“रूह कंपाने वाली यात्रा–डायरी”

चैताली सिन्हा 

शोधार्थी - जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, भारतीय भाषा केंद्र
(हिंदी विभाग) . सम्पर्क:  .chaitalisinha4u@gmail.com

‘बनमाली गो तुमि पर जनमे होइयो राधा’
बांगला में गाया जानेवाला यह बाउल गीत बंगाली समाज में बहुत प्रचलित एवं कृष्ण को उलाहना देने के संदर्भ में है. बनमाली अर्थात् कृष्ण को राधा बनने और राधा के माध्यम से एक स्त्री के दर्द या स्त्री मन को समझने की ओर संकेत किया गया है. जिस प्रकार कृष्ण राधा को जीवनभर एक प्रेमिका ही बनाकर रखे और शायद कभी राधा की पीड़ा को नहीं समझ सके ठीक उसी प्रकार जब आप इस यात्रा डायरी को पढेंगे तो आप भी आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि अंततः इस शीर्षक का कितना गहरा अर्थ है, जो अपने शीर्षक के अर्थ को सार्थक करती नज़र आती है. अक्सर हम एक ही स्थान पर रहते – रहते ऊबने और छटपटाने लगते हैं और हमें उस स्थान की हर चीज़ बुरी लगने लगती है, और एकबारगी को मन ऐसा भी होने लगता है कि बस यहाँ से दूर बहुत दूर किसी अनजान जगह पर जाकर सुख और चैन के दिन बिताएं ! परन्तु जब आप इस यात्रा डायरी को पढेंगे, उसी क्षण आपका मोहभंग और उस अनजान जगह जाने का सपना दिल से निकल जाएगा . ठीक उसी तरह जिस तरह की एक कहावत हमारे देश में प्रचलित है – “दूर के ढोल सुहावने होते हैं .” कहने का तात्पर्य वह नहीं जो अबतक आप समझ रहे थे, बल्कि वह जो अब आप समझ सकेंगे . इस ‘यात्रा’ को पढ़ते हुए भारत से इतर उन तमाम देशों में घटित होनेवाली ऐसी मार्मिक और रोंगटे खड़े कर देने वाली घटनाएं जिनके बारे में सुनकर और सोचकर कलेजा मुँह को आ जाता है . कल्पना मात्र से शरीर का पोर-पोर एक भयानक टीस का अनुभव करने लगता है. इसे पढ़ते हुए मन और शरीर के भीतर जो कोलाहल मची हुई थी उसे शब्दों में बयाँ करना बहुत-बहुत मुश्किल है . दिल्ली से आरम्भ होकर कब यह बोस्निया एवं क्रोएशिया की भावभूमि पर ठहर जाती है, पता ही नहीं चलता . सीमोन द बोउआर से आरम्भ होकर कब क्रोएशियन हाइकू कवि तोमिस्लाव मारेतिच तक पहुँच जाते हैं इसका भी ज्ञान बहुत बाद में होने लगता है. यूरोप की यात्रा करना किसे प्रिय नहीं होगा, यहाँ तक कि विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर को भी प्रिय लगा होगा परन्तु इसी यात्रा के दौरान जो रचनाकार अपना अनुभव संसार उठा लाते हैं वह अद्भुत, रहस्यमय,अद्वितीय एवं अतुलनीय होते हैं. इस यात्रा डायरी में तमाम ऐसी घटनाएं उद्धृत की गई हैं जो साक्ष्य एवं आंकड़े सहित हैं. रचनाकार जब कुछ लिखते हैं तो तथ्यों सहित लिखते हैं, जिससे उनकी तटस्थता का आभास होता है. इतना ही नहीं बल्कि अपने अंतर्मन में न जाने कितने ही प्रश्नों के अंबार लगाए हुए वे अपनी घुमक्कड़ी प्रवृत्ति को अंजाम तक पहुंचाने को निकलते हैं. लिखने की सार्थकता पर विचार करते हुए गरिमा श्रीवास्तव एक बहुत बड़ा प्रश्न आज की उन युवापीढ़ी के बरक्स खड़ा करती नज़र आती हैं जब वह कहती हैं कि –“मेरे लिखने न लिखने से क्या फर्क पड़ता है . दुनिया में ..............किसी को जीवन पाथेय मिला .” (तद्भव/189). स्वयं के अनुभव से हम समाज को कितना कुछ दे सकते हैं, इस ओर भी इसका संकेत स्पष्ट है जहाँ वे अपनी बात भी टी.एस.इलियट के कथन से आरंभ करती हैं. यदि टी.एस.इलियट यह न कहते तो आज हमें भी यह वाक्य लेखिका के माध्यम से सुनने या पढने को नहीं मिलता – “डू आई डिस्टर्ब द यूनिवर्स .” परन्तु रचनाकार की घुमक्कड़ी प्रवृत्ति उन्हें विवश करते हैं अपने ही क़दमों से दुनिया को नाप लेने की . इस यात्रा डायरी को पढ़ते हुए सबसे पहला भ्रम तो यह टूटा कि अब तक जहाँ हम केवल अपनी डफली,अपना राग आलापते रहते थे, वह डफली इस यात्रा डायरी को पढ़ते हुए फट चुकी थी . यानी हमारी सीमित बुद्धि परिधि केवल भारतीय परिदृश्य तक ही फैली हुई होती है परन्तु यहाँ आप देश से ऊपर उठकर विश्व फ़लक में पहुँच जाते हैं और न केवल भारत देश में स्त्रियों की मार्मिक दशा का आपको ज्ञान होता है बल्कि विश्व की प्रायः प्रत्येक भूमि स्त्री पीड़ा की गाथा सुनाती नज़र आती है. आधी-आबादी कही जानेवाली स्त्री वास्तव में कितनी आधी-अधूरी और हीन भाव से देखी और समझी जाती है इसकी जानकारी हमें इस यात्रा डायरी से होने लगता है.
 
