अंजुमन खाला को गुस्सा क्यों नहीं आता...

सोनी पाण्डेय

प्रकाशित पुस्तकें - मन की खुलती गिरहें (कविता सग्रह) ,सारांश समय का (साझा काव्य सग्रह),विभिन्न पत्र- पत्रिका में
 कविताऐं..कहानी ,लेख प्रकाशित. सम्पर्क:  .pandeysoni.azh@gmail.com, 

सलमा का दुपट्टा असलम की साईकिल के घूमते पहिए में फस गया.....फस गया या जबरन फसाया गया इसमें सन्देह था।रेशमी गुलाबी दुपट्टे का सुनहरा गोटा उघड़ गया.... दुपट्टा बचा कर निकालते- निकालते मछली का जाला बन गया.....हूँssssssआं...हूँssssssssssआं कर सात साल की सलमा का रुदन देख असलम की सिट्टी - पिट्टी गुम।शेख चचा लड़की को पुचकार कर चुप करा रहे थे कि कपड़े रंगती असलम की अम्मी आग पर चढ़ा हंडा छोड़ दनदनाती आकर कान उमेठते उसे लेकर चलीं....साथ -साथ सप्तम सुर में चिल्ला रही थी..." करम जली ,ना जाने किस जनम का बदला लेती है मुझसे....पहले तो खसम खा बैठी ,ऊपर से चार- चार बेटियाँ जन के बैठ गयी ।हाय अल्ला! ...रहम कर मौला! , किस महूरत में अपने मासूम रहमान मियाँ को इस कलमुही के पल्ले बाँधाssssssssss...।"

उसका राग भैरवी चालू था...रह -रह कर कच्ची मिट्टी की दीवारों से हायssssssssss, की चीखें अब भी आ रही थीं। अंज़ुमन खाला बरामदे से रोती बेटी को देख भागती हुई आईं....बगल के मकान से हाय तौबा की आवाजें साफ सुनाई दे रही थीं। वह क्या पूरी रंगरेज गली उनकी बहन परवीन  की फ़ितरत से वाक़िफ थी,...दिन- रात बहन को ज़लील करने का मौका तलाशती रहती ।..अंज़ुमन खाला एक चुप ,हजार चुप ।पहाड़ सा धैर्य समेटे बेवा खाला चार बेटियों को सिलाई ,कढ़ाई कर पाल पोश रहीं थीं।भूले से बहन की चौखट पर मदद के लिए पैर नहीं रखतीं ...न ही बेबसी का रोना रोतीं।
दोनों बहनों में छत्तीस का विकट आंकड़ा...एक का पति शहर का सबसे हुनरमन्द रंगरेज और दूसरे का टाप वन दर्जी। रहमान टेलर के नाम का आलम यह था कि शहर तो शहर आस- पास के पड़ोसी जिले के दुल्हों की शेरवानियाँ यहीं सिलतीं....रोज़ी में बरकत थी ....हुनरमन्द ,सलीक़ेदार बीबी और चार प्यारी बेटियों से रौनक उनके गुलिस्तां में कमी थी तो केवल एक बेटे की। दोनों जनें पाँचों समय नियम के नमाजी...खुदा पर पूरा यकीन रखते थे कि एक न एक दिन चश्मेचराग ज़रुर देखेंगे और हर पीर पैगम्बर के दर की खाक छानते। अभी तो अजमेर शरीफ से लौटे थे ....कितनी अकीदत से कुरानखानी कराई थी....या मौला sssssssतू ने ये क्या कर दिया।नेक बन्दों की ही तूझे भी ज़रुरत रहती है ,कहते -कहते असलम की अम्मी जिन्हें हम बच्चे परवीन खाला कहते थे ,उस दिन छाती पीट -पीट दहाड़े मार रही थीं।सामने अहाते में रहमान मियाँ की लाश पर बेटियाँ सिर पटक -पटक रो रही थीं।रात दावत से लौट कर सोये तो सोये ही रह गये।शरीर नीला पड़ गया था। जलनखोरों की कमी नहीं थी,घर पर केवल दावतखाने की बात कह कर निकले थे....कभी किसी से अदावत नहीं की ,हाँ रोजी रोज़ बढ़ते देख कुछ सिलने वाले जात भाईयों की डाह जरुर थी। ....अन्तत: पुलिस ने खुदकुशी का मामला बता पल्ला झाड़ लिया।

 चालीसे तक तो भाई जात और रिश्तेदार मदद करते रहे पर धीरे- धीरे सबके दरवाजे बन्द होने लगे। चार- चार बेटियाँ ,सबसे बड़ी सना नौवीं में...सबा सातवीं में...सब्बो छठी में और सलमा दूसरी क्लास में पढ़ती थीं। लड़कियों की फीस, कॉपी ,किताब कपड़े से लेकर घर के राशन और बूढ़ी सास की अस्थमा की बीमारी के खयाल में डूबी अंजुमन खाला ने एक दिन घर के आगे की दुकान का सटर उठा दिया....पति के साथ -साथ सिलाई करती थीं....मशीन पर बैठीं तो फिर जम कर बैठ गयीं।लड़किया तुरपाई ,काज ,बटन करतीं और उनकी मशीन खड़खडाते हुए पूरे दिन दहाड़ती।हसद बड़ी बुरी चीज होती है...आदमी पहले खुद राख होता है फिर शिकार की मुश्किलें बढ़ाता है। हमशीरा  बहन परवीन जो बगल में ब्याही थी एक बार फिर हौसला और बरकत देख कुढ़ने लगी ।मौका मिलते तोहमतों की बरसात कर देती...ज़बान थी की कैंचीं....सरsssssssssसरssssss रुह काटते उसे तनिक रहम नहीं आता।
   गुनिया की माई                
दिन ,महीने ,साल बीते.....हर सिंगार खिल कर झर गये.....सावन के झूले उतरे और औरते फगुवा की फुनगी पर बैठ सपनों की सतरंगी ओढ़नी ताने फुदकती....महकती ...गमकती जीने लगीं ,अपने औरत होने के तमाम रंजो ग़म सहेजे।गली ,मुहल्ले में धीरे- धीरे रौनक़ लौटने लगी।रंगरेज गली फिरसे गुलज़ार हो उठी ....लोग हर दिल अज़ीज रहमान दर्जी को भुलाने लगे। अब चर्चे थे तो एक गुस्ताख बेवा का तन कर दर्जी की दुकान में बेपर्दा हो मर्दों से नाप जोख करने का । अंजुमन खाला एक चुप हजार चुप ,...चेहरे पर तनिक भी बेबसी हावी नहीं होने देतीं।धीरे -धीरे पुराने आर्डर निबटाने के बाद दुकान पर नया बोर्ड टंगवा दिया ..."रहमान लेडीज एण्ड जेण्टस सूट श्पेसलिस्ट"। जानतीं थीं बेटियों को आगे इसी हुनर को बढ़ाना है सो औरतों के कपड़ों की सिलाई की ओर मुड़ीं,..वैसे भी मर्द अब किसी ज़नानी से कपड़े सिलाने से परहेज़ करने लगे थे।उपर से परवीन की कतरनी ज़बान पहले से कस्टमर को भड़काती रहती।
   
