उसने पद्मावतियों को सती/जौहर होते देखा है ..


विलियम डैलरिम्पल/अनिता आनंद 


सती/ जौहर के फिल्मांकन से एक पक्ष अपना अर्थ-व्यापार कर रहा है तो दूसरा पक्ष उससे अपने जाति गौरव को जोड़कर राजनीति-व्यापार. इस खेल में क़ानून दाँव पर है और स्त्री के हक़ में लड़ाइयों का हासिल भी दाँव पर. इस द्विपक्षीय हुतूतू खेल के बीच क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब पद्मवतियाँ सती/जौहर होती थीं, जब उनके साथ उनकी दासियाँ भी जला दी जाती थीं तब आसमान में करूण आर्तनाद की गूँज से धरती-आकाश की करुणा विदीर्ण हो जाती होगी. और यह सब होता रहा है रतनों/ रणजीतों की सामंती ऐय्याशियों को सांस्कृतिक आवरण देने के लिए. पद्मावती के लिए हो-हल्ला करते हुए जब थक गये हों तो राणा रणजीत सिंह और उनके वशंजों की मौत के बाद के उस करूण दृश्य को देखें, जो सामंतों की शान से बनी राख की ढेर और धुल से पैदा होता रहा है.... 

राख का शहर 18 जून 1839

तीन दिन और तीन रातों तक महाराजा की चिता की आग जलती रही। महल के बाग समेत पूरा परिसर चिता में जल रही चंदन की लकड़ी और महाराजा के पार्थिव शरीर की महक से भरा हुआ था। वैसे तो महाराजाओं की ज़िंदगी की तरह उनके अंतिम संस्कार किसी भी मायने में कमतर नहीं होते। पर भारतीयों ने खुद माना कि एक शेर की विदाई इसी तरह होनी चाहिए।

महाराजा के अंतिम संस्कार में हुए असंख्य रीति-रिवाजों का सबसे अच्छा विवरण एक यूरोपीय ने किया है जो लाहौर दरबार में कार्यरत था। आॅस्ट्रिया-हंगरी का मूल निवासी जान मार्टिन होनिगबर्गन एक होमियोपैथी का डाॅक्टर होने के साथ ही एक यात्री था जो दस साल पहले रणजीत सिंह के दरबार में पहुंचा था। रणजीत सिंह उससे इतने प्रभावित हुए कि उसे वापस नहीं जाने दिया और अपने दरबार में जगह दे दी।


महाराजा के दरबारी में बतौर बड़े ओहदेदार उस पर एक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी थी, उसे यह सुनिश्चित करना था कि चिता की आग ठंडी होने पर अस्थि विसर्जन के लिए चिता की राख को इकट्ठा कराया जाए। उसके मुताबिक जो उसने देखा वह यह था कि कुछ डोम या महाब्राह्मण जैसे लोग, जिनकी त्वचा सूरज में रहने की वजह से पूरी तरह झुलस चुकी है, राख इकट्ठी कर उसमें से अस्थियां जमा कर रहे थे। किसी समय दुश्मनों के लिए दहशत और दुनिया को अपने वैभव और भव्यता से दंग कर देने वाला उनका मरीज महाराजा रणजीत सिंह अब राख और अस्थियों में तब्दील हो चुका था। वह भी उसकी नज़रों के सामने।

तीन दिन पहले जब महाराजा का अंतिम संस्कार शुरू हुआ था तो लाहौर किले को बाहरी दीवार और महल के बीच की जगह में उनकी चिता सजाई गई थी। उस दिन लग रहा था कि सारा का सारा पंजाब अपनी राजधानी में उमड़ रहा है। वेदना में डूबे हुए लोगों का एक सागर था और होनिगबर्गर के कान के पर्दे वहां होने वाले शोर से गूंज रहे थे।