 
 प्रथम विश्वयुद्ध से लेकर द्वितीय विश्वयुद्ध तक जितने भी देशों ने एक-दुसरे देशों पर विजय पताका फहराई वहां हर पराजित देश ने न केवल अपना साम्राज्य खोया बल्कि वस्तुओं के साथ-साथ स्त्री अस्मिता को भी खाया, लूटा . क्या कारण है कि जिस उद्देश्य से युद्ध लड़ा जाता है वह उद्देश्य वहां की केंद्रबिंदु से हटकर स्त्री शोषण पर केन्द्रित हो जाती है? युद्ध में स्त्री अस्मिता का लूटा जाना क्या इस ओर संकेत नहीं कि आज भी स्त्री देह मात्र एक संपत्ति समझी जाती है. स्त्री देह ही स्त्री की दीन-हीन दशा का कारण है. तो क्या आधी आबादी कहा जानेवाला यह वेद वाक्य थोथा साबित नहीं हो जाता? और कितना समय अभी बाक़ी है स्त्री को मनुष्य समझने में? उसे मानव श्रेणी में रखने में? रचनाकार इस यात्रा में तमाम ऐसे आंकड़े बताती नज़र आती हैं जहाँ स्त्री का शोषण सर्व सैन्यों द्वारा बड़ा ही क्रूरता एवं वहशियाना तरीके से किया गया था – “सन 1992-95 के दौरान क्रोएशिया, बोस्निया, हर्जेगोविना में जो स्त्रियाँ सर्व सेनाओं के दमन का शिकार हुईं, लिली उनमें से एक है. युद्ध के दौरान बलात्कार, यौन हिंसा के हज़ारों मामले सामने आए कुछ मामले सरकारी फाइलों में दब गए,कुछ भुला दिए गए और कुछ शिकायतें वापस ले ली गयीं .” वहीं प्रथम विश्वयुद्ध एवं द्वितीय विश्वयुद्ध में कई देशों में सैन्य और अर्धसैन्य बलों ने सामूहिक बलात्कार की अनगिनत घटनाओं को अंजाम दिया . “प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान बेल्जियम और रशिया औरतों के लिए सामूहिक मरणस्थली बने, वहीं   कोरिया,चीन,फिलीपींस और जर्मनी में बड़े पैमाने पर स्त्रियों को घर्षित किया गया .” (तद्भव;पृ.200).सदियों से कुचली गई स्त्री अस्मिता का इतना भयानक एवं वीभत्स रूप देखकर आज स्त्री विमर्श की बात करना बेमानी सा लगता है. कौन-सी ऐसी मिट्टी है इस जहाँ में, जहाँ औरत को नंगा न किया गया हो? उसकी लुटी-पिटी अस्मिता में भी रस न लिया गया हो? मरकर फ़िर से मरने का मर्म केवल स्त्री समझती है, वह पितृसत्ता समाज नहीं जो आज स्त्री विमर्श जैसे शब्द से परहेज़ करता नज़र आता है.