                 
 सना हमारी क्लास मेट थी,गुलाबी होंठ और हिरनी जैसी आँखों वाली।उजली ऐसी की चाँदनी भी शरमा जाए ... गाती तो मादक महुए की रस भरी जैसे टप टप टपकते हुए दूर -दूर तक रसगन्ध फैला आती कि देखो फागुन आया है।ऐसी थी चर्चा पूरे स्कूल की दीवारों से निकलकर बगल के लड़कों के कालेज तक। हम पहली बार रंगरेज गली में सना के साथ ही घुसे थे...सकरी गली सरपीली गोल -गोल घूमती रही घण्टों तक ,जैसे लखनऊ की भूल भुलैया ।मैं कई बार सना का हाथ पकड़ती और डर जाती....गली के दोनों तरफ तंग मकान...मकानों के सामने के हिस्से  में रंगरेजों की दुकान....दुकान क्या बड़ी -बड़ी भट्ठियों पर हण्डों में उबलते रंगीन पानी के भाप  से रंगी पूरी होली की छावनी ....जैसे हमारे गाँवों में होली के दिनों में रहता है। एक अहाते में अलगनी पर लाइन से बाँधनी के रंग बिरंगे दुपट्टे टंगे देख हम खिल गये।हाँ....यही तो चाहिए था हमें एन्नुवल फंक्शन के लिए....गली में खोने का डर फुर्र हो गया।हम सना के घर पहुँचे... आगे दुकान में उसकी माँ कपड़े सिल रही थीं...लड़कियों का हुजूम देख मुस्कुराकर स्वागत किया।रेहाना ने झुक कर आदाब खाला कहा  और बिना कुछ सोचे समझे हम सब ने फालो किया ,समवेत स्वर में.....आदाब खाला गूंज उठा। हम बगल के गलियारे से अन्दर घुसे....अन्दर बड़ा सा बारामदा..,बरामदे में चौकी पर एक बूढ़ी औरत हाथ में सफेद मोतियों की माला लिए फेर रही थी ..ऐनक चढ़ा कर हमें पहचानने की कोशिश कर ही रही थीं कि अबकी सब एक साथ आदब बजा सर्र से आगे बढ़ गयीं सना के साथ....सना ने बरामदे का दरवाज़ा खोला ....सामने बड़ा सा अहाता.....जो एक विशाल पोखरे के किनारे था ।

क़रीब दस बकरियाँ देखते मिमियाने लगीं....बत्तख ,कोकच भी देखते मटकते आगे बढ़ने लगे,मुर्गियाँ भी भागती हुई आकर परिक्रमा करने लगीं जैसे बत्तखों को चिढ़ा रही हों कि देखों रेस जीत लिया। एक तरफ कबूतरों का दरबा दिखा....शायद कबूतर चरने निकले थे। दूसरी तरफ गाय की मड़ई ...हम सावधान की मुद्रा में खड़े इस पूरे दृश्य को सहमें देख रहे थे इस डर से कि अगले पल कौन और प्रगट होगा?.....खैर दस मिनट में स्थिति सामान्य हो गयी।सना मुट्ठी में दाने ले दूर बिखेर कर हँसती हुई आई .....सब टूट पड़ें थे दानों पर। नकाब खोलते हुए एक तरफ खड़ी चारपाई को बिछाने के लिए रेहाना को कह वह अन्दर चली गयी।रेहाना उसकी दूर की खालाजात बहन थी।