होनिगबर्गर को अपनी गर्दनें ताने हुए खड़ी भीड़ में किसी रास्ता दिलाकर उनकी जगह तक पहुंचाया गया। उनके आसपास सिख सरदारों के सामंत सफेद कपड़ों में, नंगे पैर मौजूद थे। वहां पर उस दिन महाराजा के दरबार के सबसे बड़े सिख सामंतों, दरबार के मंत्रियों, अधिकारी और महाराजा के वजीरों के सिवाय हर वह शख्स मौजूद था जिसे वहां होना चाहिए था। दरअसल इन उच्चपदस्थ सिख दरबारियों को एक खास सम्मान मिला था। वे अपने महाराजा की अंतिम यात्रा को लेकर द्रवित थे पर उनका सहचर बनने के सम्मान से गौरवान्वित भी थे। होनिगबर्गर वहीं इंतजार करते रहे, उनका इंतजार खत्म हुआ जब उन्होंने दूर से अंतिम यात्रा को आते देखा। चौथाई मील लंबी  इस यात्रा के दोनों तरफ बंदूकधारी सैनिक मौजूद थे। अंतिम यात्रा करीब करीब जनमानस के सागर को दो भागों में चीरती हुई दूर से आती दिख रही थी। इसी रेखा के बीचोबीच महाराजा रणजीत सिंह का पार्थिव शरीर दिख रहा था। एक सोने के मंच पर रखा हुआ यह शरीर मानों एक सोने के पाल वाले जहाज़ की तरह दिख रहा था।1 दरअसल इसे जहाज कहना उस समय सबसे उपयुक्त लग भी रहा था। क्योंकि वह रोती बिलखती महाराजा की प्रजा के अपार जनसमुद्र के बीच से आता हुआ जो दिख रहा था। अंतिम यात्रा में संगीतकारों की धुनें इस करुण रुदन को और कातर बना रही थी।

महाराजा के पार्थिव शरीर के पास ही होनिगबर्गन की नज़र एक महिला की तरफ पड़ गई। वह रानी महताब देवी थीं जिन्हें महाराजा प्यार से गुड्डन बुलाते थे। वे सोने की एक पालकीनुमा कुर्सी पर बैठी थीं जिसे पसीने में लथपथ कहारों ने ऊपर उठा रखा था। उनके पीदे तीन और रानियां इस तरह की कुर्सियों पर सवार थीं।2 उसने सभी रानियों को देखा पर उसकी निगाह सिर्फ रानी गुड्डन पर ही टिकी रही। इसकी वजह भी थी। दरअसल वह और रानी पहली बार लाहौर समान वर्ष में आए थे। उस समय वह एक युवा डाॅक्टर और यात्री था जिसे शोहरत कमाने की भूख थी वहीं गुड्डन एक राजपूत राजकुमारी थीं। उनके साथ ही उनकी बहन रानी राज बंसो का विवाह भी महाराजा से ही कर दिया था।


रानी गुड्डन को देखकर होनिगबर्गर को अनायास ही उनके विवाह का दिन याद आ गया, जब वह शादी  के समारोह में दाखिल हो पाने में कामयाब रहा था। उसे यह भी याद आया कि रानी की बेपनाह खूबसूरती के चर्चे थे, जिनकी पुष्टि वह कर पाने में अक्षम था। शादी के दिन रानी घूंघट में थीं और उसके बाद से वो घूंघट में ही रही थीं। अब जाकर, दस बरसों के बाद, उनकी मौत के दिन वो सार्वजनिक रूप से उनका चेहरा देख पा रहा था। होनिगबर्गर ने देखा कि वे अभी भी खूबसूरत थीं।जैसे-जैसे गुड्डन और उनके साथ की तीन रानियां चिता के पास आती जा रही थीं वे अपने कंगन उतार कर उस भीड़ में फेंक रही थी जहां से हज़ारों हाथ उन कंगनों को प्रसार समझ कर लेने को आतुर थे।

सिख दरबार में उनके सहयोगियों ने होनिगबर्गर को बताया कि ये रानियां (महाराजा की 17 में से चार) स्वेच्छा से सदियों पुरानी परंपरा का हिस्से बनने वाली हैं। इसके बावजूद जो कुछ सामने आया, उसने उसे वितृष्णा से भर दिया। अपने पति के प्रति उसके जीवन और उसके बाद भी समर्पित ये औरतें सती थीं और उनकी सार्वजनिक आत्महत्या-या हत्या, जो आपके नजरिये पर निर्भर करता है-को चारों ओर सराहा जा रहा था। शाही इतिहासकार सोहनलाल, जिनका काम महाराजा के दरबार में हो रही घटनाओं को दर्ज करना था, ने आगे चल कर लिखा कि रानियां अपनी चिता के लिए तैयार होते समय ‘नशे में डूबी हाथियों की तरह नाचती और हंसती हुई’ प्रसन्नचित थीं।