अफ्गानिस्तान,अल्जीरिया,अर्जेन्टीना,बांग्लादेश,ब्राज़ील,बोस्निया,क्रोएशिया,सर्बिया आदि ऐसे अनेक देशों की लम्बी सूची है – जहाँ यौन हिंसा और स्त्री घर्षण की घटनाएं हुईं और बड़े-बड़े भाषणों,राजनैतिक समझौतों के बीच प्रतिरोधी आवाजें दबा दी गयीं . युद्ध के दौरान स्त्री का बलात्कार होना एक बड़ा प्रश्न यह खड़ा करता है कि क्या स्त्री पूरे परिवार के साथ-साथ उस समाज की धूरी का भी प्रतिनिधित्व नहीं करता ? जिसको विजित करने के लिए सर्वप्रथम उस परिवार या समाज की स्त्री को टारगेट किया जाता है. लेखिका के अनुसार सन 1991-1995 के दौरान सर्ब सैनिकों ने सैन्य कैम्पों, होटलों, वेश्यालयों में बड़े पैमाने पर यौन हिंसा के सार्वजनिक प्रदर्शन किए . बोस्निया और हर्जेगोविना पर जब तक सर्बिया का कब्जा रहा, किसी उम्र की कोई स्त्री ऐसी नहीं बची, जिसका शोषण  या बलात्कार न किया गया हो . इसी तरह इस यात्रा डायरी में लेखिका ने न जाने कितने ही ब्यौरे क्रमवार से हमारे समक्ष प्रस्तुत किए हैं,जिन्हें पढ़कर मन बजबजा जाता है और दुःख एवं आक्रोश से भर उठता है. फिर चाहे वह बांग्लादेशी स्त्रियों का पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा किया गया घर्षण हो या युगांडा के सिविल वार और ईरान में स्त्रियों से ज़बरदस्ती यौन संबंध बनाने की घटना ? या फिर चीन के नानकिंग में जापानी सेना द्वारा स्त्रियों का सामूहिक यौन उत्पीड़न आदि . विकसित एवं प्रगतिशील कहे जाने वाले देशों में भी स्त्री के साथ इतना क्रूर व्यवहार होना संभव हो पाया है इससे बड़ा आश्चर्य और कुछ नहीं हो सकता . भूमंडलीकरण का दौर नया नहीं है,आज विश्वबंधुत्व की परिकल्पना भी नयी नहीं है बल्कि बीसवीं सदी में ही इसका शोर ज़ोर पकड़ चुका था . कहने का अर्थ यह है कि यदि विकसित देशों में भी स्त्री की इतनी भयावह स्थिति रह चुकी है तो विकासशील कहे जानेवाले देश (भारत) की स्थिति का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है. परन्तु एक सच्चाई यह भी है जिस ओर लेखिका ने इशारा किया है कि इन देशों में किस क़दर बेरोजगारी एवं गरीबी है. जिसका आधार है ख़राब अर्थव्यवस्था .  इतनी ग़रीबी एवं बेरोज़गारी की समस्या कि छात्रों को अपने जेब खर्च हेतु दिहाड़ी पर काम करना पड़ता है, वह भी एक सीमित सीमा एवं ऋतु में . परन्तु यहाँ एक दूसरा तथ्य हमारे समक्ष यह भी है कि वहां के बाज़ारों में उत्पाद तो है परन्तु उपभोक्ता (क्रेता) वर्ग की कभी है. तुर्केबाना का ज़िक्र करते हुए लेखिका बताती हैं कि – “बाज़ार है,खरीददार नहीं . बड़ी – बड़ी दुकानें, जिनमें जूते की दुकानें बहुतायत में हैं,वे वीरान हैं. सामान है, सजावट  भी.....खरीदने वालों से निहारने वालों की संख्या कई गुना ज़्यादा है. आम-आदमी की क्रयशक्ति कमज़ोर हो चली ही . छात्र-छात्राएं ‘सेल’ के मौसम की प्रतीक्षा करते हैं.” (पृ.193).
       