हम अभी तक इस पशु मेले से असहज थे कि एक देशी कुत्ता भौंकता हमारे सामने आकर खड़ा हो गया ,हम चरपाई पर चढ़ कर खड़े हो गये। मुझे गुस्सा आ रहा था....यार ये घर है की चिड़िया घर?...रेहाना हँसने लगी मेरी बात सुनकर । कुत्ते को पुचकार कर वापस भेज दिया ....,वह पूँछ हिलाता निकल ही रहा था कि सना कांच की कटोरियों से सजा ट्रे लेकर आती दिखी....वह फिर पीछे हो लिया। सना चने दाल का हलवा ,खुरमा और चिप्पस लिए चारपाई पर आकर बैठ गयी। हिन्दू लड़कियाँ कुछ खाने में संकोच कर रही थीं। सभी असहज थीं इस भय से कि कैसे खाऐं मुसलमान के घर का...खास कर तीन पण्डित और दो ठाकुर लड़कियाँ,...पाँचों ने मना कर दिया।बची मैं और दो तीन.....सना ने ना जाने क्या सोच कर बर्फी की आकार में कटा चने दाल का हलवा मेरी तरफ बढ़ाया,.....प्यार भरी सजल आँखें, मैं संकोचते अम्मा से डरते एक पीस उठा ली और पहला टुकड़ा काटते तारीफ करने लगी।सच में हलवा हमारे घरों के बेसन के हलवे से अलग और स्वादिष्ट था। .....मैं खा रही थी...धीरे -धीरे सबके हाथ बढ़ने लगे कि यदि ये पण्डित होकर खा सकती है तो हम क्यों नहीं ? नाश्ते के बाद हम बगल के रंगरेज की दुकान पर पहुँचे..हाथ में हमारे बड़ा सा कपड़े का गट्ठर देख परवीन खाला खिल गयीं। रेहाना सब समझा रही थी .....खाला ! चुनरी डिजाइन के पचास दुपट्टे छब्बीस जनवरी से पहले चाहिए।वह दुपट्टे गिन एक तरफ रख बोलीं ....हो जाएगा।रेहाना से हाल चाल, दुआ सलाम खत्म हुआ तो हम चलने को हुए।रेहाना अपनी गली में हमें छोड़कर मुड़ गयी।हम अटक गये....डर से माथे पर पसीने की चुहल कदमी बढ़ी और मैं अनयास ही .पीछे मुड़ कर देखने लगी ,इस उम्मीद में कि कोई आकर हाथ थाम इस गली से बाहर निकाले....भय के स्वेद बिन्दू सबके माथे पर रेंग रहे थे कि  अंजुमन खाला मुस्कुराती खड़ी मिलीं....हमें समझ में नहीं आ रहा था आगे किधर मुडें. ..चलो बच्चियों,मैं चौराहे तक जा रही ।खाला ने नकाब का पर्दा उठाकर मुस्कुराते हुए कहा।शायद वह माजरा समझ चुकी थी़ं।हमने अपना भय समेटा और चुपचाप उनके पीछे हो लिए। वह आगे -आगे हम पीछे -पीछे रेल के डिब्बे की तरह पतली गली में चले जा रहे थे....किनारे के घरों से कुछ औरतें पर्दे की ओट से खाला को टोकतीं....मेरी सलवार कमीज हुई की नहीं बाजी?.....वह चलते हुए कहतीं....हो गया ....किसी को भेज कर मंगा लो। हम लगभग बीस मिनट पर चौक चौराहे पर पहुँचे,जानी पहचानी सड़क देख कर जान में जान आई। खाला को सलाम कर हम अपने अपने घरों को रिक्शे से रवाना हुए।
   
               
दुपट्टे रंग गये और रेहाना सना के साथ जाकर ले आई। हमारी हिम्मत पस्त थी गली की घुमावदार तिलस्म के नाम पर। छब्बीस जनवरी का वह रंगारंग कार्यक्रम आज भी याद आता है तो मन रोमांच से भर जाता है जिसमें चार चाँद बाँधनी के  सतरंगी ओढ़नी ने लगाया था। इसी बहाने गली का प्रचार हमारे हिन्दू मुहल्लों तक आया और औरतें कभी पुरानी साड़ियों की रंगाई तो कभी चादरों पर चुनरी डिजाइन रंगाने रंगरेज गली में आने लगीं।
धीरे -धीरे अंजुमन खाला के हुनर का भी प्रचार हुआ और परवीन से ज्यादा भीड़ इधर जुटने लगी। सना मेरी अम्मा के ब्लाऊज़ के कपड़े और नाप धीरे से बस्ते में रख, ले जाती और सिला कर चुपचाप मेरे बस्ते में ला रख देती।अम्मा खाला की सिलाई की ऐसी मुरीद हुई की खाला के जीते जी साथ नहीं छोड़ा।

 देखो-देखो 'चमईया' हमार सुतुही                

 इधर परवीन का हाले आलम यह था कि टोना टोटका पीर मज़ार सब छानती फिरती की अंजुमन का धन्धा बैठ जाऐ.....किन्तु जहाँ मेहनत है बरकत होती ही होती है।घर का पिछला हिस्सा पक्का बनावाने का ख्वाब लिए रहमान मियाँ अल्ला को प्यारे हो गये थे....खाला ने पीछे एक नम्बर का पाँच कमरों का मकान बनवाया....बड़ी अक़ीदत से क़ुरानखानी करा सबको दावत दी। परवीन के कलेजे पर डाह की नागिन कुण्डली मारे बैठ गयी ....लगी सबसे कहने"जरुर रहमान कोई तस्करी -वस्करी का धन्धा करता था....इतना रुपया गड़ा था कि मरते कोठी उठ गयी।ज़रुर लाले को धन्धेबाजों ने मारा होगा कहते हुए अफवाहों का बाज़ार गर्म करती। सरपीली रंगरेज गली में गोल -गोल घूमतीं बातें खाला के घर पहुँची....सास बड़ी बहू से जा भिंड़ी ....बूढ़ी सास दरवाजे पर खड़ी हो चिल्ला रही थीं.....तेरे आँख में मिर्च झोंकूं मूईsss,ज़बान में कीड़े पड़ें रेsssss
सोई तो सोई रह जा कि तेरी ज़बान जल जाए हरामी,जो मेरे फरिश्ते से बेटे पर तोहमत लगाती है।

परवीन रसोईं में खाना पका रही थी,कान में सास की आवाज पड़ी तो तमतमाते हुए कलछुल फेंक कर चली.....हाथ लहराते आकर मुँह के पास सट कर खड़ी हो गयी....हाँ क्यों नहीं अम्मी! गालियाँ तो मुझे ही दोगी, धम्म से दरवाजे के चबूतरे पर बैठ गयी,....छाती पीटते हुए...बदुआऐं मेरे हिस्से और रक़म रहमान मियाँ ,हायsssss मेरी तो क़िस्मत फूटी थी जो इस कलमुही को देवरानी बना लाई अल्लाह । हायsssssss
परवीन का हाय तौबा सुन मुहल्ला जुट गया ,लोग खुसुर -फुसुर करने लगेे।सना और सबा दादी को पकड़ कर अन्दर लाईं।खाला मशीन में गर्दन गड़ाए किसी के ब्याह की पियरी में गोटा लगा रहीं थीं ,चुपचाप ,जबकि  सारी आवाजें साफ कानों में पड़ रही थीं। सास चौकी पर बैठ सिसक -सिसक के रो रही थीं ,बेटियाँ भी। खाला एक दम से सिलाई छोड़ सास के सीने से जा लगीं ....औरतों के सामुहिक रुदन से माहौल मातमी हो गया पर अंजुमन खाला की ज़बान नहीं खुली,वही पुरानी रवायत ....एक चुप हजार चुप।