वैसे होनिगबर्गर को सोहनलाल सूरी द्वारा वर्णित प्रसन्नता का कोई भी भाव उन अभागी औरतों के चेहरे पर नहीं दिखा। रानियों की गोद में महाराजा का सिर रखा गया, मानो वह सो रहे हों, रानियां बाकायदा उनके पार्थिव शरीर के आसपास सलीके से बैठी हुई थीं और उन्होंने अपनी आंखें बंद कर रखी थीं। उन्होंने युवराज खड़क सिंह को भले ही न देखा हो पर आग लिए हुए चिता को अग्नि देने आ रहे युवराज की मौजूदगी का अहसास उन्हें ज़रूर हुआ होगा। होनिगबर्गर यह तो सुन और समझ नहीं पास कि चिता में आग लगते ही क्या सती हो रही रानियों में से कोई चीखा। उन सबको जैसे ही चिता की आग ने अपनी आगोश में लिया तो ढोल नगाड़े और वहां मौजूद जनसमुद्र की गर्जना ने होनिगबर्गर के होश उड़ा दिए। सिर्फ होनिगबर्गर ही अकेला नहीं था जिस पर वहां का घटनाक्रम हावी हो रहा था। एक जोड़ी कबूतरों ने भी महाराजा की चिता में छलांग लगा दी। इस घटना ने तो जैसे पूरे जनसमूह को आह्लादित कर दिया। कहा गया कि इन्सान तो इंसान पशु पक्षी भी महाराजा रणजीत सिंह के लिए सती होना चाहते थे।

चिता की आग ठंडी होने में पूरे दो दिन और दो रातें लगीं। इस दौरान होनिगबर्गर अगले बीस घंटों तक चिता पर अपनी निगाहें गड़ाकर रखने को बाध्य था। दरबार के हर वरिष्ठ सदस्य से अपेक्षा थी कि वो अस्थियां प्रवाहित होने तक वहीं रहेगा। जब चिता की आग इतनी ठंडी हो गई कि उनमें गट्ठे पड़ी हुई उंगलियां काम कर सकें तो डोम लोगों ने, जो लाशों का प्रबंध करने वाली एक जाति है, अपना काम शुरू कर दिया। वे यह कैसे जानते थे कि कहां महाराजा की अस्थियां खत्म हुईं और रानियों की शुरू हुईं, यह एक राज ही था। सदियों से आम लोग और राजा-महाराजा डोमों की माहिर उंगलियों के बीच से गुज़रते रहे थे और उनके तौर-तरीकों पर आज तक कभी उंगली नहीं उठी। डोम अस्थियों को राजा और चार रानियों के पांच ढेरों में अलग-अलग कर रहे थे, लेकिन जब यह हो रहां था तो कोई भी उन सात गुलाम लड़कियों की अस्थियों की परवाह करता हुआ नहीं दिख रहा था जो उस स्याह राख में मिल गई थीं, रानियों की तरह वे भी अपने राजा के साथ जल कर मर गई थीं। लेकिन रानियों से उलट चिता तक उन्हें अपने पैरों पर चल कर आना था।


होनिगबर्गर के मन मस्तिष्क में ताउम्र उन सात लड़कियों का चेहरा दर्ज हो गया। वह भूल ही नहीं पा रहा था कि किस तरह से महाराजा की सात दासियां पालथी मारकर बैठी थीं उनके सिर पर तेल से पूरी तरह भीगी सरकंडे की चटाई रखी गई और फिर वो सती हो गईं। इन सात दासियों के बारे में कोई बात नहीं कर रहा था, उनका मातम कोई नहीं मना रहा था। यहां तक कि होनिगबर्गर के पता लगाने के बाद भी उनका नाम तक पता नहीं चल पाया। इस ‘घृणित समारोह’ को देखने के बाद होनिगबर्गर उनके लिए दयाभाव और लोगों के लिए घृणा से भर गया। बाद में जब होनिगबर्गर से पूछा गया कि वह इस समारोह के पहले ही पंजाब छोड़कर क्यों नहीं चला गया तो होनिगबर्गर ने अपने मित्र और महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में उनके सहयोगी यूरोपीय जनरल ज्यां-फ्रांसुआ अलार्ड के शब्दों को उद्धत किया, ‘यहां पर आना बहुत मुश्किल है पर जाना उससे भी ज़्यादा मुश्किल है।’