इसी संदर्भ में आगे जाग्रेब के ‘सेकेण्ड हैण्ड’ मार्केट का ज़िक्र हमें मिलता है जहाँ की तुलना हम दिल्ली की ‘सरोजिनी’ अथवा ‘करोलबाग़’ मार्केट से कर सकते हैं. दिखावे की संस्कृति केवल भारत में ही नहीं जाग्रेब जैसे देशों में भी देखने को मिलती है. जहाँ खरीदारों की भीड़ दिल्ली के फुटकर विक्रेताओं की तरह लगी रहती है. एक बार प्रयोग में लाए जा चुके वस्तुओं को पुनः प्रयोग में लाने का प्रचलन, वह भी बड़े सस्ते एवं चाव से . यह ‘सो कॉल्ड शो ऑफ़ कल्चर’ ही तो है! यहाँ देखनेवाली बात यह है कि प्रवास में रहकर या घूम कर ही आप अपने देश के साथ साम्यता और वैसम्यता का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं. इस यात्रा डायरी में आप पाएंगे कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का यूरोपीय देशों में उस समय यानी सन 1926 से ही कितना प्रभाव पड़ चुका था कि उनकी ‘गीतांजलि’ को लोग साहित्यिक कृति के रुप में सराहने लगे थे . सन 1926 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर जाग्रेब गए और वहां से ‘रिएका’ का दौरा भी किया . लेखिका बताती हैं कि – “दार्शनिक पावाओ वुक पाब्लोविच (1894-1976) ने ‘गीतांजलि’ का क्रोएशियन में अनुवाद किया था जो जाग्रेब के दैनिक ‘भोर का पत्ता’ में 1914 की जानकारी में धारावाहिक रूप में छपा था . बाद में पावाओ ने ‘चित्रा’, ‘मालिनी’ और ‘राजा’ का भी अनुवाद किया . ‘चित्रा का मंचन ‘क्रोएशियन नेशनल थियेटर’ में 1915 में कई बार हुआ .” समय कितना मूल्यवान होता है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि आज कवि गुरु न जाने कहाँ होंगे परन्तु उनकी साहित्यिक योगदान आनेवाली पीढ़ी तक भी याद रखेगी . मुझे याद नहीं कि निम्नलिखित पंक्तियाँ किसकी है, परन्तु इतना याद है कि बचपन में मैं इसे अक्सर अपनी माँ और बड़ी माँ के मुँह से सुना करती थी –
“समय  चोलिया जाए, नोदिर स्रोतेर पांए                                                                                               जे जोन न बुझे तारे धिक्-शत-धिक् 
    बोलेछे सोनार घोड़ी (घड़ी),टिक-टिक-टिक
          जा किछु बाकी आछे कोरे फेलो ठीक
            बोलेछे सोनार घोड़ी टिक-टिक-टिक..........!”

संपूर्ण यात्रा डायरी स्त्री-यातना एवं उसकी करुण आहः और चीत्कार से भरा हुआ है. प्रायः हर देश का ज़िक्र मात्र ही है स्त्री दासता की कहानी, उसकी दयनीय दशा का चित्रण . यह यात्रा हमें उन देशों का सैर कराते हुए चलती हैं,जहाँ स्त्री को ग़ुलाम और यौन दासी बनाकर रखने का सिलसिला बहुत लम्बे समय तक चलता रहा . चाहे वह देश बोस्निया हो या हर्जेगोविना . इन दोनों देशों पर जब तक सर्बिया का कब्ज़ा रहा, किसी उम्र की कोई स्त्री ऐसी नहीं बची जिसका घर्षण या बलात्कार न किया गया हो . (पृ.203) इसका उदाहरण देख सकते हैं – “बोजैक बोस्नियाई विद्ध्यार्थी है, जो जाग्रेब में पढ़ता है, साथ ही कुछ रोजगार भी . उसकी उम्र पचास के ऊपर ही है, उसके सामने ही उसकी आठ वर्षीय बेटी और पत्नी को बार – बार घर्षित किया गया . बच्ची तीन दिन तक रक्त में डूबी रही, सैनिक उससे खेलते रहे,इस बीच कब उसने अंतिम सांस ली,पता नहीं .”
    