हम इण्टर में पहुँचे,अब तक रंगरेज गली हमारी सबसे प्रिय गली बन चुकी थी,कारण थीं अंजुमन खाला....बस एक नज़र भर देख कर नाप के कपड़े उतार कर रख देतीं। हम इशारे में समझाते कपड़े की डिजाइन और वह चुप देखती रहतीं और लो तैयार हो गया डिजाइनर लिबास। इसी साल सना का निकाह हुआ ,सना की दादी अड़ी हुई थीं बेटी के निकम्मे बेटे से सना के निकाह के लिए ,उम्र में दस साल बड़ा जावेद अव्वल नम्बर का निकम्मा था ।इधर एक साल से आए दिन ननिहाल चला आता और नानी की खिदमत कर चापलूसी बजाता रहता । इसमें भी परवीन की चाल थी,जबसे मकान बना था सीने पर साँप लोट रहा था,एक दिन मौक़ा देख ननद को चढ़ाया कि अंजुमन के पास खज़ाना गड़ा है,इससे पहले की दूसरी बेटियों के शौहर आकर जमें ,बेटे का निकाह कर नकेल डाल लो । ननद माँ के कान भरने लगी...."ज़माना बड़ा खराब है अम्मी, इससे पहले की बिन मर्द के घर में कोई अनहोनी हो सना का ब्याह कर हज कर आओ।

बुजु़र्ग औरत इन दिनों मर्दों सी बेधक अंजुमन को फैसले लेते देख रही थी, उनके लाख मना करने पर भी खाला ने घर के आगे का हिस्सा गिरवा कर एक तरफ दुकान बनवा बाकी हिस्से में चाहरदीवारी उठवा फ़ाटक लगवा दिया था ,जैसा रहमान मियाँ चाहते थे। दुकान काफी बड़ा हो गया था,एक साथ चार मशीनें खड़खड़ाने लगीं थीं.....आगे पर्दा तन गया था।जवान बेटियाँ किताबें पढ़ डिजाइन बनाने लगी थीं। लगन ,तीज ,त्योहारों में सोने की फुर्सत नहीं मिलती।ननद रोज़ दुकान में नोटों से भरा गल्ला देखती और माँ के कान भरती की अंजुमन रुपये गांठ कर उसे बड़ी परवीन के घर भेज देगी....अनपढ़ औरतों को अक़ल ही कितनी होती है....उस रोज़ से जो ज़िद लेकर बैठी ,निकाह करा कर ही चैन लिया। चाँद सी सना ,अन्धेरी रात सा स्याह जावेद,बेचारी रो- रो मरी जा रही थी।हम सब ने खाला को समझाया,गली के सैकड़ों लड़के उसके नाम पर ज़हर खालें,ऐसी दिवानगी।कई की माऐं सुनते दौड़तीं आईं रिश्ता लेकर पर खाला की बेबसी का आलम यह था कि बेटी के सामने मुस्कुरातीं,पीछे दम भर रोतीं,एक बार फिर वह मौन साध गयीं,एक चुप हजार चुप। अन्तत: सना का निकाह जावेद से रोते, गाते हो गया।हम सब उस रात एक फूल सी लड़की की अनचाही शादी के गवाह बने....एक ने तो जावेद से मज़ाक ही मज़ाक में कह भी दिया।लंगूर के हाथ हूर लगी.....।

अभी हाथ की मेंहदी भी नहीं छूटी थी ससुराल में सना की ,कि जावेद उसे ले ससुराल में आ जमा।दिन भर किवाड़ भिड़का कमरे में सोता शाम को सास से बिना पूछे गल्ले से सौ पचास निकाल सैर सपाटे पर चल देता। अंजुमन खाला ने ननद को बुला मशविरा किया और घर के पीछे बड़ा सा हाल बनवा दमाद के लिए लुंगी की बुनाई का पावरलूम बिठवा दिया।न चाहते जावेद को हाथ रोकना पड़ा,अन्दर ही अन्दर सास से चिढ़े रहते और आए दिन सना से मार पीट करते।अगर गलती से दुकान पर सना किसी मर्द से बात कर लेती ,तुरन्त उसके चरित्र पर लांछन लगाने लगते।तीन बरस में सना दो बच्चों की माँ बन गयी।एक बेटा ,एक बेटी।इधर सिलाई करना भी बन्द कर दिया था।चेहरा धीरे- धीरे अपनी रौनक़ खोता जा रहा था। इस बीच हम बी.ए.पास कर एम.ए.में आ गये पर रंगरेज गली का आकर्षण कम नहीं हुआ,कारण थीं अंजुमन खाला।

इस साल सबा का भी निकाह हो गया,इनके मियाँ जावेद से भी आगे निकले ।वलीमे के दूसरे दिन ही ससुराल आ धमके और पूरी रवायत से लूम में अपनी हिस्सेदारी तय कर ली। झगड़ा बढ़ता देख खाला ने लूम में मशीनें बैंक से लोन ले बढ़ा दीं और खट कर भरने लगीं।उनकी मुश्किलों से परवीन के कलेजे को खूब ठण्डक मिलती।दामादों को आए दिन दावत देती और सास को तंग कर रुपये ऐंठने के नुस्खे बताती। इतना सब कुछ चुप सहती खाला के माथे पर कभी सिकन नहीं देखा और सोचती रही कि उन्हें गुस्सा क्यों नहीं आता? मैं सोचती रही और जिन्दगी बढ़ती रही सरपट रेस के घोड़े की तरह । किसी को ठहर कर दो पल फुर्सत नहीं थी सोचने की, कि आखिर क्यों कर अंजुमन इतना ज़ुल्म सहती है बहन का।
                           