दस साल पहले 1829 में होनिगबर्गर 34 साल का ऐसा युवक था जो एक उपनिवेशी आॅस्ट्रिया से मजबूत इरादों और उम्मीदों के साथ मेडिकल की पढ़ाई कर बाहर निकला था। उसके पास अपने पेशे के लिए ऐसे विचार थे जो उस समय के खांचे में फिट नहीं बैठते थे। एक घुमंतू युवक के तौर पर वह लाहौर पहुंचा जिसके पास दवाइयों का एक बक्सा और अनुशंसा का पत्र था। उसके इरादे बहुत ऊंचे थे, पर उसकी तरक्की की उड़ान को पंख नहीं मिल पा रहे थे। महाराजा रणजीत सिंह ने अपने आसपास ‘गोरे’ को डाॅक्टर रखने से इन्कार कर दिया था। लिहाजा उसे दरबार के छोटे अधिकारियों का ही इलाज करना पड़ रहा था। जब बहुत से लोगों का उसने सफल इलाज कर दिया तो उसे महल में तलब किया गया। होनिगबर्गर को यह उम्मीद तो कभी नहीं थी कि महल में उसके पहले शाही मरीज खुद महाराजा होंगे पर उसे यह उम्मीद तो कम से कम थी कि महल में उसका मरीज कोई इंसान होगा। उसका पहला मरीज एक बहुत ऊंचा घोड़ा था जिसे देखकर चिकित्सक के तौर पर वह बहुत आश्चर्य में था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। यह घोड़ा महाराजा को इंग्लैंड के राजा किंग जाॅर्ज चतुर्थ ने दोस्ती के बतौर उपहार दिया था। शाही अस्तबल में रहने के बावजूद इस घोड़े के पैर में फोड़े निकल आए थे। हकीमों ने उसका इलाज करने की बहुत कोशिश की पर जब सब हार गए तो अंतिम विकल्प के तौर पर होनिगबर्गर को बुलावा भेजा गया था। उसने घोड़े को बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की पर घोड़े को बचा नहीं पाया। इस तरह के नतीजे के बाद यह आशंका थी कि होनिगबर्गर के लाहौर से बोरिया बिस्तर बांधने के दिन आ गये थे पर जिस तरह से होनिगबर्गर ने बीमार पशु की सेवा की और उसे बचाने की हर मुमकिन कोशिश की वह महाराजा रणजीत सिंह को भा गया। महाराज ने युवा डाॅक्टर को अपने दरबार में शामिल कर लिया और उसे इंसानों के इलाज की अनुमति दे दी। साथ ही उसके प्रयासों के लिए उसे उपहार भी दिए। इस उदारता के बाद भी होनिगबर्गर की महाराजा के बारे में व्यक्तिगत राय बहुत खराब थी। यहां तक वह महाराजा को निचले दर्जे का मानता था और घोड़े पर सवार महाराजा की तुलना वह हाथी पर सवार लंगूर से करता था।

महाराजा ने उसे अपनी तोपखाना बटालियन में एक ओहदा देने की पेशकश की। उनका मानना था कि वह भी दूसरे गारों की तरह सेना में उनके लिए भाग्यशाली साबित होगा। दूसरे गोरों को उन्होंने महत्वपूर्ण जगहों पर तैनात किया था क्योंकि वह गोरों को भाग्य का प्रतीक मानता था। होनिगबर्गर ने बिना सोचे ही इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। उसने कहा, ‘मैंने महाराजा से कह दिया कि जिस पद के लायक आप मुझे समझ रहे हैं उसकी मैं सलाहियत ही नहीं रखता हूं।’


महाराजा कहां मानने वाले थे। उन्होंने इस इन्कार का जवाब पहले से ही सोच रखा था। उन्होंने तुरंत दूसरा प्रस्ताव दिया। उन्होंने उसे शाही बारूदखाने में अधीक्षक बना दिया। इस पद में नाम और पैसा यानी दौलत और शोहरत दोनों ही इफरात में थी। होनिगबर्गर ने इस प्रस्ताव को महज इसीलिए स्वीकार कर लिया क्योंकि वह बहुत दिन तक पंजाब में रुकने वाला नहीं था। वह जल्द से जल्द अपने घर वापस जाना चाहता था। उसने लिखा है, ‘मैं इस ख्याल से ही इतना परेशान था कि अगर कोई मुझसे यह कहता कि कोहिनूर ले लो और यहीं पर बस जाओ तो मैं उसे भी मना कर देता।’ यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि वही होनिगबर्गर अगले दस साल तक महाराजा की इच्छा के मुताबिक दरबार में टिक गया।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी सती 