ओह! वाकई ‘लाइफ मस्ट गो ऑन’............! ऐसे ही न जाने कितनी हृदय विचलित कर देनेवाली घटनाओं का उल्लेख लेखिका ने इस यात्रा में किया है,जिसे पढ़ते ही आँखें शून्य और भीतर गहरे एक भयानक चीत्कार, हाहाकार से भर उठता है. दिल को यकीन दिलाना कठिन हो जाता है यह पढ़कर कि किस तरह का क्रूर एवं अमानवीय व्यवहार सर्ब सैनिकों द्वारा मुस्लिम स्कूली लड़कियों के साथ किया गया . किस प्रकार यौन हिंसा एवं उन्हें ग़ुलाम बनाकर रखा जाता था . नस्लीय एवं जातीय भेद का कडुवा अनुभव यहाँ पढने को मिलता है. बोस्नियाई बच्चियों के साथ जो दुर्व्यवहार सैनिकों द्वारा किया गया उसे पढ़कर वाकई कभी – कभी यह एहसास होने लगा था कि एक औरत के साथ इससे बदतर और कुछ हो ही नहीं सकता . इन घटनाओं को पढ़ते हुए ऐसा अनुभव हुआ कि स्त्री न केवल अपने देश में बल्कि वैश्विक धरातल पर भी कितनी कुचली एवं प्रताड़ित की जाती रही है. इस पूरे यात्रा वृतांत से एक बात हमें यह भी जानने को मिलती है कि लेखिका का भाषा पर ज़बरदस्त अधिकार है, जो स्थान विशेष पर बोली जानेवाली भाषा का प्रयोग करती जान पड़ती हैं . दिल्ली की खड़ी बोली से शुरू होकर कोलकाता की बांगला,बिहार की भोजपुरी,अंग्रेजी,बोस्निया,क्रोआतिन (क्रोएशियाई) और न जाने क्या – क्या . यह एक ख़ास विद्वता है जो प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की पहचान है. जब हम क्रोएशिया की बात करते हैं तो वहां की भयावह स्थिति का ज्ञान होता है जहाँ लेखिका इस यात्रा डायरी में बतातीं हैं कि असल में क्रोएशिया का इतिहास युद्ध का इतिहास है. सन 1991 तक संयुक्त युगोस्लाविया का अंग रहा क्रोएशिया अपने भीतर युद्ध की अनगिनत कहानियों को लिए मौन है.

स्लोवेनिया,हंगरी,सर्बिया,बोस्निया,हर्जेगोविना और मांटेग्रो से इसकी सीमाएं घिरी हैं. आज के 21,851 वर्ग मील में फैले क्रोएशिया ने एक तिहाई भूमि युद्ध में खो दी . लेखिका इसका उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लिखतीं हैं –“भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् की ओर से क्रोएशिया के जाग्रेब विश्वविद्यालय में जब उन्हें अध्यापन के लिए भेजा गया तो पूर्वी यूरोप के इस भाग में युद्धोत्तर यूरोप के जीते-जागते साक्ष्यों से उनके सामने एक ऐसा चेहरा प्रस्तुत किया गया जो उनकी दैनन्दिनी का हिस्सा बना .” क्रोएशिया के संदर्भ में जो सबसे चौंकाने वाली बात लेखिका बताती हैं कि किस प्रकार यह सेक्स ट्रेफिकिंग के लिए पश्चिमी यूरोप के प्रमुख द्वार का काम करता है,जहाँ  स्लोवेनिया,बोस्निया और सर्बिया से औरतों,लड़कियों को आसानी से लाया जाता है. बहुत ही भयावह!
  


उपर्युक्त जानकारियाँ किसी भी सभ्य समाज एवं देश की संस्कृति के लिए सबक लेने जैसा कार्य हो सकता है, जहाँ एक ओर तो स्त्री को देवी एवं पूज्या बनाई जाती हैं और वहीं दूसरी ओर उसी स्त्री की अस्मिता की चिंदी-चिंदी उड़ाई जाती है. उसे केवल मात्र एक देह एवं भोग्या समझकर उसका दलन किया जाता है. जिस स्त्री के सम्मान मात्र से देवता  के वास होने के वेद-वाक्य कहे गए हैं वहीं स्त्री का केवल और केवल अपमान एवं शोषण होता दिखाई देता है. उसे मानव समझने में जब तक समाज सक्षम नहीं होगा, तब तक स्त्री अस्मिता लुटती रहेगी . )
                “फिर भी कहते हो कह डालूं, दुर्बलता अपनी बीती
                 तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे यह गागर रीति .”

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