एम.ए.अन्तिम साल में पहुँचते मेरी शादी की तलाश में पिता जी ज़मीन आसमान एक करने लगे ,कहीं बात बनती तो लड़की दिखाने का उपक्रम शुरु होता ,और मेरी पैकिंग महंगे गिफ्ट पैकेट की तरह होने लगती। पार्लरवाली ने अम्मा से कहा....."आंटी जी जब दिखाईएगा पीली जार्जेट की भारी बार्डरवाली साड़ी में दिखाईएगा,साँवली लड़कियों का रंग निखर कर आता है लाईटिंग में।अम्मा परेशान साड़ी की तलाश में दुकान -दुकान भटकती फिर रही थीं कि बाजार में सना से टकरा गयीं ।सना ने हाल चाल पूछा तो परेशानी का सबब जान हँस पड़ी....चच्ची इतनी सी बात पर आप इतनी परेशान हैं,कोई पुरानी बनारसी साड़ी और पीली जार्जेट की प्लेन साड़ी लेकर आईएगा ,फिर देखिएगा जादू।वह कहते हुए हँस रही थी। मेरे पास जादू की छड़ी है.....समझीं। इतना सुनते अम्मा को चैन पड़ा।अगले दिन माता जी बक्से खोल बनारसी साड़ी छांटने लगी। कोई डाल की तो नइहर की तो कोई बिदाई की कह निकालती और रखती।उन साड़ियों के प्रति उसका मोह देखते ही बनता था ,.....समझ सकती हूँ कि कलेजे पर पत्थर रख कर अम्मा ने लाल बनारसी साड़ी निकाली होगी। हम अगले दिन अपनी प्रिय रंगरेज गली में घुसे .....उस तंग गली में जिन्दगी गमकती थी.....घुसते शेख चचा की मिठाई की दुकान जिस पर शहर की सबसे मशहूर कचौड़ी मिलती थी ,हम वापसी में दस बीस ज़रुर लेकर आते,..कढ़ाई में गोल गोल फुल कर नाच रही थी....एक तरफ चूड़िहारिन एक औरत की कलाईयाँ दबा दबा चूड़ियाँ पहना रही थीं,कुछ इन्तजार में बैठी थीं।पूरी गली करघे की खटखट नाद से खटकती ज्यों एकतारे पर जोगी जीवन का श्रमगीत गा रहा हो।बच्चे हाथ में गुल्ली डण्डा लिए कहीं दिखते तो कहीं पजामें का नाड़ा सम्हालते नाक पोंछते गोली खेलते। कुछ छत पर पतंग ले पेंचा लड़ाते,हाँ लड़कियाँ बाहर नहीं दिखतीं इस गली में....छोटी से छोटी लड़की मऊवाली साड़ी के पीछे के तार काटने का काम घर घर करतीं इस लिए।हर हाथ व्यस्त था ,इतना की सर उठे तो बस नमाज़ और घर के दूसरे ज़रुरी काम के लिए....हम चल रहे थे ,लगन के दिन,दुकान पर भीड़ दूर से दिखाई दे रही थी।मैं गेट खोल सीधे घर में घुस गई,सलमा ने भाग कर सना को आवाज दी....बाजी ssss देखो प्रिया बाजी आई हैं । सब्बो ने आगे के बैठक में हमें बिठा दिया और अन्दर चली गई ।सना गोद में अपनी गोल मटोल बेटी को लेकर आई और दादी के पास लेकर गई । दादी क़ुरान में सिर झुकाए बैठी थीं।मैंने धीरे से आदाब कहा तो मुस्कुराकर पोथी बन्द कर माथे से लगा एक तरफ रख दिया।माँ ने नमस्ते किया और हम उनके कहने पर पास की चौकी पर बैठ गये।सना ने साड़ी का पैकेट ले दादी को खोल कर दिखाया .....बनारसी साड़ी को दिखाते हुए .....इसका बार्डर पीली साड़ी पर चढ़ाना है। उन्होंने माँ से पूछा....कब ज़रुरत है? माँ ने कहा अगले शुक तक हर हाल में चाहिए।शनिवार को लड़के वाले आ रहे हैं।वह मुस्कुराकर चुप रह गयीं।माँ का अगला सवाल था.....पैसे.....बात पूरी भी नहीं हुई कि वह डपट पड़ी....बस यही रह गया है,जैसी मेरी सना वैसी ये।ये काम छोड़े तो जमाना हो गया बेटी, मेरी तरफ देख कर, पिरिया की बात है तो कर दूंगी । माँ चुप हो गयी।
                 
सब्बो ट्रे में चाय नाश्ता लेकर आई... माँ ने व्रत का बहाना कर टाल दिया ।मैं खा पीती रही और माँ घूरती रही। आज प्रत्यक्ष को प्रमाण की ज़रुरत नही थी कि मैं उनकी सबसे बड़ी वादाखिलाफ बेटी थी उन दिनों। मेरी टिफिन कभी रसोईं में नहीं जाती थी इस आरोप के साथ कि मियाँ मकुनी सबका खाती खिलाती है।मैं धोती ...मैं ही रखती,मजाल की किसी बर्तन से छुला जाए।खैर मैंने इन्हीं लड़कियों से वेज बिरयानी,जर्दा,मूंग चने दाल का हलवा,सेवईं बनाने की विधियाँ सीखीं ,जिसके दम पर ससुराल में बेस्ट बाबर्ची घोषित हुई। साड़ी सना सब्बों संग आकर पहुँचा गयी,माँ ने उसके बच्चों के हाथ पर वापसी में पचास पचास के नोट धर एहसास कराया कि वह भी मेरे घर में अपनों जैसी है ,जैसा उसके घर में मेरा मान था ....मान दिया। माँ का ये बदलाव मुझे उस दिन इतना अच्छा लगा कि सना के जाते मैं लिपट कर उसके गालों को चुमने लगी.....माँ ने मेरे लिए आज धर्म की सकरी गली की थोड़ी सी चौड़ाई बढ़ाई थी .....दिलों की भी।ये हुनरमंद औरतें मेरे देखते देखते धर्म की गलियों से निकर मनुष्यता की सड़क पर मिलने लगीं थीं जिसमें रंगरेज गली की अहम भूमिका थी।