राजतिलक होने से बहुत पहले ही खड़क सिंह ने महाराजा की पदवी धारण कर ली थी। जून 1839 में अपने पिता के अंतिम संस्कार के तुरंत बाद यह पदवी धारण करने वाला खड़क सिंह जल्दी ही सत्ता के दुर्गुणों से घिर गया। वह आलीशान दावतें करने लगा, जिनके अंत में वह नशे में पूरी तरह धुत इंसान के सिवा कुछ नहीं रहता था। उसने अपने शातिर वज़ीर ध्यान सिंह को नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया और अपने सभी मंत्रियों और ताकतवर दरबारियों को हाशिए पर डाल दिया। धार्मिक खालसा जल्द ही नए महाराजा के व्यवहार से घृणा करने लगा था और ऐसा करने वाला वह अकेला नहीं था। नए महाराजा के तौर पर उसके सलाहकारों और सेनापतियों को जल्द ही उससे वितृष्णा हो गई, क्योंकि महाराजा के तौर पर उसकी रुचि राज्य के किसी भी मामले में नहीं थी बल्कि वह नशे, सुरा और सुन्दरी में ज़्यादा व्यस्त रहता था। उसके सिंहासन पर बैठने के चार महीने के भीतर ही उसकी हत्या की साजिश रच दी गई।

यह तय किया गया कि सफेदा कस्करी (सफेदा सीसा) और दस काफूर (पारे का मिश्रण) की खुराक महाराजा के रोज़ के खाने और शराब में मिलाई जाएगी। पहले तो इस ज़हर का असर कुछ खास नहीं दिखा। सिर्फ महाराजा की नशे में धुत रहने की अवधि बढ़ गई और उसकी आवाज़ हल्की लड़खड़ाने लगी। उसे अपने हाथ पांव में तालमेल करने में भी अब सामान्य से ज़्यादा समय लगने लगा था। इसके बाद धीरे-धीरे महाराजा अंधा होने लगा। इसके बाद उसके पूरे शरीर में एक रहस्मय लेकिन गंभीर पीड़ादायक खुजली मचने लगी और कुछ ही हफ्तों बाद उसके जोड़ों में दर्द और उसकी त्वचा में जगह-जगह से खून रिसने लगा। ज़हर की खुराक शुरू करने के छह मीने के भीतर ही महाराजा का एक-एक अंग धीरे-धीरे काम करना बंद करने लगा। खड़क सिंह अब सिंहासन से शय्या पर पहुंच चुका था। तिलतिल कर मर रहा वह मौत का इंतज़ार करने लगा था।

इस धीमी हत्या में ग्यारह महीने और लगे। इस दौरान खड़क सिंह के 18 साल के बेटे नौनिहाल सिंह को राजधानी बुलाकर युवराज बना दिया गया था। एक आकर्षक व्यक्तित्व और साहसी सेनानायक के तौर पर नौनिहाल सिंह वैसे तो सबकी पसंद था लेकिन उसे दरबारी सियासत का बिलकुल इल्म नहीं था। लिहाज़ा उसे अपने पिता के नाम और अपने वज़ीर की सलाह पर शासन संभालना पड़ा। अफवाहें इस तरह की भी रहीं कि खड़क सिंह को ज़हर देने की साज़िश शातिर वज़ीर ध्यान सिंह ने रची थी। हालांकि इसकी कभी पुष्टि नहीं हो सकी।

इस साज़िश में नौनिहाल सिंह के शामिल होने के कोई संकेत तो नहीं मिलते लेकिन उसने भी अपने पिता के प्रति कोई विशेष स्नेह या आदर नहीं दिखाया। जब खड़क सिंह जीवित और शय्या पर पड़ा था तो वह हर दिन अपने बेटे को देखने की भीख मांगता था। लेकिन होनिगबर्गर के लिखे संस्करण में यह साफ है कि नौनिहाल सिंह अपने पिता के पास बहुत कम अवसरों पर गया। खड़क सिंह की मौत 5 नवंबर 1840 को हुई और उसकी मौत को लोगों ने उस पर कुदरत का रहम माना। महाराजा की मौत के आधिकारिक एलान मंे बताया गया कि एक रहस्मय बीमारी से महाराजा की अचानक मृत्यु हो गई। इस एलान में महाराजा की महीनों से चल रही बीमारी का कोई ज़िक्र नहीं किया गया।


होनिगबर्गर के मुताबिक शायद किसी को महाराजा की मौत का न तो कोई दुख था, न ही कोई दिक्कत। लोगों ने उनकी मौत के कारण और उसके एलान पर सवाल उठाने की ज़हमत भी नहीं की। एक बार फिर से होनिगबर्गर पंजाब के शाही अंतिम संस्कार को इतनी जल्दी देख रहा था। उसका विवरण वह कुछ इस तरह लिखता है: ‘महाराजा के साथ उनकी तीन पत्नियां सती हो गईं। मैं एक बार फिर से यह भयावह दृश्य का साक्षी बना। यह भयावह ज़रूर था लेकिन इसकी तड़क-भड़क और धूमधाम में कोई कमी नहीं थी।’ उनके साथ उनकी ग्यारह दासियां भी सती हुईं लेकिन शायद यह विदेशी चिकित्सक सती के खौफनाक मंज़र का इस कदर आदी हो गया था कि वह उनके बारे में लिखना ही भूल गया।

