने 

अचानक वाट्स एप्प पर संदेश आता है..न्यूज चैनल्स पर फ्लैश होने लगता है..फिर स्क्रोल चलने लगता है, शशि कपूर नहीं रहे…

पहली प्रतिक्रिया तो यही आती है- अरे, और उसके बाद हर जगह चाहे फेसबुक हो या वाट्सएप्प…नमन,श्रद्धांजलि और आरआईपी घूमने लगते हैं…इन सबकी परवाह किए बिना एक अभिनेता चुपचाप जा चुका होता है..

पिछले कितने ही सालों से वे डायलिसिस पर थे, एकाकी जीवन जी रहे थे…और कल जब अमूमन सबकी दोपहर की चाय का समय था, वे चले गए…


शशि कपूर का जाना…हमारी पीढ़ी के लिए क्या मायने रखता है, वे हमारी पीढ़ी के हीरो नहीं थे, जबकि सत्तर और अस्सी के दशक में जब हममें से कई लोग जन्मे या अपने बचपन को जी रहे थे वे तब बड़े परदे के हीरो थे…तब बड़ा परदा, बड़ा ही होता था, घरों में टीवी नहीं थे, टॉकिजों में जाकर फिल्में देखी जाती थी या किसी त्योहार,मेले-मौके पर किसी मैदान में बड़ा सफेद पर्दा लगाकर सबके लिए पिक्चर दिखाने का आयोजन होता था। तब पिक्चर देखना इतना कैजुअल नहीं था, कि जब मन हुआ चल दिए…बल्कि एक आयोजन ही होता था..और उस आयोजन की याद से जुड़े थे शशि कपूर…

बड़े भारी-भारी संवाद और उनके अर्थ समझ पाने की उम्र नहीं थी लेकिन ‘मेरे पास माँ है…’ का रुतबा तब भी बहुत ‘भारी’ लगता था, ऐसा लगता था जैसे सच में हम कितने अमीर है।

अपने बचपन के दौर में वह नायक था वह अल्हड़ सा शशि कपूर, गालों के गड्ढे और मासूम हँसी, और गीत.. ‘एक था गुल…’


तब हम जो बच्चे थे, वो किसी गीतकार आनंद बक्शी को नहीं जानते थे, हमें तो लगता था शशि कपूर सुना रहा है, मतलब उसी की कहानी होगी…और आज वह गीत जब हकीकत में बदल गया, शशि कपूर खुद अतीत हो गए तो पूरा दौर याद हो आया एक ही गीत के साथ कि ‘एक था गुल…’

कुछ बड़े हो जाने पर जाना कि अभिनेताओं के उस दौर में अपनी पहचान बना पाना शशि कपूर के लिए कितना कठिन रहा होगा… पृथ्वीराज कपूर के घर पर जन्म लेना और राज कपूर, शम्मी कपूर जैसे दोनों बड़े भाइयों के ऊँचे फिल्मी कद के साथ खुद को बैठा पाना उतना भी आसान नहीं रहा होगा। वर्ष 2011 में भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया तो एक बार फिर इस अभिनेता का बहुआयामी जीवन रेखांकित हो गया। कुछ सालों बाद ही वर्ष 2015 में उन्हें वर्ष 2014 का दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिला।


केवल चॉकलेटी हीरो यह उनकी पहचान नहीं थी, सत्तर के दशक में उनके जैसा कोई व्यस्त कलाकार नहीं था। उन्होंने हर भूमिका के साथ न्याय किया, भूमिका चाहे हीरो की हो, बाल कलाकार की, सह कलाकार की या निर्माता-निर्देशक की, उन्होंने ब्रितानी फिल्मों में काम किया किसी ब्रिटिश की तरह, उन्होंने गैर परंपरागत फिल्मों में काम किया किसी समांनतर फिल्मों के अभिनेता की तरह, थियेटर के लिए खड़े हुए रंगकर्मी की तरह…भूमिकाएँ जो भी हो, उन्होंने दिलों-जान से निभाई…केवल 20 साल की उम्र में ब्रिटिश अभिनेत्री जेनिफर से शादी हो या संजना, करण, कुणाल के पिता की या रणधीर-ऋषि कपूर के चाचा या करिश्मा-करीना के दादा की… या अपने पिता के पृथ्वी थियेटर को नव संजीवनी देने की..उनका जीवन ‘आग (1948)’ से शुरू हुआ था, जिसकी ज्वाला ताउम्र उनके भीतर धधकती रही..1965 के बाद भी ‘जब-जब फूल खिले’ तब-तब उन्हें याद किया जाता रहेगा..अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा के मंच पर वे ‘सिद्धार्थ (1972)’थे,..वे एक ‘विजेता’ थे, जिसने इस ‘शान’ से जीवन जीया था, कि उनका जीवन ‘जुनून’ भी था और ‘उत्सव’ भी…लेकिन ‘कभी-कभी’ ही ऐसे लोग हुआ करते हैं…

जन्म- 18 मार्च 1938
मृत्यु – 04 दिसंबर 2017

परिचय :-वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और अनुवादक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित. 
संपर्क :-swaraangisane@gmail.com

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