शनिवार को मेरी प्रस्तुति सजा धजा कर सास के सामने सराहनीय रही ।कुछ पार्लर के मेकप का असर तो कुछ शानदार बनारसी साड़ी का कमाल था कि ससुराल की औरतें मुग्ध हो गयीं। शादी तय हुई और एक माह के भीतर मैं भी अपने सपनों के अंखुवाने के दिनों में उस धरती से उखाड़ दी गयी जड़ समेत ,जहाँ अंकुरित हो पौधा बनी थी।खैर जो रवायत है रहेगी ही....इस मुद्दे पर प्रलाप का कोई फायदा नहीं।दिन ऐसे भागने लगे जेसे बचपन में हम जेठ की भरी दोपहरी में पुनपुन बाग में भागते थे। देखते देखते दस साल यूँ बीते जैसे आते जाते मौसम..... मैं मऊ जाती और घर से लौट आती। गली दोस्त मुहल्ले हाट बाज़ार सब छूट गये। एक बस मेरे शहर से जाती और आज़मगढ़ मोड़ पर उतार देती.....वहाँ से सटा घर,वापसी भी वहीं से। अम्मा मेरी बिदाई का ब्लाऊज अंजुमन खाला के यहाँ से सिला कर मंगा देती और उधर जाने का बहाना खत्म।इन दिनों शहर तेजी से बदला था..पैराडाइज सिनेमा हाल बन्द हो चुका था....अली बिल्डिंग में पूरा बाजार समाता जा रहा था....मुन्शीपुरा की औरतों को चौक बाजार जैसे था ही नहीं,.... जैसा हाल,...जब पूरा शहर बाजार लिए घर के मुहाने पर सिमट गया हो ,भला रंगरेज गली को कौन पूछे। मैं भी अपनी दुनिया में रमती बसती बढ़ रही थी...कि इकलौते भाई की शादी पड़ी।पहली बार शादी के बाद मैं शहर के भूले बिसरे दुकानों पर माँ और बहन के साथ युद्धस्तर पर खरिद्दारी करने में मशगूल थी....अली बिल्डि़ग में भाभी की डाल की साड़ियों की मैचिंग चूड़ियाँ ढूढते हम दुकान दुकान घूम रहे थे कि एक दुकान से कुछ पहचानी सी आवाज आई.....प्रिया बाजीsss
मैंने पलट कर देखा....सामने इण्टर में पढ़नेवाली सना सी सक्लो सूरत की लड़की हाथ हिला कर बुला रही थी.....मैं नज़दिक पहुँची.....तुम सलमा हो न?...लड़की चहक उठी... बाजी!....आप तो ईद का चाँद हो गयीं।... दुकान में खासी भीड़ थी,एक इकहरे बदन का लड़का औरतों को रैक से मैचिंग चुड़ियाँ निकाल कर दिखा रहा था।मैं चौंकी....उसे गौर से देखते हुए सलमा से पूछा...ये असलम है न?...वह लजा गयी। चेहरे पर लाज की लाली समेटे शिकायत किया,क्या बाजी ,अपनी दुकान छोड़ यहाँ वहाँ घूम रही हैं...हाथ से साड़ियों का पैकेट झट ले एक लड़के को पकड़ा कर कहा...सबसे बढ़ियाँ मैचिंग लगा ...और दूसरे को हमारे मना करने के बाद भी चाय के लिया दौड़ा दिया।नन्हीं सलमा हमारे सामने कुशल दुकानदार बन गयी थी। सिर का  दुपट्टा बार बार ठीक करती और ग्राहकों से रस मिसरी घोल बतियाती सलमा को देख सना अनायास याद आ जाती,वह अपना काम करते करते पूरे घर का हाल बताती रही और मैं आदतन मुस्कुराती चुप सुनती रही।असलम मियाँ ने बड़ी सुघड़ता से चूड़ियों के सेट तैयार कर सामने रख सलमा से मुस्कुराकर कहा....हिसाब ढ़ंग से लगाना,..सलमा भी उसी अदा से बोली...लो जी,बाजी मेरी हैं की आप की?

हिसाब की पर्ची देख माँ और बहन खुश हो गयीं।चूड़ियाँ बाजार भाव से काफी सस्ती थीं।चलते वक्त उसने वादा लिया ,घर जरुर आइएगा।मैं खुश थी आज ,....इस लिए नहीं की चूड़ियाँ सस्ती मिलीं थीं,बल्कि खुशी कारण सलमा और असलम की प्यारी जोड़ी थी।बातों ही बातों में उसने अपनी शादी की कहानी भी बता ड़ाली....बाजी इनकी अम्मी तो सुनते सदमें में आ गयी कि असलम मुझसे निकाह करना चाहते हैं।खूब कुहराम मचा और अन्त में सना बाजी के समझाने बुझाने पर ना जाने कैसे मान गयीं।मैं उस भोली लड़की की मासूम कहानी सुनती रही और समझती भी कि परवीन खाला जरुर इस तरह भी अंजुमन खाला को नीचा दिखाना चाहती रही होंगी।
             