खड़क सिंह ने जिस तरह अपने पिता को मुखाग्नि दी थी, नौनिहाल सिंह ने उस परंपरा का निर्वाह किया लेकिन खड़क सिंह से ठीक उलट, ऐसा करते समय नौनिहाल एक राजा की तरह व्यवहार कर रहा था। अपने पिता की रहस्यमय बीमारी के दौरान ही दरबारियों में लोकप्रिय हो चुका नौनिहाल सिंह नैसर्गिक नायक के तौर पर दरबार और जनता के बीच स्थापित हो चुका था। उसकी उम्र भले ही 18 वर्ष रही हो लेकिन उसकी परिपक्वता उसकी उम्र से कहीं आगे थी। और जो लोग अपने राजा में नायक और नेतृत्व तलाशते हैं उनके पैमान पर भी नौनिहाल सिंह कोहिनूर के असली हकदार के तौर पर खरा उतरा था।

पिता की चिता की राख ठंडी होने के बाद एक महाराजा अपने सभी दरबारियों को लेकर, जिनमें होनिगबर्गर शामिल था, रावी नदी के तट पर, ‘अस्थियां प्रवाहित करने पहुंचा जो पंबा की रवायत थी। इस बीच सबसे नज़रें बचाकर होनिगबर्गर वहां से निकल गया। उसने पंजाब की काफी ‘भयावह’ प्रथाएं देख ली थीं और अब उसके मरीज़ों को उसकी ज़रूरत थी। घर पहुंचकर उसने मरीज़ों को देखना शरू ही किया था कि महल से एक बेहद बौखलाया हुआ हरकारा उसके पास आया। नौनिहाल सिंह और उसके साथी रावी नदी से हजूरी बाग से होकर वापस लौट रहे थे, जिसे 1818 में रणजीत सिंह ने कोहिनूर हासिल करने की खुशी मेें बनवाया था। जब शाही काफिला हजूरी बाग के द्वार के नीचे से गुज़र रहा था, तो एक मेहराब से एक बड़ा सा पत्थर रहस्यमय तरीके से उनके ऊपर गिर पड़ा। पत्थर नौनिहाल और उसके दो साथियों पर गिरा, जिनमें से एक की तो मौके पर ही मौत हो गई। किस्मत से नौनिहाल को ज़्यादा चोट नहीं लगी और ब्योरे के मुताबिक वे पैदल वहां से चल कर गए। होनिगबर्गर अपनी दवाओं का बक्सा और मलहम लेकर आनन फानन में महल पहुंचा। उसे उम्मीद थी कि वह हल्की-फुल्की चोट खाए लेकिन सदमें में आए एक युवा महाराजा से मिलेगा। लेकिन उसका स्वागत दरबारियों के पीले पड़े चेहरों ने किया। वज़ीर राजा ध्यान सिंह ने होनिगबर्गर को अपने पीछे आने का इशारा किया:
एक मंत्री मुझे एक तंबू में ले गया। मंत्री ने मुझे निर्देश दिया कि मैं इस बारे में किसी को कुछ ना बताऊं। शिविर में नौनिहाल सिंह अपने पलंग पर थे। उनका सिर बुरी तरह कुचला हुआ था और उनकी हालत ऐसी थी कि अब उनके बचने की उम्मीद ही नहीं थी। इस विचार के साथ मैं शिविर से बाहर निकला और मंत्री से फुसफुसाकर कहा, ‘दबाएं अब इस अभागे राजकुमार का कोई भला नहीं कर सकतीं।’

नौनिहाल के साथ हुई इस ‘दुर्घटना’ के हालात पूरी तरह से अस्पष्ट थे और चश्मदीदों के बयान भी एक दूसरे से मेल नहीं खा रहे थे। वज़ीर का अपना भतीजा पत्थर के गिरने से घटनास्थल पर ही मारा गया था। और ब्योरे से उलट, ध्यान सिंह ने शपथ लेकर कहा कि नौनिहाल को हजूरी बाग में उनके भतीजे के समान ही चोट लगी थी। वहीं रणजीत सिंह की सेना में तोपची कर्नल एलेक्जैं़डर गार्डनर ने कुछ और ही कहानी सुनाई। जब ढांचा गिरा था तो गार्डनर युवराज के ठीक पीछे थे और उनके अपने आदमियों ने स्ट्रेचर पर ढो कर घायल नौनिहाल को महल तक पहुंचाया था। जैसा कि गार्डनर ने बताया, युवराज अपने पैरों पर चल कर जाने के लायक होशोहवास में थे और पानी मांग रहे थे। सिर्फ गार्डनर के आग्रह पर ही उन्हें स्ट्रेचर पर रख कर उनके बिस्तर तक पहुंचाया गया।