उनकी निगाह पहले से उनकी जगह ज़मीन पर थी और भोली लड़की उनके बनावटी विरोध को सच समझ बैठी होगी। खैर जो हुआ ,अच्छा हुआ था....सलमा खुश दिखी थी,जिस खुशी से सना और सबा को महरुम रहना पड़ा था सलमा के चेहरे पर सहज था।औरत जीवन में एक अदद मोहब्बत ही तो चाहती है मर्द से,बदले में उसके लिए खुशी खुशी कुर्बान हो जाती है। मैं उन लड़कियों और अंजुमन खाला में उलझी जाकर छत पर एकान्त पा चारपाई पर लेट गयी।नीचे शादी के घर की चहल पहल जारी थी।मैं लौट रही थी रंगरेज गली की स्मृतियों में....एक सुनहरा शहर फड़फड़ाकर पंख फैला उड़ रहा था.....अजान और आरती की एक साथ गूंजती आवाजों वाला शहर मऊ.....मऊवाली साड़ी....वनदेवी का विशाल नौरात्रों का मेला....मालिकताहिर बाबा की मजार से सटा मुख्य चौक बाजार और करघे की खटखट धुन पर थिरकती कर्मनिष्ठ उंगलियों का लय में नर्तन एक एक कर चलचित्र की तरह उभरने लगा।राग/विराग की गहरी खूंट यहीं कहीं गड़ी है आज भी मेरी,जिसके सहारे  चलती है  मेरी जिन्दगी .....एक टूटे सितार सी पड़ी स्मृतियों की डायरी में दर्ज यौवन के संगीतमय दिन की तलाश और बिखरे सपनों को समेटने की धुन रह गयी आज भी मन के किसी कोने में शेष....।
नीचे औरतें ब्याह का गीत गा रही थीं.....
बन पइठी खोजिहा ए बाबा चन्दन हो लकड़िया
देश पइठी खोजिहा ए बाबा पढ़ल हो पंड़ितवा.........
अचानक आँगन में से माँ की आवाज गूंजी...प्रियाsssssssss

मन भारी था....थकान से नींद भी आ रही थी। मैं बेमन से नीचे लौटी...माँ अपने कमरे में पलंग पर अपनी बिदाई की पीली बनारसी खोले सिर पर हाथ रखे दुखी बैठी थी। जाते ही.....ये देख प्रिया ,ड्राई क्लीन कराते खिसक गयी....वह रुआंसी थी। माँ इकलौते बेटे के परछन पर वही पहनना चाहती थी .....चालीस साल पुरानी साड़ी के रेशम के तन्तु कट गये थे।मैं चुप खड़ी देख रही थी कि माँ का फरमान जारी हुआ....कल अंजुमन बी के घर लेकर जाओ और उसी तरह दूसरी साड़ी पर आँचल बार्डर चढ़वा कर लाओ जैसा तुम्हें दिखाते समय बनवाया था। बारात तीन दिन बाद उठनी थी....मैंने लम्बी साँस छोड़ते हुए धीरे से कहा....उनकी सास तो कबकी मर खप गयीं,अब कौन करेगा?....साड़ी के प्रति गजब का मोह था माँ को,तन कर बैठ गयीं....मैं कुछ नहीं जानती,.....कल तुम लोग रंगरेज गली जाओ ....जरुर कोई मिलेगा।

अगले दिन समझा बूझा कर हम थक हार गये....माँ अड़ी रही।मैं छोटी बहन के साथ अन्तत:  बारह साल बाद रंगरेज गली में घुसी....कदम रखते पहले तो मुझे लगा कि हम किसी और गली में जा रहे हैं पर ध्यान देने पर पाया कि नुक्कड़ की शेख चचा की कचौड़ी की दुकान शेख स्वीट्स हाऊस में बदल गयी है। अगर आगे काउंटर पर बूढ़े शेख चचा न होते तो हम पहचान भी न पाते कि ये उनकी दुकान है।दुकान बहुत बड़ी थी....शायद घर का नीचे का पूरा हिस्सा तोड़ कर दुकान में उनके बेटों ने बदल दिया था।हाँ आगे की तरफ कढ़ाई में तैरती नाचती कचौड़ियों की पुरानी खुशबू जरुर आ रही थी।मैं दम साधे खड़ी थी कि बहन ने तन्द्रा तोड़ा....क्या देख रही है?...जल्दी चलिए।

गली पहले से चौड़ी हो गयी थी....दोनों तरफ के मकान ,दुकान में बदल गये थे। अच्छा खासा बाजार में बदल गया था रंगरेज गली। हम आगे बढ़ रहे थे ....न भट्ठियाँ दिख रही थीं न रंगों के रंगीन हण्डे। जिस गली में करघे की खटखट पूरे दिन सुनाई देती थी वहाँ आज कोई आवाज थी तो फिल्मी गीतों की ,....हम चले जा रहे थे,सामने रहमान टेलर का बोर्ड देख कदम ठिठके और हम यन्त्रवत गेट खोल घर में दाखिल हो गये।
जाज़िम
घर के बाहरी हिस्से में गहन सन्नाटा पसरा था..दरवाजे पर दस्तक दे हम खड़े हो गये....अन्दर से तेज आवाज आई....आती हूँsssss,दरवाजा खोलने वाली बड़बड़ा रही थी,दरवाजा खोलने की ड्यूटी केवल मेरी है....सबको सीढ़ियाँ उतरने नानी याद आती है।कमर टेढ़ी होती है...मैं नौकरानी हूँ क्या सबकी?.....दरवाजा खोलते प्रश्न दाग वह बिना हमारी सूरत देखे मुड़ गयी और दनदनाती सीढ़ियाँ चढ़ती वापस चली गयी। अन्दर एक बड़े से बरामदे में हम खड़े हो सोचने लगे क्या करें ?बरामदे के दोनों कोने से सीढ़ी ऊपर के तल्ले पर गयी थीं।शायद मकान चार हिस्से में बंट गया था ।दो बहने नीचे,दो ऊपर की कल्पना में उलझी सोच विचार रही थी कि सामने की खिड़की से एक नेह भरी लरजती आवाज कानों में पड़ी .....अरेsss! पिरिया.....और सामने का दरवाजा खटाक से खुला।सफेद झक्क सलवार कुर्ते में सामने अंजुमन खाला मुस्कुराते खड़ी थीं ,जैसे कह रही हों कि अब रंगरेज गली की संवेदनाऐं सुफैद हो गयी हैं बच्ची। ......हमें इशारे से बुलाकर अन्दर ले गयीं.... चौकी पर बिठा आवाज लगाई.....सनाss । बगल के कमरे से पर्दा सरका एक दुबली पतली बीमार बेवा सामने आ खड़ी हो गयी...मैं आवाक उसे ताकती एसी चकराई की कमरा आँखों के सामने नाचने लगा। सना धीरे से कुर्सी खींच आ कर हमारे सामने बैठ सुबकने लगी....मैं रोती रही....उफ्फ! ये सेमल की रुई सी सुकोमल लड़की क्या से क्या हो गयी ,सनाsss