वहीं महज़ कुछ मिनटों बार होनिगबर्गर ने जिस युवराज को देखा वह न चलने के काबिल था और न ही बोल पा रहा था। नौनिहाल की खोपड़ी चकनाचूर हो गई थी और उसके बिस्तर की चादर उसके खून और भेजे के हिस्सों से सनी हुई थी। उसके जख्म इतने गंभीर थे कि वह कुछ घंटों बाद ही मर गया, हालांकि इस खबर को जनता से तीन दिनों तक छिपाकर रखा गया। नौनिहाल की चिता के लिए चंदन की लकड़ियां भी गोपनीय ढंढ से इकट्ठा की गईं और दिशाहीन पंजाब के आतंक की आगोश में समाने से पहले दरबार में खाली पड़ी गद्दी को भरने का खेल शुरू हो गया था। दरबारी मंत्री गद्दी पर अपना अपना दावा पेश कर रहे थे।

तीन दिन बाद जब इस ‘अनोखी दुर्घटना’ की खबर जनता को दी गई तो गार्डनर ने यह खबर देते हुए अटकलों को और हवा दी कि जिन पांच तोपचियों ने नौनिहाल को स्ट्रेचर पर ढोकर उसके पलंग तक पहुंचाया था, उनमें से रहस्मय ढंग से दो की मृत्यु हो गई, दो छुट्टी मांग कर गए और कभी नहीं लौटे और एक अजीबोगरीब ढंग से लापता हो गया। जब पंताब एक बार फिर से खुद को एक शाही अंतिम संस्कार के लिए तैयार कर रहा था-दो साल में तीसरी बार-तो ऐसे मंे कोहिनूर पर शक जाना स्वाभाविक था। क्या यह कोहिनूर का शाप था जो एक एक कर रणजीत हसंह के उत्तराधिकारियों को निगल रहा था?

9 नवंबर 1840 को नौनिहाल का अंतिम संस्कार हो रहा था तो उसकी किशाोर उम्र की दो पत्नियां उसके साथ सती होने के लिए उसकी चिता तक पहुंची। उसकी सबसे बड़ी पत्नी गर्भवती थी, इसलिए उसे सती नहीं होने दिया गया वहीं एक बेहद छोटी रानी को नौनिहाल के चाचा शेर सिंह ने सती होने से बचा लिया। होनिगबर्गर इस घटना को इस तरह दर्ज करता है: ‘दो बेहद खूबसूरत लड़कियां उसके साथ (नौनिहाल) लपटों की शिकार हो गईं। 12 साल की एक लड़की को बचा लिया गया... इसलिए कि उसकी उम्र बहुत कम थी और वह सती समारोह के लिए परिपक्व नहीं थी।’


इस बच्ची को बचाने वाले शेर सिंह खड़क सिंह के भाई थे। कद में नाटे, काली दाढ़ी, पैनी निगाहों और ओजस्वी दिखने वाले शेर सिंह ने अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए इस बच्ची को चिता की आग से बचा लिया था पर कोहिनूर और सिंहासन पर दावा जताना उनके अधिकार में नहीं था। अब वे अपने भतीजे नौनिहाल को चिता में जलते देख कर दुखी तो थे पर एक बच्ची को बचाने का आत्मसंतोष ज़रूर उनमें रहा होगा।

बालक राजा

शेर सिंह रणजीत सिंह के दूसरे सबसे बड़े बेटे थे, जो खड़क सिंह से पांच साल छोटे थे। 1807 में पैदा हुए शेर सिंह जुड़वां हुए थे। दोनों बेटों में शेर सिंह 5 मिनट बड़े थे जबकि उनके जुड़वां भाई तारा छोटे। पर इन दोनों भाइयों और सिंहासन के बीच एक खाई थी। उनकी मां, महारानी मेहताब कौर, जिनकी सगाई रणजीत सिंह के साथ तब हो गई थी जब वह चार साल की थीं और महाराजा छह साल के थे। उनका नमा मेहताब इसलिए रखा गया था क्योंकि इसका मतलब चांदनी होता है और रानी के गोरे और बेदाग चेहरे और काया से यह नाम पूरी तरह न्याय करता था। उनके अप्रतिम सौंदर्य के सामने महाराजा कहीं नहीं ठहरते थे। महाराजा बेहद दुबले और कुरुप थे जिन्हें चेचक ने दागदार बना दिया था और उनकी एक आंख छीन ली थी। बहरहाल उनका विवाह 1796 में हुआ।

शादी सफल नहीं हो सकी। अमीर घराने में पैदा हुई मेहताब कौर एक स्वाभिमानी महिला थीं, उन्हें यह बिलकुल गवारा नहीं था कि महाराज रणजीत सिंह पूरे पंजाब के एक छत्र राजा बनने की ललक में शादी के एक दशक तक सिर्फ युद्ध करते रहें। दरअसल महाराज के पास उन पर ध्यान देने का ज़रा भी वक्त नहीं था। उन्होंने युद्ध में जीतने के बाद अपने हरम में बहुत सी सुंदरियों को जगह दे दी थी। यह मेहताब को बर्दाश्त नहीं हो सकता और वह राजधानी से 65 मील उत्तर पूर्व में स्थित अपनी मां के घर बटाला रियासत लौट गईं। भले ही रणजीत सिंह मेहताब के घर यानी अपने ससुराल जाते रहे पर वास्तविकता यह थी कि दोनों के बीच रिश्ता सिर्फ नाम का ही बचा था। इसके बाद के कुछ सालों में महाराजा रणजीत सिंह ने बहुत सी महिलाओं से शादी की और बहुत सी दूसरी खूबसूरत महिलाओं को अपने हरम में रखा। जब महाराजा की दूसरी पत्नी दतर कौर ने खड़क सिंह को जन्म दिया तो मेहताब की मां ने उन्हें महाराजा के साथ संबंध सुधारने की सलाह दी। दरअसल खड़क सिंह के जन्म ने राजशाही में मेहताब की स्थिति कमज़ोर कर दी थी और यह न तो मेहताब के लिए मुफीद थी न ही उनके परिवार के लिए। महराजा के रहमोकरम पर पल रहे उनके परिवार के लिए तो यह बिलकुल अनुकूल नहीं था।

संबंध सुधारने के अच्छे परिणाम अपने भी लगे थे क्योंकि 1803 में मेहताब ने एक बच्चे इशर सिंह को जन्म दिया था पर उसकी एक साल का होते ही मौत हो गई। इस सदमे से वह उबर भी नहीं पाई थी कि उसकी मां ने उसे फिर से महाराजा को लुभाने के लिए कहा। इस बार महाराजा का ध्यान आकर्षित करना आसान नहीं था क्योंकि अब महाराजा एक मुस्लिम तवायफ मौरन के इश्क़ में अंधे हो चले थे। सिर्फ मेहताब ही नहीं मौरन के आगे महाराजा को पूरा हरम फीका लगने लगा था। अब सारा प्यार महाराजा उसे पर लुटाते थे। बावजूद इसके तीन साल बाद मेहताब ने महाराजा को फिर से हासिल कर लिया और जल्दी ही जुड़वां बच्चों शेर सिंह और तारा को जन्म दिया।

इस दोहरी खुशी की उम्र ज़्यादा लंबी नहीं थी। बटाला में चल रहे जश्न थमने लगे थे। बच्चों की पहली किलकारियों के साथ एक भयावह अफवाह ने भी जन्म ले लिया था। यह आरोप लगाए गए कि मेहताब ने लड़की को जन्म दिया था पर क्योंकि लड़कियां सिंहासन की उत्तराधिकारी नहीं हो सकतीं, इसलिए उन्होंने अपनी बेटी को किसी को दे दिया था और बदले में वे एक बुनकर और एक बढ़ई के दो बच्चे ले आई थीं। रानी पर अपनी बेटी बदलकर आम जनता के दो बेटे लेने का आरोप सही हो या गलत पर रणजीत सिंह ने इन दोनों को अपना कानूनी उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया था। यह बात और थी कि रणजीत सिंह ने उन दोनों लड़कों को बेदखल नहीं किया था और उनका पालन-पोषण राजकुमारों की तरह महल में ही हुआ। पर सार्वजनिक तौर पर इन दोनों को उत्तराधिकारी न मानने से यह तय हो गया था कि तारा और शेर सिंह दोनों कभी भी राजा नहीं बन सकते थे। पिता की चुप्पी ही उनकी नियति बन गई थी। इसी के सहारे उन्होंने बचपन काटा और बाद में ताकतवर और समृद्ध भी बने, लेकिन शर्मिंदगी ने उनका पीछा नहीं छोड़ा।

यह हिस्सा लेखक द्वय की किताब 'कोहिनूर' (जगरनाट प्रकाशन) से उद्धृत है. 

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