वह उठ कर मुझसे लिपट गयी ...हम फूट पड़े...जैसे तपती धरती की दरारें स्याह बादलों की प्रतीक्षा में हूकती हैं ,सना को सौहर के लिए हूकते देख मैं तड़प उठी।सना के तीनों बच्चे आकर माँ से लिपट गये। दोनों बेटियों के बीच में बेटा , घर का मर्द,.....एक ना समझ दस साल का बच्चा अपनी माँ से लिपटा पूरी तरह दिलाशा दिला रहा था कि वह सब सम्हाल लेगा। खाला ने बताया...गलत संगत ने जावेद को असमय मौत के मुँह में ढ़केल दिया। वह पछतावे की आग में गीली लकड़ी सी सुलग रही थीं कि क्यों कर सास की बात मान सना को जावेद से ब्याहा।खैर जो होना था सो हो चुका था....घर की फूट साफ झलक रही थी....बेवा माँ बेटी एक बार फिर नए संघर्ष पथ पर थीं।हमने ढ़ाढ़स बँधा आने का कारण बताया ....अंजुमन खाला ने भारी मन से मुस्कुराने की कोशिश की....अम्मी जाते -जाते अपना हुनर और करघा सना को सौंप गयीं पिरिया!...आज कल इसी से घर चल रहा है। लोग खोजते हुए आते हैं इधर ,नम आँखो में बची अन्तिम उम्मीद की ड़ोर थामें अंजुमन खाला हमें अन्दर के कमरे में लेकर आईं ।मेज पर साड़ी फैलाकर देखा और हँस कर कहा ...गोटे को छोड़ सब झर गयी है।मैं आदतन मुस्कुराकर रह गयी। छोटी ने पूछा ....परसों तक हो जाएगी न खाला? कल आकर ले जाना ...उन्होंने पीठ ठोंकते हुए कहा।तुम्हारी माँ हमेसा घोड़े पर चढ़ कर काम भेजती है।हम सब हँस पड़े।सना की बेटियों ने बड़े प्यार से चाय नाश्ता कराया।अन्दर बनारसी साढ़ियों का ढ़ेर देख कर शूूकुन मिला कि चलो रोटी की किल्लत नहीं है खाला और सना को। हम घर लौटने लगे तो बच्चियों ने दुबारा आने का प्यार भरा न्योता दिया ।मैंने तीनों के हाथ पर पचास पचास की नोट रख टॉफी खाने का आग्रह किया और सना नाराजगी जताती रही कि यह सब क्यों कर रही हो ?खाला एक बार फिर रो पड़ी ....इन तीनों को खाला का मतलब तो आज पता चला है पिरिया ....वरना अपनी पेटजात तो चवन्नी ईदी तक हाथ पर नहीं रखतीं।सना चुप थी।हम फाटक से बाहर निकले तो ऊपर देखा ....चहल पहल थी ....रौनक भी।नीचे मातमी सन्नाटा ।खाला मौन .....सना भी ।मैं एक बार फिर सोच में पड़ गयी कि इतना सब कुछ बिखर गया और खाला ने किसी को कुछ भी बुरा नहीं कहा ,बदले में खुद को कोशती रहीं।आखिर उन्हें गुस्सा क्यों नहीं आता? सोचते चली जा रही मैं बिजली के खम्भे से टकराते टकराते बची,.....छोटी मेरी आदत जानंती थी।भनभनाते रिक्शा रोक मुझे हाथ पकड़ बिठाया और पूरे राश्ते फालतू बातें न सोचने की नसिहत देती रही।

एक दिन बाद मैं भाई संग बाईक से सना के घर साड़ी लेने पहुँची। आज उसकी छोटी बेटी खिलखिलाती हुई दौड़ कर मुझे देखते आई और हाथ पकड़ कर अन्दर ले चली....भाई ने पहले ही हड़का दिया था कि बैठना मत ,शादी का घर है। अन्दर पहले से साड़ी तैयार लिफाफे में पड़ी थी।सना ने मुस्कुराकर लिफाफा बढ़ा दिया । खाला भी सूचना पा बाहर निकलीं ...मैंने पाँच सौ की नोट बाजार भाव को ध्यान में रख खाला की तरफ बढ़ा दिया। खाला नाराज हो गयीं...दिमाग खराब है क्या तुम्हारा....जैसी सना वैसी तू मेरे लिए...पैसे  से तौलने लगी,हाथ थाम लिया और पैसे लौटा कर नम आँखों से देखती रहीं....नमी इतनी गहरी थी कि मैं डूबने लगी....सना भी नाराज हो रही थी।बाजार अपने चरम पर ,..रिश्ते रेडीमेट लिफाफों में सजे धजे जब बिक रहे हों पैसे के नाम पर ,खाला का प्रेम पाकिजगी की हद तक मुझे भींगोए लिए जा रहा था।मैं खाला के जीवन संघर्ष और हौसले की गवाह एक बार फिर सना के साथ उसी चौराहे पर उन्हें खड़ी देख रही थी ,जहाँ बरसों पहले  मिली थी । मैं खाला को पकड़ कर रो पड़ी।भाई बाहर बाईक पर बैठा बार -बार हार्न बजाए जा रहा था।शादी में आने का न्यौता दे मैं सना की छोटी बेटी के हाथ पर पाँच सौ की नोट रख चलने लगी...पैसे देते देख ऊपर से दनदनाती सब्बो उतरती हुई आई ....मैं बढ़ रही थी,कानों में सब्बो की आवाज साफ सुनाई दे रही थी....जो मिले सबकी रहमत इन्हीं के बाल बच्चों की है...हम तो जैसे शौतेले हैं आपके....ठूसों तुम्हीं लोग इनकी कमाईsssssssss
पीछे एक बार फिर मैं एक परवीन और अंजुमन की कहानी नए सिरे से उभरती छोड़े जा रही थी।मन में आज भी द्वन्द शेष था कि अंजुमन खाला को गुस्सा क्यों नहीं आता?

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